मीटू आन्दोलन पर निबंध | Current topics for essay writing |#METOO आंदोलन क्या है?

#METOO आंदोलन क्या है?.

मीटू आन्दोलन : स्त्री चेतना का आहवान |मीटू आन्दोलन पर निबंध |Current topics for essay writing

अमेरिकी कवि, गायिका एवं नागरिकों के अधिकारों की मुखर आवाज माया एंजेलो ने एक बार किसी इंटरव्यू में कहा था-“एक बुद्धिमान महिला किसी की भी दुश्मन बनने की इच्छा नहीं रखती, एक बुद्धिमान महिला किसी का शिकार होने से इंकार करती है।” हालिया संदर्भ में जागरूकता से लबरेज महिलाओं के संदर्भ में यह बात एकदम सटीक बैठती है। #मीटू आन्दोलन के संदर्भ में बात करें तो #मीटू आन्दोलन’ को हम नारी चेतना के नवजागरण के रूप में अभिहित कर सकते हैं। खास बात यह है कि नारी चेतना का यह आह्वान वैश्विक स्तर पर हुआ है। इस आन्दोलन के तहत विश्व के अनेक देशों की महिलाएँ उद्वेलित दिख रही हैं और उनमें अपने विरुद्ध होने वाले दुर्व्यवहारों के प्रति जबरदस्त चेतना दिख रही है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र में नारी की सहभागिता बढ़ी है, किन्तु प्रायः हर क्षेत्र में वह लैंगिक भेदभाव और शोषण का शिकार भी होती रही है। व्यवस्था के स्तर पर विविध देशों की सरकारों द्वारा नारी को भरपूर शक्ति और अधिकार प्रदान किए गए, किन्तु धरातलीय यथार्थ यह है कि केवल शक्ति और अधिकार ही नारी की मदद नहीं कर सकते। खुद को सशक्त बनाने के लिए उन्हें स्वयं भी कमर कसनी होगी। ऐसा ही कुछ #मीटू आन्दोलन’ के तहत दिख रहा है। वैश्विक स्तर पर नारियाँ मुखर होकर अपने शोषण और दर्द को बयां कर रही हैं।

व्यवस्था के स्तर पर विविध देशों की सरकारों द्वारा नारी को भरपूर शक्ति और अधिकार प्रदान किए गए, किन्तु धरातलीय यथार्थ यह है कि केवल शक्ति और अधिकार ही नारी की मदद नहीं कर सकते।

#मीटू आन्दोलन’ (# MeToo Movement) अपनी तरह का संभवतः पहला वैश्विक आन्दोलन है, जो कि उन लोगों के विरुद्ध छेड़ा गया है, जो यौन अपराधों में संलिप्त हैं तथा महिलाओं को हिंसा, यौन हिंसा और शोषण का शिकार बनाते रहे हैं। यह लैंगिक हिंसा एवं भेदभाव के विरुद्ध आकार लेता एक ऐसा आन्दोलन बन चुका है, जिसकी चर्चा समूचे विश्व में है। इस आन्दोलन के तहत वैश्विक स्तर पर ‘आधी दुनिया’ लामबंद दिख रही है। अमेरिका से शुरू हुआ यह आन्दोलन विश्वव्यापी होता दिख रहा है तथा इसकी अनुगूंज भारत सहित, फ्रांस, कनाडा, इंग्लैण्ड, पाकिस्तान आदि देशों में सुनी जा सकती है।

#मीटू आन्दोलन’ के संबंध में यह जान लेना उचित रहेगा कि ‘मी टू’ (MeToo) शब्द युग्म का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 2006 में दक्षिण अफ्रीका की सामाजिक कार्यकर्ता टराना बुर्क ने यौन उत्पीड़न, यौन शोषण एवं यौन हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए किया था तथा दुनियाभर की महिलाओं से यह कहा था कि वे अपने यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा कर समूचे विश्व को वस्तुस्थिति से अवगत कराएं। बुर्क द्वारा नारी चेतना का जो आह्वान वर्ष 2006 में किया गया था, उसने अब रंग दिखाना शुरू किया है। वर्ष 2017 में ‘मी टू’ शब्द युग्म एक आन्दोलन बन कर तब सामने आया, जब हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने मशहूर निर्माता-निर्देशक तथा मीडिया मुगल कहे जाने वाले हार्वे वाइन्सटीन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। इसके बाद ऐसे ही आरोप अभिनेत्री एंजेलिना जोलीजीनिश पैट्रोन ने भी हार्वे पर लगाए। इसके बाद एक ऐसा प्रचाल आया, जिसने यौन उत्पीड़कों को हिला कर रख दिया। यहाँ तक कि इसकी आंच अमेरिका के ‘ह्वाइट हाउस’ तक भी पहुँची।हुआ यह कि जेसिका लीड्स, समांथा हाल्वे और रैकल कम्स नामक तीन महिलाओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए, जिनका खंडन ‘ह्वाइट हाउस’ को करना पड़ा।

#मीटू आन्दोलन’ के संबंध में यह जान लेना उचित रहेगा कि ‘मी टू’ (MeToo) शब्द युग्म का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 2006 में दक्षिण अफ्रीका की सामाजिक कार्यकर्ता टराना बुर्क ने यौन उत्पीड़न, यौन शोषण एवं यौन हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए किया था तथा दुनियाभर की महिलाओं से यह कहा था कि वे अपने यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा कर समूचे विश्व को वस्तुस्थिति से अवगत कराएं।

अमेरिका से शुरू हुआ नारी नवजागरण का यह आन्दोलन धीरे-धीरे विश्व के कुछ और देशों में प्रभाव दिखाने लगा। यानी इसने वैश्विक स्तर पर आकार लेना शुरू कर दिया। भारत, पाकिस्तान, फ्रांस, कनाडा, इंग्लैण्ड सहित दुनिया के अनेक देशों की महिलाओं में चेतना का संचार हुआ और उन्होंने यौन उत्पीड़कों के खिलाफ जुबान खोलना शुरू कर दिया। महिलाओं ने इस प्रतिरोधात्मक आन्दोलन को विश्वव्यापी बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई। सोशल मीडिया के विविध माध्यमों से इस आन्दोलन के तहत दुनियाभर की तमाम महिलाओं ने यौन उत्पीड़न से जुड़े अपने निजी डरावने अनुभव साझा किए तथा पुरुषों की उस जमात को बेनकाब किया जोलैंगिक हिंसा और भेदभाव में आगे है तथा अपनी स्थिति का लाभ उठाकर महिलाओं को शोषण का शिकार बनाते हैं। दिन-ब-दिन पुरुषों को बेनकाब करने वाले इस आन्दोलन का प्रभाव बढ़ता गया। मौजूदा समय में दुनिया भर की तीन करोड़ से भी अधिक महिलाएं नारी चेतना और अस्मिता के इस आन्दोलन को धार देने में जुटी हैं। कहना असंगत न होगा कि इस आन्दोलन ने समूचे विश्व में खलबली मचा रखी है। भोग्या समझ कर नारी को दबाने और उसका शोषण करने वाले डरे-सहमे हैं। दमित नारी जाग उठी है और दमन करनेवालों को नारी शक्ति का एहसास होने लगा है।

#मीटू आन्दोलन’ ने भारत में भी अच्छा प्रभाव दिखाया है। कई ऐसी नामचीन और शफाक शख्सीयतें महिलाओं के खलासे के बाद स्याह हुई हैं, जिन्हें अब तक समाज बहुत ही सम्मान से देखा करता था। कंगना रनोट, स्वरा भास्कर, मुनमुन दत्ता, मल्लिका दुआ, राधिका आप्टे एवं ऊषा जाधव जैसी बॉलीवुड अभिनेत्रियों ने जहाँ आम जीवन और मनोरंजन की दुनिया में यौन शोषण व यौन हिंसा के अनुभव साझा किए, वहीं कांग्रेस पार्टी की नेत्री ने यह कहकर उस तल्ख हकीकत की तरफ ध्यान खींचा कि महिलाओं के शोषण की यह अपसंस्कृति हर क्षेत्र में विद्यमान है तथा संसद औरअन्य कार्यस्थल भी इससे अछूते नहीं हैं। इसके अलावा मशहूर फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अक्टूबर, 2018 में अभिनेता नाना पाटेकर पर यह आरोप लगाया कि अभिनेता ने वर्ष 2008 में ‘हॉर्नओके प्लीज’ नामक फिल्म की शूटिंग के दौरान उनके साथ यौन उत्पीड़न किया। भारत के संदर्भ में ‘#मीटू आन्दोलन’ का जिक्र करते हुए यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा की महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से भारत की वैश्विक स्थिति अच्छी नहीं है। बलात्कार और यौन हिंसा में भारत दुनिया में चौथे पायदान पर है, जहाँ प्रत्येक 22वें मिनट पर बलात्कार का एक नया मामला दर्ज होता है।

#मीटू आन्दोलन’ को वैश्विक स्तर पर अच्छी सफलता मिली है। यह आन्दोलन नारियों में चेतना का संचार कर रहा है और वे यौन शोषण के विरुद्ध न सिर्फ मुखर हुई हैं, बल्कि लामबंद भी हुई हैं। वैश्विक स्तर पर इसका अच्छा प्रभाव दिख रहा है। यह अकारण नहीं है इस आन्दोलन की सफलता और विश्व व्यापकता को देखते हुए प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ (Time) ने वर्ष 2017 में इस
अभियान को Time Person of the Year’, 2017 के खिताब से नवाजा, जो कि एक बड़ी उपलब्धि है। यह #मीटू आन्दोलन’ का ही प्रभाव है कि वर्ष 2018 के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के ‘पुलित्जर पुरस्कार’ (Pulitzer Prizes) यौन उत्पीड़न तथा यौन दुर्व्यवहार का खुलासा करने के लिए समाचार पत्र ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ (The New York Times) तथा पत्रिका ‘द न्यू योर्कर’ (The New Yorker) को दिया गया।

यह सच है कि इस विश्वव्यापी आन्दोलन ने अच्छा प्रभाव छोड़ा है और यह सफलता के पायदानों पर आगे भी बढ़ रहा है, किन्तु इस तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है। ऐसी शिकायतें भी मिली हैं कि बदले की भावना से इसका बेजा इस्तेमाल भी किया जा रहा है तथा चरित्र हनन के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लग गई है, जिससे इस आन्दोलन की आत्मा को ठेस पहुंची है। झूठे इल्जामों से आहत होकर आरोपित द्वारा आत्महत्या तक किए जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सरकारों और समाज को इस दिशा में ध्यान देना होगा, ताकि निर्दोष इसके शिकार न हों।

यह अकारण नहीं है इस आन्दोलन की सफलता और विश्व व्यापकता को देखते हुए प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ (Time) ने वर्ष 2017 में इस अभियान को ‘Time Person of the Year’, 2017 के खिताब से नवाजा, जो कि एक बड़ी उपलब्धि है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि #मीटू आन्दोलन’ ने नारियों में चेतना का संचार किया है और वे मुखर होकर आपबीती बयां कर रही हैं, जिससे वो चेहरे बेनकाब हो रहे हैं, जिनकी समाज में तो पहचान | एक नेक और कामयाब इंसान की है, पर असल चेहरा घिनौना है।
आज के पुरुष वर्चस्व वाले समाज को सही रास्ते पर लाने के लिए ऐसे आन्दोलनों की जरूरत है, बशर्ते ये सिर्फ और सिर्फ सच पर ही केन्द्रित रह कर देश और समाज की सच्ची आवाज बनें।

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