न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन पर निबंध |Essay on Minimum Government and Maximum Governance

न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन

न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन या ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ (Minimum Government, Maximum Governance) 

भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न सिर्फ ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ (Minimum Government, Maximum Governance) दर्शन का प्रतिपादक माना जाता है, बल्कि इस दर्शन को मूर्त रूप देने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। यह अकारण नहीं है ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ वह अवधारणा है, जिसका सीधा संबंध विकास से है और हमारे प्रधानमंत्री विकास को लेकर प्रतिबद्ध हैं। उनकी इस प्रतिबद्धता में सतही और वोट बैंक पर केंद्रित राजनीति का कोई स्थान नहीं है। वह विकास के पथ पर चलने वाले पथिक हैं। इस पथिक ने विकास की इबारत लिखने में बहुत खूबी से ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ का इस्तेमाल किया और सुशासन से विकास का पथ प्रशस्त किया। यही कारण है कि वर्ष 2018-19 के बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस अवधारणा को मूर्त रूप दिए जाने से प्राप्त उपलब्धियों का जिक्र किया, जिसमें प्रमुख उपलब्धि विश्व बैंक की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट’ में भारत की रैंकिंग में अभूतपूर्व 42 स्थानों का सुधार आना है। 

“प्रायः शासन के अभिकर्ताओं के द्वारा संपादित किये जाने वाले कार्यों को ‘अभिशासन’ कहते हैं।” 

प्रायः शासन के अभिकर्ताओं के द्वारा संपादित किये जाने वाले कार्यों को ‘अभिशासन’ कहते हैं। किसी राज्य संस्था व समदाय को संचालित करने के लिए किये जा रहे कार्यों को ही ‘अभिशासन’ अर्थात ‘गवर्नेस’ कहते हैं। यहां पर शासन अर्थात् गवर्नमेंट की स्थिति निर्देश देने, नियम बनाने व समन्वय की होती है जबकि अभिशासन, शासन द्वारा प्रदत्त निर्देशों का पालन करता है। शासन का स्वरूप, भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त शासन का कार्यकाल बदलता रहता है लेकिन अभिशासन की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। अभिशासन की प्रक्रिया को संपादित करने के लिए प्रत्येक देश में नौकरशाही की स्थायी व्यवस्था होती है। 21वीं सदी के वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में विकासशील देशों की अनिवार्य आवश्यकता ‘संपोषणीय विकास’ हो गया है। इसके लिए अभिशासन’ की गुणवत्ता को सुधारना सबसे जरूरी कदम है। भारत के संदर्भ में ‘अभिशासन’ संबंधी हमारा अनुभव मिला-जुला रहा है। प्रायः यह देखने को मिलता है कि शासन की प्रकृति व प्रतिबद्धताएं एक विशेष प्रकार की औपचारिकता को जन्म देती हैं जिससे ‘लालफीताशाही’ (रेडटेपिज्म) की समस्या उत्पन्न होती है। भारतीय प्रशासन में यह व्यापक समस्या के तौर पर उभरकर आया है। लालफीताशाही की समस्या को भारत में खत्म करने के लिए नये आर्थिक सुधारों का सहारा लिया गया जिससे लाइसेंस व परमिट, कोटाराज को खत्म किया गया। सरकार द्वारा उठाये गये इन कदमों से शासन का स्वरूप, योजनाओं, कार्यक्रमों के संबंध में तथा जनता के कार्यों के निष्पादन के संबंध में, कम होता गया। शासन का हस्तक्षेप कम होने से ‘अभिशासन का दायरा बढ़ता गया। ‘अभिशासन’ में इसी बीच कुछ अनिवार्य सुधार करने आवश्यक हो गये—सूचना प्रौद्योगिकी और आधुनिकतम उपकरणों का प्रयोग, राजनीतिक, सिविल सोसाइटी और अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्षेत्र में नेतृत्वपरक शैली तथा समाज के महत्त्वपूर्ण लोगों के साथ व्यवस्थाबद्ध साझेदारी आदि। 

इस तरह ‘शासन के न्यूनतम व अभिशासन के अधिकतम होने से कार्य के निष्पादन का दायित्व अभिशासन पर आ जाता है। इसके लिए ‘अभिशासन’ को एक बेहतर मॉडल पर आधारित होना चाहिए जिसमें राजनीतिक, प्रशासनिक और स्वच्छ अभिशासन के नैतिक आयाम समाहित हों। ‘अभिशासन’ का एक मॉडल निम्नलिखित बिंदओं के अंतर्गत समझा जा सकता है—निर्णय करने या लेने में अधिक सतर्कता, अत्यधिक केंद्रीकृत संगठनात्मक संरचनाओं के स्थान पर विकेंद्रित प्रबंधन, प्रत्यक्ष लोक व्यवस्था के विकल्प ढूंढ़ने का लचीलापन, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व को मिलाने पर ध्यान केंद्रित करना, लोक सेवा संगठनों के बीच पारस्परिक प्रतियोगिता के वातावरण का निर्माण करना, परिणामों और उनकी संपूर्ण लागत के साथ रिपोर्ट प्रस्तुत करना जिससे जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके, नागरिकों की शिकायत संबंधी निवारण तंत्र विकसित किया जाना, सरकारी संस्थाओं व कार्यालयों की कार्य संस्कृति में सुधार कर एक नई कार्य संस्कृति स्थापित करना जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, जिम्मेदारी, सहभागिता और नागरिक-अनुकूल प्रबंधन के सिद्धांत अंतनिर्हित हों। 

“प्रथम दृष्टया इससे निष्पादन की प्रक्रिया तेज है और जनता, अभिशासन की प्रक्रिया से सीधेतौर पर जुड़ रही है।” 

अभिशासन के इस मॉडल में वैश्वीकरण की प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए निजी-सार्वजनिक क्षेत्र दोनों को शामिल करने की आवश्यकता है। भारतीय प्रशासन व आर्थिक क्षेत्रों में वर्ष 1991 के बाद से यह प्रक्रिया तेज हुई है। राजग सरकार ने पीपीपी (सार्वजनिक निजी साझेदारी) मॉडल को ‘अभिशासन’ के लिए महत्त्वपूर्ण माना है। ‘अभिशासन’ के लिए वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी ने व्यापक अवसर उपलब्ध करा दिए हैं जिससे ‘ई-अभिशासन’ की संकल्पना जन्मी है। यह शासन व नागरिकों के बीच अमूर्त जुड़ाव को स्थापित करता है तथा दूरियों को प्रायः कम करता है। ई-अभिशासन वास्तव में नागरिकों के रोजमर्रा के कार्यों जैसे—बिल जमा करना, कर जमा करना, उपभोक्ता शुल्क अदायगी, विभिन्न आवेदन पत्र भरना, जानकारी प्राप्त करना, शिकायत दर्ज कराने संबंधी कार्यों को सम्पादित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के तौर पर रेलवे विभाग को लें, रेलवे में व्यक्ति को यात्रा करने को छोड़कर शारीरिक तौर पर स्टेशन पर उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है। टिकट बुक कराने से लेकर, कैंसिलेशन तक की प्रक्रिया ऑनलाइन उपलब्ध है। रेलवे के अतिरिक्त यह सुविधा हवाई यात्राओं व महानगरों में कैब सर्विसेज में भी उपलब्ध है। सरकारी कार्यालयों में ई-अभिशासन के माध्यम से सुदूर गांवों को भी सरकारी कार्यालयों से जोड़ा जा सकता है, इससे कार्यालयों में अतिरिक्त कर्मचारियों की संख्या में कमी की जा सकती है। साथ ही साथ कार्यालय में कागजों व अन्य प्रपत्रों पर होने वाले व्यय को कम किया जा सकता है। कई विभागों को ‘पेपरलेस’ बनाने की भी प्रक्रिया चल रही है। इससे नागरिकों व सरकार के बीच संवाद की प्रक्रिया आसान होती जाएगी। ई-अभिशासन के सफल संचालन के लिए कुशल व अनुक्रियाशील, स्किल्ड आफीसरों व कर्मचारियों की आवश्यकता प्रशासन को पड़ेगी। 

राजग सरकार ने अधिकतम अभिशासन को सुनिश्चित करने के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाये हैं। प्रधानमंत्री जनधन योजना’, डिजिटल गांव योजना, गो इंडिया स्मार्ट कार्ड, डिजिटल इंडिया प्रोग्राम, ई एग्रीकल्चर, ग्रीन फैबलेट, किसान कॉल सेंटर, सिंगल विंडो सिस्टम, बायोमीट्रिक एटेंडेंस, नागरिक चार्टर, अकादमिक ऑडिट तथा अन्य मोबाइल एप्लीकेशन। इन कार्यक्रमों, योजनाओं व संरचनाओं की मदद से प्रशासन के क्षेत्र में अधिकतम अभिशासन को शत फीसदी सम्भव बनाया जा रहा है। लेकिन ‘अधिकतम अभिशासन’ में सबसे बड़ी समस्या औपचारिकता की वजह से है। ‘औपचारिकता’ के कारण किसी कार्य के सम्पादन में नियमों-कानूनों का हवाला दिया जाता है जो वास्तव में अनावश्यक भी साबित होते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए हाल ही में राजग सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के सैकड़ों कानूनों को खत्म करने के कदम की सराहना की जानी चाहिए। अत्यधिक औपचारिकता की प्रवृत्ति भ्रष्टाचार की समस्या को भी जन्म देती है क्योंकि यदि किसी कार्य के निष्पादन में कई स्तरों पर अनुमोदन की आवश्यकता होगी तो प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार की संभावना बनी रह सकती है। ‘अधिकतम अभिशासन’ की सफलता के लिए यह सबसे अधिक आवश्यक है कि ‘न्यूनतम भ्रष्टाचार’ की स्थिति हो। 

‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ के माध्यम से ही संपोषणीय विकास की अवधारणा को साकार किया जा सकता है। इसके साथ ही साथ विकसित देशों के समकक्ष इसी अवधारणा पर कार्य करके पहुंचा जा सकता है। इसके लिए शिक्षा व कौशल विकास’ को व्यापक लोगों तक पहुंचाना होगा जिससे ‘अभिशासन’ के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया करने में नागरिकों को आसानी होगी। ‘अधिकतम अभिशासन’ को लागू करते समय इस बात का ख्याल करना पड़ेगा कि कहीं ‘अभिशासन’ की प्रक्रिया पूर्णरूप से निजी हाथों में न चली जाए। वैश्विक उदाहरणों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में सरकार द्वारा नागरिकों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं व सुविधाओं को निजी कंपनियों के हाथों में सौंप दिया जाए। रेलवे से लेकर अन्य सभी जनसुविधाओं के क्षेत्र में ‘निजी प्रशासन’ को बढ़ावा दिया जा रहा है। न्यूनतम शासन व अधिकतम अभिशासन’ की पहल में निश्चिततौर पर वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वार्थ व लाभ छिपा हुआ है। सरकार की तमाम योजनाओं व संस्थाओं में निजी पूंजी का दबाव लगातार बना रहा है, ऐसे में निजी प्रक्रम जनता के हित में कितना कार्य करेंगे यह संदेहास्पद है। क्योंकि निजी उद्यमों का इतिहास प्रायः मुनाफा कमाने का होता है। जनता अपने हितों के सर्वश्रेष्ठ चयन के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं तथा उनसे तमाम मूलभूत अपेक्षाएं रखते हैं। इस पहल की आलोचना करते हुए यह कहा जाता है कि इसके द्वारा शासन अपने दायित्वों को कम कर रहा है तथा जनता के प्रति उसके कर्तव्यों को निजी हाथों में सौंप रहा है। इस आलोच्य बिंदु को प्रभावहीन बनाना होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ की पहल अच्छे शासन (सुशासन) से जुड़ी है और स्वयं प्रधानमंत्री इसके पैरोकार हैं। वर्ष 2018-19 के बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि इससे सरकारी एजेंसियां, नियमों, नीतियों और प्रक्रियाओं में सैकड़ों सुधार लाने के लिए प्रेरित हुई हैं। यह बदलाव भारत द्वारा पिछले तीन वर्षों के दौरान विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में शामिल देशों की रैंकिंग में 42 स्थानों के सुधार आने से प्रदर्शित होता है। भारत पहली बार इस सूची में 2017 में शीर्षस्थ 100 देशों की श्रेणी में शामिल हो गया जबकि उसने 2018 में 23 स्थान की छलांग लगाते हुए 77वां स्थान हासिल किया। 

कुल मिलाकर राजग सरकार द्वारा बहचर्चित यह पहल वर्तमान में जनता के बीच में काफी लोकप्रिय है, क्योंकि प्रथम दृष्टया इससे निष्पादन की प्रक्रिया तेज है और जनता, अभिशासन की प्रक्रिया से सीधेतौर पर जुड़ रही है। वर्तमान में इस प्रक्रम की स्वीकार्यता को देखकर कहा जा सकता है कि भविष्य में ‘अधिकतम अभिशासन’ अपने डिजिटल रूपों ई-गवर्नेस व मोबाइल-गवर्नेस की ओर बढ़ेगा। वर्तमान में लघु स्तर में ई और एम-गवर्नेस की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ रही हैं जो आगे चल कर व्यापक रूप लेंगी। 

NOTE  -‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ से अभिप्राय, कैसा हो अभिशासन का मॉडल, इस मॉडल में आवश्यक है,सार्वजनिक-निजी साझेदारी, अधिकतम अभिशासन में सहायक सूचना प्रौद्योगिकी, अधिकतम अभिशासन की सरकारी पहले, अधिकतम अभिशासन के लिए आवश्यक है न्यूनतम भ्रष्टाचार, संपोषणीय विकास में सहायक है ‘न्यूनतम शासन, अधिकतम अभिशासन’ उपसंहार 

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