मेरे प्रिय लेखक प्रेमचंद पर निबंध | Essay on my favorite author Premchand

मेरे प्रिय लेखक प्रेमचंद पर निबंध

मेरे प्रिय लेखक प्रेमचंद पर निबंध | Essay on my favorite author Premchand

किसी भी भाषा के उन्नयन में उस भाषा के लेखकों का हाथ होता है। हिन्दी भाषा के विकास में अमीर खुसरो, तुलसीदास से लेकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, जैसे स्वनाम धन्य लेखकों का योगदान है। हिन्दी को लोकप्रिय कथा साहित्य से समृद्ध करने वाले गिने चुने लेखकों में मुंशी प्रेमचंद का नाम लिया जाता है। प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य के जरिए भारतीय समाज को एक सोच दी। उसे अंधविश्वासी और रूढ़िवादी परम्पराओं से लड़ने के लिए न केवल प्रेरित किया अपितु उसे एक दिशा भी दी। अपने उपन्यासों द्वारा उन्होंने समाज को जासूसी, तिलस्मी और एय्याशी वाली दुनिया से निकाल कर वास्तविक धरातल पर ला खड़ा किया। यह प्रेमचंद ही थे जिन्होंने पाठक के अंदर यह एहसास भर दिया कि जिन रूढ़ियों के अंधेरे में तुम लैम्पपोस्ट बन कर खड़े हो उसका उजाला बंद गलियों में दस्तक दे सकता है। और यह सब उन्होंने यों कर दिखाया कि पढ़ने वाले को इसका आभास ही नहीं हुआ कि उसके अंदर की दुनिया में रोशनी का एक सैलाब उड़ेला जा रहा है। यह मामूली बात नहीं थी इसके लिये बड़े सधे हुए हाथों की जरूरत है। अपने उपन्यास में जासूसी कहानियों की भांति रोचकता बनाए रखते हुए आस-पास की जिंदगी को उजागर करके रख देने का हुनर प्रेमचंद के ही पास था। अति सरल एवं मर्मस्पर्शी भाषा का प्रयोग करते हुए यह काम प्रेमचंद ने इतनी खूबसूरती से किया कि हमारी सामाजिक चेतना के वे प्रतीक से बन गए। प्रेमचंद का अर्थ समाज सुधारक हो गया। 

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लमही नामक ग्राम में हुआ था। अपने जन्म के बारे में स्वयं इन्होंने इस प्रकार लिखा है| 

 “तारीख पैदाइश संवत् 1937 बाप का नाम मुंशी अजायबलाल सुकूनत मौजा मढ़वा, लमही, मुत्तिसिल पांडेपुर बनारस। ईब्तदाअन् आठ साल तक फारसी पढ़ी फिर अंग्रेजी शुरू की। बनारस के कॉलेजिएट स्कूल से एंट्रेस पास किया, वालिद का इंतकाल पंद्रह साल की उम्र में हो गया, वालिदा सातवें साल गुजर चुकी थीं, फिर तालीम के सीगे में मुलाजिमत की। सन् 1901 में लिटररी जिंदगी शुरू की।” प्रेमचंद के बचपन का नाम धनपतराय था। इनके पिता श्री अजायब राय तथा माता आनंदी देवी थीं। पिता जी एक सरकारी डाकखाने में क्लर्क थे। प्रेमचंद की आयु जब सात वर्ष की थी तब उनकी माता का देहान्त हो गया। पन्द्रह वर्ष की आयु तक उनके पिता भी स्वर्गवासी हो गए। 

प्रेमचंद ने 5 वर्ष की अवस्था में अपने गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ना आरंभ किया और अनेक कठिनाइयों को पार करते हुए मैट्रिकुलेशन की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी बीच पिताजी का स्वर्गवास हो गया तथा इन्हें अपनी पढ़ाई आदि का खर्च चलाने के लिए पांच रुपये प्रतिमाही की ट्यूशन करनी पड़ी थी। नौकरी करते हुए उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। पंद्रह वर्ष की अवस्था में प्रेमचन्द का विवाह हुआ। पहली पत्नी को त्यागकर प्रेमचन्द ने दूसरा विवाह बाल-विधवा शिवरानी के साथ किया। शिवरानी प्रेमचंद के लिए अद्भुत जीवन संगिनी सिद्ध हुईं। प्रेमचंद जी स्वयं कहते थे कि वह शिवरानी के साथ सुखी हैं। प्रेमचंद जी पहले बनारस में एक वकील के यहां 5 रुपये माहवार पर ट्यूशन करते थे, फिर 18 रुपये माहवार पर सरकारी अध्यापक हुए। वहां से डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर पहुंच गये। सन् 1920 में गांधीजी के प्रभाव के कारण उन्होंने अपनी बीस वर्ष पुरानी नौकरी छोड़ दी और असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और जेल गये। कुछ समय तक गोरखपुर के एक निजी स्कूल में अध्यापन भी किया। उसके बाद उन्होंने सम्पादन के क्षेत्र में प्रवेश किया तथा ‘माधुरी’, ‘हंस’, ‘जागरण’ और ‘मर्यादा’ जैसी उच्चकोटि की पत्रिकाओं का सम्पादन किया। प्रेमचंद कुछ समय के लिए बम्बई के फिल्म क्षेत्र में भी गये। 8 अक्टूबर सन् 1936 को इन्होंने अपना पार्थिव शरीर छोड़ दिया। 

प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन बड़ी ही कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। बचपन में ही मां का निधन फिर विमाता द्वारा प्रताड़ित किया जाना, किशोरावस्था में पिता की मृत्यु आदि घटनाओं ने प्रेमचंद को गरीबी को काफी निकट से देखने का अवसर दिया। आर्थिक तंगी ने उन्हें साहूकारों की निकटता दी तो माता-पिता की मृत्यु ने सामाजिक निकटता दी। इन सब का प्रभाव प्रेमचंद के साहित्य पर पड़ा। निर्भीकता, मुखरता, विद्रोह का जो पुट उनके साहित्य में मिलता है वह उनके व्यक्तिव में समाया था। स्वयं गरीबी में जीने के कारण उनके कथा साहित्य में गरीबी का यथार्थ चित्रण मिलता है। विधवा विवाह, बेमेल विवाह, गरीबों का शोषण, साहूकारी प्रथा, अंधविश्वास तथा गांवों में प्रचलित छिटपुट रूढ़िवादी मान्यताओं के प्रति उनका विद्रोह उनके कथा साहित्य में पूरी तरह उजागर होता है। 

प्रेमचंद ने सन् 1901 से कथा साहित्य का लेखन शुरू किया। प्रारंभ में उन्होंने उर्दू में ही लिखा परंतु बाद में वे हिन्दी में भी लिखने लगे। उर्दू में उन्होंने धनपतराय एवं नवाब राय नाम से लिखा। हिन्दी में उनका लेखन प्रेमचंद नाम से ही है। कुछ कहानियां धनपत राय एवं नवाब राय नाम से भी लिखी गयी हैं। उनके कुछ प्रमुख उपन्यास सेवा सदन, निर्मला, कर्मभूमि, रंग-भूमि, कायाकल्प, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, गोदान हैं। मृत्यु के समय वे मंगलसूत्र नामक उपन्यास लिख रहे थे जो अधूरा ही रह गया। कफन, मानसरोवर, प्रेम पचीसी, प्रेम सरोवर, प्रेम प्रतिभा, सप्त सरोज, नव-निधि उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। यद्यपि प्रेमचंद कथा साहित्य हेतु विख्यात हैं तथापि उन्होंने गद्य की विभिन्न विधाओं का स्पर्श किया है। महाजनी सभ्यता, साहित्य का उद्देश्य, कुछ विचार, कलम, तलवार और न्याय जैसे निबंधों के साथ-साथ उन्होंने संग्राम, कर्बला, रूठी रानी, तथा प्रेम की वेदी जैसे नाटक भी लिखे हैं। उन दिनों यद्यपि बाल साहित्य को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता था फिर भी प्रेमचंद ने टालस्टॉय की कहानियां, कुत्ते की कहानी, मनमोहक तथा जंगल की कहानियां बच्चों के लिए भी लिखीं। इसके अतिरिक्त सृष्टि का आरंभ, आजाद कथा, चांदी की डिबिया, हड़ताल तथा न्याय उनकी अनुवादित कृतियां हैं। 

प्रेमचंद वास्तव में प्रगतिशील लेखक थे। उनके संपूर्ण साहित्य में समाजवादी विचारों की झलक मिलती है। वे सौंदर्यवादी न होकर यथार्थवादी थे। साहित्यकार की संकुचित सौंदर्य दृष्टि की आलोचना करते हुए वह कहा करते थे, “आज का साहित्यकार रूपवती स्त्री के गुलाबी गालों के सौंदर्य का वर्णन करना चाहता है। किन्तु उस श्रमिक स्त्री की ओर निगाह उठाकर भी नहीं देखता जो अपने दुधमुंहे बच्चे को खेत की मेड़ पर सुला कर खेत में काम करते हुए चोटी का पसीना एड़ी तक बहा रही है। अब तक उनकी दृष्टि अमीरों और राजाओं की गगनचुम्बी अट्टालिकाओं तक ही अवरुद्ध रही है। गरीबों के झोपड़े उनके ध्यान के अधिकारी ही नहीं थे।” प्रेमचंद ने बहुत जोर देकर कहा कि अब हमें सौंदर्य की कसौटी को बदलना होगा। हमारी दृष्टि में सच्चा साहित्यकार वही होगा जो जीवन संग्राम में सौंदर्य के चरमोत्कर्ष को देखे। उन्होंने सौंदर्य के संबंध में जिस दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया उसका संपूर्ण प्रगतिशील साहित्य पर प्रभाव पड़ा। 

प्रेमचंद की मान्यता थी कि मानव की दुर्बलताओं का साहित्य में निरूपण तो होना ही चाहिए किन्तु लेखक का आग्रह मनुष्य की सद् प्रवृत्तियों के उद्घाटन पर होना चाहिए, न कि उसकी कुप्रवृत्तियों के विस्तत चित्रण पर। प्रेमचंद के साहित्य में समाज की प्रचलित नैतिक मर्यादाओं के प्रति स्वीकृति का भाव व्यक्त किया गया है न कि विरोध का। किन्तु बाद के उपन्यासों में उनका विरोध का स्वर मुखरित हुआ है। प्रेमचंद स्वयं मार्क्सवाद से बहुत प्रभावित थे। इसी प्रभाव के वशीभूत होकर उन्होंने समाज के उस वर्ग का चित्रण किया है जो सदा से उपेक्षित रहा है। किन्तु वे अपनी कृतियों में मार्क्सवाद के प्रवक्ता नहीं दिखायी देते। इसी कारण कई स्वनाम धन्य समालोचकों ने प्रेमचंद को द्वितीय श्रेणी का साहित्यकार घोषित किया है। हमार विचार से प्रेमचंद मानवतावादी लेखक थे, वह किसी वाद विशेष या विचार विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे। वह संपूर्ण समाज के कल्याण में तथा सामाजिक मर्यादाओं के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले साहित्यकार थे, वह अकिंचन एवं सर्वहारा वर्ग के हिमायती थे। इस अर्थ में वह समाजवादी थे। परंतु साथ ही वह पूंजीपति के प्रति निर्मम नहीं थे, वह पूंजीपति को भी जीवित रहने का अधिकार देने वाले क्रांतिदर्शी थे। इस अर्थ में गांधीवादी थे। प्रेमचंद की दुनिया में घृणा, विद्वेष एवं हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं था। वह हृदय परिवर्तन द्वारा समाजधर्मी समाजवाद की स्थापना का सुख स्वप्न देखने वाले कलाकार थे। प्रेमचंद को हिन्दुस्तान की पहचान थी, वह भारत के सामान्य निवासी की नब्ज से परिचित थे। वह जानते थे कि भारत का गरीब आदमी ईश्वर के बिना, भाग्य का सहारा लिए बिना जीवित नहीं रह सकता है। गहराइयों में उतर कर उन्होंने यह भी देख लिया था कि भारत का हरेक सामर्थ्यवान व्यक्ति छद्म पूंजीपति है तथा सत्य और अहिंसा समन्वित गांधीवाद के मार्ग पर चलकर ही भारत स्वतंत्र हो सकता था। 

प्रेमचंद ने अपने साहित्य द्वारा तत्कालीन समाज को झकझोर कर रख दिया था। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी पूरी दिलचस्पी थी और वे गांधीजी के विचारों से प्रेरित थे। ‘सेवा सदन’ और ‘गोदान’ को छोड़कर उनके सभी उपन्यासों में गांधी युग का समग्र चित्रण है। बंग भंग आंदोलन, जलियांवालाबाग हत्याकांड प्रेमचंद के काल की ही घटनाएं हैं। इसका उनके ऊपर गहरा प्रभाव था। उनके साहित्य में देश के आहत अभिमान और भारत माता की परतंत्रता की पीडा मुखरित होती है। देश के नवनिर्माण के प्रति उनके विचारों की यात्रा पश्चिम बंगाल में ‘स्वदेशी आंदोलन’ के प्रति उनकी जोरदार कोशिश से शुरू हुई जिसे अंग्रेजों ने बंगाल में उग्रवादी आंदोलन का नाम दिया था। तब पहली जरूरत थी देश की आजादी। प्रेमचंद ने उन दिनों आजादी के लिए जो भी जिस किसी भी तरीके से लड़ रहा था उसका पूरा साथ दिया। आजादी की लड़ाई के प्रति उनके रुझान को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उनकी पुस्तक ‘सोजे वतन’ को जब्त कर लिया। किन्तु प्रेमचंद के विचारों में कोई परिवर्तन न हुआ, उल्टे वह शिक्षा विभाग की डिप्टी इंस्पेक्टरी से इस्तीफा देकर स्वतंत्र लेखन करने लगे। प्रेमचंद के उपन्यासों में परतंत्र भारत का स्वर सुनायी देता है। अंग्रेजों के प्रति द्रोह की भावना से ओत प्रोत समाज का चित्रण उनकी कहानियों में प्राप्त होता है। 

प्रेमचंद ने अपनी कहानियों एवं उपन्यासों के माध्यम से मानवीय करुणा, मानवीय गरिमा, मानवीय स्वतंत्रता की आकांक्षा, मान्यता एवं दृष्टिकोण की नयी व्याख्या प्रस्तुत की है। प्रेमचंद की कहानियों से हमें संवेदना के धरातल पर अपने देश व समाज, उसके ढांचे तथा इतिहास को समझने में पूरी-पूरी मदद मिलती है। ये कहानियां इतिहास बोध एवं भाव बोध में परिवर्तन के लिए हमें तैयार करती हैं। प्रेमचंद ने हमारे साहित्य को चेतना के उस स्तर पर पहुंचा दिया है जहां से पीछे देखना तो संभव है ही नहीं, उल्टे साहित्य संबंधी सपूर्ण धारणाओं, मान्यताओं एवं दृष्टिकोण में बदलाव आ गया है। प्रेमचंद की कहानियों, उपन्यासों में जिस समाज का चित्र पेश किया गया है, उसके संबंध में शुरू में ही दो बातें कहीं जा सकती हैं, एक तो सदियों से हमारे समाज का ढांचा करीब-करीब ऐसा ही रहा है, दूसरी बात यह कि समाज के आधारभूत ढांचे में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं आया है। मोटे तौर पर प्रेमचंद द्वारा उनके कथा साहित्य में तीन प्रकार के समाज का चित्रण मिलता है। प्रथम मेहनतकश किसानों का समाज, द्वितीय किसानों की दुर्बलताओं का लाभ उठाकर संपन्न हुए साहकारों का समाज, तृतीय घीसू या माधव जैसे पात्रों के माध्यम से व्यक्त अछूतों का समाज। प्रेमचंद का किसान श्रम तो करता है किन्तु उसका प्रतिफल क्रूर सामंती दमन के कारण नहीं प्राप्त कर पाता। इसी तरह अछूत वर्ग है जो गालियां और मार खाता है। फिर भी अपने में ही संतुष्ट और प्रसन्न रहता है। 

प्रेमचंद का साहित्य समकालीन संदर्भो की कसौटी पर भी खरा उतरता है। इसका कारण बहुत सीधा सा है। प्रेमचंद ने जिस भारत का अपनी रचनाओं में चित्रण किया है, वह कमोबेश अब भी वही है। ‘कफन’, ‘पूस की रात’ जैसी कहानियों में गरीबी में पिसते जिन पात्रों का सशक्त चित्रण किया गया है, वे अभी भी बिल्कुल वैसे ही हैं। गांव में जमींदार, साहूकार, पटवारी तथा गांव की दुर्व्यवस्था के जिम्मेदार, दूसरे छोटे अफसरों द्वारा क्रूर शोषण वाली व्यवस्था अभी भी मूलतः वही है, जिसका चित्रण प्रेमचंद ने अपनी दर्जनों कहानियों और ‘गोदान’ तथा प्रारंभिक उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ में विविधापूर्वक किया है।

एक जवान लड़की का बूढ़े आदमी से ब्याह हो जाना, जो निर्मला’ की कहानी है, अभी भी इस देश में कई युवा औरतों की व्यथा गाथा है। लाखों-करोडों नहीं तो हजारों युवा लड़कियां सामाजिक पिछड़ेपन और ऊंच-नीच के अन्याय के कारण ‘सेवासदन’ उपन्यास की सुमन की तरह वेश्यालयों तक पहुंच जाती हैं। कारखाना लगाने के लिए गरीबों को बेदखल करके जमीन हथियाना और उसके खिलाफ ‘रंगभूमि’ उपन्यास के सूरदास के संघर्ष पर जब कोई विचार करता है तो यह परिस्थिति आज और भी सही प्रतीत होती है। इसी प्रकार ‘कायाकल्प’ 1926 में लिखा गया। तब कांग्रेस मंत्रिपरिषद् में शामिल होने के सवाल पर गौर कर रही थी। राजनीतिक सत्ता की भूख इस उपन्यास का मुख्य विषय थी। यह महज आत्माओं के पुनर्जन्म की कहानी नहीं, जैसा कि प्रतीकात्मक कथानक की वजह से प्रतीत होता है, अपितु यह उन नेताओं, महत्त्वाकांक्षाओं, लालची और आत्म-केंद्रित व्यक्तियों की कहानी है जो एक बार राजनीति शक्ति मिलते ही किस प्रकार रंग बदलकर विकृत हो जाते हैं। इसे इस वक्त हू-ब-हू घटित होते और भारतीय राजनीति में खरीद-फरोख्त केंद्र बनते देखा जा सकता है। 

अपने आपको अपनी हैसियत से अधिक अमीर दिखाने के दुराग्रह से ग्रसित ‘गबन’ उपन्यास का रामनाथ सरकारी धन में घपला करके अपराधी बन जाता है और फिर उसकी मुसीबतों का कहीं अंत नहीं होता। महिलाओं में गहनों की असीम लालसा इन दिनों एक आम बीमारी बन गयी है। यही असली मुसीबत की जड़ है। रिश्वत हमारे जीवन का एक अंग बन चुकी है और कदम-कदम पर इसका सामना करना पड़ता है। यह कोई नयी बात नहीं रही। यह पहले भी थी। 

प्रेमचंद नवयुग के प्रवर्तक ही नहीं उसके सुधारक और सृष्टा भी थे। उनके साहित्य में समाज के लिए संदेश है। इस अर्थ में उनका साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, दीपक भी है। यही वो कारण हैं, जिनकी वजह से प्रेमचंद आज भी हमारे प्रिय लेखक बने हुए हैं। 

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