साहित्य और समाज पर निबंध |Essay on Literature and Society

साहित्य और समाज पर निबंध

साहित्य और समाज : समतुल्यता (Literature and Society : A Comparison) 

‘साहित्य समाज की चेतना में साँस लेता है. वह समाज का वह परिधान है जो जनता के जीवन के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, आकर्षण-विकर्षण के ताने-बाने से बुना जाता है. उसमें विशाल मानव-जाति की आत्मा का स्पन्दन ध्वनित होता है. वह जनता के जीवन की व्याख्या करता है. इसी से उसमें जीवन देने की शक्ति आती है. वह मानव को लेकर ही जीवित है, इसलिए वह पूर्णतः मानव केन्द्रित है. साहित्य उसी मानव की अनुभूतियों, भावनाओं और कलाओं का साकार रूप है. और मानव सामाजिक प्राणी है. सामाजिक समस्याओं, विचारों तथा भावनाओं का जहाँ वह स्रष्टा होता है, वहीं वह उनसे स्वयं भी प्रभावित होता है. इसी प्रभाव का मुखर रूप ‘साहित्य’ है. इसी से विद्वानों ने ‘साहित्य को समाज का दर्पण’ कहा है. 

साहित्य : ‘सहित’ का पोषक

 ‘साहित्य’ का अर्थ है-जो हित सहित हो. भाषा द्वारा ही साहित्य हितकारी रूप में प्रकट होता है. भाषा मनुष्य की सामाजिकता को विशेषरूप से पुष्ट करती है. उसी के द्वारा मानव समाज में सहकारिता का भाव उत्पन्न होता है. साहित्य मानव के सामाजिक सम्बन्धों को और भी दृढ़ बनाता है, क्योंकि उसमें सम्पूर्ण मानव-जाति का हित सम्मिलित रहता है. साहित्य साहित्यकार के भावों को समाज में प्रसारित करता है, जिससे उसमें सामाजिक जीवन स्वयं मुखरित हो उठता है.

साहित्य के प्रयोजन 

आचार्य मम्मट ने काव्य के प्रयोजन छः बताए हैं- 

“काव्यं यशसेऽर्थकरे व्यवहार विदे शिवेतरक्षतये । 

सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मितयोपदेश युजे ॥”

अर्थात् काव्य का प्रयोजन है-यश, धन, व्यवहार कुशलता, अमंगल से रक्षा, आनन्द और कान्ता के समान मधुर उपदेश. ये छः प्रयोजन जीवन के भी सर्वमान्य प्रयोजन हैं. जीवन में हमें यश की आकांक्षा रहती है, धन भी सभी चाहते हैं. जीवन के सुचारू संचालन के लिए व्यवहार कुशलता की अत्यन्त आवश्यकता पड़ती है. अमंगल से रक्षा हुए बिना जीवन अभिशाप बन जाता है. मधुर उपदेश के प्रभाव के उदाहरण स्वरूप सम्पूर्ण साहित्य उपस्थित किया जा सकता है, जब अनेक नीति-शास्त्र उपदेश और ताड़ना द्वारा हमें समझाने में असमर्थ रहते हैं, तब भी मधुरता और कोमलता से भरी यही वाणी हमें वश में करके हमसे जो चाहती है वह करा लेती है, और उपर्युक्त प्रयोजनों की आवश्यकता हमें तभी पड़ती है, जब हम समाज के एक अभिन्न अंग होते हैं. वनवासी, समाज से विच्छिन्न व्यक्ति के लिए इनकी कोई आवश्यकता नहीं होती. फिर हम समाज और साहित्य को पृथक् करके कैसे देख सकते हैं? 

साहित्य : समाजोत्थान में भागीदार 

आज तक विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का सबसे बड़ा उद्देश्य और प्रयत्न मानवी-जीवन को अधिक से अधिक सुन्दर और आनन्दमय बनाने का रहा है. विज्ञान ने सदैव ये यह प्रयत्न किया है कि वह मानव को श्रम के भार से यशाशक्ति मुक्त कर उसे शारीरिक और भौतिक सुविधा दे सके. राजनीति समाज को आर्थिक एकता के सूत्र में बद्ध करने के लिए प्रयत्नशील है, और दर्शन आध्यात्मक सिद्धान्तों की खोज और प्रसार द्वारा मानव को एकता का पाठ पढ़ाने का प्रयत्न करता आया है और कर रहा है, परन्तु इनका यह काम बिना कवि की सहायता से पूर्ण नहीं हो सकता. समाज के लिए भौतिक सुविधा भी उतनी ही आवश्यक है जितने कि आध्यात्मिक सिद्धान्त, परन्तु वह इन सबसे ऊपर उस सत्य और सौन्दर्य को प्राप्त करना और उसका उपभोग करना चाहता है जो उसे जीवन की प्रत्येक सम-विषम परिस्थिति में अनुप्राणित कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहता है. साहित्यकार जब इन भौतिक सुविधाओं और दार्शनिक सिद्धान्तों को कलात्मक ढंग से उपस्थित करता है, तभी हमारे मन में उनके प्रति अनुराग और पावन भावना उत्पन्न होती है. “ऐसा होने पर ही हमारे मन में ओज, बाहुओं में बल, मुख पर प्रसन्नता, हृदय में उत्साह और प्रेम, बुद्धि में विवेक तथा आत्मा में आनन्द-उल्लास प्रवाहित होता है. कवि का सत्य हमारे जीवन का सत्य है, और हमारे हृदय और भावनाओं का सत्य है, जिसके माध्यम से हम एक-दूसरे से मिले हुए हैं.” इसलिए सामाजिक उन्नयन में साहित्य का भाग सर्वोपरि और सर्वप्रमुख है. 

हमारे सामाजिक जीवन की परिपूर्णता के लिए शान्ति और सहयोग की आवश्यकता सर्वोपरि है. आप आँख दिखाकर किसी को वश में नहीं कर सकते. केवल मधुर और कोमल वाणी ही हृदय पर प्रभाव डालती है और उसके द्वारा आप दूसरों से जो चाहे करा सकते हैं, तुलसी इस बात को जानते थे 

“तुलसी मीटे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर । 

वशीकरण इक मन्त्र है, परिहर वचन कठोर ॥”

साहित्य और समाज : गहन अन्तर्सम्बन्ध 

‘समाज’ और ‘साहित्य’ का उपर्युक्त सम्बन्ध अनादि काल से चला आ रहा है. वाल्मीकि ने अपनी रामायण में एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था का चित्रण कर अपने दृष्टिकोण के अनुसार समाज के विभिन्न पहलुओं की विवेचना करते हुए यह सिद्ध किया है कि मानव-समाज किस पथ का अनुसरण करने से पूर्ण सन्तोष और सुख का अनुभव करता है. तुलसीदास ने भी अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर राम-राज्य और राम-परिवार को हिन्दु समाज के सम्मुख आदर्श रूप में उपस्थित किया है. “कवि वास्तव में समाज की व्यवस्था, वातावरण, धर्म-कर्म, रीति-नीति तथा सामाजिक शिष्टाचार या लोक व्यवहार से ही अपने काव्य के उपकरण चुनता है और उनका प्रतिपादन अपने आदर्शों के अनुरूप ही करता है. साहित्यकार उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वह जन्म लेता है. वह अपनी समस्याओं का सुलझाव, अपने आदर्श की स्थापना अपने समाज के आदर्शों के अनुरूप ही करता है. जिस सामाजिक वातावरण में उसका जन्म होता है, उसी में उसका शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास भी होता है.” इस प्रकार साहित्यकार जिस समाज का अंग होता है, उस समाज का ही चित्रण करता है.” यह दूसरी बात है कि वह इस चित्रण में समाज के सुधार की भावना से प्रेरित होकर एक आदर्श की स्थापना करता है या उसका यथातथ्य चित्रण कर, केवल एक संकेत देकर, दूर हट जाता है, जिससे समाज उस चित्रण पर मनन करने के लिए विवश होता है. ऐसे साहित्यकार युग-युग तक समाहत होते रहते हैं. इसके विपरीत, कुछ ऐसे भी साहित्यकार होते हैं जो समाज का यथातथ्य चित्रण कर कोई सुझाव या आदर्श उपस्थित करने में समर्थ होते हैं. समाज ऐसे साहित्यकारों की ओर एक बार दृष्टि डाल फिर उन्हें सदैव के लिए भूल जाता है.

समाज व साहित्य : बिम्ब व प्रतिबिम्ब 

समाज साहित्य का प्रतिबिम्ब है, लेकिन कुछ साहित्य प्रेमी इस प्रतिबिम्ब में अपनी रसिक आकृति के सिवा और कुछ भी नहीं देखना चाहते. वे इस बात का विरोध करते हैं कि साहित्य में सौन्दर्य के, और वह भी निष्क्रिय सौन्दर्य के अतिरिक्त और किसी भी प्रकार का चित्रण होना चाहिए, क्योंकि उनकी दृष्टि में साहित्य केवल हमारे मनोरंजन का साधन है, न कि हमें उसमें उपयोगिता ढूँढ़नी चाहिए. ऐसे साहित्य प्रेमी रसिकों की भर्त्सना करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने उचित ही कहा था-“यदि रसिकगण दर्पण में अपना ही प्रतिबिम्ब देखना चाहते है तो उन्हें साहित्य की परिभाषा बदल देनी चाहिए. तब कहना चाहिए कि साहित्य वह दर्पण है जिसमें समाज के उन विशेष लोगों की ही शक्ल दिखाई देती है जो दुपल्ली टोपी लगाए, पान खाए, सुरमा रचाये इस दुनिया से दूर नायिका-भेद के संसार में विचरण करते हैं. इन साहित्य मर्मज्ञों के हृदय इतने सहृदय हो गये हैं कि जिस बात से 40 करोड़ जनता के हृदय को ठेस लगती है, वह उनके मर्म को छू भी नहीं पाती. इनका कुसुम कोमल हृदय नकली गर्मी से उगने वाले पौधों की तरह एक कृत्रिम साहित्य की उत्तेजना पाकर ही विकसित होता है. ये लोग कहें तो ठीक ही होगा कि लेखकों को जनता से दूर ही रहना चाहिए.” अस्तु, 

इस प्रकार साहित्य और समाज निरन्तर एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं. दोनों में आदान-प्रदान तथा क्रिया-प्रतिक्रिया भाव चलता रहता है. इसी से सामाजिक उन्नति की आधारशिला दृढ़ बनती है. संसार में हुए अभी तक सम्पूर्ण परिवर्तनों या विप्लवों के मूल में कोई न कोई विचारधारा कार्यरत रहती आई है. इस विचारधारा का चित्रण साहित्य द्वारा होता है, वही हमारे ज्ञान को विस्तृत कर हमें वर्तमान के प्रति असन्तुष्ट बनाता है. उसके द्वारा जब हम दूसरों से अपनी अवस्था की तुलना कर अपने को हीन पाते हैं, तब हमारे हृदय में असंतोष की अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठती है. फ्रांस की प्रसिद्ध राज्य क्रान्ति के मूल में वाल्तेयर और रूसो के क्रान्तिकारी विचार कार्य कर रहे थे. रूस की राज्य क्रान्ति भी रूसी लेखकों के उग्र विचारों का ही प्रतिफलन थी. साहित्य स्वाधीनता संग्राम में स्वतन्त्र देशों की विचारधारा से प्रभावित साहित्य ने बहुत बड़ा भाग अदा किया था. यह तो हुआ साहित्य का 

सत्प्रभाव. साहित्य का दुरुपयोग

इसके विपरीत, कुछ साहित्यकार ऐसे भी होते हैं और हुए हैं जो दूसरी जाति को पराधीन बनाने के लिए उसकी सभ्यता और संस्कृति का बड़ा विकृत चित्रण करते हैं. आयरिश स्वाधीनता संग्राम के पीछे उसके प्रतिपक्षी इंगलैण्ड के कतिपय साहित्यकारों का यही प्रयत्न कार्य कर रहा था. उन लोगों ने आयरिश जाति में ऐसे साहित्य का वितरण किया जो 

उस जाति के जातीय साहित्य और संस्कृति के आदर्श को ध्वंस कर उनकी अपनी दृष्टि में आयरलैण्ड के अतीत को निन्दनीय सिद्ध कर उनके मन में शासक जाति के प्रति मर्यादा का भाव जाग्रत कर सके. पार्नेल के राजनीतिक जीवन के अवसान के बाद आयरिश देश-भक्तों का ध्यान इस घातक और विषम स्थिति के प्रति आकर्षित हुआ. तब साहित्य साधना के मार्ग द्वारा आयरिश-जाति में नूतन जीवन का उदबोधन करने की चेष्टा होने लगी. नीत्शे आदि जर्मन दार्शनिकों के विचार, जिन्होंने जर्मन जाति में शक्ति की उपासना तथा अपनी सभ्यता के विस्तार के भाव उत्पन्न किये थे, विगत विभिन्न महासमरों के लिए उत्तरदायी हैं, वीरगाथा-कालीन चारणों के उत्तेजनापूर्ण छन्द अपने आश्रयदाताओं को उत्तेजित कर सदैव मार काट के लिए प्रेरित करते रहते थे.

साहित्य : सुख का दूत 

इसके विपरीत, संसार में सदैव ऐसे साहित्य की रचना अधिक होती आई है जो मानव जीवन में सुख और शान्ति की भावना भरता आया है. कबीर और तुलसी का साहित्य इसका प्रमाण है. ‘मानस’ ने कितने हताश और भीरू हृदयों को सान्त्वना देकर कर्म क्षेत्र में अवतरित होने के लिए सन्नद्ध किया. समर्थ गुरु रामदास और महाराष्ट्रीय सन्तों का उपदेश तथा भूषण आदि कवियों की उत्साह प्रदायिनी रचनाओं ने महाराष्ट्र के उत्थान में कितनी सहायता प्रदान की थी. प्रेमचन्द के साहित्य ने हमारी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को कितना प्रभावित किया था. प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों ने हमारे हृदय में हमारे गौरवमय अतीत के प्रति गौरव की भावना भरकर हमें अपनी वर्तमान दीनावस्था की ओर देखने के लिए बाध्य किया था. हमारे ऐतिहासिक साहित्य की रचना करने वाले साहित्यकारों ने हमारे हृदय में विदेशियों द्वारा आरोपित इस भाव को कि-“हमारे पूर्वज जंगली थे’, जड़-मूल से उखाड़ फेंका था. इसी प्रकार साहित्य समाज को युग-युगान्तरों से प्रभावित करता आया है. 

साहित्य का प्रभाव इतना अक्षुण्ण होता है कि उसके प्रभाव के सम्मुख शस्त्रों का आतंक फीका पड़ जाता है. साहित्यिक विजय शाश्वत होती है और शास्त्रों की विजय क्षणिक. अंग्रेज तलवार द्वारा भारत को दासता की श्रृंखला में इतनी दृढ़तापूर्वक नहीं बाँध सके जितना कि अपने साहित्य के प्रचार और हमारे साहित्य का ध्वंस करके सफल हो सके. आज उन्हीं अंग्रेजों का प्रभाव है कि हमारे सौन्दर्य सम्बन्धी विचार, हमारी कला का आदर्श, हमारा शिष्टाचार आदि सब यूरोप से प्रभावित हो रहे हैं. यूनान ने अपनी कला द्वारा सम्पूर्ण यूरोपीय जीवन को प्राचीनकाल से लेकर आज तक प्रभावित कर रखा है-यह समाज पर साहित्य के प्रभाव का प्रतीक है.

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