राष्ट्रीय आयुष मिशन पर निबंध | Essay on National Ayush Mission

राष्ट्रीय आयुष मिशन पर निबंध

राष्ट्रीय आयुष मिशन पर निबंध | Essay on National Ayush Mission

राष्ट्रीय आयुष मिशन पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पूर्व यह जान लेना उचित होगा कि ‘आयुष’ है क्या। ‘आयुष’ (AYUSH) से अभिप्राय है, आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध (सिद्धा) एवं होम्योपैथी। ये सभी प्राचीन एवं पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियां हैं, जिनका संक्षिप्ताक्षर ‘AYUSH’ (आयुष) है। आयुर्वेद का अर्थ जहां ‘जीवन का ज्ञान’ है, तो योग वह आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा शरीर, मन एवं आत्मा को एकीकृत किया जाता है। यूनानी वह प्राचीन चिकित्सा पद्धति है, जिसमें शरीर के पंचमहाभूतों (अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु एवं आकाश) पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सिद्ध (सिद्धा) के तहत यह प्रतिपादित किया गया है कि एकाग्रचित्त साधना द्वारा व्यक्ति ‘सिद्ध’ बन सकता है। होम्योपैथी उस समरूपता के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार रोग को उत्पन्न करने वाली औषधि रोग को जड़ से दूर कर सकती है। 

हमारे देश में एक पृथक मंत्रालय के रूप में 9 नवंबर, 2014 को आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) की स्थापना की गई थी. जबकि राष्ट्रीय आयुष मिशन का शुभारंभ 15 सितंबर, 2014 को किया गया। इसका लक्ष्य जहां देश की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहन देना है, वहीं देश में एलोपैथिक चिकित्सकों की कमी को आयुष चिकित्सकों से पूरा किया जाना है। इस मिशन के अच्छे परिणामों को देखते हए 15 दिसंबर, 2017 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रीय आयुष मिशन को 1 अप्रैल, 2017 से 31 मार्च, 2020 तक जारी रखने की मंजूरी प्रदान की गई। इस पर तीन वर्ष की अवधि के दौरान लगभग 2400 करोड़ रुपये का लागत खर्च आएगा। गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए इस योजना हेतु 1939.76 करोड़ रुपए आवंटित किए है| 

राष्ट्रीय आयुष मिशन के उद्देश्य अत्यंत व्यापक हैं। इसके जरिए जहां आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध (सिद्धा) एवं होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों का उन्नयन कर उन्हें और प्रभावी बनाना है, वहीं ऐसी किफायती आयुष सेवाएं उपलब्ध कराना है, जो सबकी पहुंच में हों। साथ ही पहाड़ी एवं दूर-दराज के दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के अंतराल को दूर करना है। मिशन के तहत जहां आयुष स्वास्थ्य सेवा की बेहतर पहुंच, आयुष प्रशिक्षित जनशक्ति तथा दवाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाना है, वहीं उन्नत आयुष शिक्षण संस्थानों की स्थापना द्वारा आयुष शिक्षा में सुधार किया जाना है। साथ ही, फार्मेसियों एवं आयुष प्रयोगशालाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित कर कड़े प्रवर्तन तंत्र द्वारा जिम्मेदारी को सुनिश्चित किया जाएगा। इसके तहत लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक तो बनाया ही जाएगा, दवाओं की गुणवत्ता में वृद्धि भी की जाएगी। लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। इस मिशन के अंतर्गत जड़ी-बूटियों के उत्पादन को बढ़ाकर न सिर्फ इनकी घरेलू मांग को पूरा किया जाएगा, बल्कि इनके निर्यात को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें जहां आयुष दवा निर्माताओं को गुणवत्ता मानकों को अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जाएगा, वहीं आयुष दवाओं के निर्माण हेतु आवश्यक कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इस मिशन की केंद्र और राज्य स्तरों पर समुचित निगरानी की व्यवस्था की गई है। इसके लिए मूल्यांकन इकाइयां स्थापित की जाएंगी। 

आयुध मिशन के अनेक लाभ हैं। इससे लोगों को कम लागत की दवाएं उपलब्ध होंगी, जिससे वे लाभान्वित होंगे। दवाओं और स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच बढ़ने से विशेष रूप से पहाड़ी एवं दूर दराज के दुर्गम इलाकों में रहने वाले लाभान्वित होंगे। आयुध शिक्षा में सुधार से हमारी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां पुनर्जीवित होगी तथा इनमें लोगों का विश्वास बढ़ेगा। रोजगार के नए अवसर सृजित होंग, तो देश में जड़ी-बूटियों (Herbal) का उत्पादन बढ़ेगा। किसान औषधीय पौधे अधिक से अधिक लगाकर लाभान्वित होंगे। योग और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ेगा, तो स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता भी बढ़ेगी। 

यह कहना असंगत न होगा कि स्वस्थ भारत के निर्माण में राष्ट्रीय आयुध मिशन की विशेष उपादेयता है। इसके लाभों को देखते हुए ही इस मिशन को मार्च 2020 तक जारी रखने की मंजूरी प्रदान की गई है। इससे जहां हमारी पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों का उन्नयन होगा, वहीं आयुध सेवाओं से देशवासी लाभान्वित होंगे। हम स्वस्थ और सबल बनेंगे। 

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