विद्यालय में मेरा पहला दिन पर निबंध।Essay on my first day in school

विद्यालय में मेरा पहला दिन पर निबंध।Essay on my first day in school

विद्यालय में मेरा पहला दिन पर निबंध।Essay on my first day in school

अपने स्नातक अग्रज से मैं अक्सर सुना करता था कि महाविद्यालय के बिना ज्ञान नहा (No knowledge without college)। विद्यालय की चहारदीवारी लाँधकर मेरा मन विश्वविद्यालय के उन्मुक्त वातावरण के लिए तरसता रहता था। मैं जिस शुभघड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था, आखिर वह आ गई। 

दूर देहात से मैं पटना आया था। 10 जुलाई से हमारी पढ़ाई शुरू होनेवाली थी। 10 जुलाई को ज्योंही अशोकपथ की भीड़ चीरता हआ मेरा रिक्शा महाविद्यालय के द्वार पर आया, मेरा मन इसके भव्य भवन को देखकर अभिभूत हो गया। ओह ! यहाँ पटना महाविद्यालय, जनक और याज्ञवल्क्य, चंद्रगुप्त और चाणक्य के गरिमामंडित विहार का इस काल का सबसे प्राचीन उच्चशिक्षा-संस्थान है। एक शताब्दी से अधिक वर्षों से (स्थापना : 9 जनवरी, 1883) इसने राष्ट्र के चतुर्मुखी जीवन को अच्छी तरह प्रभावित किया है। लॉ कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज तथा साइंस कॉलेज इसी से छिटककर अलग हुए हैं। जे० के० रोजर्स के समय से आज तक सुयोग्य प्राचार्यों की परंपरा रही है। पंडित रामावतार शर्मा, गोरखप्रसाद सिंह, डॉक्टर ज्ञानचंद, डॉक्टर धीरेंद्रमोहन दत्त जैसे महान शिक्षकों की परंपरा इसे मिली है। यह अध्ययन और विद्याव्यसन, चरित्रनिर्माण और संस्कृति, व्यवस्था और अनुशासनबद्धता, उत्कृष्टता एवं दक्षता का प्रमाण माना जाता है। यह प्रख्यात विद्वानों, महान देशभक्तों, जनप्रिय राजनेताओं, विख्यात अधिवक्ताओं, अनुभवी पत्रकारों तथा सुयोग्य प्राध्यापकों का निर्माण-गह रहा है। बिहार में जो कुछ उत्तम और महान है, वस्तुतः उसका संपोषण यहीं हुआ है। यह सब सोचते-सोचते मेरा रिक्शा प्रशासकीय भवन की बरसाती में लग जाता है। 

रिक्शावाले को पैसे देकर ज्योंही भवन के भीतर जाता हूँ, सामने विशाल पुस्तकालय – के काउंटर के सामने पुस्तकाध्यक्ष बैठे दिखाई देते हैं। इधर-उधर छात्रों का आना-जाना लगा है। मैं जरा पूरब की ओर बढ़ता हूँ, तो देखता हूँ कि दीवार पर टँगे सूचनापट्ट पर छात्रों का झुंड मधुमक्खियों की तरह टूट पड़ा है। मैंने एक छात्र से पूछा-भाई साहब, आप किस कक्षा में पढ़ते हैं? उसने कहा-‘फर्स्ट ईयर।’ फिर उससे रूटीन के बारे में बात हुई और उसने बताया कि आज तीसरी घंटी अर्थात् 11-20 मिनट पर हिंदी-रचना की कक्षा है-कमरा-नं० 11। 

अभी दिन के ग्यारह बज रहे थे। कुछ लड़कों के साथ मैं प्रशासकीय भवन के पश्चिम विशाल भवन की दूसरी मंजिल पर पहुँचा। कमरा-नं० 11 एक विशाल दीर्घा है। मुझ देहाती, छोटे-छोटे कमरावाले विद्यालय में पढ़नेवाले छात्र को तो यह दीर्घा कोई विशाल रंगशाला-सी प्रतीत हो रही थी। कुछ छात्र बेंचों पर बैठे हुए थे। मेरी नजर खिड़की के शीशे से गंगा की ओर गई। सावन के इस महीने में गंगा किसी मदभरी युवती की तरह अपने सर की वेणी झुलाती हुई, अपने नूपुरों की झंकार सुनाती हुई, अपनी मधुमय मुस्कराहटों का उपहार लुटाती हुई अपने सागर-प्रियतम से मिलने दौड़ी जाती हुई मालूम पड़ रही थी। इसके तपःपूत आँचल की छाया में अवस्थित इस विद्यालय में अध्ययन का सौभाग्य मुझे अपने संचित पुण्य का फललाभ जैसा मालूम पड़ रहा था। भारतवर्ष का शायद ही कोई कला-महाविद्यालय हो, जो गंगा मैया की दुलारभरी गोद के पालने में इस तरह पलता हो। मेरे इन मोहक विचारों का धागा सहसा टूट जाता है, जब प्राध्यापक महोदय कक्षा में प्रविष्ट होते हैं।

 पहले वे उपस्थिति लेते हैं। सभी लड़के ‘जी हाँ, जी हाँ करते जाते हैं। ऊँचे मंच से उनका जब भाषण सुना, तब लगा साक्षात् वाग्देवी सरस्वती उनकी जिह्वा पर समासीन हैं। वे सबसे पहले चरित्रनिर्माण-संबंधी प्रेरक बातें बताकर राष्ट्रभाषा हिंदी की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं। उसके प्रसार के लिए भागीरथ-साधना की आवश्यकता बताते हैं, दैनिक कार्यों में हिंदी के व्यवहार की आवश्यकता पर बल देते हैं। सभी लड़के मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे हैं। माथे पर नाचते हुए विद्युद्व्यजन मानो, मस्तक पर आशीर्वाद का पवन फैला रहे हैं। 

सहसा घंटी बजती है। हम स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आ जाते हैं—“क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति”। इसके बाद तुरत अँगरेजी की कक्षा थी। दौड़ते हुए लड़कों की कतार में मैं भी शामिल हो जाता हूँ। एक संकुल पथ से गुजरते हुए, सहपाठियों के अंगों से रगड़ खाते हुए, हम उस कत्थई मकान में चले आते हैं, जिसकी कक्षा में अँगरेजी की पढ़ाई होनेवाली थी।

 कहते है कि डच लोगों का यह भवन अफीम-गोदाम था। शायद इसीलिए, यहाँ अध्ययन-अध्यापन का ऐसा नशा, ऐसा सरूर छाया रहता है। अँगरेजी के प्राध्यापक कोट-पैंट में लैस आए और उपस्थिति लेने के बाद उन्होंने लच्छेदार अँगरेजी में शेक्सपियर पर भाषण देना आरंभ किया। आरंभ में उनकी बात मेरे दिमाग में कम घुसीं, किंतु, धीरे-धीरे जब सब ओर से कूर्मवत् अपने को समेटकर ध्यानस्थ किया, तब शेक्सपियर की महत्ता से संबद्ध कुछ बातें बोधगम्य होने लगीं। शेक्सपियर मानव-मनोविज्ञान का कुशल पारखी था, मानव-अनुभूतियों का चतुर चितेरा था—यह उनके अध्यापन का निष्कर्ष था। 

घंटी बजी और मेरे मित्र चिल्लाए, ‘लीजर !’ यह लीजर क्या बला है, मैं समझ नहीं पाया। टिफिन की बात तो जानता था। गंभीर विचारों के कारण उत्पन्न मानसिक तनाव के तंतुजाल को ढीला करने के लिए इस अल्पावकाश ‘लीजर’ का बड़ा महत्त्व है-ऐसा मेरे साथियों ने बताया। 

मित्रों के साथ हमलोग कैंटीन में पहुँचे। लड़के आनंदविह्वल कोलाहल कर रहे थे-कोलाहल रेडियो के गाने तथा कप, प्लेट और चमचों की खनखनाहट से और भी तीव्र हो रहा था। मेरे मित्र ने बैरा से चाय लाने को कहा। मैं चाय पीने का अभ्यस्त नहीं था। किंतु मित्रों ने कहा-यार, जहर थोड़े ही है; यह तो भारत का राष्ट्रीय पेय है, इसे न पीओगे, तो क्या अमेरिका की तरह कॉलेजों में दूध के नल लगे हैं ! करीब चालीस मिनट के बाद हमलोग फिर कक्षा नं० 6 में चले आए। 

यह नागरिकशास्त्र की घंटी थी। प्राध्यापक महोदय ने ‘भारत में प्रजातंत्र का भविष्य’ पर भाषण दिया। उन्होंने बताया कि प्रजातंत्र में क्रूर बहुमत का शासन होता है; प्रजातंत्र । सिर गिने जाते हैं, सिर के भीतर बुद्धि भी है या नहीं, इसपर ध्यान नहीं दिया जाता। प्रजातंत्र के जहाज को बचाने के लिए अब्राहम लिंकन जैसे महान कैटेन की जरूरत होती है, महात्मा गाँधी जैसे कुशल कर्णधार की आवश्यकता होती है। 

घंटी बजी। पता चला कि अब आज कोई घंटी नहीं है। छात्र आनंद से अपने आवास की ओर लौट रहे थे। इसी बीच मेरे एक मित्र ने कहा था-प्राचार्य ! प्राचार्य के तन पर दूध-से धुले खादी वस्त्र थे, जो मन की शुभ्रता को प्रतिबिंबित कर रहे थे। खादी पहनना क्या है, आजादी का बाना धारण करना है, ऐसा महात्मा गाँधी ने कहा है। प्राचार्य की आकृति शीशे की तरह पारदर्शी थी, जिसपर उनके अंतःकरण के भाव साफ नजर आ रहे थे। 

हमलोग कतराकर कनखियों से उन्हें देखते हुए, आवास की ओर चले। लगा, पटना विश्वविद्यालय का जीवन किसी मधुमास में खिले हुए गुलाब का जीवन है, किसी पावस में पर्वतप्रदेश पर झरते हुए रजतनिर्झर का जीवन है, किसी मधुयामिनी में तारों के सितार पर लहराते संगीत का जीवन है। कॉलेज जीवन का यह प्रथम दिन हमारी समतियों के कोष की वह महामणि है, जिसका आलोक कभी कम न होगा-ऐसा मेरा मन बार-बार कहता है। 

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