राष्ट्रीय एकता पर निबंध |Essay on National Unity in Hindi

राष्ट्रीय एकता पर निबंध

राष्ट्रीय एकता पर निबंध |Essay on National Integration in Hindi

प्राचीन काल में भारत की राष्ट्रीय एकता का स्वरूप आज से बहुत भिन्न था। उस समय सामंतवादी व्यवस्था थी। छोटे-छोटे राज्यों की भी अपनी अलग स्थिति थी। उस समय की राष्ट्रीयता आज की भांति व्यापक और ठोस नहीं थी। भारत में अनेक राज्य स्थापित थे। कन्याकुमारी से हिमालय तक और असम से सिंध तक भारत की सांस्कृतिक चेतना एक थी। यही एकात्मकता हमारी राष्ट्रीय एकता की नींव थी। उस समय भी भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की अपनी अलग परंपरा, रीति-रिवाज और आस्थाएं थीं, लेकिन समूचा भारत एक सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध था। इसी को अनेकता में एकता कहा जाता है। जैसे शतदल कमल अनेक पंखुड़ियों के मिलन से शोभायमान होता है, वैसे ही भारत अनेक जातियों, भाषाओं एवं विश्वासों के सम्मिलन से रूपाकार था। यही उसकी शोभा थी। 

कहने का तात्पर्य यह है कि अनेकता में एकता ही भारत की विशेषता है। यही विशेषता तब भी थी और आज भी है, किंतु कहीं से कृत्रिम नहीं है। अगर गौर किया जाए, तो पता चलेगा कि अनेकता में ही एकता अपेक्षित है। एक जाति या एक से मनुष्यों में एकता आम बात है, लेकिन अनेकता या विविधता की स्थिति में दृढ़ एकता होना विशेष बात है। ऐसी विशेषता दुनिया के किसी भी अन्य देश में दुर्लभ है। अनेकता में एकता से मुग्ध होकर पं. नेहरू ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “There is unity amidst diversity in India.” 

हम अनेक तरह के हैं। हममें से कोई गोरा, कोई काला, कोई पंडित, कोई मुल्ला, कोई ईसाई, कोई सिक्ख, कोई असमी, कोई गुजराती, कोई शहरी, कोई देहाती और कोई आदिवासी है। लेकिन जब हमारे सामने भारत की बात आती है, तो हम सभी भारतवासी हैं । उस समय हम जाति, धर्म, संप्रदाय या क्षेत्र आदि किसी तत्व से प्रभावित नहीं होते। भारत की अनेकता में निहित एकता से हमें यह संदेश मिलता है कि हम न हिंदू हैं, न मुसलमान, न सिक्ख, न ईसाई, बल्कि एक इंसान हैं और भारत में जन्म लेने के कारण मात्र भारतवासी हैं। 

लेकिन दुख यह है कि कालांतर में आपसी फूट और स्वार्थपरता के कारण हमारी राष्ट्रीय एकता का मूल तत्व क्षीण होने लगा था। फिर हमारी आंतरिक दुर्बलता का लाभ उठाकर विदेशी शक्तियों ने इस पर अधिकार कर लिया और हमारा देश परतंत्र हो गया। इन विदेशी शक्तियों ने अपनी बर्बरता से हमारी सभ्यता और संस्कृति को विनष्ट करना शुरू कर दिया। हमारी आस्थाओं तथा धार्मिक मूल्यों का हनन हुआ और हमारा गौरव अक्षुण्ण नहीं रहा। 

एक हजार वर्ष के बाद अनेक संघर्षों, बलिदानों और कठिन साधनों से हमें पुनः स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी। अब भारत की पहली आवश्यकता आर्थिक विकास और नवनिर्माण के लिए राष्ट्रीय एकता की है। इसके बिना हम प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकते। जब तक समूचा राष्ट्र संगठित होकर एक लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ता, तब तक नये भारत का निर्माण संभव नहीं है।

 हमारे देश की एकता के मूल में सबसे महत्वपूर्ण तत्व सांस्कृतिक एकता है। हमारी संस्कृति, जाति, धर्म तथा संप्रदाय आदि बाद की चीजें हैं। प्रांतीयता, क्षेत्रीयता, आंचलिकता, भाषा-भेद की प्रवृत्ति, सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाई भतीजावाद, आतंकवाद, अलगाववाद आदि के कारण हमारी एकता बाधित होती है। हमारे देश का इतिहास गवाह है कि सांप्रदायिकता और अलगाववाद के कारण अनेक महान व्यक्तियों को अपने प्राण गंवाने पड़े। 

आतंकवाद में भय फैलाने और अलगाववाद में उत्पीड़ित करने का भाव होता है। इन्हीं के कारण क्षेत्रीयता या भाषाई आधार पर देश के टुकड़े होते हैं। प्रांतीयता की भावना तो देश को बांटने का द्योतक है। सांप्रदायिक भावना अत्यंत ज्वलनशील होती है। इससे सर्वनाश भी हो सकता है। जब तक देश के अंदर विघटनकारी और विध्वंसकारी प्रवृत्ति पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं किया जाएगा, तब तक भारत की एकता एवं अखंडता पर खतरा बना रहेगा। अतः भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह देश की एकता और अखंडता के लिए हर संभव प्रयास करे तथा देश के गौरव की रक्षा के लिए बलिदान हेतु तत्पर रहे। 

इसके अलावा हमारे देश के प्रबुद्ध वर्ग का कर्तव्य है कि वह जनता को राष्ट्रीय एकता और अखंडता की उपादेयता से अवगत कराए। अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित की चिंता करें। इसी भावना के पनपने से देश की एकता और अखंडता की रक्षा हो सकती है। इसके लिए सभी सरकारी प्रयास व्यर्थ होंगे, अगर देश का नागरिक जागरूक नहीं होगा।

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