मदर टेरेसा पर निबंध

मदर टेरेसा पर निबंध

मदर टेरेसा पर निबंध |Essay on Mother Teresa in Hindi

मदर टेरेसा का जन्म सन 1917 में यूगोस्लाविया में हुआ था। वे जन्म से अल्बानिया की नागरिक थीं। उनके बचपन का नाम एग्नस गोंक्सा बोजास्क्यू था। वे बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और उनमें परहित की भावना थी। वे पीड़ित मानवता का दुख देखकर दुखी रहती थीं। उनमें सांसारिक सुखों के प्रति रंचमात्र भी आसक्ति नहीं थी। उन्हें निजी सुख की चिंता नहीं थी। यही कारण है कि 18 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने ईसाई सेविका बनकर गृह त्याग कर दिया। जन्म से ईसाई होते हुए भी उनमें प्रारंभ से ही यह भाव था कि मानव सेवा ही सच्चा धर्म है। सांप्रदायिकता की संकुचित सीमा मानवता के लिए बाधक है-यह भावना भी उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी। 

मदर टेरेसा डबलिन के लोरेतो गिरजाघर में ‘नन’ की दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात सेवा के व्यापक क्षेत्र हेतु कोलकाता चली आईं। कोलकाता स्थित लोरेतो कॉन्वेंट में इन्होंने अध्यापन कार्य आरंभ किया। शिक्षा मनुष्य के निर्माण में सर्वाधिक सहायक तत्व है, अतः मदर टेरेसा ने शिक्षा क्षेत्र को अपने जीवन के लिए चुना। शिक्षण काल में उन्होंने अपनी क्षमता और योग्यता का समुचित उपयोग किया। उन्होंने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व सेवा की। 20 वर्षों के अध्यापन के बाद उन्होंने उक्त विद्यालय के प्रिंसिपल पद पर कार्य शुरू किया। 

यद्यपि मदर टेरेसा पूरे मनोयोग से अपने शिक्षण कार्य में संलग्न थीं, किंतु उनका मन निरंतर व्यापक क्षेत्र की खोज में लगा रहता था। उन्हें विद्यालय की दीवारों की सीमा लांघनी थी। सन 1946 में मदर टेरेसा के मन में दीन-हीनों के प्रति काफी गहरी करुणा उत्पन्न हुई। उन्होंने कोलकाता की गंदी बस्तियों में रहने वाले लोगों की सेवा का निश्चय किया। उन्हें लगा कि जब तक गरीबी, रोग और अपंगता से मनुष्य जाति को मुक्त नहीं किया जाता, तब तक जीवन के कोई अन्य कार्य महत्वपूर्ण नहीं हो सकते। 

सन 1952 में मदर टेरेसा ने ‘निर्मल फ्राइडे होम’ नामक एक जनहितकारी संस्था की स्थापना की। यह संस्था निराश्रितों के लिए वरदान साबित हुई। इसके बाद उन्होंने असहाय और उपेक्षित शिशुओं की सेवा तथा सुरक्षा के लिए ‘शिशु भावना’ की स्थापना की, जहां आज भी अनेक अनाथ बच्चे संरक्षण पाते हैं। यहीं उनके पालन-पोषण के साथ शिक्षा का भी समुचित प्रबंध है। 

 मदर टेरेसा ने कुछ कुष्ठ रोगियों की दुर्दशा देखी, तो उनका भावाकुल हृदय द्रवीभूत हो उठा। उन्होंने ऐसे रोगियों की सेवा का व्रत लिया। ऐसे में उन्होंने 1957 में आसनसोल में कुष्ठ रोगियों की सेवा हेतु एक सेवागृह खोल दिया, जहां तिरस्कृत और उपेक्षित कोढ़ियों को नवजीवन देना शुरू किया गया। इस सेवागृह में रहते हुए अनेक कुष्ठ रोगी स्वस्थ हुए। उन्होंने सन 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ नामक संस्था की भी स्थापना की थी। 

दया की प्रतिमूर्ति मदर टेरेसा को भारत सरकार ने 1962 में ‘पद्मश्री’ की उपाधि प्रदान की। उसी वर्ष फिलीपींस सरकार ने ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ से उन्हें सम्मानित किया। इसके बाद उन्हें ‘पोपजॉन शांति पुरस्कार’, ‘केनेडी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार’ एवं ‘गुड सेमेंरिटन अवार्ड’ भी मिले। सन 1971 में अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना के प्रचार-प्रसार के लिए इन्हें ‘जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार’ दिया गया। सन 1973 में उन्हें ‘टेंपल्टन फाउंडेशन पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने उनकी व्यापक सेवा के लिए सर्वोच्च उपाधि ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया। 

मदर टेरेसा की अमूल्य सेवा के तहत उन्हें स्वीडन ने विश्वविख्यात ‘नोबल पुरस्कार’ से सम्मानित किया। वे गरीबों के लिए भगवान थीं। मदर टेरेसा कहती थीं कि मैं गरीबों में भगवान के दर्शन करती हूं। यह सारे विश्व के लिए गौरव की बात थी। मदर टेरेसा नि:स्वार्थ भाव से असहायों की सेवा करती थीं। यह कारण है कि लोग उन्हें श्रद्धा से ‘लोक माता’ कहते हैं। 

 

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