कुपोषण पर निबंध |भारत में कुपोषण पर निबंध |Essay on Malnutrition in India in Hindi 

कुपोषण पर निबंध

कुपोषण पर निबंध |भारत में कुपोषण पर निबंध |Essay on Malnutrition in India in Hindi              भारत में कुपोषण : कारण और निवारण अथवा कुपोषण (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2013) 

भारत में कुपोषण की समस्या भयावह है। अच्छी आर्थिक वृद्धि दर एवं पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद इस समस्या से उबर न पाना चिंतनीय है। कुपोषण की समस्या तब उत्पन्न होती है, जब खाद्य सुरक्षा का गुणात्मक पहलू कमजोर होता है। यानी आहार में महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक पोषक खनिज, प्रोटीन एवं अन्य माइक्रो तत्व उपलब्ध नहीं होते हैं अथवा पर्याप्त मात्रा में नहीं होते हैं। कोई भी व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो सकता है, यदि उसके भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों का अभाव हो। 

कुपोषण के व्यापक भयावह परिणाम सामने आते हैं। शैशव अवस्था में जो बच्चा कुपोषण का शिकार हो जाता है अथवा जो जन्म ही कुपोषित अवस्था में लेता है, वह बड़ा होने पर भी सुपोषित बच्चों की तरह शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर क्षमतावान एवं सशक्त नहीं बन पाता है।” 

भारत में कुपोषण की समस्या की विकरालता का पता हाल में जारी की गई संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट से चलता है, जिसमें बताया गया है कि भारत में प्रतिवर्ष पांच साल से कम वय के लगभग 21 लाख बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड़ देते हैं। 2017 में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार भारत कुपोषित बच्चों की संख्या में पूरे विश्व में दसवें स्थान पर है। इस बात से भारत में कुपोषण की भयावह स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि भारत सरकार समय-समय पर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कुपोषण से लड़ने की कोशिश करती रही है। 

भारत में कुछ बच्चे तो जन्म ही कुपोषण की अवस्था में लेते हैं,तो कुछ जन्म के कुछ समय बाद कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। भारत में कुपोषण की समस्या बढ़ने के कई कारण हैं। सर्वप्रमुख कारण है जच्चा-बच्चा को समुचित पोषण न मिल पाना। आहार में पोषक तत्वों के अभाव के कारण भी यह समस्या बढ़ी है। यदि मां कुपोषण की शिकार है, तो स्वाभाविक है कि जन्म लेने वाला बच्चा भी कुपोषण का शिकार होगा। आजकल विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में ‘जंक फूड’ का चलन बढ़ा है। इससे भी कुपोषण की समस्या बढ़ी है, क्योंकि इससे पेट तो भर जाता है, किंतु शरीर को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिलते हैं। हमारे देश में साफ-सफाई की कमी भी कुपोषण का एक बड़ा कारण है। गंदगी से बीमारियां फैलती हैं, जिनका प्रभाव पाचन तंत्र पर पड़ता है। अंततः खराब पाचन तंत्र के कारण व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो जाता है। जागरूकता के अभाव से भी कुपोषण की समस्या बढ़ी है। तमाम लोग यह जानते ही नहीं हैं कि संतुलित आहार होता क्या है। उन्हें तो बस पेट भरने से मतलब रहता है। पेट भरने यानी जो मिले भरपेट खाओ को लोग ‘सुपोषण’ समझ कर ‘कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इन सबके अलावा गरीबी, स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा का अभाव, जनसंख्या विस्फोट, लैंगिक भेदभाव तथा चिकित्सा सुविधाओं का अभाव आदि भी वे कारण हैं, जो कुपोषण की समस्या के लिए उत्तरदायी हैं। 

कुपोषण के व्यापक भयावह परिणाम सामने आते हैं। शैशव अवस्था में जो बच्चा कुपोषण का शिकार हो जाता है अथवा जो जन्म ही कुपोषित अवस्था में लेता है, वह बड़ा होने पर भी सुपोषित बच्चों की तरह शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर क्षमतावान एवं सशक्त नहीं बन पाता है। कुपोषित बच्चे कम वजन, छोटे कद एवं कमजोरी के कारण जहां जीवनपर्यंत हीन भावना का शिकार रहते हैं, वहीं राग प्रतिरोधक शक्ति के अभाव में बीमारियों से भी ग्रस्त हो जाते हैं। याद्दाश्त की कमी, शरीर में सूजन या शरीर सूख जाना, घेघा, एनीमिया तथा मैरेमस आदि बीमारियों के ग्रास कुपोषित बच्चे आसानी से बन जाते हैं। कुपोषण रूपी अभिशाप से ग्रस्त बच्चे मानसिक एवं शारीरिक दुर्बलता के कारण बड़े होकर राष्ट्र और समाज के निर्माण में उस तरह योगदान नहीं दे पाते, जिस तरह सुपोषित बच्चे बड़े होकर देते हैं। इसका प्रतिकूल प्रभाव राष्ट्र के विकास पर पड़ता है। कुपोषण के कारण वैश्विक स्तर पर भी भारत की छवि धूमिल हुई है। 

भारत में कुपोषण की समस्या के निवारण हेतु समय-समय पर सरकार द्वारा कदम उठाए जाते रहे हैं। जून, 2011 में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा ‘जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ की शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम के जरिए सुरक्षित मातृत्व के उपाय सुनिश्चित किए गए तथा जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य का देख-रेख पर ध्यान केंद्रित किया गया। कार्यक्रम के तहत जहां सभी गर्भवती महिलाओं एवं एक माह के नवजात शिशुओं को मुफ्त स्वास्थ्य देख-रेख सुविधाएं उपलब्ध करवाना शुरू किया गया, वहीं स्वास्थ्य केंद्र में महिला के रुकने की अवधि के दौरान मफ्त आहार की सुविधा भी प्रदान की गई। इससे जहां पोषण स्तर में सुधार आया, वहीं जच्चा-बच्चा मृत्यु दर में भी कमी आई। 

“सरकारी पहलों के बावजूद यदि भारत से कपोषण का कलंक नहीं मिट पा रहा है, तो इसकी वजह यह है कि कुपोषण निवारण कार्यक्रमों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। व्यावहारिक धरातल पर काम कम हो रहा है, कागजी खानापूर्ति ज्यादा है।” 

प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत आने वाले प्राथमिक वर्ग के बच्चों के आहार को पोषणीय बनाने तथा शिक्षा का सार्वभौमीकरण करने के उद्देश्य से वर्ष 1995 में मध्याह्न भोजन कार्यक्रम (Mid-day Meal Programme) की शुरुआत की गई, जिसे वर्ष 2015 में कानूनी स्वरूप प्रदान किया गया और इस प्रकार कानूनी स्तर पर बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 450 कैलोरी ऊर्जा एवं 12 ग्राम प्रोटीन से युक्त पकाया हुआ मध्याह्न भोजन प्रथमिक स्तर के बच्चों को उपलब्ध कराया जाता है |

भारत में चल रहे एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम (Inte grated Child Development Scheme) को कुपोषण मिटाने का दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम माना जाता है। इस वृहद कार्यक्रम के जरिए बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया। वर्ष 2005-06 एवं 2006-07 में इसे और व्यापक बनाते हुए इसके अंतर्गत किशोरवय की बालिकाओं के विशेष रूप से स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए ‘किशोरी शक्ति योजना’ को भी संचालित किया गया है। ‘गर्ल टु गर्ल एप्रोच’ तथा ‘बालिका मण्डल योजना’ किशोरी शक्ति योजना के दो घटक हैं। इसी क्रम में ‘आशा’ नामक कार्यक्रम के जरिए भी कुपोषण के विरुद्ध मुहिम जारी है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत जहां कुपोषित बच्चों के लिए ग्रामीण स्तर पर मिनी अस्पताल खोले जा रहे हैं, वहीं जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 देश के समस्त नागरिकों के लिए ‘जीवन के अधिकार’ की घोषणा करता है। बिना भोजन के जीवन के अधिकार का आदर्श कभी पूरा नहीं हो सकता है। इसी को ध्यान में रख कर देश के नीति नियंताओं द्वारा समस्त नागरिकों की सबसे मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति हेतु खाद्य सुरक्षा कानून लाया गया है। सार्वजनिक खाद्यान्न वितरण प्रणाली के जरिए गरीबों को किफायती दामों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। 

सरकारी पहलों के बावजूद यदि भारत से कुपोषण का कलंक नहीं मिट पा रहा है, तो इसकी वजह यह है कि कुपोषण निवारण कार्यक्रमों की स्थिति बहत अच्छी नहीं है। व्यावहारिक धरातल पर काम कम हो रहा है, कागजी खानापूर्ति ज्यादा है। ये कार्यक्रम भ्रष्टाचार से भी नहीं बच पाए हैं। मिड डे मील का उदाहरण हमारे सामने है, जिसमें व्याप्त भ्रष्टाचार मीडिया में छाया रहता है। केंद्र व राज्य सरकारों के बीच तालमेल के अभाव के कारण भी देश से कुपोषण मिटाने की योजनाएं प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रही हैं। फिर भारत से कपोषण को मिटा पाना अकेले सरकार के बते की बात भी नहीं है। यहां यह रेखांकित करना समीचीन होगा कि कपोषण से मुक्ति के लिए जितनी आवश्यकता समुचित पोषण, चिकित्सा व स्वच्छता की है, उतनी ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की भी है। इसके लिए जितना दायित्व सरकार का है, उतना ही समाज के जागरूक लोगों का भी है। 

कुपोषण की समस्या राष्ट्र के विकास में बाधक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश में 6 वर्ष से नीचे की बाल जनसंख्या 15.88 करोड़ है। आने वाले वर्षों में इस वर्ग की स्वस्थता ही भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वस्थ होने का आधार सुनिश्चित कर सकती है, किंत दर्भाग्य का विषय है कि नौनिहालों की इस आबादी का 42% कुपोषित है, जो कि राष्ट्रीय-सामाजिक विकास में एक बड़ी बाधा है। कुपोषण के संबंध में भारत की दशा नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों से भी बदतर है। 

स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार करने एवं सशक्त भारत के निर्माण के लिए कुपोषण संबंधी बाधा को दूर किया जाना नितांत आवश्यक है। इसके लिए सचिंतित पहलों एवं सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहली जरूरत तो यह है कि राष्ट्र के नीति नियंता इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए उसके अनुरूप पहले करें। समग्र रूप से कुपोषणों के कारणों को चिह्नित कर उनका निवारण करें। कुपोषण निवारण कार्यक्रमों की ढंग से निगरानी की जाए, ताकि ये भ्रष्टाचार के शिकार न हों। केंद्र व राज्य सरकारों के बीच बेहतर तालमेल की भी आवश्यकता है। निजी क्षेत्र एवं जागरूक नागरिकों को भी इस समस्या के निवारण के लिए आगे आना होगा। समग्र प्रयासों से ही हम कुपोषण मुक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं। 

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