मेरे प्रिय कवि पर निबंध | Essay on My Favorite Poet in Hindi

Essay on My Favorite Poet in Hindi

मेरा प्रिय कवि पर निबंध | Essay on My Favorite Poet in Hindi

आप जानना चाहते हैं कि मेरे सबसे प्रिय कवि कौन हैं? तो जान लें कि जिन्हें भक्तमाल-प्रणेता भक्तशिरोमणि नाभादास ने ‘कवि कुटिल जीवन निस्तार हित वाल्मीकि का अवतार माना था, जिन्हें जॉर्ज प्रियर्सन ने ‘गौतम बुद्ध के पश्चात् सबसे बड़ा जननायक’ स्वीकारा था, जिन्हें सुप्रसिद्ध इतिहासलेखक विसेंट स्मिथ ने ‘अकबर महान से भी महान व्यक्तित्व’ सिद्ध किया है-वे ही मेरे लिए कवियों के ही कवि नहीं, वरन् महाकवियों के महाकवि, तुलसीदास की तरह अतिपावन, अतिशय प्रिय कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। 

गंगा की धारा-से सतत प्रवहमाण एवं तपःपूत, सूर्य की किरणों-से सतत भास्वर, चाँद की रश्मियों-से सतत शीतल, गायत्री मंत्र-से सतत पवित्र, देवतात्मा हिमालय-से सतत प्रशस्त एवं प्रोन्नत, सागर-से सतत अगाध हैं हमारे ये महाकवि तुलसीदास। 

‘कवयः क्रान्तदर्शिनः’ को चरितार्थ करनेवाले, ‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः’ को उदाहृत करनेवाले, बीजाक्षरी वाणीवाले मंत्रद्रष्टा प्रजापति कवि हैं तुलसीदास। जिस भाषा में वे अवतीर्ण हुए, वह भाषा धन्य हो गई, जिसने वह भाषा पढ़ी, वह धन्य हो गया। वे आजीवन दिगंतव्यापी क्रांति की मशाल जलाते रहे, हताश-निराश बुझी-बुझी आत्माओं में पौरुष का अलख जगाते रहे। उन्होंने बनी-बनाई, पिटी-पिटाई विषयवस्तु की लीक को तोड़ा। छोड़ा उन्होंने बहुवल्लभ दुष्यंत तथा छछिया भरि छाछ पै नाच नचानेवाले, देख्यो दुरो वह कुंजकुटीर में बैठो पलोटतु राधिका पाँयन, वंशीबजैया, रासरचैया, कुँअर कन्हैया को और पकड़ा रघुकुलकमल-दिवाकर दशरथ-अजिरविहारी सीतापति श्रीराम को, जिन्होंने अपना सारा जीवन ही लोकसेवा की बलिवेदी पर सहर्ष उत्सर्ग कर दिया था। 

गोस्वामीजी का बाल्यकाल मखमली गद्दी पर नहीं बीता, उन्हें उपेक्षाओं-प्रताड़नाओं का गरल-घुट बार-बार पीना पड़ता था, किंतु वे विषपायी नीलकंठ मानवता के कल्याण के लिए उपकरण जुटाते ही रहे। भ्रमर को कँटीली डालों का चक्कर लगाने में न मालूम कितने कष्ट झेलने पड़ते हैं। किंतु, वह भयभीत-पराजित होकर अपनी वृत्ति से पराङ्मुख नहीं होता और तभी तो हमारे समक्ष अपना मधुकोष लुटा जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं तो भ्रमर की भाँति काँटों की चुभन सही, किंतु हमारे लिए काव्य का अक्षय मधुच्छत्र उपहारस्वरूप अर्पित किया। 

“देश-काल के शर से बिंधकर’ जब ये ‘अशेष छविधर’ कवि जागे, तब इन्होंने सभी प्रचलित काव्यविधाओं में साहित्य-सर्जन किया। इनके प्रामाणिक ग्रंथों की संख्या बारह है। यदि ‘रामचरितमानस’ महाकाव्य है, तो ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’ तथा ‘श्रीकृष्णगीतावली’ गीतिकाव्य हैं; ‘पार्वतीमंगल’ तथा ‘जानकीमंगल’ खंडकाव्य हैं, तो ‘कवितावली’ ‘दोहावली’, ‘रामाज्ञाप्रश्न’, ‘बरवै-रामायण’, ‘वैराग्यसंदीपनी’ तथा ‘रामलला नहछु’ मुक्तक काव्य। सारी शैलियों को राममय करने की दृष्टि से ये रचनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं, फिर भी ‘रामचरितमानस’ और ‘विनयपत्रिका’ तो सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। 

‘रामचरितमानस’ एक ऐसा मृत्युंजय ग्रंथ है, जिसकी चर्चा संसार की श्रेष्ठ भाषाओं के विचारकों ने की है। संसारप्रसिद्ध ग्रंथों की दो कोटियाँ हैं। एक में ‘वेद’, ‘बाइबिल’, ‘कुरान’ जैसे धार्मिक ग्रंथ आते हैं और दूसरी में ग्रीक महाकवि होमर की ‘इलियड’ और ‘ओडेसी’, इटालियन महाकवि दाँते की ‘डिवाइन कॉमेडिया’, मिल्टन की ‘पैराडाइज लॉस्ट’, शेक्सपियर की ‘किंग लियर’ और ‘मैकबेथ’, कालिदास की ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘गीतांजली’ जैसी रचनाएँ आती हैं। किंतु, ‘रामचरितमानस’ में इन दोनों कोटियों का आश्चर्यजनक समन्वय हुआ है। यही कारण है कि यदि मानस आस्तिकों का मनोमुकुट है, तो दूसरी ओर साहित्यिकों का कंठहार । ‘मानस’ इतने गुणों की खान है कि उनका बखान संभव नहीं। इसके एक-दो गुणों का आकलन ही यहाँ अलम् होगा। 

भारतीय संस्कृति के दो प्रबल स्तंभ हैं—सत्य और त्याग। इन्हीं दोनों के आधार पर महान-से-महान बना जा सकता है। तुलसी के नायक भगवान राम तथा उनके परिवार के सदस्यों ने सत्य और त्याग का पालन जिस दृढ़ता से किया है, वैसा सत्य 

और त्याग का पालन अन्यत्र दुर्लभ है। 

राजा दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान दिए थे। राजा ने कैकेयी के प्रति अपने वचननिर्वाह के लिए अपने प्रिय पुत्र राम को चौदह वर्षों का वनवास दिया तथा अपने पत्रप्रेम को प्रमाणित करने के लिए अपना शरीरत्याग किया-

रघुकुल रीति सदा चलि आई।

प्राण जाई बरु बचनु न जाई ।।  रामचरितमानस 

राजा दशरथ की आँखों के तारे सुकुमार राम ने चक्रवर्ती सम्राट की सारी संपदाओं को ठुकराकर वन के लिए पैदल प्रस्थान किया। जिन जनकतनया ‘जीवनमूरि’ सीता ने कभी कंटकाकीर्ण कठोर मार्ग पर गमन नहीं किया था, वे ही राम के साथ कष्ट झेलती रहीं। पुर से आगे दो कदम रखते ही सीता के मधुराधर सूखने लगे थे, भाल पर स्वेदजल की कणिकाएँ चमकने लगी थीं। किंतु, राम के लिए ये कष्ट साधारण थे। मार्ग के कंटकों को पाँव-तले रौंदते, गिरिनिर्झरों को लाँघते राम पंचवटी पहँचे। पंचवटी में रहते समय रावण ने सीता का हरण किया। राम सीता के विरह में बड़े ही उद्विग्न हए, फिर भी उन्होंने हार न मानी। जड़ उदधि ने लंका का रास्ता रोक दिया, किंतु राम ने नल-नील की सहायता से उसपर पुल बाँध लिया। रावण से उनकी घमासान लड़ाई हुई। लक्ष्मण मूर्च्छित हुए, फिर भी विजयलक्ष्मी ने राम का ही वरण किया। 

इसका कारण स्पष्ट है कि राम ने कभी सत्य और त्याग का पल्ला नहीं छोड़ा। रावण के पास पाशविक शक्ति थी, तो राम के पास आत्मिक शक्ति। रावण को रथी और राम को विरथ देखकर भक्त विभीषण का कोमल चित्त विचलित हो उठा था। विभीषण को सांत्वना देने के लिए भगवान राम ने अपने जिस रथ का वर्णन किया है, उससे हम अपने चरित्ररथ का निर्माण कर सकते हैं- 

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य शील दृढ़ ध्वजा पताका ।।

बल विवेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ।।

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । वर विग्यान कठिन कोदंडा ॥

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना ।

कवच अभेद विप्र गुरु पूजा । एहि सम विजय उपाय न दूजा ।।

सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥  -रामचरितमानस

आज जिस ढंग से पारिवारिक व्यवस्था चरमराकर टूट रही है, वैसी ही गोस्वामीजी के युग में भी शुरू हो गई थी। जबतक परिवार सुगठित नहीं हो तबतक सुगठित समाज की आशा नहीं की जा सकती। एक परिवार में जब एक भाई दूसरे भाई के खन का प्यासा हो तब समाज में भ्रातृत्व रहे, इसकी कल्पना व्यर्थ है। अतः, सामाजिक संबंधों के समुचित निर्वाह के लिए ‘रामचरितमानस’ हमारा जितना पथप्रदर्शन करता है, उतना हिंदी का कोई दूसरा ग्रंथ नहीं। 

डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘रामचरितमानस’ को उत्तर भारत की ‘बाइबिल’ माना है। वस्ततः, भारतीय जनता तुलसीदास की रचना को ‘बाइबिल’ से भी अधिक आदर देती है। 

गोस्वामी तुलसीदास की दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति है ‘विनयपत्रिका’ । “विनयपत्रिका’, अपने ढंग की अनोखी पुस्तक है। प्रेमी-प्रेमिका के बीच पत्र-व्यवहार भले ही साहित्य । में वर्णित हुआ हो, किंतु एक भक्त का भगवान के पास पत्र लिखना बिलकुल नई बात है, जो ‘विनयपत्रिका’ में देखी जा सकती है। 279 पदों की इस पुस्तक में भक्तिरस की सुरसरिता उमड़ चली है। गोस्वामीजी ने इसमें अपनी दीनता और कलुष का कच्चा चिट्ठा उपस्थित करते हुए ‘कलि की कुचालि’ तथा उसके दुराचारों का विवरण भी प्रस्तुत किया है। इसके बारे में पं० रामनरेश त्रिपाठी का कहना है, “तुलसी को यह पत्रिका लिखने में जैसी सफलता मिली है, उस अनुपात में वह उसके और किसी ग्रंथ में नहीं है। ‘मानस’ में, खासकर अयोध्याकांड में, उनकी कविता-शक्ति सावन-भादो की नदी की भाँति उमड़ी हुई दिखाई पड़ती है। पर, अरण्य, किष्किंधा, संदर और लंका कांडों में वह घटते-घटते जेठ-वैशाख की नदी की तरह छिछली हो गई है, कहीं-कहीं उसमें गड्ढे हैं, जिससे कुछ अधिक जल जरूर जमा मिलता है। पर ‘विनयपत्रिका’ में आदि से अंत तक कवि की रसधारा एक-सी प्रवाहित है। उसमें पचर जान गंभीर अनुभव, भाषा और भाव पर कवि के अबाध अधिकार का रोचक इतिहास कमल की तरह सर्वत्र विकसित मिलता है।” 

उनकी अन्य पुस्तकों का भी चिरस्थायी महत्त्व है। उन्होंने अपनी प्रतिभा का पारस-परस जिसे प्रदान किया, वह स्वर्ण बन गया—पूर्ण मूल्यवान एवं भास्वर । ‘छू दिया जिसे, वह स्वर्ण हुआ, छू गई रात मधुप्रात हुई’ -पंक्ति उन्हीं पर चरितार्थ होती है। 

गोस्वामीजी संदेशों, आदर्शों एवं उदात्त कल्पनाओं के कवि हैं। उन्होंने इनकी अभिव्यक्ति के लिए जनभाषा को माध्यम के रूप में लिया, जो तब तक पूर्णतः उपेक्षित थी। हिंदी-भाषा को अपनाकर उन्होंने इसके सामर्थ्य का द्वार खोल दिया। इसलिए, आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह कथन उचित ही मालूम पड़ता है, “यह एक कवि ही हिंदी को एक प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।” 

अतः भारतीय जनता के ये प्रतिनिधि कवि, जिन्होंने भारतीय संस्कृति के चिन्मय आकाशदीप को प्रज्वलित कर अनुकरणीय जीवनसरणि का निर्माण किया, हमारे लिए वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति आदि से भी अधिक प्रिय हैं—ऐसा हम निःसंकोच कह सकते हैं। धन्य हैं महाकवि। आपके बारे में महाकवि हरिऔध ने ठीक ही कहा है- 

कविता करसे तुलसी न लसे।

कविता लसी पा तुलसी की कला ॥ 

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