मोदी डॉक्ट्रिन पर निबंध : भारत की अपार वैश्विक संभावनाओं का द्वार  अथवा मोदी डॉक्ट्रिन : भारत विश्व शक्ति बनने की राह पर 

मोदी डॉक्ट्रिन पर निबंध

मोदी डॉक्ट्रिन : भारत की अपार वैश्विक संभावनाओं का द्वार अथवा मोदी डॉक्ट्रिन : भारत विश्व शक्ति बनने की राह पर 

इक्कीसवीं सदी एशिया की सदी घोषित की जा चुकी है। निश्चित तौर पर इस कथन को सही साबित करने में चीन एवं जापान के अलावा भारत की भूमिका निर्णायक होगी। भारत की आजादी से अब तक के सत्तर सालों में भारत की एक परिपक्व विदेश नीति निर्मित हुई है। लेकिन इस विदेश नीति की गतिकी में पिछले दो वर्षों में ऐसे परिवर्तन देखने को मिले जो पिछले 72 सालों में देखने को नहीं मिले थे। जून, 2016 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के समय जो घटित हुआ वह भारतीय विदेश नीति में मील का पत्थर साबित हुआ। ओबामा प्रशासन ने प्रधानमंत्री मोदी के दुनिया के प्रति विजन को ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ नाम दिया। प्रस्तुत आलेख में इसी प्रत्यय की चर्चा विस्तार से की जाएगी। ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ शब्द में निहित अर्थों को समझने के लिए भारतीय विदेश नीति के विकास एवं उसकी मूल विशेषताओं से परिचित होना आवश्यक है। 

भारतीय विदेश नीति की जड़ें उसके अतीत में समाई हुई हैं। पड़ोसी राज्यों एवं सुदूर स्थित राज्यों से वैविध्यपूर्ण संबंध स्थापित करने की परंपरा मनु एवं कौटिल्य के समय से ही भारत में पाई जाती है। कौटिल्य ने तो विदेश नीति/परराष्ट्र नीति संबंधी अपने विचार अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में दिए। इसके अलावा आज भारतीय विदेश नीति की विश्व शांति, लोकतंत्र, सर्वधर्म समभाव एवं शांतिपूर्ण सहअस्तित्व जैसी विशेषताएं बुद्ध और महावीर जैसे महात्माओं द्वारा स्थापित विचार एवं मूल्य पद्धतियों से प्रेरित है। इसके साथ ही वर्तमान भारतीय विदेश नीति पर यदि सबसे अधिक किसी काल या विचार का प्रभाव पड़ा तो वह भारत का स्वतंत्रता आंदोलन और उस दौर में जन्में विचार मूल्य हैं। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष, नस्लवाद का विरोध, शस्त्रीकरण का विरोध, साम्राज्यवाद का प्रातिरोध, धर्मनिरपेक्षता, गुटनिरपेक्षता आदि ऐसी विशेषताएं हैं जो भारत की विदेश नीति का आधार तय करने के लिए उसे स्वतंत्रता संघर्ष से विरासत के तौर पर मिली थीं। इसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू एम. एन. राय जैसे विश्व दृष्टि रखने वाले नेताओं का पुट भी जड़ता गया। खासकर नेहरू ने भारतीय विदेश नीति की आधारशिला रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

आजादी के बाद भारतीय विदेश नीति की मूल विशेषता गुटनिरपेक्षता एवं पंचशील रही तथा अन्य देशों के साथ संबंधों के निर्धारण में ये दोनों अवधारणाएं निर्धारक बनी रहीं। द्वितीय विश्व यद्ध की समाप्ति के बाद गुटीय और वैचारिक द्विध्रुवीयता की राजनीति से अलग हटकर भारत ने गुटनिरपेक्षा का विचार ग्रहण किया। यह विचार अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर अन्य देशों के साथ अपने संबंध बनाने की वकालत करता है। साथ ही यह विचार हथियारों, परमाणु आयुधों के विस्तार का विरोध, नस्लीय-जातीय भेदभाव के अंत, संयुक्त राष्ट्र के सुदृढ़ीकरण और नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था (NIEO) के आधार पर टिका था। नब्बे के दशक में जब गुटीय राजनीति खत्म हुई (सोवियत संघ के पतन के साथ) तो गुटनिरपेक्षता का विचार अपने नये संदर्भो के साथ प्रासंगिक हो चला। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का विरोध, पर्यावरण संकट से निकलने के लिए पहल (ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन) आदि नई चुनौतियां गुटनिरपेक्ष विचार की प्रासांगिकता है। पंचशील, इसी गुटनिरपेक्ष नीति का पालन करते हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में किस प्रकार आचरण किया जाए, इस प्रश्न का उत्तर देता है। इस विचार का स्रोत गौतम बुद्ध के विचारों में मिलता है। यूं तो यह सिद्धांत चीन के साथ एक व्यापार संधि के अनुपालन में आधार वक्तव्य के रूप में आया था लेकिन उसके बाद से यह भारतीय विदेश नीति का मुख्य गुण बन गया। एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और स्वतंत्रता का पारस्परिक सम्मान, एक-दूसरे पर अनाक्रमण, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप, समानता के आधार पर एक-दूसरे को लाभ पहुंचाना एवं शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, यही पांच वर्तमान भारतीय विदेश नीति के आधार हैं।

 पिछले सत्तर सालों के विभिन्न दशकों में भारतीय विदेश नीति इन्हीं मूल विशेषताओं को समेटे हुए अपने भीतर नये तत्वों का समावेश भी करती रही। उदाहरणस्वरूप नेहरू काल में आदर्शवाद का प्रभाव रहा तो इंदिरा ने अमेरिकी यथार्थवाद की राह पर विदेश नीति लागू की। राजीव गांधी और नरसिम्हा राव के समय भारतीय विदेश नीति में अहम बदलाव देखने को मिले, क्योंकि यह समय सोवियत संघ के पतन, तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाओं के खुलने और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को सार्वजनिक उद्यमों पर तरजीह देकर निजी उद्यमों को प्रोत्साहित करने का था। वाजपेयी और मनमोहन सरकार के समय में दुनिया के देशों से आर्थिक रिश्ते बनाने के लिए कई पहले हुईं जिन पर देश की नई आर्थिक नीति और भूमंडलीकरण का प्रत्यक्ष प्रभाव था। हालांकि वाजपेयी के समय में पड़ोसी देशों के साथ कुछ अपवादों (कारगिल युद्ध) को छोड़कर रिश्ते बेहतर हुए। इसके पहले भारतीय विदेश नीति को गुजराल डॉक्ट्रिन ने अहम दिशा दी थी। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया आतंकवाद की चपेट में थी, 9/ 11 की घटना हो चुकी थी, इराक व अफगानिस्तान युद्ध की गिरफ्त में थे, तब भारत की विदेश नीति स्पष्ट थी और भारत ने अमेरिका के किसी देश की संप्रभुता में हस्तक्षेप, उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की आलोचना की थी। 

“वर्तमान समय में भारतीय विदेश नीति को गढ़ने का कार्य नरेंद्र मोदी बखूबी कर रहे हैं जिस तरह कभी नेहरू ने किया था। ओबामा प्रशासन ने ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ को ‘शांति, समृद्धि और स्थायित्व से जोड़ते हुए इसे पूरी दुनिया के लिए एक विजन माना।” 

प्रस्तुत आलेख मुख्यतः मोदी सरकार के आगमन के बाद भारतीय विदेश नीति में आये अहम पड़ावों से होते हुए ‘मोदी ड्रॉक्ट्रिन’ का परीक्षण करना चाहता है। इसलिए मई, 2014 के ठीक पहले की वैश्विक स्थितियों और भारत के उन पर दृष्टिकोण को सरसरी तौर पर देखना आवश्यक है। पाकिस्तान में नवाज शरीफ की सरकार के समय से भारत के साथ रिश्ते स्वस्थ करने को पहल बढ़ रही थी। लेकिन पाकिस्तान की चीन के साथ बढ़ती निकटता भारत के लिए चिंता का विषय रहा, इस बीच पाकिस्तान ने ग्वादर बंदरगाह | चीन के हवाले कर दिया। चीन का दक्षिणी चीन सागर में हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा था लेकिन तिब्बत व अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे पर चीन नरम था। बांग्लादेश शाहबाग आंदोलन की चपेट में था, नेपाल में राजनीतिक संकट बना हुआ था और अफगानिस्तान नाटो शक्तियों से खाली होना शुरू हो गया था। मध्य पूर्व में अरब वसंत की बयार धीमी होने लगी थी लेकिन सीरिया में आईएसआइएस और नाइजीरिया में बोको हरम का आतंक तेजी से बढ़ रहा था। ऐसे वैश्विक परिदृश्य में भारत में 16वीं लोकसभा का निर्वाचन होता है और देश नये प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को चुनता है। 

वर्ष 2014 में निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री (गुजरात) के रूप में राजनीतिक अनुभव काफी पुराना था। उस दौरान भी विदेशों के प्रति उनकी रुचियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे मुख्यमंत्री रहते हुए और उसके पहले भी राष्ट्रीय जरूरतों के लिहाज से विदेश यात्राएं किया करते थे। उन्होंने ‘थिंक इंडिया, डॉयलॉग फोरम’ का गठन किया था तथा ‘ब्राइब्रेट गुजरात’ के जरिए वे विश्व के बड़े निवेशक देशों के आकर्षण के केंद्र बने हुए थे। पड़ोसी देशों और विश्व की अन्य शक्तियों का उनके प्रति खास तरह का लगाव उनके शपथ ग्रहण समारोह में नजर आ गया था। सभी सार्क देशों के प्रतिनिधित्वकर्ता उनके शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद थे। यहां तक कि निर्वासित तिब्बती सरकार ने भी उनका अभिवादन किया। असल में जून, 2016 में प्रधानमंत्री द्वारा की गई अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी प्रशासन द्वारा ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ शब्द प्रचलन में लाने के पीछे मोदीजी के पिछले दो वर्षों का नजरिया शामिल है। दुनिया को उसकी समस्याओं को और भारत के उसके प्रति पहल को ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ के लिहाज से समझा जा सकता है। 

वर्तमान समय में भारतीय विदेश नीति को गढ़ने का कार्य नरेंद्र मोदी बखूबी कर रहे हैं जिस तरह कभी नेहरू ने किया था। ओबामा प्रशासन ने ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ को ‘शांति, समृद्धि और स्थायित्व से जोड़ते हुए इसे पूरी दुनिया के लिए एक विजन माना। अमेरिका की दक्षिणी एवं मध्य एशिया मामलों की सहायक विदेश मंत्री निशा देसाई ने एक शब्द प्रचलित करते हुए कहा कि ‘इंडो-यूएस’ नीति में उनका विजन विशेष तरह का है जिसे ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ भी कहा जा सकता है। उनका विचार इतिहास में फैसले लेने की हिचकिचाहट से काफी ऊपर है। ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ केवल अमेरिका से भारत के संबंध मात्र तक नहीं सीमित है बल्कि वह एशिया से अफ्रीका व भारतीय महासागर से प्रशांत महासागर तक शांति, समृद्धि और स्थायित्व के लिए रास्ते तलाशता है। निशा देसाई ने ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ के बारे में अपने विचार दिए। उनके अनुसार, यह सिद्धांत कहता है कि यदि आपसी सहमति से देशों की सुरक्षा व्यवस्था नहीं कायम की गई तो एक प्रकार की अनिश्चितता बरकरार रहती है। वर्तमान इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठनों के यूरोपीय व मध्य एशिया सहित भारत में भी बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में मोदी डॉक्ट्रिन की यह बात महत्त्वपूर्ण है। यह सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों के लिए भारत के समर्थन को दोहराता है और अन्य देशों से भी समर्थन की अपील करता है। मोदी डॉक्ट्रिन में यह विश्वास निहित है कि वह अंतर्राष्ट्रीय मानकों को बरकरार रख सकता है। अमेरिका रक्षा मंत्री कार्टर ने इस बाबत कहा है कि भारत एक सैद्धांतिक सुरक्षा नेटवर्क को सहयोग दे सकता है और एक ऐसी प्रमुख शक्ति बन सकता है जो अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ा सकता है और स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु संकट जैसे मुद्दों पर वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकता है। अमेरिका के भीतर यह दृष्टिकोण मोदी डॉक्ट्रिन की स्पष्टता के कारण विकसित हुआ है। 

“मोदी सरकार ने अपने सौ दिन पूरे होने पर वैश्विक परिवेश में अपनी उपलब्धियों पर ‘फास्ट ट्रैक कूटनीति’ नामक शीर्षक से एक पुस्तिका जारी की, यह भारत की अन्य देशों के प्रति तेज और राष्ट्रीय हितों को साधकर कूटनीति का निर्धारण करने की मोदी सरकार की नीति का संकलन करती है।” 

‘मोदी डॉक्ट्रिन’ भले ही भारत-अमेरिका संबंधों के आलोक में अमेरिकी प्रशासन द्वारा जनित अवधारणा हो लेकिन यह न केवल मोदी सरकार की विदेश नीति के प्रति अमेरिका की, वरन् सम्पूर्ण विश्व की सोच को व्यक्त करता है। मोदी सरकार की विदेश नीति के कुछ बिंदुओं का उल्लेख करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। प्रथम पड़ोसी प्रथम नीति (Neighbourhood First Policy), मोदी सरकार की पड़ोसी देशों के प्रति सबसे अधिक सहयोगात्मक और तेज पहल की नीति रही है। उन्होंने अपने कार्यकाल का पहला दौरा पड़ोसी देश नेपाल का किया। सार्क देशों के सम्मेलन को संबोधित करते हए इसरो से सार्क देशों के लिए सैटेलाइट विकसित करने की बात कही। द्वितीय- हिंद महासागर में बढ़ता प्रभाव, मोदी सरकार ने अपनी विदेश नीति में हिंद महासागर को प्रमुखता दी, मोदी ने अपनी चीन यात्रा के दौरान हिंद महासागर पर अपना रुख स्पष्ट किया और समदी सीमाओं की संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाये रखने को प्रतिबद्धता दिखाई। इस क्षेत्र में भारत सरकार ने ‘प्रोजेक्ट मौसम’ की शुरुआत की। तृतीय- भारत प्रशांत द्वीपों के लिए सहयोग मंच, मोदी प्रशासन की फिजी यात्रा के दौरान प्रशांत महासागर के द्वीपों को विभिन्न तरीके से सहयोग करने की नीति रही। इसके लिए साझा मंच तैयार हुआ। चतुर्थ- फास्ट ट्रैक कूटनीति, मोदी सरकार ने अपने सौ दिन पूरे होने पर वैश्विक परिवेश में अपनी उपलब्धियों पर ‘फास्ट ट्रैक कूटनीति’ नामक शीर्षक से एक पुस्तिका जारी की, यह भारत की अन्य देशों के प्रति तेज और राष्ट्रीय हितों को साधकर कूटनीति का निर्धारण करने की मोदी सरकार की नीति का संकलन करती है। इनके अलावा पैरा कूटनीति, पूर्वी एशिया नीति, पश्चिमी एशिया नीति, लिंक वेस्ट नीति आदि मोदी सरकार की विशिष्ट विदेश नीति का हिस्सा है। इन्हीं बिंदुओं पर मोदी सरकार पिछले दो वर्षों में अपनी विदेश नीति को क्रियाशील बनाया है। ये मोदी डॉक्ट्रिन का अहम रूप से हिस्सा है। 

अंततः यह कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी के इस असीम संभावनाओं के दौर में ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ भारत को विश्व शक्ति बनाने की राह पर ले जा रही है, लेकिन इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत की आंतरिक स्थिति में तमाम ऐसी अस्थिरताएं उत्पन्न होती रहती हैं जो वैश्विक समुदाय को प्रभावित करती हैं। खासकर पड़ोसी देशों के प्रति संवेदनशील मुद्दों के संदर्भ में। अमेरिका की साम्राज्यवादी और त्रिपक्षीय आर्थिक नीति से भी भारत को सचेत रहने की आवश्यकता है। अमेरिका वैश्विक वित्तीय संगठनों (IMF, WTO, WB) को अपने हित में अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंध कायम करने के लिए जोर डालता रहता है। मोदी सरकार की सफलता इसी बात में होगी कि वे नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के अगुआ के तौर पर किस प्रकार वैश्विक पहल पर तीसरी दुनिया के देशों की समस्याओं को रख सकता है। ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन व अन्य पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने के लिए भारत विकसित देशों से मदद लेने के लिए तीसरी दुनिया को नेतृत्व प्रदान कर सकता है। कुल मिलाकर ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ यदि कामयाब होती है तो यह भारत सहित एशिया व अफ्रीका के अन्य देशों की प्रशस्ति का मार्ग खाल सकती है। 

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