राष्ट्रीय एकीकरण पर निबंध |Essay on National Integration

राष्ट्रीय एकीकरण पर निबंध

राष्ट्रीय एकीकरण पर निबंध अथवा भारत में राष्ट्रीय एकीकरण : बाधाएं एवं उपाय 

किसी भी देश की सुदृढ़ता, स्थिरता एवं विकास के लिए राष्ट्रीय एकीकरण को आवश्यक माना जाता है। यह बात भारत पर भी लागू होती है। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण को ध्यान में रखकर ही हमारे संविधान में ‘राष्ट्र की एकता एवं अखंडता’ पर विशेष बल दिया गया है। वस्तुतः राष्ट्र की एकता एवं अखंडता ही एक मजबूत राष्ट्र की आधारशिला होती है। राष्ट्रीय एकीकरण राष्ट्रीय एकता की वह प्रक्रिया है, जो हमें राष्ट्र निर्माण, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, लोकतंत्रीकरण, आधुनिकीकरण एवं बहुआयामी विकास की ओर अग्रसर करती है और समग्रतः राष्ट्रवाद की जड़ों को मजबूत करती है। 

अनेक प्रकार की विविधताओं के बावजूद भारत में राष्ट्रीय एकीकरण | की भावना सदैव विद्यमान रही। भारतीय जनमानस में भारतीयता का | बोध सदैव रहा। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की प्राचीनता को समझने के लिए विष्णु पुराण का यह उद्धरण दृष्टव्य है- 

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैब दक्षिणम्।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः॥

समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में जो भूखंड है, वह भारत वर्ष है तथा वहां की संतानें भारतीय हैं। भारत में विषमताओं के बावजूद भूमितत्व से समान जुड़ाव एवं भावनात्मक लगाव ने सदैव राष्ट्रीय एकीकरण को पुष्ट किया। प्राचीनकाल में राष्ट्रीयता की जो नींव रखी गई, उसे कोई हिला नहीं पाया। सच तो यह है कि भारतवासियों की राष्ट्रीय एकीकरण की प्रबल भावना से ही विचलित होकर अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना कर औपनिवेशिक साम्राज्य की जड़ें पुख्ता करने के पुरजोर प्रयास किए, तथापि वे राष्ट्रीय एकीकरण की आत्मा को मार नहीं पाए। भारतवासियों की एकजुटता के आगे अंग्रेज टिक नहीं पाए और अंततः उन्हें भारत छोड़ कर जाना पड़ा। 

“राष्ट्रीय एकीकरण राष्ट्रीय एकता की वह प्रक्रिया है, जो हमें राष्ट्र निर्माण, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, लोकतंत्रीकरण, आधुनिकीकरण एवं बहुआयामी विकास की ओर अग्रसर करती है।” 

आजादी के बाद हमने लोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत बनाने का प्रयास किया और अपने संविधान की उद्देशिका में इसको ध्यान में रखकर राष्ट्र की एकता एवं अखंडता पर तो विशेष बल दिया ही, संघ तथा राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन के बावजूद संप्रभुता का कोई विभाजन नहीं किया गया। राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए देश में एकल नागरिकता का प्रावधान किया गया। समान नागरिक संहिता की व्यवस्था की गई, तो लोकतंत्रात्मक समाजवाद की अवधारणा का प्रतिपादन किया गया। संविधान में जहां पंथ निरपेक्षता को स्थान दिया गया, वहीं राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने तथा भाई-चारा बनाए रखने के लिए संविधान की उद्देशिका में बल प्रदान किया गया। इस तरह हम देखते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय एकीकरण की आधारशिला हमारे संविधान में रख दी थी। 

संविधान की भावना के अनुरूप स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की पहलें एवं प्रयास बराबर होते रहे। राष्ट्रीय एकीकरण पर सम्मेलन आहुत किए गए, तो ‘राष्ट्रीय एकता परिषद’ (NIC) का गठन किया गया। समय-समय पर राष्ट्रीय एकता परिषद का पुनर्गठन कर इसे अधिक सक्षम एवं प्रभावशाली बनाने के प्रयास भी हए। परिषद द्वारा यथासामर्थ्य जातीय, नृजातीय एवं साम्प्रदायिक विद्वेष पर नियंत्रण पाने के उपाय सुनिश्चित किए गए, तो साम्प्रदायिक, जातीय, प्रांतीय एवं भाषाई एकरसता एवं सौहार्द बढ़ाने की कोशिशें भी की गईं। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप उन लोगों पर शिकंजा कसने के लिए कानून बनाए गए, जो साम्प्रदायिक, धार्मिक, नृजातीय एवं भाषाई आधार पर वैमनस्य पैदा कर राष्ट्रीय एकीकरण में बाधा पैदा करते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की स्थापना में सहायक एकात्मक एवं रचनात्मक विचारधारा वाले लोगों को प्रोत्साहित करने की भी तमाम पहलें होती रहीं। 

राष्ट्रीय एकीकरण की अनेकानेक पहलों के बावजूद भारत में अलगाववादी एवं विघटनकारी शक्तियों की सक्रियता बनी रही, जिससे जहां राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया बाधित हुई, वहीं राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के लिए खतरे भी बढ़े। यही कारण है कि राष्ट्रीय एकीकरण में भारत पिछड़ गया। अलगाववादी शक्तियों के संकीर्ण स्वार्थों के कारण जहां ‘उपराष्ट्रीयता’ की भावना बढ़ी, वहीं आतंकवाद एवं विघटन बढ़ा। ऐसा उन बाधाओं के कारण हुआ जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में अवरोधक की भूमिका निभाती हैं। भारत में ऐसी बाधाओं की भरमार हैं। ये बाधाएं इतनी अधिक हैं कि स्थानाभाव के कारण इन पर सविस्तार तो प्रकाश नहीं डाला जा सकता, तथापि संक्षिप्ततः इन्हें रेखांकित किया जाना भी आवश्यक है। 

सारतः हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग की मुख्य बाधाएं जातिवाद, जनजातिवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद (प्रादेशिकता), भाषावाद, आर्थिक असमानता, राजनीति का अपराधी करण, नक्सलवाद, आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार एवं काला धन आदि हैं। नैतिकता एवं राष्ट्रीय सोच का अभाव, भौगोलिक विषमता तथा स्थानीय स्वायत्तता की प्रबल भावना भी वे कारण हैं, जिन्होंने भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की गति को रोक रखा है। एक राष्ट्रीय भाषा का न होना भी राष्ट्रीय एकीकरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है, जबकि हिन्दी इस दृष्टि से एक सक्षम एवं समर्थ भाषा है। यह कहना असंगत न होगा कि भारत में इन बाधाओं की जड़ें अत्यंत गहरी हैं तथा इनके वृक्ष इतने विशाल, विषाक्त और घने हैं कि ये अपनी विषैली छाया के तले राष्ट्रीयता की भावना, राष्ट्र के प्रति निष्ठा, समर्पण एवं प्रतिबद्धता के पौधों को पनपने नहीं देते। 

राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को गति एवं लय देने के लिए अभी भारत में कहीं अधिक प्रतिबद्ध एवं पारदर्शी प्रयासों की आवश्यकता है। यह काम अकेले सरकार के बूते का नहीं है। इसके लिए नागरिक | समाज को भी आगे आना हो समाज को भी आगे आना होगा। दोनों के समन्वित प्रयासों से ही देश में राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को बल मिल सकता है। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ाने के लिए पहली जरूरत तो यह है कि हम देशवासियों में राष्ट्रवादी भावना को विकसित किए जाने के पुरजोर प्रयास करें, जिनमें मनोवैज्ञानिक प्रयास भी सम्मिलित हों। नागरिकों में राष्ट्रवादी, राष्ट्र समर्पित एवं राष्ट्र प्रतिबद्ध मनोविज्ञान जिस दिन हम विकसित कर लेंगे तथा उनमें सबसे पहले हिन्दुस्तानी होने का जज्बा पैदा कर लेंगे, उस दिन इसके सामने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग की सारी बाधाएं बौनी पड़ जाएंगी। हालांकि यह काम बहुत आसान नहीं है, क्योंकि भारत में इस काम को जटिल बनाने वाले विविध ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक कारक विद्यमान हैं। राष्ट्रवाद का मनोविज्ञान बनाने के लिए हमें उपाय भी मनोवैज्ञानिक करने होंगे। इसके लिए हमें मनोवैज्ञानिक पद्धतियों का सहारा लेकर राष्ट्रवाद का विकास करना होगा। 

हमें राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद, जनजातिवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद (प्रादेशिकता), भाषावाद, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार एवं काला धन, नक्सलवाद एवं आतंकवाद एवं राजनीति के अपराधीकरण जैसी राष्ट्रीय एकीकरण विरोधी दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा, तो नागरिकों में नैतिकता को विकसित करना होगा। नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करने के लिए हमें नैतिक शिक्षा को अनिवार्य बनाना होगा। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए शैक्षिक पाठ्यक्रमों में भी बदलाव की आवश्यकता है। यह ऐसा होना चाहिए कि इससे राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता, निष्ठा, समर्पण एवं सेवा के भाव प्रबल रूप से विकसित हों और हम अपने सार्वजनिक जीवन एवं व्यवहार में राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च वरीयता दें। हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्रदान कर भी हम राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बना सकते हैं, क्योंकि एक संपर्क भाषा को राष्ट्रीय एकीकरण एवं राष्ट्रीय विकास के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। 

“हमें राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद, जनजातिवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद (प्रादेशिकता), भाषावाद, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार एवं काला धन, नक्सलवाद एवं आतंकवाद एवं राजनीति के अपराधीकरण जैसी राष्ट्रीय एकीकरण विरोधी दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा।” 

राष्ट्रीय एकीकरण के लिए सुशासन भी अनिवार्य शर्त है। जहां सुशासन होता है, वहां अलगाव एवं असंतोष के बीज नहीं पनप पाते। भारत में 28 राज्य एवं 9 केंद्र शासित प्रदेश हैं। इनमें विविधताएं भी हैं, तो इनकी अलग-अलग किस्म की समस्याएं एवं जटिलताएं भी हैं। सुशासन के अभाव में इन समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता और ये विकराल रूप धारण करने लगती हैं। फलतः अलगाववाद, अराजकता एवं हिंसा बढ़ने लगती है, जिससे राष्ट्रीय एकीकरण की गति मंद पड़ने लगती है। सुशासन से हम इस समस्या का हल निकाल सकते हैं। संघ सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह बगैर भेदभाव के सभी प्रदेशों को समान दृष्टि से देखे और वहां विकास की पारदर्शी नीतियों को अपनाकर 

सभी को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करे। साथ ही | सरकारों का यह भी दायित्व बनता है कि वे राष्ट्रीय महत्त्व तथा | राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता से जुड़े प्रकरणों में ढुलमुल रवैये का परिचय न दें और दबाव मुक्त होकर कार्य करें। ऐसे प्रकरणों में राजनीतिक रोटियां सेकने की दुष्प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाना होगा।

राष्ट्र निर्माण, आर्थिक विकास, राजनीतिक विकास, सामाजिक न्याय, समृद्ध लोकतंत्र, आधुनिकीकरण एवं प्रगतिशीलता के लिए राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकीकरण पहली जरूरत है। राष्ट्रीय एकता एवं एकीकरण से ही राष्ट्र की सुरक्षा एवं संरक्षा सुनिश्चित होती है तथा इसकी अस्मिता अक्षुण्ण रहती है। ऐसे में हर सच्चे देशवासी का यह दायित्व बनता है कि वह राष्ट्रीय एकीकरण के प्रति प्रतिबद्ध रहकर राष्ट्र निर्माण में अपना यथेष्ट योगदान दे। ऐसा करते हुए हमें, धर्म, वर्ग, पंथ, सम्प्रदाय, क्षेत्र एवं जाति आदि की दीवारों से ऊँचा उठना होगा। यही सच्चा राष्ट्र धर्म है। 

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