भारत में स्वतंत्रता की गलत व्याख्या एवं उसका दुरुपयोग पर निबंध |Essay on misinterpretation and misuse of independence in India

भारत में स्वतंत्रता की गलत व्याख्या एवं उसका दुरुपयोग पर निबंध

भारत में स्वतंत्रता की गलत व्याख्या एवं उसका दुरुपयोग पर निबंध |Essay on misinterpretation and misuse of independence in India

हम देश की आजादी की 50 वर्षगाँठे माना चुके हैं, पर क्या आज भी हम पूर्णतया स्वतंत्र है? क्या आज भी हमारे अन्दर देश के प्रति प्रेम है? क्या वास्तव में हम स्वतंत्रता का तात्पर्य जान पाए है? 

वास्तव में, आज भी हम स्वतन्त्रता का तात्पर्य, उसका महत्व और उसकी उपयोगिता को नहीं जान पाए हैं. आज के परिवेश में लोग स्वतंत्रता का तात्पर्य अपनी इच्छानुसार कार्य करने को ही मानते हैं. वे सोचते हैं कि हम प्रत्येक कार्य चाहे वह वैध हो या अवैध उसे करने को स्वतन्त्र हैं. आज संविधान में वर्णित स्वतन्त्रता व मौलिक अधिकारों का गलत उपयोग किया जा रहा है. 

स्वतन्त्रता केवल व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती है. वह समाज को अर्थात् समाज के प्रत्येक घटक को प्राप्त होती है, जो व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का लाभ उठाना चाहता है, उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तब ही सार्थक हो सकती है, जब वह वोल्टेयर की भाँति यह कहने का नैतिक साहस रखता हो “I disapprove of what you say, but I would defend to the death your right to say it.” अर्थात् “तुम जो कुछ कहते हो, मैं उसको अस्वीकार करता हूँ, परन्तु उक्त कथन को कहने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा मैं अन्तिम श्वास तक करूँगा.” परन्तु भारत में स्वतन्त्रता का अर्थ मनमानी करना अथवा उच्छृखल होता है. आरक्षण की ओट में अनेक योग्य व्यक्तियों के योग्यतानुसार कार्य प्राप्त करने के अधिकार को छीन लेना, घोटाले, भ्रष्टाचार आदि द्वारा कानून का ठेंगा दिखाना, देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बनाना तथा उनको लक्ष्य करके उल्टी-सीधी बातें कहकर स्वतन्त्रता की दुहाई देना आदि बातें यह स्पष्ट करती हैं कि हमने स्वतन्त्रता का गलत अर्थ लगा रखा है. और तो और मतपेटिकाओं के साथ ही मनमानी करके हम अपने आचरण की स्वतन्त्रता का दावा करने का दम भरते हैं. विडम्बना यह है कि उच्छृखल आचरण द्वारा हम अपने देश की छवि धूमिल करते हुए भी लज्जित नहीं होते हैं. 

यूँ तो, संविधान में समता का अधिकार प्रदान कर दिया गया है, पर आज भी कितने ऐसे लोग हैं जिन्हें इस अधिकार का ज्ञान है, और इसका उपयोग कर वे शोषण करने वालों के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं. इस अधिकार का ज्ञान है, वे इसका गलत उपयोग कर रहे हैं, यथा-आरक्षण के नाम पर आज निरन्तर अनुसूचित जाति व जनजातियों का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है. जहाँ नौकरियों में आरक्षण के नाम पर वे प्रवेश बड़ी सरलता से पा रहे हैं, वहीं योग्य व्यक्ति आज बेरोजगार हैं. वे अधिक योग्य होकर भी आज कुछ नहीं कर पा रहे हैं, परन्तु चाहे जिस व्यक्ति के विषय में चाहे कुछ छापकर या कहकर लोग स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करते हुए देखे जाते हैं. हमारी प्रेस की स्वतंत्रता भी सीमित है. किसी बड़े व्यक्ति के सम्बन्ध में कोई लेख हो, जिसमें उसकी वास्तविकता व्यक्त की गई हो, तो उसे छपने से रोक दिया जाता है. आज भी कलम उतनी स्वतंत्र नहीं जितनी गुलामी के समय थी. ताजा उदाहरण है, फिल्म ‘फायर’ जिस पर आए दिन प्रदर्शन होते है. कहाँ है उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? महान एवं गरिमामय नेताओं से सुसज्जित संसद में ही बात-बात में नेताओं के कॉलर पकड़कर घसीटा जाता है. क्या कर पाते हैं वे अपनी बात का समर्थन? संघ की स्वतन्त्रता का पूरा फायदा उठाया जा रहा है भारत और पाक के बीच होने वाले मैच को रोकने के लिए, जो पिच खोदकर प्रदर्शन किया. वह इस बात को दर्शा रहा है कि आज स्वतंत्रता का खुलकर उपहास उड़ाया जा रहा है. यूँ तो भारत में स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण की स्वतंत्रता है पर कितनी? आज सड़कों पर नारी अकेले घूमने में हिचकती क्यों है? क्या नैना साहनी काण्ड व अंजना मिश्रा प्रकरण इस बात को प्रकट नहीं कर रहे हैं कि आज कितनी स्वतंत्रता है? कश्मीर से गायब हुए नवयुवक इसी बात का प्रमाण हैं कि आज भी कहीं आने-जाने की स्वतन्त्रता सम्भव नहीं है. अपनी आजीविका प्राप्त करने व व्यापार की स्वतंत्रता ही है जो आज बढ़ती हुई महँगाई को प्रदर्शित कर रही है. जीविकोपार्जन की स्वतंत्रता का लाभ उठाकर ही, आज यहाँ भारत देश में माता सरस्वती आदि देवियों के अश्लील चित्र बनाकर हमारी संस्कृति का अपमान किया जा रहा है. 

आज राजनीति से धर्म को जोड़कर जो राजनीतिक प्रपंच खेला जा रहा है. वह भी असहनीय है. हालांकि प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता का पूर्ण अधिकार है फिर भी इस स्वतंत्रता ने जाने कितने ही लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है. धर्म के नाम पर हुई मन्दिर, मस्जिद घटना के दुःखदायी समाचार से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि ईसाइयों पर हुए हमले के मामले ने सर उठा लिया है. आखिर क्यों? क्यों, आज ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम पर ये मामले हमें दिखाई दे रहे हैं. सालों से चले आ रहे माता सरस्वती के पूजन व वंदना को लेकर नया विवाद खड़ा कर दिया गया और तो और, जिस ‘वन्दे-मातरम्’ ने हमें आज ये आजादी के मायने समझाए, हमें खुलकर जीने की, स्वतंत्र वायु प्रदान की आज उसी का विरोध किया जा रहा है और वह भी धर्म के नाम पर कितना घृणित व गन्दा लगता है ये सब. 

हमें शिक्षा और संस्कृति सम्बन्धी अधिकार भी मिले हैं. जिनसे हम खुलकर अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर सकें. पर क्या हमें ये स्वतंत्रता प्राप्त है. शिक्षा पर होने वाला व्यय, शिक्षकों की हड़ताल की स्वतन्त्रता, छात्रों के अनशन की स्वतन्त्रता, क्या ये सब मिलकर हमें शिक्षा को ग्रहण करने देते हैं? नहीं, तो फिर क्या हुआ इस स्वतन्त्रता का अर्थ. कहाँ गई हमारी यह स्वतन्त्रता. 

अन्य भी कई स्वतंत्रताएं हैं जिनका आज देश में धड़ल्ले से दुरुपयोग किया जा रहा है यथा-कहा गया है कि हर राज्य में न्यूनतम मजदूरी दर तय है, फिर भी आज मिल मालिकों एवं ठेकेदारों की स्वतंत्रता के आगे बेचारे गरीब मजदूर विवश दिखाई पड़ते हैं. कृषकों को प्रतिदिन बढ़ती हुई, आत्महत्याओं की दर बता रही है. कृषि एवं पशुपालन में होने वाले घोटाले इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि आज का कृषक, आज तक भूस्वामी नहीं बन सका है 

हमारे देश के बड़े-बड़े स्मारकों एवं इमारतों तथा पुराने किलों को भी संरक्षण प्रदान किया जाता है. हमें ही उनकी सुरक्षा करनी चाहिए. सरकार इन्हें कितना संरक्षण देती है पता नहीं, पर हममें से कोई जाता है और गांधीजी की समाधि को नुकसान पहुंचाता है, किसलिए? कि उसे स्वतन्त्रता थी. 

यूँ तो स्वतन्त्रता हमें मताधिकार की भी है पर मतदान केन्द्र पर पहुँचने पर हमें पता चलता है कि वहाँ हमारे नाम से कोई और वोट डाल गया. अब अपने मताधिकार की 

स्वतंत्रता की शक्ति को लेकर भी हम स्वतंत्रता का गलत उपयोग करने वाली ताकत के आगे घुटने टेक देते हैं निर्वाचन के समय ऐसे-ऐसे उम्मीदवार होते हैं, जिनकी स्वतंत्रता के आगे हमारा तो क्या अच्छे-अच्छे ऊँचे लोगों का भी वश नहीं चलता. वे उम्मीदवार चाहे अंगठा छाप ही क्यों न हों, पर उन्हें चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता है. गलत ढंग से चुनाव जीतने की भी स्वतन्त्रता है. मत पेटियाँ बदलने की भी स्वतंत्रता है. 

आज की राजनीति एक ऐसा अखाड़ा बन चुकी है. जहाँ केवल बलवान एवं धनवान का ही बोलबाला है. महिलाएं जोकि 33% आरक्षण की माँग कर रही हैं, उस विधेयक को नकारा जा रहा है, लेकिन यहाँ ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जिन्हें अपने पति का पद प्राप्त है और वे शासन का संचालन कर रही हैं, क्योंकि उनके पास स्वतंत्रता है. राजनीति की इसी स्वतंत्रता ने महिलाओं को उच्छृखल भी बनाया है. वे बड़े-से-बड़े घोटाले करने में भी आज नहीं सकुचाती हैं. 

ताजा प्रकरण, सरसों के तेल में ‘आर्जीमोन’ नामक विषैला तत्व पाया गया, क्योंकर? स्वतंत्रता के दुरुपयोग से. दुकानदार अपनी दुकान किसी भी तरह चलाने के लिए स्वयं को स्वतन्त्र समझ रहा है. ‘नकल अध्यादेश जारी किया गया है’ छात्र विरोध कर रहे हैं, वे चाहते हैं स्वतंत्रता नकल करने की. चिकित्सक जिन्हें देवता मानकर पूजा भी जाती था आज के समय में गुर्दा प्रत्यारोपण काण्ड में लिप्त हैं या फिर अपने ही मरीजों के साथ कुकृत्य कर डालते हैं. और वन्यजीव संरक्षण का बोलबाला है पर वे मूक रहकर कठोर वेदनाएं सहते रहते हैं. अमीरों के शिकार होकर बेमौत मारे जाते हैं. 

आज स्वतन्त्रता का मतलब ही बदल गया है. हर नागरिक, हर नेता, हर कोई समझता है कि उसकी स्वतन्त्रता अबाध है, भूल जाते हैं कि उनकी स्वतंत्रता के दुरुपयोग से किसी की जान भी जा सकती है. क्यों भूल रहे हैं हम कि हमारी छोटी-सी स्वतंत्रता का ही सवाल था जब हमारे राज्य बँट गए थे. आज हम निजी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर उसका माखौल बना रहे हैं. आज भी विदेशी व शत्रु देशों की नजर हम पर गिद्ध के समान गढ़ी है. हम अपनी स्वतंत्रता के गलत इस्तेमाल का प्रयोग रोकते क्यूँ नहीं? क्यों नहीं समझ पाते, दूसरों का दर्द? क्यों अपनी गलत स्वतंत्रता के नाम पर दूसरों के स्वतंत्रता की बलि दे डालते हैं? 

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