नैनो टेक्नोलॉजी पर निबंध |Essay on Nanotechnology in Hindi

Essay on Nanotechnology in Hindi

नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी (Nano Science and Technology) 

वैज्ञानिकों ने हमेशा ही अपनी सहज शोध प्रवृत्ति और अनवरत क्रियाशीलता के द्वारा प्रकृति में छिपे बसे गुणों एवं विशेषताओं को मानव हितकारी रूपों में ढालकर समाज को परोसा है. इसी सहज वैज्ञानिक क्रियाशीलता और शोधीय प्रवृत्ति के चलते महान् वैज्ञानिक रिचर्ड थिनमैन ने नोबेल पुरस्कार प्राप्ति के समय आज से साढ़े चार दशक से भी पूर्व 29 दिसम्बर, 1959 में अपने तत्कालीन भाषण से नैनो विज्ञान की भावी सम्भावनाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था. आज वैज्ञानिकों के प्रयास के चलते थिनमैन की वह सोच उत्तरोत्तर ठोस वास्तविकताओं के रूप में सामने आ रही है. 

वर्तमान समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकीय शोध के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित नैनो शब्द ग्रीक भाषा की उत्पत्ति है जिसका अर्थ है ‘ठिगना’ या ‘नाटा’. इस तकनीक के माध्यम से कार्बन को वाष्पित कर उसे सक्रिय गैसों में संघनित करके उसके क्रिस्टल बनाए जा सकते हैं तथा कार्बन की अतिसूक्ष्म नलिकाएं, गोले, खोल बर्फ के फाहे और अन्य उपयोगी सूक्ष्म कणों का बनाया जाना सम्भव हुआ है. इस प्रविधि से उत्पादित सूक्ष्म कणों का उपयोग कैंसर की नई दवाओं के साथ ही अन्य रोगों के उपचार में किया जा सकता है.

नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मूल आधार 

स्थूल पदार्थों को लघुकत कर जब अत्यन्त सूक्ष्म स्थिति में पहुँचा दिया जाता है तब इसके गुणधर्म में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ जाता है. पदार्थों के सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया से प्राप्त एक निर्धारित आकार वाले कणों को नैनो कण या नैनो तत्व कहते हैं. नैनो रूप में सूक्ष्मीकृत इन पदार्थीय कणों में आने वाले विशेष गुण ही इस नई क्रान्तिकारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मूल आधार है.

नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी की कल्याणकारी खोजें 

नैनो विज्ञान से उपजी तकनीकों ने पेयजल, ऊर्जा, कृषि, संचार एवं विश्वव्यापी प्रदूषण की समस्या के साथ ही कैंसर तथा ऐसी अन्य जानलेवा बीमारियों के निवारण के लिए विश्ववासियों को नया पैकेज दिया है. इस क्रान्तिकारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा आविष्कृत विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त हो रहे प्रभावकारी साधनों में से कुछ के विवरण इस प्रकार हैं 

कैंसर जैसे लाइलाज रोगों के निवारण में नैनो विज्ञान की भूमिका- नैनो तकनीकों की उपयोगिताओं पर काम कर रहे जर्मनी स्थित ‘मैक्स प्लांक’ संस्थान के वैज्ञानिकों ने ‘क्वांटम डाट्स’ बनाया है. इसी प्रकार अमरीका के ‘कार्नेल विश्वविद्यालय’ के वैज्ञानिकों ने ‘कार्नेल डाट्स’ का निर्माण किया है. चुम्बकीय पदार्थों के स्वर्ण आवरण से ढके ये क्यूबिन्दु चुम्बकीय घूर्णन क्षमताओं से युक्त होते हैं. 

शरीर के किसी भी भाग के कैंसरग्रस्त होने पर वहाँ की कुछ कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. कैंसर के रोगी द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भोजन का अधिकतम भाग कैंसर वाली कोशिकाओं के पोषण में ही खर्च हो जाता है. ये कैंसरग्रस्त कोशिकाएं भोजन से बनने वाली ऊर्जा एवं पोषक तत्वों को बहुत तेजी से अपनी ओर खींच लेती है. अतः रोगियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भोजन एवं पोषक तत्वों के साथ किसी भी दवा को आसानी से इन तक पहुँचाया जा सकता है. 

अस्थि चिकित्सा में नैनो विज्ञान-जैव संवेदी नैनो विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहे नॉर्थ वेस्टर्न विश्वविद्यालय के डॉ. सैमस्टप और उनकी टीम ने स्वयं जुड़ने वाली एक ऐसी कृत्रिम नैनो हड्डी का निर्माण किया है जो एक बार आकार पा लेने पर असली हड्डी की तरह मजबूत हो जाती है. इस कृत्रिम नैनो हड्डी से टूटी हड्डियों को जोड़ने के साथ ही हड्डीजनित विकृतियों को दूर भी किया जा सकता है.

 नैनो रोबोट- नैनो वैज्ञानिकों ने पेंसिल से बनने वाले बिन्दु से भी करोड़ों गुना छोटे ऐसे रोबोट बनाने में सफलता पाई है जिससे कैंसर रोधी दवा के कोशकीय घटनाक्रम की सम्पूर्ण क्रियाओं को चलचित्र की भाँति दिखाने में सफल रहे हैं. आने वाले दिनों में नैनो वैज्ञानिक नैनो कणों से बने इस प्रकार के सूक्ष्म रोबोटों के द्वारा कैंसर फैलाने वाली कोशिकाओं को खोज कर नष्ट करने में पूरी तरह सक्षम होकर कैंसर पर लगाम लगा सकेंगे. 

वैज्ञानिक ऐसे नैनो रोबोट के निर्माण के बहुत निकट हैं जो किसी बीमार कोशिका तक पहुँच कर उसे दवाई का टीका और सूई लगा सकेंगे. चिकित्सक इस तकनीक से दवा को सीधे शरीर के रुग्ण भाग पर पहुँचाने में सक्षम होंगे. इस तकनीक से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि स्वस्थ अवयवों को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा और वह पूरी तरह सुरक्षित रह सकेंगी. 

रोग निरोधक वस्त्र- वैज्ञानिकों ने नैनो तकनीक के सहयोग से ऐसे धागों का निर्माण कर लिया है जिनसे बने वस्त्र कई तरह के रोगों के निवारण के सक्षम होंगे. इन वस्त्रों से बुखार, मधुमेह, दर्द, मानसिक तनाव सहित कई तरह की शारीरिक और मानसिक व्याधियों को नियंत्रित किया जा सकेगा. 

सिरेमिक पदार्थों के इंजन- सामान्यतया मोटर वाहन और जेनरेटर सहित अन्य सभी प्रकार के इंजन ढलवाँ लोहे (कास्ट आयरन) या मिश्र धातुओं से बनाए जाते हैं. ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए जब इन इंजनों में पेट्रोल या डीजल का दहन होता है तब यहाँ बहुत ऊँचे तापमान और गैस का उत्पादन होता है. ये गैसें भारी दबाव से पिस्टनों से उत्पन्न ऊर्जा से ही वाहनों और इंजनों को चलाने का काम करती हैं. पेट्रोल-डीजल के दहन से उत्पन्न ऐसी गैसें अत्यधिक संक्षारक होती है. इन संक्षारक गैसों के साथ ही भारी दाब और उच्च ताप को धातुओं के बने इंजनों में पिस्टन और सिलेण्डर के अन्दरूनी हिस्सों में तेजी से घिसावट होती है, जिससे इंजनों से धातुओं के बारीक कणों से युक्त विषाक्त गैसें उत्सर्जित होती हैं, जो वातावरण में विषकारी, प्रदूषणीय प्रभाव भी छोड़ती हैं. आज सम्पूर्ण विश्ववासी वाहनीय प्रदूषण से त्रस्त हैं. लम्बे समय से वैज्ञानिक इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि ये इंजन संक्षारक-प्रतिरोधी पदार्थों से बनने लगे. इससे जहाँ इंजनों की आय बढ़ जाएगी वहीं प्रदूषणकारी विषाक्त तत्वों के उत्सर्जन में भी भारी कमी होगी. आधुनिक नैनो वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान सिरेमिक नैनो कण बना कर प्रस्तुत कर दिया है. नैनो कण आकारों में पहुँच कर ये सिरेमिक पदार्थ धातुओं की तरह आघात सहने और फैलने वाले गुणों के धारक बन जाते हैं. 

खरोंच प्रतिरोधी क्षमता वाले प्लास्टिक लेंस-नजर से कमजोर किसी भी व्यक्ति द्वारा काँच के लेंस वाले चश्मों का प्रयोग आम बात है. काँच से बने ये लेंस अपनी पारदर्शिता और घिस कर लेंस का रूप दिए जाने की विशेषता के कारण ही प्रयोग में लाए जाते हैं. काँच के ये लेंस भंजनशील और भारी होते हैं. प्लास्टिक से बने घात सहनीय अभंजनशील चश्मों के लेंस भी प्रयोग में लाए जाते हैं, जो उत्तरोत्तर कमजोर पड़ती नजर वाले लोगों को मोटे लेंसों वाले वजनी चश्मों से नाक पर पड़ने वाले भार की परेशानी से बचाते हैं, लेकिन प्लास्टिक के लेंस काँच की अपेक्षा मुलायम होने के कारण खरोंच लगने से पारदर्शिता खोकर जल्दी ही बेकार हो जाते हैं. नैनो वैज्ञानिकों ने आघातसह्य, हल्के प्लास्टिक के लेंसों पर जिरकोनियम के नैनो कण (जिरकोनियम ऑक्साइड) की कोटिंग करके पारदर्शी प्लास्टिक लेंसों की सतह को खरोंच रहित बनाने का फॉर्मूला खोज लिया है. जिरकोनियम की कोटिंग वाले ये लेंस हल्के आघात सह्य, भंजन रहित, खरोंचरोधी गुणों से युक्त होते हैं काँच के भारी और भंजनशील लेंसों की तुलना में इनका प्रयोग निरापद, आसान और सुविधाजनक हो गया है. 

धातुओं के नैनोकरण से लाभकारी फल-ताँबे को स्थूल रूप की तुलना में 50 नैनोमीटर तक लघुकृत करने पर इसकी मजबूती दोगुनी हो जाती है, इसी क्रम में यदि ताँबे के स्थूल आकार को 6 नैनोमीटर तक लघुकृत किया जाता है, तो उसकी मजबूती पाँच गुनी बढ़ जाती 

उत्प्रेरक गुणों से सम्पन्न रेडियम और प्लैटिनम जैसी धातुएँ जब नैनो आकार में लघुकृत होती हैं तब उनकी उत्प्रेरकीय क्षमताओं में और बढ़ोतरी हो जाती है. इन धातुओं के गुणधर्म में यह परिवर्तन नैनो रूप में लघुकृत होने पर पृष्ठीय क्षेत्रफल (आयतन) के बहुत अधिक बढ़ने के कारण होता है. 

कैडमियम सेलेनाइट द्वारा प्रकाश उत्सर्जन अलग-अलग आकार के कैडमियम सेलेनाइट के बने नैनों कणों को किसी द्रव में मिलाने के बाद परखनलियों से भरे इस द्रव पर जब सफेद रोशनी डाली जाती है, तब अलग-अलग आकारों वाली कैडमियम सेलेनाइट के नैनो कणों से युक्त द्रवों वाली परखनलियों से भिन्न-भिन्न वर्गों का प्रकाश उत्सर्जित होता है. इस प्रकार के परिणाम से यह स्पष्ट होता है कि कैडमियम सेलेनाइट जैसा प्रकाश उत्सर्जन क्षमता से रहित पदार्थ भी नैनो आकार में आकर प्रकाश उत्सर्जक बन जाता है, इसी प्रकार सिलिकॉन जैसे इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकी के आधार पदार्थ को भी नैनो रूप में प्रकाश उत्सर्जक बनाया जाता है. 

ऊर्जा के नए साधन-जीवाश्मीय ऊर्जा स्रोतों के लगातार दोहन से उनके खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो गया है. नैनो तकनीकी के उपयोग से इस विश्वव्यापी समस्या का निराकरण सम्भव है, नैनोकृत पदार्थों के सूक्ष्म आयाम और विशेष सतही क्षमता तथा प्रकाशिक विशेषताओं के कारण ऐसी बैटरी का निर्माण सम्भव है, जो आज काम कर रही बैटरियों की अपेक्षा अधिक समय तक काम कर सकने वाली, अधिक बिजली देने वाली हल्की और कारगर होगी. 

इस दिशा में काम कर रहे नैनो वैज्ञानिक लिथियम बैटरी इलेक्ट्रोड पर शोधरत् हैं. इससे ऊर्जा के अधिक समय तक भण्डारण का मार्ग प्रशस्त होगा. 

सूक्ष्मीकृत नैनो कणों की स्थिति, आकार मापन इकाई और मापन उपकरण– पदार्थों का सूक्ष्मीकरण या लघुकरण क्रमशः मिलीमीटरों, माइक्रोनों से और आगे जाकर नैनो मीटर के बाद ऑगस्ट्रोम तक पहुँचता है. नैनोमीटर के आकार की सूक्ष्मताओं को सामान्य रूप से सूई के उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझा जा सकता है- 1 नैनोमीटर सूई के नोंक के 1 अरबवें हिस्से के बराबर होता है, वहीं एक गोल नैनो कण जिसका व्यास 3 नैनोमीटर के बराबर होता है उसमें 900 परमाणु समा सकते हैं, यानि एक नैनोमीटर व्यास वाले बिन्दु में तीन सौ परमाणु आ सकते हैं. 

नैनो कणों की आकार सीमा 1 नैनो-मीटर से आरम्भ होकर 100 नैनोमीटर तक जाती है. वास्तव में एक नैनोमीटर 10-9 मीटर के बराबर होता है. परमाणुओं को आँगस्ट्रोम (A) पैमाने से मापा जाता है. 1 ऑगस्ट्रोम (A) 10-10 मीटर के बराबर होता है. इस प्रकार एक नैनोमीटर = 10A होता है. इसे और आसानी से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि एक रेखा पर स्थित तीन से चार परमाणु = 1 नैनोमीटर. 

नैनो संरचनाओं के मापीय उपकरण– ऊपर दिए गए विवरण से नैनो संरचनाओं की सूक्ष्मता का सहज अन्दाज लगाया जा सकता है. इससे यह भी स्पष्ट है कि नैनोकृत पदार्थों के आकार को सामान्य मापन उपकरणों से नहीं मापा जा सकता अतः नैनो विज्ञान के आरम्भ में इसके मापन उपकरणों (स्कैनिंग खोजी यन्त्र) का निर्माण किया गया. नैनो संरचनाओं को मापने के प्रमुख उपकरण इस प्रकार हैं-(1) एटामिक फोर्स, माइक्रोस्कोपी (ए. एफ. एम.) तथा (2) स्कैनिंग टनलिंग माइक्रोस्कोप (एस. टी. एम.). 

पदार्थों का नैनोकरण-स्थूल पदार्थों से नैनो कणों की प्राप्ति के लिए वांछित पदार्थ के निपिडों को विशेष प्रकार की भट्ठी में वाष्पीकृत बिन्दु तक गरम किया जाता है. इसके पास ही द्रव नाइट्रोजन को गुजार कर ठण्डा किए एक खोखले सिलेण्डर को रखा जाता है. वांछित पदार्थ का निपिंड जब वाष्पित स्थिति में पहुँचता है तब उसे द्रव नाइट्रोजन द्वारा ठण्डा किए गए खोखले सिलेण्डर की सतह तक पहुँचा दिया जाता है. सिलेण्डर के ठण्डा होने के कारण वाष्पीकृत पदार्थ उसकी सतह पर लघुकृत नैनो कणों के वे (क्रिस्टल) के रूप में जमा होकर इकट्ठा होने लगते हैं. पदार्थों के क्रिस्टलों के जमा होते ठण्डे खोखले सिलेण्डर को घूर्णित करते रहते हैं, ताकि लघुकृत क्रिस्टलों के कण मिलकर बड़े क्रिस्टल का रूप न धारण कर लें. इसके बाद सिलेण्डर की सतह को उपयुक्त अपघर्षक के सहयोग से खुरच कर प्राप्त किए गए. नैनो कणों को एकत्र कर लिया जाता है. प्राप्त नैनो कणों को विश्लेषित कर उपयोग की दृष्टि से वर्गीकृत करने के बाद संग्रहित कर आवश्यकता के अनुसार प्रयोग किया जाता है. 

(1) बॉटम अप विधि-इस विधि में विद्युत्-रसायन तकनीकों के प्रयोग से नैनो कणों की प्राप्ति की जाती है. ये तकनीकें कैडमियम सल्फाइड (CaS) तथा कैडमियम सेलेनाइट (CdSe) जैसे अर्द्धचालक पदार्थों से नैनो कणों की प्राप्ति की सर्वोपयुक्त प्रणाली है. 

(2) टाप डाउन विधि-इस विधि से स्वतन्त्र धातुओं और मिश्र धातुओं के नैनो कण प्राप्त किए जाते हैं. इस विधि में ‘बाल मिलिंग’ तकनीक के रूप में स्थूल नमूनों को एक बॉल मिल में प्रेषित कर नमूनों का नैनो कण तक लघुकरण किया जाता है.. 

वर्तमान समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकीय शोध के क्षेत्र में नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सर्वाधिक चर्चा है. ऐसा अनुमान है कि आगामी डेढ़-दो दशक में महान् वैज्ञानिक चिंतक थिनमैन द्वारा संकेतिक विज्ञान की यह उपयोगी शाखा जब अपने चरम पर होगी उस समय हमारे समस्त क्रिया-कलापों में इसका प्रभावकारी हस्तक्षेप होगा. 

वास्तव में नैनो विज्ञान आज के मानव की तमाम समस्याओं को हल करने में सक्षम विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का बहुउपयोगी व्यापक समुच्चय है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सभी शाखाओं में नई सम्भावनाओं की ओर संकेत कर रहा है. रुख को देखते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में विश्व की सम्पूर्ण वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय शोध की दशा दिशा के निर्धारण में नैनो विज्ञान की भूमिका प्रमुख हो जाएगी.

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