कर्मयोगी कबीर की जीवन दृष्टि पर निबंध | कबीरदास का जीवन परिचय और काव्यगत विशेषताएँ

कर्मयोगी कबीर की जीवन दृष्टि पर निबंध

कर्मयोगी कबीर की जीवन दृष्टि पर निबंध | कबीरदास का जीवन परिचय और काव्यगत विशेषताएँ

14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में एक ऐसी ओजस्वी प्रतिभा संपन्न विभूति का आविर्भाव हुआ जिसने हाथ में मशाल लेकर जर्जरित-विशृंखलित रूढ़ियों से ग्रस्त मृतप्राय समाज को ज्ञान का आलोक प्रदान किया। निजी जीवन की परवाह न करते हुए स्वयं को नैतिक आदर्श और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु पूर्णतः समर्पित कर दिया। ऐसी बहुआयामी प्रतिभा के धनी कबीर दास के व्यक्तित्व एवं उनकी वाणियों में अभिव्यक्त उनकी विचारधारा के आधार पर अधिकांशतः आलोचकों ने उन्हें संत, क्रांतिकारी, समाज सुधारक, युग चेता, युग प्रवर्तक, विद्रोही, अक्खड़, आत्मज्ञानी आदि विशेषणों | से विभूषित किया है। ये सभी विशेषण सार्थक एवं साभिप्राय हैं। इनके साथ-साथ कबीर दास का एक ‘कर्मयोगी’ का रूप भी है जिसकी ओर सामान्यतः कबीर के अध्येताओं एवं आलोचकों का ध्यान कम ही जाता है या उन्होंने गंभीरता से इस पर विचार, मनन ही नहीं किया है। 

उन्होंने आजीवन कर्मशील जीवन व्यतीत किया और कर्मण्यता का ही संदेश दिया। कर्मण्यता उनका आदर्श नहीं था बल्कि उनके दैनिक व्यवहार का एक अंग था। आजीवन अपना कर्म करते हुए किस प्रकार हृदय में भगवत् भक्ति को धारण किया जा सकता है उन्होंन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। कबीर बहथत थे। उन्होंने जो भी सामाजिक विसंगतियां समाज में देखी उस पर तीखा प्रहार किया। 

कबीर ने जनता में प्रचलित आडम्बरों और अंधविश्वासों का भण्डाफोड़ किया और साथ ही कर्मयोगी का रास्ता अपनाया। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों संस्कृतियों के मूलभूत सिद्धांतों को स्वीकार कर आडम्बरों का खण्डन किया। मध्यकाल में धर्म ही मनुष्य के समस्त कार्य-व्यापारों का नियामक था। सामन्ती समाज का यही स्वीकृत विधान था। सर्व-साधारण की आर्थिक, सामाजिक गुलामी के बंधनों को और कठोर बनाने के लिए विधि-विधान, तीर्थाटन, स्थान, वेद पाठ, व्रतोद्यापन, छुआछूत, अवतारोपासना, कर्मकाण्ड आदि बाह्याचारों की शृंखला को और जटिल तथा सर्वसाधारण के लिए दुरभिसाध्य और कठोर बनाया जाता था। इस युग में समस्त जन-आंदोलनों का वाह्य रूप धार्मिक था। प्रगतिशील जन नेता और मनीषी धर्म के नाम पर ही मानव मुक्ति और मानव मात्र की समानता और एकता पर जोर देते थे और उन तमाम सामाजिक कुरीतियो, रूढ़ियों, अंधविश्वासों, साम्प्रदायिक कट्टरताओं, वाह्य आचार और कर्मकाण्ड पर खुलकर आक्रमण करते थे, जिनका आश्रय लेकर उच्च वर्ग और उच्च जातियां सर्व साधारण का शोषण, दोहन करती थीं। कबीर दास ने कर्म को महत्त्व देते हुए कहा है- 

पाहन पूजै हरि मिलैं तो मैं पूजौं पहार।

ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार। 

इससे ध्वनित होता है कि कबीरदास जी जाँता और चकरी को ज्यादा महत्त्व देते थे क्योंकि उसमें गेहूं पीसा जाता था और पत्थर पूजने से अच्छा है जाँता और चक्की को पूजना, अर्थात् कबीरदास कर्म पर ज्यादा जोर देते थे।

कबीरदास तो विवेकपूर्ण, प्रतिभा संपन्न संत थे। उन्होंने समाज की इस प्रवृत्ति को अनुभव किया और समाज के कल्याणार्थ, समाज में संतुलन लाने के लिए प्रवृत्ति तथा निवृत्ति में, राग और विराग में, भोग और वैराग्य में समन्वय करने का सद्प्रयास किया। अपने उत्तरदायित्वों से मुंह मोड़ कर संन्यास धारण कर, वन में रहने वालों की उन्होंने कड़ी भर्त्सना की। इसके लिए तो वह जनक को आदर्श मानते हैं। खुद गृहस्थ जीवन बिताते हुए अपने कर्म करते हुए उन्होंने सांसारिक विरक्ति को धारण किया। यह सही है कि आध्यात्मिक जीवन की तुलना में सांसारिक संबंधों और भौतिक समृद्धि को निस्सार समझा जाता है फिर भी भारतीय संस्कृति मानव जीवन के प्रति एकांगी दृष्टिकोण नहीं अपनाती, व्यावहारिक यथार्थता को वह महत्त्व देती है। यही कारण है कि मनुस्मृति में चारों आश्रमों में से गृहस्थाश्रम को सभी आश्रम धर्मों का आधार माना गया है तथा धर्मानुसार अर्थ व काम का उपभोग करते हुए भी स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति केवल इसी आश्रम में स्वीकार की गई है। भौतिक जगत के प्रति विरक्ति का दृएिकोण रखते हुए भी कबीरदास ने गृहस्थ जीवन को उपेक्षित दृष्टि से नहीं देखा। उनका दधिकोण व्यावहारिक या। समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए गृहस्थ जीवन की महता का उन्होंने जाना था। यही कारण था कि उन्होंन घर छोड़कर बन जान वालों की निंदा की और घर में ही रहकर परमानंद प्राप्ति की कामना की। उदाहरण के लिए- 

घर तजि बन बाहरि कियौं बास,

घर बन देखौं दोऊ निरास।

जहाँ जाऊं तहां सोक संताप,

जुरा मरण की अधिक वियाप।

कहै कबीर चरन तोहि बंदा,

घर मैं घर दे परमानंदा।। 

कबीरदास का मत है कि अगर व्यक्ति वैरागी है तो उसमें सच्ची विरक्ति की भावना होनी चाहिए और यदि गृहस्थ है तो उसमें उदारता होनी चाहिए। जो इन दोनों से चूक जाते हैं, उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है- 

वैरागी विरकत भला, गिरही चित्त उदार।

दुहूं चूका रीता पड़े, ताईं बार न पार।। 

कबीर संसार छोड़ने की बात कभी नहीं कहते हैं। उनका तो निश्चित मत था कि अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए सच्ची भक्ति हो सकती है। गृहस्थ के कर्तव्यों एवं धर्म से विमुख मत बनो अन्यथा राजा राम रुष्ट हो जायेंगे 

घर छाँडै जिनि बाहरि जाँई।

नहिं तर खरौ निसावै राई॥ 

वैराग्य और गृहस्थ में स्थान और भेष का महत्त्व नहीं है, बल्कि महत्त्व है जीवन पद्धति का – जीने के ढंग का। एक भेष से साधु होते हुए भी गृहस्थ सदृश है – यदि वह तृष्णायुक्त एवं चिंतायुक्त है और एक गृहस्थ वैरागी साधु-संत है यदि वह चिंतामुक्त और अनासक्त है कबीर का विश्वास है कि गृह में वैराग्य भाव संभव है। 

इक वैरागी गृह में।

इक गृही में वैराग॥ 

कबीरदास के विचार से अर्थव्यवस्था तो इस प्रकार होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति सादा जीवन उच्च विचार वाला हो जाय। कबीर का निश्चित मत है कि संत यदि आसक्ति पूर्ण अवस्था में परिणत हो गया तो उसका जीवन व्यर्थ है। समाज में सभी परिश्रम करके उत्पादन करें, जीवन-स्तर समान हो, स्वार्थ, लोभ, मोह का परित्याग कर सभी परस्पर कल्याणकारी भावना से कर्मनिष्ठ हो जाएं तथा पारस्परिक सहकार के द्वारा जीवन यापन करें। कबीर के समय में हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य चल ही रहा था, ऊंच-नीच के भाव भी पनप रहे थे। अतः उन्होंने सर्वप्रथम राम-रहीम की एकता स्थापित की। दोनों ही संप्रदायों में भयंकर कट्टरता के भाव भरे थे जिन्हें दूर करने के लिए दोनों संप्रदायों को कबीर ने फटकार लगाई और उनकी अंधपरंपराओं का उपहास किया- 

काँकरि पाथरि जोरि कैं, मसजिद लेई चुनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बाँगि दे बहिरा हुआ खुदाय।। 

कबीर ने साधना के बाहरी स्वरूप का भी विरोध किया। वे जप-तप आदि को व्यर्थ समझते थे उनके विचार से हृदय की शुद्धि हा वास्तविक शुद्धि है। हृदय की साधना ही वास्तविक साधना है। इसी से तो वे कहते थे कि “कर का मनका छाड़ि दे मनका मनका फेर । कबीर ने मोक्ष प्राप्ति के लिए वेदाध्ययन तथा अन्यान्य कर्मकाण्ड क विधानों का प्रयोग आवश्यक नहीं समझा। उनका तो मत था 

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥ 

कबीर के उपदेशों का प्रभाव निम्नवर्गीय व्यक्तियों पर विशेष पड़ा। अतः उन लोगों के बीच ‘कबीर पंथ’ नाम का एक पंथ ही चल निकला। कबीर बड़े अक्खड़ एवं स्वतंत्र विचार के कर्मयोगी थे। पुत्र कमाल के गलत आचरण पर कबीर की प्रतिक्रिया थी 

बूड़ा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल।

हरि का सुमिरन छोड़ि के, घर ले आया माल। 

वे हिंदू तथा मुलसमानों में कोई भेद नहीं समझते थे। अतएव इन्होंने हिंदू तथा मुलसमालों में प्रचलित आडम्बरों, तीर्थ और अवतारवाद का डटकर विरोध किया है 

अरे इन दोउन राह न पाई।

हिंदू अपनी करै बड़ाई, गागर छूवन न देई। 

वेश्या के पाइन तर सोवै, यह देखो हिंदुवाई।

मुसलमान के पीर औलिया, मुरगी मुरगा खाई।

खाला केरी बेटी ब्याहै, घरहिं में करें सगाई। 

इसके अलावा कबीर दास ने मानव जीवन की जीवनचर्या से संबंध रखने वाले उपदेश भी दिये हैं 

कथनी मीठी खाँड़ सी करनी विष की लोय।

कथनी तज करनी करै, विष से अमृत होय।।

कबीरदास ने कर्मवाद का कितना सटीक उदाहरण प्रस्तुत किया- 

काहे के ताना, काहे के भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया

इंगला-पिंगला ताना भरनी, सुषमन तार से बीनी चदरिया। 

कबीर की तीसरी प्रकार की रहस्यमय भावनाएं उन रचनाओं में मिलती हैं जिनमें परंपरा को प्राप्त कर तन्मय हो जाते हैं। 

लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल।

लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।। 

कबीर में कर्म और रहस्य के दर्शन भरे पड़े हैं। कहीं उन्होंने रहस्यवाद की अभिव्यक्ति की है तो कहीं कर्मवाद की जैसे- 

अकथ कहाणी प्रेम की कछू कही न जाई।

गूंगे केरी सरकरा, बैठा ही मुसकाई॥ 

कबीर की कविता मुख देखी बात न होकर स्पष्ट कंठ से की गई धार्मिक और सामाजिक विवेचना थी। वे सत्य के अन्वेषक थे और जीवन में सदैव सत्य के नए प्रयोग करते रहे थे। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ लिखकर कबीर की पहचान कराई। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, “उन्होंने कविता के लिए कविता नहीं लिखी वह अपने आप हो गई।” 

कबीर दास ने जीवन के अर्थ को समझाने के लिए उलटवासियों का प्रयोग किया था। 

बरसे कम्बल भीजत पानी

कम्बल बरस रहा है और पानी भींग रहा है

इसके अलावा

इक अचंभा देखा रे भाई

ठाड़ा सिंह चरावै गाई। 

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कबीर के लिए लिखा है कि “वे मुसलमान नहीं थे। हिंदू होकर भी हिन्दू नहीं थे। साधु होकर भी अगृहस्थ नहीं थे। वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे, वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे भगवान के नरसिंहावतार की मानव प्रतिमूर्ति थे नरसिंह की भांति वे असम्भव समझी जाने वाली परिस्थितियों के मिलन बिन्दु पर अवतीर्ण हुए थे, जहां एक ओर ज्ञान निकल जाता है और दूसरी ओर भक्ति मार्ग।” 

कबीर काल में संन्यासियों की दशा पतनोन्मुख हो चुकी थी। ऐसे संन्यासी वेशधारियों की कमी न थी जो दूसरों को ज्ञान का उपदेश देते हुए भी स्वयं उससे कोसों दूर थे। निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर, पूर्ण संन्यास वृत्ति को धारण करके लोक कल्याण का व्रत लेने वाला संन्यासी वर्ग अपने आदर्श से गिर चुका था। कबीर ने ऐसे ढोंगी वेषधारी संन्यासियों की तुलना पिंजरे में बंद तोते से की है। 

चतुराई सूवै पढ़ी, सोई पंजर मांहि।

फिरि परमोधै आन कौ, आपन समझै नाहिं। 

कबीरदास ने स्वधर्म पर बल दिया चाहे वह धर्म ब्रह्मचारी का हो, गृहस्थ का धर्म हो अथवा संन्यासी का। उनका तो स्पष्ट कथन है कि वैरागी और गृहस्थ होना महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्व है अपने-अपने कर्तव्य पालन में प्रमाद का न होना। धर्म से विमुख व्यक्ति ‘रीता’ है उसका विनाश ही समझना चाहिए। कबीरदास निष्काम कर्म को ही । ‘सहज कर्म’ की संज्ञा देते हैं। समस्त कर्म ईश्वर को समर्पित करके ही करने चाहिए-जो कीजिए हरि हेत। सभी कर्मों को निष्काम भाव से भगवत समर्पित करने पर कर्म संज्ञा नष्ट हो जाती है और वे अर्पित कर्म भगवत धर्म कहलाते हैं, जो बंधक न होकर मोचक हो जाते हैं। कबीर स्वयं भी एक ही समय में आसक्त और विरक्त थे। एक ही साथ गृहस्थ एवं संन्यासी थे। वे गृहस्थ में विरक्त भाव से रहने को ही सबसे पवित्र कर्म मानते हैं। जो उस परम ज्योति के महामिलन का हेतु बन जाता है। 

संत कबीर जब कर्मण्यता की बात कहते हैं तो वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य को किस प्रकार के कर्म करने चाहिए। कर्म दो प्रकार के माने गए हैं-1. शुभ कर्म, 2. अशुभ कर्म। मानसिक विकारों को दूर करने वाले, चित्त एवं बुद्धि को निर्मल बनाने वाले कर्म ही शुभ कर्म कहलाते हैं। कबीर का साध्य ईश्वर भक्ति है। वे उन्हीं कर्मों को स्वीकार करते हैं और शुभ कर्म मानते हैं जो भक्ति की प्राप्ति में सहायक हैं या भक्ति के अंग हैं। नाम स्मरण, गुरु सेवा इनकी दृष्टि में शुभ कर्म है दया, क्षमा, सत्य, उदारता, सहिष्णुता आदि सात्विक भावों से प्रेरित होकर किए गए जनहितार्थ कर्म ही शुभकर्म हैं। कबीर ने अनेक संदर्भो में, अनेक बार प्रभु भक्ति नाम स्मरण, गुरु सेवा जल में कमलवत् संसार में निर्लिप्त भाव से जीवन यापन करना, अहं बुद्धि के परित्यागयुक्त किए गए कर्म को शुभ कर्म माना है। इसके विपरीत जो कर्म भक्ति एवं ज्ञान की प्राप्ति में बाधक है, उन्हें अशुभ कहा है। जिन कर्मों के कारण माया प्रभाव शालिनी बनती है, मनुष्य को आवागमन के चक्र में भटकना पड़ता है, जो आत्मकल्याण और जनकल्याण के विरुद्ध हैं, वे सभी अशुभ कर्म हैं। कबीरदास ने अशुभ कर्मों को परित्याज्य एवं मानव-कल्याण में बाधक मानकर भर्त्सना की है तथा उनका त्याग करने के लिए कहा है एवं शुभ कर्मों को श्रेष्ठ मानते हुए उनकी ओर प्रवृत्त होने का उपदेश दिया है। कबीरदास कर्म करना इन्द्रियों का धर्म मानते हैं एवं निरासक्त भाव से आजीवन शुभ कर्म करते रहने का उपदेश देते हैं। 

कबीरदास ने अपनी बानियों में कर्मकाण्ड का खण्डन किया है। डॉ. राम कुमार वर्मा ने कबीर के बारे में लिखा ह—“हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की साम्प्रदायिक सीमा को तोड़कर उन्हें एक ही भावधारा में बहा ले जाने का अपूर्व बल कबीर के काव्य में था। अपने स्वाधीन और निर्भीक विचारों से उन्होंने सुधार के नवीन मार्ग की ओर संकेत किया। उनकी समदृष्टि ने उन्हें सार्वजनिक और सार्वभौमिक बना दिया।” 

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की कर्मयोगी दृष्टि के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है कि युग का प्रतिनिधि अथवा लोकनायक उसे माना जा सकता है, जो विभिन्न विरोधों में समन्वय स्थापित कर सके। हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई कवि उत्पन्न नहीं हुआ। साहित्य में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वन्द्वी तुलसीदास का आता है। मस्ता, फक्कड़ाना स्वभाव और सबको झाड़-फटकार कर चल देने वाल तेज ने कबीर को हिंदी साहित्य का अद्वितीय व्यक्ति बना दिया। 

कर्मकाण्ड से उनका अभिप्राय साम्प्रदायिक कर्मकाण्ड से था साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के प्रति उनकी बिल्कुल आस्था नहीं थी। मीमांसकों के कर्मकाण्ड और वैधी भक्ति के बाह्याडंबरों का भी उन्होंने खंडन किया तथा पंडितों एवं मुल्लाओं को कर्म के जाल में भटकने वाला, बतलाया है। इस प्रकार कबीर ने अकर्मण्यता का क्रियात्मक विरोध कर कर्मण्यता को भगवत प्राप्ति में सहायक बताया है। कर्मण्य जीवन का संदेश देने वाले कबीर दास ने अपने जीवन को जिस प्रकार आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है वह कोई सच्चा कर्मयोगी ही कर सकता है। इस प्रकार कबीर सच्चे अर्थों में एक कर्मयोगी थे जिनके जीवन से आज भी समाज को कर्मण्यता की प्रेरणा मिलती है। यही संदेश हमें भगवत्गीता भी देती है 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्

इस प्रकार हम देखते हैं कि कर्मयोगी कबीरदास ने स्पष्ट घोषणा कर दी है- 

मसि कागद छूयो नहिं कलम गह्यो नहिं हाथ 

इसका सीधा तात्पर्य है कि कबीरदास पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन बहश्रत थे। जिस प्रकार गीता हमें निष्काम कर्म का संदेश देती है उसी प्रकार कबीरदास का काव्य हमें कर्मोन्मुख कर्मयोगी का संदेश देता है और वह भी गृहस्थ जीवन बिताते हुए। यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि सभी चीजों का निर्वाह करते हुए कबीर दास ने जीवन को कर्मयोगी दृष्टि दी। 

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