मातृभाषा और शिक्षा पर निबंध | शिक्षा का माध्यम मातृभाषा पर निबंध

मातृभाषा और शिक्षा पर निबंध

मातृभाषा और शिक्षा पर निबंध | शिक्षा का माध्यम मातृभाषा पर निबंध 

आज शिक्षा एक पद्धति, एक तंत्र और एक उत्तरोत्तर बढ़ता व्यवसाय है। उस पर गहराई से विचार किया जाय तो वह एक सहज प्रक्रिया है जिसके माध्यम से प्राणी विकसित होता है। शिक्षा एक बौद्धिक प्रक्रिया है जो नैसर्गिक रूप से प्राणी को उसके पर्यावरण के लायक विकसित करती है। प्राणी स्वयं अपनी मां से फिर औरों से सीखता चला जाता है। इसलिए शिक्षा की मूल प्रवृत्ति यही है कि शिक्षा ली जाती है। मनुष्य ने सभ्यता के विकास के साथ-साथ शिक्षा देने का पूरा तंत्र खड़ा कर लिया है और शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटका दी गई है। आज शिक्षा मनुष्य को अपनी कठिनाइयों से लड़ते हुए पर्यावरण के अनुकूल और बेहतर बनते जाने की प्रक्रिया न रह कर मुख्यतः धनोपार्जन का माध्यम बनती जा रही है। शिक्षा का स्वरूप रूपांतरित हो गया है पर एक चीज नहीं बदली है, न बदल सकती है, वह यह कि शिक्षा का माध्यम है भाषा और वह भाषा मातृभाषा हो तभी शिक्षा के आदान-प्रदान का उद्देश्य बेहतर ढंग से पूरा हो सकता है। इस मूलभूत बात को गहराई से समझने की जरूरत है। 

“जिसे अपनी मातृभा आती हो उसे दूसरी भाग आसानी से आती है पर मातृभा न आए तो कोई भाग ठीक से नहीं आती।” 

शिक्षा बौद्धिक प्रक्रिया है और बुद्धि का माध्यम है भाषा। जैसे बिजली बिना तार के प्रवाहित नहीं हो सकती वैसे ही बुद्धि प्रवाह बिना भाषा के नहीं हो सकता–भाषा कूट भाषा हो या सांकेतिक या ध्वन्यात्मक पर भाषा के बिना संप्रेषण नहीं हो सकता। बिजली के तार अगर लोहे या अल्यूमिनियम के हों तो बिजली का प्रवाह अपेक्षित सरलता के साथ नहीं होगा। तांबे के तारों के माध्यम से ही बिजली समुचित और दोषरहित ढंग से प्रवाहित होती है। अन्य माध्यम प्रवाह को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और बिजली का क्षरण होता है। इस रूपक को बुद्धि पर लागू करें तो मातृभाषा में बुद्धि का प्रवाह निर्बाध और निर्दोष होता है। अन्य भाषा में भी बुद्धि काम कर सकती है। पर उसके लिए बुद्धि को आदत डालनी पड़ती है। इसके लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है और बौद्धिक ऊर्जा का अपव्यय होता है। 

इसीलिए कहते हैं कि जिसे अपनी मातृभाषा आती हो तो उसे दूसरी भाषा आसानी से आती है पर मातृभाषा न आए तो कोई भाषा ठीक से नहीं आती। भाषा से निजता यानी अपनत्व का संबंध होता है इसलिए भाषा ही आधार बनी थी जब एक वृहत्तर निजता के लिए राष्ट्र-राज्य का प्रादुर्भाव हुआ था। राष्ट्रवाद का मूल आधार भाषा ही है। भौतिक संवाद हो या आध्यात्मिक निज भाषा से निजता बढ़ती है। इसीलिए धर्म की भाषा भी मातृभाषा हो तभी धर्म मनुष्य द्वारा नैसर्गिक रूप से ग्रहण किया जाता है। जब धर्म का माध्यम मातृभाषा नहीं होती तो धर्म में पुरोहिती का जोर बढ़ जाता है और धर्म भी अजनबियत पैदा करता है और रूढ़िग्रस्त हो जाता है। 

“आज के भारत में शिक्षा और साक्षरता की उन्नत स्थिति के लिए ‘जन शिक्षा की आवश्यकता है और यह शिक्षा मातृभाषा में ही संभव है।” 

उदाहरण के लिए प्राचीनकाल में जब सनातन धर्म की भाषा संस्कृत थी तो धीरे-धीरे उसमें पुरोहिती और कर्मकांड बढ़ता गया। जैसे ही बुद्ध ने लोगों की अपनी भाषा पाली में अपना प्रचार किया उसकी स्वीकार्यता बढ़ती चली गई। यूरोप में इसाई धर्म और बाइबिल की भाषा जब तक लातिन रही वह रूढ़िग्रस्त होता चला गया। मार्टिन लूथर ने धर्म सुधार शुरू किया तो धार्मिक विवेचना और प्रचार अपने क्षेत्र की जन भाषा जर्मन में किया। बाद में इसाई धर्म जहां भी गया प्रचार का माध्यम उस क्षेत्र की जन भाषा को ही बनाया। यहां तक जन जातियों की उन भाषाओं का भी प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया जो बोलियां कहलाती थीं और जिनकी लिपि तक नहीं थी। 

सारांश यह कि धार्मिक शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा रहने पर ही धर्म का संदेश जन तक ठीक से पहुंचता है। 

अब जरा सामान्य शिक्षा पर नजर डालें। भारत में प्राचीन काल में शिक्षा का माध्यम संस्कृत थी। सारा चिंतन-मनन-शिक्षण संस्कृत भाषा में होने लगा जो कभी जन भाषा नहीं थी। इसलिए संस्कृत न जानने वाले अशिक्षित, असभ्य और असंस्कत करार दिए गए। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि प्राचीनकाल में ज्ञान-विज्ञान में इतना आगे रहने वाला देश इतना पिछड कैसे गया। सबसे बड़ा कारण तो यही था कि समाज का बहुमत विशेषकर नारियां और मेहनतकश यानी भारी बहुमत संस्कृत न जानने के कारण अशिक्षित रहा और बौद्धिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी नहीं हो पाई। 

यूरोप में भी देखें कि ज्ञान का माध्यम पहले ग्रीक और फिर लातिन भाषा रही। इसलिए यूरोप में भारत की तरह अपना अतीत विस्मृत होता गया था। पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में वहां हुए पुनर्जागरण का और क्षैतिज विस्तार का एक बहुत बड़ा कारण था जन भाषाओं- अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि का विकास और उन्हीं के माध्यम से शिक्षा का विस्तार। 

भारतीय परिदृश्य पर नजर डालें। भारत में पहले संस्कृत और फिर फारसी के वर्चस्व और कई तरह के पूर्वाग्रहों के कारण सामान्य जन अशिक्षित रहा और जड़ता बढ़ती गई थी। भक्तिकाल और सूफी संतों के जमाने में लोक भाषाओं के इस्तेमाल के कारण जन-चेतना का विस्तार हो रहा था परन्तु इसे पर्याप्त राजाश्रय और प्रोत्साहन नहीं मिला। जब भारत में अंग्रेजों का राज्य कायम हुआ तो पहले उन्होंने नीतिगत अस्पष्टता के कारण संस्कृत पाठशाला और उर्दू-फारसी के मदरसे खोले पर शीघ्र ही मैकाले के नेतृत्व में अंग्रेजी के पक्ष में फैसला हो गया और धीरे-धीरे अंग्रेजी का वर्चस्व कायम हो गया। इससे लाभ भी हआ, क्योंकि अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षित भारतीय विश्व के ज्ञान-विज्ञान से परिचित हो गए और एक नया मध्यम वर्ग भारत में पैदा हुआ। परन्तु इससे नुकसान यह हुआ कि भारतीय भाषाएं ‘व कूलर’ और गौण बन गईं। 

भारतेन्दु ने ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ कहकर राष्ट्रवाद के लिए मातृभाषा के महत्व को चिन्हित किया था। धीरे-धीरे हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं का विकास होने लगा और भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की ताकत भारतीय भाषाओं में, अंग्रेजी के साथ अपनी भाषा में, बौद्धिक गतिविधियां तेज करने के कारण बढ़ती गईं। हिन्दी में भी रामचन्द्र शुक्ल और महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि ने हिन्दी वाङ्गमय को समृद्ध करने का प्रयास किया। 

वास्तविक त्रासदी स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई। उम्मीद थी कि वर्ष 1947 के बाद भारतीय भाषाएं शिक्षा और चिंतन का माध्यम बनेंगी। कुछ राज्यों में ऐसा हुआ भी। पर विभिन्न कारणों से अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहा है-विशेष रूप से हिन्दी क्षेत्र में । इसलिए शिक्षा का परिमाणात्मक विकास तो हुआ पर गुणात्मक विकास बाधित ही रहा है। आजादी के सात दशकों के बाद भी केवल हिन्दी जानने वाले शिक्षित व्यक्ति और बुद्धिजीवियों को दोयम दर्जे का माना जाता है। वास्तविकता यही है कि हिन्दी के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान–समाज विज्ञान आदि के आधुनिकतम विकास तक हिन्दीवासियों की पहुंच नहीं है। इसलिए हिन्दी वाले अंग्रेजी वालों से तो पिछड़ ही गए हैं, भारत की अन्य भाषाओं के मुकाबले भी पिछड़ते जा रहे हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि हिन्दी क्षेत्र के लोग कम प्रखर हैं। ऐसा इसलिए कि बौद्विक विकास के उपकरण हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं।

आज के भारत में शिक्षा और साक्षरता की उन्नत स्थिति के लिए ‘जन शिक्षा की आवश्यकता है और यह शिक्षा मातृभाषा में ही संभव है। अपनी भाषा यानी मातृभाषा में दी जाने वाली शिक्षा को आत्मसात करना आसान होता है। किसी भी विषय को हम अपनी भाषा में जितनी सहजता से समझ सकते हैं, किसी दूसरी भाषा में नहीं। शिक्षा की सार्थकता भी इसी में है कि जिसे दी जाए, वह उसका वरण कर सके। हमारी आज की शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा दोष यह भी है कि उसमें मातृभाषा माध्यम के रूप में अभी भी हाशिए पर है। शिक्षा के स्तर पर माध्यम के रूप में मातृभाषा को प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही हम शत-प्रतिशत शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। 

अंत में, यह कहना भी जरूरी है कि इस युग में शिक्षा का जनतांत्रिक होना अनिवार्य है और जन का विकास मातृभाषा के माध्यम से जन शिक्षा के विकास द्वारा ही संभव है। 

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