मेरे प्रिय लेखक पर निबंध |Essay on My Favourite Author in Hindi

मेरे प्रिय लेखक पर निबंध

मेरे प्रिय लेखक पर निबंध |Essay on My Favourite Author in Hindi

विश्व-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेकानेक लेखक उत्पन्न हए हैं, जो अपनी महान रचनाओं के कारण अमर हो गए हैं। आधुनिक युग में मेटरलिंक, हॉफमैन, रवींद्रनाथ ठाकुर, रोम्याँ रोलाँ, अनातोले फ्रांस, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, टॉमस मान, गाल्सवर्दी, यूजेन ओ नील, पर्ल बक, हर्मन हेस, आंद्रे जीद, विलियम फॉकनर, बट्रेंड रसेल, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, आलबेयर कामू, बोरिस पास्तरनाक, जीन स्टेनबेक, बालजॉक, टॉल्सटॉय, रस्किन, तुर्गनेब, दोस्तोवस्की, गोर्की जैसे विश्वविश्रुत लेखक हुए, किंतु मुझे अपनी भाषा हिंदी के महान लेखक प्रेमचंद जितने पसंद आए, उतना कोई अन्य नहीं। 

यह बात दूसरी है कि प्रेमचंद नोबेल-पुरस्कार से पुरस्कृत नहीं हुए। किंतु, हिंदीभाषी जनसमुदाय ने उन्हें जो अपनी अपार श्रद्धा का अर्घ्य दिया है, वह विश्व के महत्तम पुरस्कारों से भी महान है। प्रेमचंद कभी राजकीय सम्मानों से समलंकृत नहीं हए। उन्हें जीवन में कभी सुखोपभोग नहीं प्राप्त हुआ, जली हुई बीड़ी को दुबारा-तिबारा पीते रहे, फिर भी उन्होंने जो शाश्वत साधना का सरसिज खिलाया, वह अपने सारस्वत सौरभ से दिग्दिगंत को परिपूरित करता है। 

कौन लेखक किसी के लिए सबसे प्रिय हो सकता है—इसमें वैयक्तिक रुचि भी काम करती है; किंतु मेरे लिए वही लेखक सर्वाधिक प्रिय हो सकता है, जो केवल, कल्पना के कमनीय पंखों पर सवार होकर व्योमविहार न करे, वरन् जिसके साहित्य में यथार्थ जीवन की स्पष्ट झलक हो। वह साहित्य, जो केवल यौनभावनाओं को उत्तेजित करता हो, जिसमें वासना का विजृभण हो, मेरी दृष्टि में हेय है। साहित्य वह नहीं, जिसमें केवल इत्र की खुशबू हो, बल्कि हमारी सोंधी मिट्टी की खुशबू हो—ऐसा साहित्य, जिसमें हमारे युग, हमारे समाज, हमारे जीवन ही प्रतिबिंबित न होते हों, वरन् पढ़-सुनकर हम अपने जीवन और समाज को सँवार भी सकते हों। लेखक का कार्य समाज में वर्ग, जाति, संप्रदाय जैसी संकीर्णताओं का विषवमन करना नहीं है, वरन् उसका काम दिग्भ्रांत समाज का अमृत-सिंचन है। निर्भीकता, व्यापकता और सहजता के संगम पर अवस्थित लेखक ही हमारा कंठहार हो सकता है। जो लेखक कूटशैली में लिखता है, जिसके लिए मस्तिष्क को पूरा व्यायाम करना पड़ता है, वह मुझे ग्राह्य नहीं, वरन् जिसकी रचना गंगाजल की तरह सर्वसुलभ तथा शीशे की तरह पारदर्शी हो, वही मुझे सर्वाधिक प्रिय मालूम पड़ता है। 

कीरति भनिति भूति भलि सोई।

सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥   –रामचरितमानस 

साहित्य की सरिता जब जनसमुदाय के हर्ष-विषाद से तरंगित होती है, तभी वह भागीरथी की तरह ग्राह्य होती है, अन्यथा वह कर्मनाशा के सदृश त्याज्य है। प्रेमचंद ने लगभग 36 वर्षों के अपने साहित्यिक जीवन में तीन सौ के लगभग कहानियाँ, एक दर्जन उपन्यास, तीन-चार नाटक, अनेक निबंध तथा बालोपयोगी साहित्य की रचना की। उन्होंने दूसरी भाषाओं से अनुवाद किया है, किंतु उनकी अमर कीर्ति का मूलाधार ये ही रचनाएँ हैं 

उपन्यास–’गबन’, ‘निर्मला’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘सेवासदन’, ‘कायाकल्प’, ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘मंगलसूत्र’ (अपूर्ण) । 

प्रमुख कहानियाँ-‘पूस की रात’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘आत्माराम’, ‘पंच-परमेश्वर’, ‘नशा’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘इस्तीफा’, ‘दफ्तरी’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘कफन’, ‘नमक का दारोगा’, ‘रानी सारंधा’, ‘घासवाली’, ‘लांछन’, ‘सौत’, ‘सत्याग्रह’, ‘प्रायश्चित्’, ‘कामना। 

नाटक-कर्बला’, ‘प्रेम की वेदी’, ‘संग्राम’, ‘रूठी रानी’ । निबंध-‘कुछ विचार’, ‘निबंध-संग्रह। 

अनुवाद–‘टॉल्सटॉय की कहानियाँ’, ‘अहंकार’, ‘आजाद-कथा’। 

प्रेमचंद ने अपनी कहानियों को न केवल वर्णनाडंबर से विमुक्त किया, वरन् उसे प्रथम बार जीवन की संवेदनाओं से पूर्ण किया। उन्होंने मानव-मनोविज्ञान का चित्रण बडी सगमता से किया। प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोविनोद का उपकरण नहीं हैं, वरन् जीवन के सघन शिलीभूत क्षणों की बड़ी ही मार्मिक एवं सजीव अभिव्यक्ति हैं, जिनमें गहराई तक डूबने की आवश्यकता है। 

प्रेमचंद के पूर्व देवकीनंदन खत्री तथा किशोरीलाल गोस्वामी के तिलस्मी-ऐयारी उपन्यासों का जमाना था। उपन्यास या तो मनःप्रसादन का साधन था अथवा अभिभावक की नजर बचाकर पढ़ने का रहस्यपुराण। प्रेमचंद ने पहली बार उपन्यास को खुली हवा दी, प्रशस्त भूमि प्रदान की। जो उपन्यास अस्पृश्य था, प्रेमचंद की लेखनी का पारसस्पर्श पाकर स्तरीयता से मंडित हो गया। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में शोषितों, दलितों और पीड़ितों की जीवनगाथा बड़े ही हृदयवेधक एवं सशक्त शब्दों में व्यक्त की है। जनसमाज में व्याप्त विषमता के अनगिनत चित्र उनके कथा-साहित्य में भरे पड़े हैं। तयुगीन क्षोभ एवं असंतोष की स्वरलहरियों को बारीकी से पकड़ समग्र वायुमंडल में उत्क्षिप्त करने का श्लाघ्य प्रयास उन्होंने किया है। उनकी सारी रचनाओं में सामंती समाज, उसके अत्याचार, रजवाड़ों का खोखला जीवन, नौकरशाही की पतनोन्मुख संस्कृति के साथ किसान, मजदूर, अध्यापक, छात्र और साधारण लोगों की विकासोन्मुख संस्कृति का भी अंकन हुआ है। प्रेमचंद ने अपने आरंभिक उपन्यासों में समाधान खोजने का प्रयत्न किया था। उन्होंने सेवासदन खोलने और कायाकल्प करने की बात कही थी. किंतु पीछे चलकर उनके विश्वासों का शीशा चकनाचूर होता नजर आता है। इसलिए, ‘गोदान’ में कोई समाधान नहीं है, वरन् समस्याओं का निस्सीम सागर ही लहराता दीखता है। बीसवीं सदी के आरंभिक चार दशकों की, अपने राष्ट की सामाजिक राजनीतिक, धार्मिक हलचलों का चित्र प्रेमचंद के साहित्य में स्पष्टता से उभर आया है। उनका साहित्य पराधीन भारत की धड़कनों एवं स्वतंत्रता-प्राप्ति की आकांक्षाओं का सुंदर संगम है। 

प्रेमचंद की दष्टि बडी व्यापक एवं सारग्राहिणी थी। किसानों की झोपड़ी से राजमहल तक, बड़े-बड़े बैंकों के अधिपतियों तथा मिल-मालिकों से छोटे चमारों और मजदूरों तक की रहन-सहन, आचार-विचार आदि का बड़ा ही मार्मिक चित्रण उन्होंने किया है। प्रेमचंद के साहित्य का आधार ऐसे तो उत्तरप्रदेश का पूर्वी अंचल है; किंतु उनके साहित्य में संपूर्ण मानवसमाज की आशा-आकांक्षाओं की कहानी चित्रित हई है। वे सदा मानव की एकता, समता तथा स्वाधीनता के लिए जूझते रहे, अभावग्रस्त मानव की वकालत करते रहे। किंतु, इतना होते हुए भी उनका साहित्य निराशा से हमें बोझिल नहीं करता, वरन् एक नई आशा की किरण से दीप्त करता है। उनका साहित्य समाजवादी जीवनदर्शन, जनवादी भावना, धर्मनिरपेक्षता, मानवता, विश्व-बंधुत्व आदि का उद्घोष करता है। उन्होंने साहित्य के अनुपम उद्यान को अपने अंतस के रस से सींचा है। यही कारण है कि इसका परिमल हमारे मुरझाते हृदय को प्रफुल्लित करता है। उन्होंने कभी अर्थप्राप्ति के लिए साहित्य नहीं रचा, उत्प्रेरणा से रचा। उनका जीवन एक दीपक की तरह था, जो जलकर सबको प्रकाश देता रहता है। आदर्श और यथार्थ के कल-कछारों के बीच प्रेमचंद की साहित्य-सरिता कल-कल छल-छल करती हई हमें अपने दिव्य संगीत से मोहती है। उनका साहित्य जनजीवन की गीता है; सत्यं, शिवं एवं सुन्दरम् का त्रिवेणी-संगम है। उनके साहित्य में मानव-मन का एक नया क्षितिज हमारी आँखों के समक्ष उभरता है। 

मेरे विचार से वही साहित्य खरा है, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सर्जन की प्रेरणा एवं सच्चाई का प्रकाश हो। प्रेमचंद का साहित्य इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। सचमुच, उपन्यासकार-सम्राट प्रेमचंद अपनी अंतर्दृष्टि, विलक्षण प्रतिभा, गहरी संवेदना एवं अद्भुत चित्रणशक्ति के कारण हमारे लिए सदा हृदयहार बने रहेंगे। 

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