पर्वतारोहण पर निबंध |Essay on Mountaineering in Hindi

पर्वतारोहण पर निबंध

पर्वतारोहण पर निबंध |Essay on Mountaineering in Hindi

मानव का आदि युग से प्रकृति के साथ गहरा संबंध रहा है। वह इसके साथ रहकर सदैव आनंद की खोज में लगा रहा है। अतः प्रकृति और मानव का आपसी संबंध अनिश्चित रूप से सदा के लिए जुड़ गया। ऐसा ही संबंध मानव का पर्वतों के साथ था, इसलिए वह पर्वतारोहण का शौकीन बन गया। पर्वतारोहण एक साहसपूर्ण कृत्य है। लेकिन प्रकृति की इस चुनौती को स्वीकार करना जान-बूझकर काल देवता से टक्कर लेने के समान है। 

पर्वतारोहण का अभिप्राय है-पर्वतों के शिखर पर चढ़ना। पर्वतारोहण का अर्थ शिमला, मसूरी, दार्जिलिंग या कश्मीर की पक्की सड़कों की चढ़ाई नहीं है। इसका अर्थ ऐसे पर्वतों पर चढ़ाई करना है, जहां विधिवत मार्ग न हों, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ मार्ग रोके खड़े हों तथा बर्फीली चोटियां पर्वतारोही को चुनौती देती हों; यथा-एवरेस्ट का आरोहण अथवा नीलकंठ शिखर की चढ़ाई। यह शौक बहुत दुर्गम तथा दुःसाध्य है। कठिन मार्गों को पार कर सीधी ऊंचाई पर शिखर तक पहुंचना वास्तव में जोखिम का काम है। इस प्रकार के कार्य केवल साहसी लोग ही कर सकते हैं। आज के यांत्रिक युग में पर्वतारोहण का शौक मानव-साहस का परिचय तो देता ही है, साथ ही उसका मनोरंजन भी करता है। 

हिमालय की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर विश्व के कुछ साहसी लोगों ने अपने-अपने ढंग से अनेक बार आरोहण करने का प्रयत्न किया, परंतु ये आरोहण योजनाएं दस बार असफल हुईं। अंतत: 29 मई, 1953 को कर्नल हंट और शेरपा तेनसिंह ने मध्याह्न साढ़े ग्यारह बजे एवरेस्ट पर अपने पग रख दिए। बीस मिनट तक एवरेस्ट शिखर पर रहने वाले ये प्रथम पर्वतारोही थे। इसी प्रकार नीलकंठ शिखर के आरोहण का प्रारंभ सन 1913 में ब्रिटिश पर्वतारोही श्री मीड ने किया। उसके पश्चात सन 1937, 1947 तथा 1951 में भी साहसपूर्ण प्रयास किया गया, किंतु असफलता ही मिली। 

सन 1959 में पहला भारतीय पर्वतारोहण दल एयर वाइस मार्शल एस.एन. गोयल के नेतृत्व में गया। दूसरा दल सन 1961 में सत्ताईस वर्षीय कप्तान नरेंद्र कुमार के नेतृत्व में गया था। अकस्मात वहां हिम वर्षा हो गई, जिससे दल का साहस टूट गया। किंतु ओ.पी. शर्मा विचलित नहीं हुए और दो शेरपाओं के साथ 400 फुट ऊपर चढ़ गए। वहां पहुंचकर उन्होंने भगवान नीलकंठ की पूजा की। उसके बाद अन्य दुर्गम शिखरों पर विजय प्राप्त करने का तांता सा लग गया। 

विश्व में ऐसे अनेक साहसी पर्वतारोही हुए हैं, जिनकी गाथाएं आज भी लोगों की जबान पर हैं। उनमें से अंग्रेज पर्यटक सर जॉर्ज एवरेस्ट, हार्वर्ड बैरी, कप्तान हिलेरी, जॉन लबूस, इर्विन ओल्ड, कर्नल हंट, मैलोरी तथा भारतीय पर्यटक शेरपा तेनसिंह और बछेद्री पाल प्रमुख हैं। युवा वर्ग प्रतिवर्ष हिमालय की दुर्गम चोटियों पर पहुंच रहा है। इनमें महिलाएं भी आगे आ रही हैं। 

पर्वतारोहण का शौक पूरा करने के लिए वैज्ञानिक सूझ-बूझ होना चाहिए, ताकि मौसम का ज्ञान हो सके। भूगोलवेत्ता को चाहिए कि वे पहाड़ पर चढ़ने का मार्ग-निर्देशन करें। पर्वत पर वायु दाब कम हो जाता है, अतः पर्वतारोही के पास सांस लेने के लिए गैस सिलेंडर होना चाहिए। हवा, पानी और बर्फ से बचाव के लिए विशेष प्रकार के वस्त्र तथा जूते पहनने चाहिए। इसके अलावा संदेश का आदान-प्रदान करने वाले यंत्र, कुल्हाड़ी, फावड़ा, रस्सी, कैमरा एवं फोटोग्राफर और प्रशिक्षित डॉक्टर की भी आवश्यकता होती है। 

18 मई, 1921 से अब तक सैंकड़ों लोग पर्वतारोहण के इस शौक में अपनी जान गंवा चुके हैं। पर्वतों में रास्ता ढूंढना, बर्फ काटकर रास्ता बनाना, बर्फ में कील गाड़ना, रस्से के सहारे ऊपर चढ़ना, बर्फीली हवाओं को सहन करना, तंबू गाड़ना, भोजन बनाना, तेज वर्षा एवं हिम वर्षा से बचाव करना आदि अत्यधिक जीवट का काम होता है। यद्यपि यह शौक अत्यंत साहस, शौर्य एवं सहनशीलता का परिचायक है; फिर भी प्रशिक्षण, टीम सहयोग, उपकरण और विविध प्रकार के साधनों के बिना इस शौक को पूरा नहीं किया जा सकता। पर्वतारोहण का शौक सामूहिक कार्य कुशलता का परिणाम होता है।

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