साहित्य और मीडिया पर निबंध | Essay on Literature and Media

साहित्य और मीडिया पर निबंध

साहित्य और मीडिया पर निबंध | Essay on Literature and Media

यूँ तो साहित्य की बहुत सी परिभाषाएं दी जा सकती हैं लेकिन सच यह है कि वह मानव-मस्तिष्क का उत्कृष्टतम् उत्पाद है, जबकि मीडिया सिर्फ ‘माध्यम’ है जिससे साहित्य जन-जन तक फैलता है। और यह माध्यम कोई भी हो सकता है, परंपरागत भी और आधुनिक भी। परंपरागत माध्यम तो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी किसी न किसी रूप में बनी हुई है। शुरुआती दौर में माध्यम यांत्रिक न होकर व्यक्तिपरक होते थे। यदि पौराणिक कथाओं पर यकीन करें तो नारद मुनि ही देवताओं और मनुष्यों के बीच संचार बनाये रखने के प्रमुख माध्यम थे। इसी तरह अविश्वसनीय लगने वाली आकाशवाणियों की चर्चा भी की जा सकती है। महाभारत में तो नेत्रहीन धृतराष्ट्र के सम्मुख आँखों देखा हाल सनाने के लिए संजय की चर्चा आज भी की जाती है। वैदिक युग में विद्वानों के बीच होने वाले शास्त्रार्थ और वाद-विवाद ही संचार के प्रमुख साधन माने जाते थे। इनके अलावा साधु-संतों और चारण-भाटों द्वारा उपदेश देने, विरुदावली गाने को भी एक प्रकार का माध्यम ही माना जाता था। बाद में तीर्थस्थल, मंदिर, मठ आदि भी संचार के माध्यम बन गये। धार्मिक उत्सवों, मेलों-ठेलों, पर्वो-त्योहारों में कथा कहने, मठों विहारों में धार्मिक प्रवचन करने वाले भी माध्यम का ही काम करते थे। प्राचीन भारत में संचार के लिए कितने ही शिलालेखों का इस्तेमाल किया गया। इसके अतिरिक्त लोकसंगीत, लोकनाट्य तथा लोककलाओं के जरिए भी संचार किया जाता था। 

आधुनिक माध्यमों का संबंध हमारी वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति से जुड़ा हुआ है। भाषा और लिपि के विकास के क्रम में मनुष्य की सबसे बड़ी खोज मुद्रण तकनीक है। छपे हुए अक्षरों से जिस आधुनिक संचार की शुरुआत हुई थी, अब उसने ध्वनि तथा दृश्य का रूप ले लिया है। इनमें साहित्य का रिश्ता सबसे अधिक यदि किसी से है तो वह प्रिंट मीडिया ही है। यों तो प्रिंट मीडिया का संबंध समाचार पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों, जर्नलों, पंफलेटों, हैंडबिलों और पोस्टरों आदि सबसे है, लेकिन सबसे अधिक इसका दारोमदार पस्तकों के प्रकाशन पर टिका है। साहित्य या साहित्येतर कोई भी विधा हो, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवन-चरित, समालोचना, यात्रा-वृत्तांत, इतिहास, भूगोल, पुरातत्त्व, सामाजिक अध्ययन, विज्ञान आदि पर हर साल लाखों पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। पुस्तक प्रकाशन के अलावा दूसरे अन्य स्रोत हमारी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ हैं जो लाखों में निकलती हैं। तीसरा स्रोत हमारे समाचार पत्र हैं जो रविवारीय परिशिष्ट के रूप में हमारे समक्ष साहित्यिक सामग्री परोसते हैं। पुस्तकों, साहित्यिक पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों के साहित्यिक परिशिष्टों के अलावा साहित्य को जनता तक पहुंचाने का श्रेय श्रव्य संचार माध्यमों (Audio Media) को भी है। रेडियो तथा आडियो कैसेट इसी तरह के माध्यम हैं। टेलीफोन, कार्डलेस, मोबाइल तथा सेल्युलर फोन भी श्रव्य संचार माध्यम के अंतर्गत ही आते हैं। वैसे तो इनका प्रयोग निहायत व्यक्तिगत होता है, लेकिन यदि दो साहित्यकार आपस में बातचीत के लिए इनका प्रयोग करते हैं, और वह बातचीत टेप हो जाती है तो उसका साहित्यिक महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। ठीक यही बात आडियो कैसेट के लिए भी लागू होती है। आडियो कैसेट का इस्तेमाल भी प्रायः व्यक्तिगत रूप से होता है लेकिन हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ का कैसेट साहित्य की धरोहर है। महात्मा गांधी या जवाहर लाल नेहरू के टेपित भाषण आज दुर्लभ हैं। फिराक साहब के मुंह से टेपित शायरी सुनना, उससे कम महत्वपूर्ण नहीं। लेकिन श्रव्य संचार माध्यमों में जन माध्यम के रूप में रेडियो की जितनी प्रतिष्ठा है, उतनी अन्य माध्यमों की नहीं। इसका मूल कारण शायद यह है कि यह माध्यम सर्वसुलभ है, दूसरे इसमें व्यय भी कम होता है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी रेडियो रख सकता है। यह बात सच है कि रेडियो के कार्यक्रमों विशेषकर साहित्यिक कार्यक्रमों का लेखन एवं प्रसारण एक जटिल प्रक्रिया है। यहां भाषा की ध्वनि अथवा ‘श्रव्यता’ के गुणों को उभाड़ना पड़ता है क्योंकि साहित्यिक पत्रिकाओं की तरह यहाँ न तो छपे हुए शब्द सामने होते और न टेलीविजन की तरह दृश्य ही। इसलिए इसमें बोलने की कला का विशेष महत्व है, क्योंकि जो कुछ कहा जाय, उसका सीधा और स्पष्ट प्रभाव श्रोताओं पर पड़े, इसका सदैव ध्यान रखा जाता है। जमाना चाहे जितना व्यावसायिक हो गया हो, आज भी रेडियो पर साहित्यिक कार्यक्रम पेश किये जाते हैं और उसके सुनने वाले दुनिया भर में फैले हुए हैं। साहित्यिक कृतियों के कितने ही नाट्य रूपांतरणों को लोग धारावाहिक में सुनते हैं और उसके लिए बेचैन रहते हैं। उच्चकोटि के कितने ही साहित्यकारों का संबंध रेडियो से रहा है। उनकी बहुत सी रचनाएँ आज भी रेडियो स्टेशनों के संग्रहालयों में मौजूद हैं जिनके योगदान पर अच्छी-खासी रिसर्च हो सकती है। 

श्रव्य संचार माध्यमों के अलावा साहित्य का रिश्ता श्रव्य एवं दृश्य संचार माध्यमों से भी गहरा है जिनमें फिल्म, टेलीविजन और वीडियो कैसेट्स की गणना की जाती है। वीसीआर एवं वीसीपी भी इसी श्रेणी में आते हैं। बीती सदी के उत्तरार्द्ध में दृश्य एवं श्रव्य संचार में अभूतपूर्व उन्नति हुई है। उपग्रह प्रणाली के चलते कितने ही नवीन साधन ईजाद हुए हैं, जिनमें कंप्यूटर प्रणाली, इंटरनेट, सी.डी., वी.डी.ओ. टैक्स्ट, वीडियो फोन, टेली कांफ्रेंसिंग और हाइब्रिड मेल सर्विस की गणना की जा सकती है। आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में “मल्टीमीडिया’ एक ऐसा साधन है जिसने सारी दुनिया को अपने साथ जोड़ लिया है लेकिन इन सबमें साहित्य का रिश्ता जनसंचार माध्यमों विशेषकर फिल्मों और टेलीविजन से कुछ ज्यादा ही है। भीष्म साहनी का ‘तमस’, आर. के. नारायण का ‘मालगुडी डेज’, जवाहर लाल नेहरू की ‘भारत एक खोज’ और प्रेमचंद सहित शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय, बलाई चंद मुखोपाध्याय उर्फ ‘बनफूल’, ताराशंकर बन्योपाध्याय जैसे विश्व विश्रुत साहित्यकारों की कुछेक अमर कृतियों के नाम लिये जा सकते हैं जो ‘दूरदर्शन’ के माध्मय से आम जनता तक पहुँचीं। लेकिन जिस प्रभूत मात्रा में साहित्य को इन माध्यमों के जरिए जनता तक पहुंचना चाहिए, नहीं पहुंचा। कई साहित्यिक कृतियों को तो इतना मसालेदार बनाकर परोसा गया कि 

उन साहित्यकारों की आत्मा भी पनाह माँग गयी होगी। देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चन्द्रकांता’ के साथ ऐसा ही हुआ। शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास ‘देवदास’ के साथ भी संजय लीला भंसाली ने ऐसा ही कुछ किया जबकि के. एल. सहगल और दिलीप कुमार वाली ‘देवदास’ पर मसालेदार होने का आरोप ता नहीं ही लगाया जा सकता। राही मासूम रजा के डायलाग्स के कारण एक समय ‘महाभारत’ पर बना सीरियल बहुत ही मकबूल हुआ। कुछ वैसा ही लोकप्रिय ‘रामायण’ पर बनाया रामानंद सागर का सीरियल भी साबित हआ। एक जमाने में भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर बनी फिल्म भी बहुत मशहूर हुई और शरतचन्द्र का ‘स्वामी’ भी। प्रेमचंद के कछेक उपन्यासों पर फिल्में तो बनी ही, व इस नीयत से फिल्मों में गये भी थे कि फिल्मों के जरिए समाज सुधार का काम कर सकेंगे, लेकिन एक साल के कंट्रैक्ट के बावजूद नौ महीने में ही लौट आये। लौटने के बाद जैनेन्द्र को उन्होंने लिखा कि लेखक कलम का बादशाह क्यों न हो, यहाँ डायरेक्टर की अमलदारी है और उसके राज्य में उसकी (लेखक की) हुकूमत नहीं चल सकती क्योंकि डायरेक्टर यह मानते हैं कि वे जनता के इस्लाह के लिए फिल्में नहीं बनाते। उनके लिए फिल्म बनाना एक व्यवसाय है और धन कमाना उनकी गरज। मुंशी प्रेमचंद ने अपने एक खत में लिखा : “सिनेमा में किसी इस्लाह की तवक़्को (आशा) करना बेकार है। यह सनअत (व्यवसाय) भी उसी तरह सरमायःदारों के हाथ में हैं जैसे शराबफ़रोशी। इन्हें इससे बहस नहीं कि पब्लिक के मज़ाक़ (रुचि) पर क्या असर पड़ता है। इन्हें तो अपने पैसे से मतलब। बरहना (नंगा) रक्स (नाच), बोसाबाज़ी (चूमाचाटी) और मर्दो का औरतों पर हमला यह सब उनकी नजरों में जायज़ है। पब्लिक का मज़ाक़ (सुरुचि) इतना गिर गया है कि जब तक ये मुखर्रिब (घातक) और हयासोज़ (निर्लज्ज) नजारे न हों, उन्हें तस्वीर में मज़ा नहीं आता। मज़ाक़ की इस्लाह का बीड़ा कौन उठाये ? सिनेमा के जरिए मग़रिब (पश्चिम) की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं और हम बेबस हैं। पब्लिक में तंज़ीम (संगठन) नहीं, न नेक-ओ-बद (भले-बुरे) का इम्तियाज़ (विवेक) है। आप अख़बारों में कितनी ही फ़रियाद कीजिए, वह बेकार है …जब ऐक्ट्रेसों और ऐक्टरों की तस्वीरें धड़ाधड़ छपें और उनके कमाल के कसीदे गाये जायं तो क्यों न हमारे नौजवानों पर उसका असर हो। साइंस एक बरकते एजदी (ईश्वरीय वरदान) है, मगर नाअहलों (अयोग्य लोगों) के हाथों में पड़कर लानत (अभिशाप) हो रहा है। मैंने खूब सोच लिया और इस दायरे से निकल जाना ही मुनासिब समझता हूँ।” 

गौरतलब है कि सिनेमा के बारे में जो बातें साहित्यकार के नाते प्रेमचंद जी ने तब कही थीं, वे बातें आज भी सही हैं। इससे साहित्य और सिनेमा के संबंधों पर रोशनी पड़ती है। टेलीविजन खासकर ‘दूरदर्शन’ पर पहले कुछेक सीरियल भले प्रसारित हुए हों, लेकिन आजकल तो साहित्य के लिए टेलीविजन पर जगह दिखाई नहीं पड़ती। ‘दूरदर्शन’ जिसे प्रायः ‘दुःखदर्शन’ कहकर बदनाम किया गया है, उस पर कभी-कभार अब भी एक-आध साहित्यिक कार्यक्रम देखने को मिल जाते हैं, लेकिन इसके अलावा जो चैनल हैं, उनके पास साहित्य के लिए कोई जगह नहीं है। जैसे मेन स्ट्रीम जर्नलिज़्म में साहित्य को बहुत तवज्जो नहीं दी जाती, उसी तरह इन रंगीन चैनलों में साहित्य के लिए कोई जगह नहीं। इसी का परिणाम है कि रोने धोने वाले सीरियल तो बहुत आते हैं, लेकिन उनमें साहित्यिक संवेदना नहीं होती। आम आदमी की जिंदगी से उसका कोई मतलब नहीं होता। उन सीरियलों में आने वाले पात्र भी नकली होते हैं। वे बंबई में होते होंगे, कलकत्ते में होते होंगे, लेकिन हमारे आस-पास तो न वैसे पुरुष होते हैं, न ही वैसी औरतें, न वैसी घटनाएं, न वैसा जीवन। ऐसे चैनलों में काम करने वाले देखने में भले माडलों की तरह दिखते हों, सितारों की तरह रहते हों, लेकिन मानसिक रूप से दरिद्र भी होते हैं, यह नहीं मालूम था। दरअसल चैनलों या अखबारों में जाने वाले ज्यादातर गैरसाहित्यिक मिज़ाज़ के लोग हैं। उन्हें साहित्य से कुछ लेना-देना नहीं, इसलिए साहित्यिक व्यक्तियों की भी वे गैरसाहित्यिक चर्चा करना ही बेहतर मानते हैं जैसे मनोहर श्याम जोशी के मरने पर उनको एक साहित्यकार के मुकाबले एक सोप-ओपेराकार के रूप में प्रतिष्ठित करने में उनकी दिलचस्पी ज्यादा थी। 

वैसे भी मीडिया की नज़र में जो बिकाऊ होता है, उनका सबसे ज्यादा ध्यान उसी पर होता है। यदि राजनीति से संबंधित कथाओं, अपराध, सनसनी, घोटालों, सेक्स और तंत्र-मंत्र पर आधारित, लिजलिजी कथाओं, फैशन परेडों, अधनंगी तस्वीरों, स्टिंग आपरेशनों से यदि मीडिया की ‘टीआरपी’ बढ़ती है, तो वे वरीयता इन्हीं चीजों को देंगे, जबकि साहित्य से ऐसा संभव नहीं लगता क्योंकि मीडिया ने लोकरुचि के परिष्कार के लिए ऐसा कोई प्रयास किया ही नहीं कि जनता के अंदर साहित्य के प्रति दिलचस्पी जगे। फिर साहित्य के प्रति जनता की उदासीनता स्वाभाविक है। ऐसे में साहित्य के साथ मीडिया को जोड़कर सवाल तो बहुत उठाये जा सकते हैं, लेकिन उसका उत्तर किसी के पास नहीं है। 

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