देश-प्रेम पर निबंध | Essay on Love for Country in Hindi

देश-प्रेम पर निबंध

देश-प्रेम पर निबंध | Essay on Love for Country in Hindi

देशप्रेमी को देश का अभिमान होता है और जिसमें देशाभिमान होता है, वह नि:संदेह देशभक्त होता है। एक सच्चे देशभक्त के लिए देश से बड़ा कुछ नहीं होता। वह स्वजन-परिजन, माता-पिता, भाई-बहन एवं धन-दौलत आदि के विपरीत अपनी जन्मभूमि को ही सबसे बड़ी चीज मानता है। उसका हृदय स्वदेश प्रेम से भरा होता है। कवि के हृदय में स्वदेश-प्रेम की भावना से रहित व्यक्ति के लिए कितना घृणा-भाव है, यह निम्नलिखित पंक्तियों में देखें 

जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, 

वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

जिसके हृदय में स्वदेश-प्रेम है, यदि उसके स्वदेश पर कोई भी कुदृष्टि डालता है या उसके अपमान का दुस्साहस करता है, तो वह प्राणों की बाजी लगाकर बदला लेता है। हंसते-हंसते फांसी के तख्ते पर लटक जाता है। उसे न तो सागर की गहराई पर संदेह होता है और न ही पर्वत की हिम श्रृंखलाओं का भय। देशहित के लिए जीवन का बलिदान ही उसका लक्ष्य होता है। 

स्वदेश का गौरव और गर्व प्रतिपल हमारे अंतस में त्याग तथा कर्तव्य परायणता की अमर भावना सुदृढ़ करते हैं। तभी तो देशहित की भावना का उफान आने पर हमें न तो राजप्रासादों का वैभव रोक पाता है और न ही पत्नी का प्यार बाधक बनता है। एक अलौकिक तेज से हमारी इंद्रियां दमक उठती हैं। हमें न तो अकाल मृत्यु का भय रहता है और न ही पुनर्जन्म की आशंका। हर घड़ी हमारे सामने स्वदेश के सम्मान तथा उत्थान का प्रश्न उपस्थित रहता है और उसी की पूर्ति में हम अपना सर्वस्व समर्पण करके धन्य होते हैं। 

महाराणा प्रताप ने घास की रोटियां खाईं और भयानक वन प्रदेशों में भटके, परंतु मुगलों से संघर्ष करके अपनी मातृभूमि मेवाड़ का गौरव अंतिम क्षण तक मिटने नहीं दिया। देश की स्वाधीनता के लिए कोटिशः शहीदों की स्मृतियां हमारे अंतस में रोमांच पैदा करती हैं। लाला लाजपत राय, सरदार भगत सिंह आदि के नाम कभी भुलाए नहीं जा सकते। भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास इन देशभक्तों की गाथाओं से भरा पड़ा है। मानव जाति इनकी समाधियों पर पुष्पहार चढ़ाकर श्रद्धांजलि अर्पित करने में स्वाभिमान समझती है। विदेशी इनके कृत्यों को सुनकर नतमस्तक हो जाते हैं। उनका यश-सौरभ चारों ओर पवन के साथ बिखरकर देशहित में मर-मिटने की प्रेरणा देने लगता है। 

एक स्वदेश प्रेमी को स्वदेश की प्रत्येक वस्तु प्राणों से बढ़कर लगती है। प्रत्येक देशवासी उसका आत्मीय हो जाता है। स्वदेश के कण-कण से उसकी आत्मीयता हो जाती है। वह देश के लिए त्याग और बलिदान करने में अपने जीवन की सार्थकता समझता है। इसकी सुरक्षा के लिए वह बलिवेदी पर मर मिटना चाहता है। यह भावना निम्नवत पंक्तियों से प्रकट होती है 

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, 

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाते वीर अनेक।

जब स्वदेश प्रेम और संपूर्ण राष्ट्र हमारे जीवन की इकाई बन जाता है, तब हम उसी की सामूहिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील होते हैं, उसके आर्थिक उत्थान के लिए पर्याप्त शारीरिक परिश्रम करते हैं और राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए भ्रातृत्व भाव को स्थान देते हैं। पारस्परिक झगड़ों को समाप्त कर सहयोग से रहने लगते हैं। अनेक प्रकार से देश के बहुमुखी विकास के लिए प्रयास करने में ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति समझते हैं। जिन देशवासियों में स्वदेश प्रेम होता है, उनकी शक्ति के आगे पूरा विश्व झुक जाता है। 

भारतीय इतिहास देशभक्तों की चर्चाओं से भरा पड़ा है। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, गुरु गोविंद सिंह, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, तिलक, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सरोजिनी नायडू आदि के देश-प्रेम से आज हम स्वाधीनता का गौरव प्राप्त कर सके। इसके पीछे इन विभूतियों के जीवन की कितनी गाथाओं की चर्चा है और कितने शहीदों के प्राण-त्याग की कहानियां हैं-इतिहास इसका ज्वलंत उदाहरण है, जो युग-युग तक हम भारतीयों में स्वदेश-प्रेम का उत्कर्ष करता रहेगा। 

हमें यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि देशभक्तों की कीर्ति मानव जाति को अमर पाठ पढ़ाती रहती है। विश्व उनके नाम का स्मरण करके धन्य होता है। पृथ्वी पर ईश्वर की भांति उनकी पूजा होती है। इसके विपरीत देशद्रोही सर्वत्र अपमानित होते हैं। निष्कर्षतः यह कहना उचित है कि स्वदेश की रक्षा और सम्मान का ध्यान रखना मानव का परम धर्म है।

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