नमामि गंगे पर निबंध | Essay on Namami Gange in Hindi

नमामि गंगे पर निबंध

नमामि गंगे पर निबंध | Essay on Namami Gange in Hindi  गंगा स्वच्छता कार्यक्रम के उत्साहवर्धक परिणाम अथवा’नमामि गंगे’ 

गंगा भारत का गौरव है। यह मात्र एक नदी नहीं है, बल्कि भारतवासियों की जीवन-रेखा है। यह असंख्य भारतवासियों की आस्था का केंद्र है, तो लोगों की आजीविका का साधन भी है। यही वह नदी है, जिसकी गोद में सभ्यताएं विकसित हुईं 

और पुष्पित-पल्लवित हुईं। विडंबना यह है कि जिस गंगा की पवित्रता की हम दुहाई देते नहीं अघाते, जिस गंगा की कसमें उठाते हैं, वही गंगा आज बढ़ते प्रदूषण से आहत है। प्रदूषण की शिकार भव्या भगीरथी की भव्यता न जाने कब की तिरोहित हो चुकी है। अब न गंगा अविरल रही, न निर्मल। वह सिर्फ उदास और मलिन है। 

प्रदूषण और गंदगी की शिकार गंगा को इस त्रासद स्थिति से उबारने की पहले समय के साथ-साथ चलती रहीं. मगर अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो सके। ताजा पहल एकीकृत तरीके से गंगा को निर्मल बनाने के लिए ‘नमामि गंगे’ के रूप में सामने आई है। इस पहल के बारे में चर्चा करने से पूर्व, उन पहलों के बारे में संक्षेप में जान लेना प्रासंगिक रहेगा, जो गंगा सफाई के निमित्त पहले की जा चुकी हैं। नदी में व्याप्त प्रदूषण के उपशमन और जल गुणवत्ता में सुधार करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा 1985 में केंद्रीय गंगा प्राधिकरण’ और ‘गंगा परियोजना निदेशालय’ का गठन किया गया था तत्पश्चात 14 जनवरी, 1986 को ‘गंगा कार्य योजना’ (GAP : Ganga Action Plan) का शुभारंभ किया गया था जिसके दो चरणों तथा हजारों करोड़ रु. के व्यय के बाद भी बेहतर परिणाम नहीं प्राप्त हए। इस कार्य योजना की समीक्षा के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा 31 दिसंबर, 2009 को ‘मिशन क्लीन गंगा’ प्रारंभ करने की घोषणा की गई थी तथा इस संदर्भ में पहले ही प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGBRA) का गठन भी किया गया था। गंगा सफाई की इन पहलों के संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की’। 

गंगा सफाई के पूर्व में हुए प्रयासों की निष्फलता को देखते हुए अब एक बार फिर प्रदूषण की मार से छटपटा रही राष्ट्रीय नदी गंगा को स्वच्छ एवं संरक्षित करने के उद्देश्य से ‘नमामि गंगे’ के रूप में एक अभिनव पहल की गई है। 13 मई, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में संपन्न केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में केंद्र सरकार के महत्त्वाकांक्षी फ्लैगशिप कार्यक्रम ‘नमामि गंगे’ को स्वीकृति प्रदान की गई। इस एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन का उद्देश्य गंगा नदी को स्वच्छ और संरक्षित करने संबंधी प्रयासों को व्यापक रूप से समेकित करना है। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (NGRBA) के तहत क्रियान्वित हो रहा है। वर्ष 2020 तक इस परियोजना पर 20,000 करोड़ रुपये खर्च आएगा। 

 ‘नमामि गंगे’ की खास बात यह है कि गंगा सफाई की पिछली योजनाओं के क्रियान्वयन की असफलताओं से सबक लेते हुए अब इस कार्यक्रम में राज्यों के साथ जमीनी स्तर की संस्थाओं यथा शहरी स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थानों को क्रियान्वयन स्तर पर शामिल किया गया है। गंगा नदी संरक्षण की इस वृहद योजना में पूर्व योजनाओं की तुलना में क्रियान्वयन के प्रारूप में एक बड़ा परिवर्तन किया गया है, जिसके तहत बेहतर और सतत परिणाम हासिल करने के लिए नदी के किनारों पर रहने वाले लोगों को परियोजना में शामिल करने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसी का एक घटक है ‘गंगा ग्राम योजना’। 15 जनवरी, 2016 को तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती द्वारा उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के ग्राम पुठ से ‘गंगा ग्राम योजना’ का शुभारंभ किया गया। इस योजना के तहत गंगा किनारे स्थित देश के 1,600 ग्रामों का विकास किया जाएगा। पहले चरण में इस योजना के तहत 200 ग्रामों का चयन किया गया है। इन ग्रामों की खुली नालियों एवं नालों को गंगा में गिरने से रोककर अपशिष्ट निकासी और उसके शोधन की वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है तथा पक्के शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना में जल के शुद्धीकरण हेतु एक विशिष्ट जल तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका विकास ‘भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान’ द्वारा किया गया है। इस तकनीक के माध्यम से पौधों एवं सूक्ष्म जीवों द्वारा जल की अशुद्धि को दूर किया जाएगा। जल गुणवत्ता की निगरानी ‘राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर’ द्वारा की जाएगी, जो कि इसरो का अनुषंगी संगठन है। 

केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न गतिविधियों एवं परियोजनाओं का शत-प्रतिशत वित्तीय भार वह वहन करेगी ताकि कार्यक्रम की प्रगति को त्वरित गति प्रदान की जा सके। साथ ही पिछली गंगा कार्य योजनाओं के असफल परिणामों को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम 10 वर्षों की अवधि तक इस कार्यक्रम के परिचालन और परिसंपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था स्वयं करने का निर्णय लिया गया है। इसके अतिरिक्त इस कार्यक्रम के तहत गंगा नदी के अति प्रदूषित स्थलों (Pollution Hotspots) के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP)/विशेष प्रयोज्य वाहन (SPV) व्यवस्था को अपनाया जाएगा। गंगा को प्रदूषित होने से बचाने संबंधी प्रयासों को सुचारु रूप से लागू करने के लिए केंद्र सरकार की प्रादेशिक सैन्य इकाई (Territorial Army Unit) के तौर पर ‘गंगा इको-टास्क फोर्स’ की 4 बटालियनें स्थापित करने की भी योजना है।

गंगा स्वच्छता कार्यक्रम के उत्साहवर्धक परिणाम सामने आने लगे हैं। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल के 52 जिलों में गंगा तट पर स्थित 4470 गांवों को ‘नमामि गंगे’ के तहत खुले में शौच से मुक्त बनाया गया। इसी क्रम में गंगा तट पर स्थित 24 गांवों को ‘गंगा ग्राम’ के रूप में रूपांतरित किया गया। नमामि गंगे कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए थल सेना की मदद से । “गंगा वाहिनी बटालियन’ की पहली कंपनी 4 जनवरी, 2016 को दमक्तेश्वर में तैनात की गई। ऐसी तीन और कंपनियों की तैनाती कानपुर, वाराणसी एवं इलाहाबाद में की जानी है। गंगा तट पर तनात इस वाहिनी के जवान यह सुनिश्चित करेंगे कि औद्योगिक इकाइया एवं नागरिक गंगा को प्रदषित न करें। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत समग्र रूप से कल 187 प्रोजेक्ट स्वीकृत किए जा चक जिनका परिव्यय 16565.34 करोड़ रुपये है। इसके तहत किए जाने वाले कार्य हैं—सीवेज अधोसंरचना, घाटों एवं श्मशानों का विकास, नदी की सतह की सफाई जैव-विविधता संरक्षण, ग्रामीण स्वच्छता एवं गंगा सफाई में जनभागीदारी। 187 में से 47 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं जबकि शेष निष्पादन के विभिन्न चरणों में हैं। गंगा का प्रदूषण घटाने, उसके संरक्षण और उद्धार के लिए सरकार ने गंगा रिवर बेसिन के तहत 11 राज्यों को अधिसूचित किया, जिनमें बिहार, दिल्ली, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल एवं उत्तराखंड शामिल हैं। इनमें वे राज्य भी सम्मिलित हैं, जिनसे निकलने वाली नदियां गंगा में मिलती हैं। 

सबसे अच्छी बात तो यह है कि ‘नमामि गंगे’ के क्रियान्वयन से गंगा में स्वच्छता बढ़ी है। जल में घुली ऑक्सीजन गैस (डीओ), जैवकीय ऑक्सीजन मांग (बीओडी) तथा जल में मल कॉलीफॉर्म स्तर की जांच वे मानक हैं, जिन्हें आधार बनाकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गंगा जल की गुणवत्ता की जांच की गई। बोर्ड द्वारा यह निर्धारित किया गया कि जल की बेहतर गुणवत्ता हेतु इसमें घुली ऑक्सीजन का स्तर 5 एमजी/1 से अधिक और जैवकीय ऑक्सीजन की मांग का स्तर 3 एमजी/1 से कम होना चाहिए। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े दर्शाते हैं कि पांच राज्यों से होकर बहने वाली गंगा नदी के किनारे स्थित 10 नगरों में इसके जल में धूली ऑक्सीजन गैस का स्तर वर्ष 2017 में 5 एमजी/1 से अधिक था। इनमें से अधिकांश नगरों में गंगा जल के नमूने में घुली ऑक्सीजन का स्तर 7.7 एमजी/1 से 8.8 एमजी/ 1 के बीच पाया गया, जबकि ऋषिकेश में यह 10 एमजी/1 के स्तर पर था। स्पष्ट है कि गंगा जल की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह राय दी है कि अभी भी गंगा में कचरे की मात्रा में कमी लाने की जरूरत है। और अधिक संख्या में मल जल उपचार संयंत्रों की स्थापना का भी मशविरा दिया गया है। गंगा को प्रदूषित करने वाले उद्योगों पर भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सख्त हुआ है। बोर्ड के अधिकारियों द्वारा दिसंबर, 2015 से नवंबर, 2017 के दौरान 1109 प्रदूषणकारी उद्योगों का निरीक्षण किया गया और कचरा निपटान हेतु निर्धारित मानकों का उल्लंघन करने वाले 508 उद्योगों को बंद करने के निर्देश दिए गए। 

सारतः कहा जा सकता है कि अच्छी पहलें हो रही हैं और धीरे-धीरे गंगा की सेहत सुधर रही है। परिणाम सकारात्मक और उत्साहवर्धक हैं। गंगा की शुचिता वापस लौट रही है। गंगा जल्द ही प्रदूषण मुक्त होगी और हम फख्र से कह सकेंगे कि हमारे देश में स्वच्छ, निर्मल और अविरल गंगा बहती है। 

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