पुस्तकालय पर निबंध

पुस्तकालय पर निबंध

पुस्तकालय पर निबंध | Essay on Library in Hindi

  पुस्तकालय का सरलार्थ है-पुस्तकों का घर (पुस्तक+आलय), किंत इस तात्पर्य पुस्तकों का गोदाम नहीं, वरन् ज्ञानकेंद्र है, जहाँ तरह-तरह के जिज्ञासु अपनी ज्ञान की पिपासा शांत करने के लिए पहुँचते रहते हैं। जबसे मुद्रणयंत्र का प्रसार हुआ, तबसे संसार में विभिन्न विषयों पर लाखों की संख्या में पुस्तकें छपने लगी और इधर तो उनकी संख्या सुरसा-विस्तार पाती जा रही है।

अतः, किसी भी धनकुबेर के लिए यह संभव नहीं कि एक विषय की सारी पुस्तकें वह खरीद सके, यदि खरीदना संभव भी हो जाए, तो बहुत-सी प्राचीन पुस्तकों का उपलब्ध होना संभव नहीं है। अतः, ज्ञान की गंगा सबके लिए उपलब्ध हो सके, परंपरा की चिंतन-संपदा सबको हस्तगत हो सके, इसके लिए पुस्तकालय की आवश्यकता हुई। अतः, आज पुस्तकालय किसी राष्ट्र के विद्यानुराग के मापकयंत्र बन गए हैं, उसकी सभ्यता और संस्कृति के दिक्सूचस यंत्र बन चुके हैं। 

पुस्तकालय कई प्रकार के होते हैं—(1) सार्वजनिक पुस्तकालय (2) संस्थागत पुस्तकालय (3) वैयक्तिक पुस्तकालय (4) राजकीय पुस्तकालय (5) राष्ट्रीय पुस्तकालय (6) चलन्त पुस्तकालय। सार्वजनिक पुस्तकालय सभी लोगों के लिए खुला होता है, जबकि संस्थागत पुस्तकालय संस्थाओं से संबद्ध व्यक्तियों के लिए उपयोगी होता है।

विद्यालय के पुस्तकालय केवल विद्यालय के छात्रों एवं शिक्षकों के लिए व्यवहरणीय होते हैं, तो महाविद्यालय-पुस्तकालय या विश्वविद्यालयी पुस्तकालय महाविद्यालय-विश्वविद्यालय के छात्रों-प्राचार्यों एवं विभागाध्यक्षों के लिए उपयुक्त हैं। इन पुस्तकालयों में बाहर के व्यक्ति का प्रवेश निषिद्ध होता है। वैयक्तिक पुस्तकालय विद्याव्यसनी के वैयक्तिक उपयोग के लिए होता है। 

संसार के बड़े-बड़े विद्वानों के निवास पर जाएँ, तो उनके यहाँ पुस्तकों का विशाल संग्रह मिलेगा। वे यह मानकर चलते हैं कि पुस्तकों के बिना घर आत्मा के बिना शरीर जैसा है। ऐसे महापुरुष अध्ययन के बाद अपने जीवन में ही अपना पुस्तकालय किसी संस्था को दान कर जाते हैं। महर्षि अरविंद ने वैयक्तिक पुस्तक-संग्रह बड़ौदा-विश्वविद्यालय को दान कर दिया।

खुदाबक्श खाँ, सच्चिदानंद सिन्हा तथा डॉ. श्रीकृष्णसिंह के वैयक्तिक पुस्तकालय अब सार्वजनिक पुस्तकालय में परिणत हो गए हैं। हर राष्ट्र का अपना राष्ट्रीय पुस्तकालय भी होता है, जहाँ हर प्रकाशक को अपनी पुस्तकों की कम-से-कम दो प्रतियाँ निःशुल्क देनी पड़ती है और चेष्टा की जाती है कि देश का समस्त मुद्रित साहित्य अवश्य संगृहीत हो जाएँ। इनके अतिरिक्त, हमारे यहाँ तथा विदेशों में अब चल पुस्तकालयों की व्यवस्था की गई है।

 मोटर पर पस्तकें पाठकों के घर पहँचाई जाती हैं। देहातों में बड़े पुस्तकालया के न रहने से ग्रामीणों को पुस्तकें मिल नहीं पातीं। पुस्तक पढ़ने के लिए दूर नगरी में जाना भी समय और अर्थ की अपेक्षा रखता है। इसलिए ज्ञानगंगा केवल विशाल नगरों के जटाजाल में ही उलझकर न रह जाए, वह सामान्य जनजीवन ममा हो, इसे ध्यान में रखकर ही चल पुस्तकालयों की योजना बनाई गई है। 

पुस्तकालयों में पाठकों को बहत कम पैसे सदस्यता-शल्क के रूप में देने पड़ते है और उन्हीं थोड़े पैसों में सालभर पुस्तकें पढी जा सकती हैं। अनुक्रमपत्रक (Index Card) लेखकवार या पुस्तकवार बना होता है। एक पर्जे पर माँग उपस्थित करने पर दस-पंद्रह दिनों के लिए पुस्तकें प्राप्त हो जाती हैं। बड़े-बड़े पुस्तकालयों में दस-बीस पुस्तके एक साथ निकासी कराकर वहीं बैठकर पढ़ने की भी व्यवस्था होती है। वाचनालय में पत्र-पत्रिकाओं का अलग विभाग ही होता है, जहाँ नई-नई पत्र-पत्रिका पढ़ी जा सकती हैं। 

ऐसे पुस्तकालयों में संदर्भ-अनुभाग (reference section) भी होता है। इस अनुभाग में बहमुल्य विश्वकोष, भिन्न-भिन्न प्रकार के कोषग्रंथ और संदर्भग्रंथ हात है, जो घर ले जाने के लिए नहीं दिए जाते हैं। वहीं बैठकर पढ़ने की व्यवस्था रहती है। इनके अतिरिक्त, पांडुलिपि-विभाग (manuscript section) भी होता है, जहाँ दुर्लभ अमुद्रित हस्तलेख सुरक्षित रहते हैं। शोध करनेवालों के लिए संदर्भ और हस्तलिपि-विभाग बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं। 

जिस प्रकार किसी मंदिर में प्रवेश करते ही नास्तिक का मन भी देवमूर्ति के अभिवादन के लिए मचल उठता है, उसी प्रकार पुस्तकालय में प्रवेश करते ही अध्ययन में अरुचि रखनेवाले व्यक्ति का भी मन ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक हो उठता है। पुस्तकालय वह महासागर है, जहाँ भिन्न-भिन्न दिशाओं से ज्ञानसरिताएँ आकर मिलती हैं। युग-युग की प्रतिभाओं ने जो अपनी साधना के दीप जलाए, उनका पुँजीभूत प्रकाश हमें यहाँ एकत्र मिल जाता है। भिन्न-भिन्न देशों के विचारकों ने अपने विचार के जो विवेचन प्रस्तुत किए हैं, उनका सारा भंडार ही हमें यहाँ उपलब्ध हो जाता है।

पुस्तकालय में ज्ञान का सहस्रदल कमल अपनी सुरभि से हमें मुग्ध करता है, ज्ञान की सहस्र रश्मियाँ हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर करती हैं। जब तक हम पुस्तकालय के द्वार के बाहर रहते हैं, तब तक हम भले तप्त-शप्त रहें, किन्तु यहाँ आते ही हमें वह पारिजात पुष्प मिल जाता है, जिसके सामने हमारी सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। 

आप चाहें तो भवभूति की ग्रावाद्राविणी करुणाधारा में गोते लगा सकते हैं, आप चाहें तो तुलसीदास की ‘विनयपत्रिका’ की भक्तिमंदाकिनी में डूब सकते हैं, आप चाहें तो मिल्टन के ‘पैराडाइज लॉस्ट’ के शैतान के खुराफातों से सबक ले सकते हैं, आप चाहें तो आइंस्टीन के सापेक्षता-सिद्धांत की गहराइयों में डूब सकते हैं। साहित्य, दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र-जिस किसी भी विषय में आपकी रुचि हो, आपके समक्ष हजार-हजार चिंतकों-लेखकों की चिंतन-कामधेनुएँ खड़ी हैं; आप स्वेच्छानुसार ज्ञान-दुग्ध प्राप्त कर लीजिए। संसार की सभ्यता, साहित्य, संस्कृति आदि की जानकारी के लिए पुस्तकालय से बढ़कर और कोई स्थान नहीं। 

किंतु, हमारे देश में पुस्तकालयों की बड़ी उपेक्षा है। यह बड़ी ही दुःखद और चिंत्य स्थिति है। सरकार इधर थोड़ा ध्यान देने लगी है, किंतु उसके संचालक छूट (कमीशन) के लोभ में बुरी पुस्तकें खरीदकर अच्छी अध्ययन-सामग्री से जनसामान्य को वंचित कर रहे हैं। 

भारतवर्ष में ऐसा कोई पुस्तकालय शायद ही हो, जहाँ किसी विषय पर सारी अच्छी पुस्तकों का संकलन मिल जाए। पाठक दुर्लभ पस्तकों को ले जाते हैं, तो लौटाते नहीं। वे अपने साथ ब्लेड लिए चलते हैं और अपने उपयोग के पन्ने को काटकर पुस्तकों को दूसरों के लिए अनुपयोगी बना डालते हैं। यह ऐसा अन्याय है कि इसके लिए बड़ा-से-बड़ा दंड भी छोटा है। यह ऐसा पाप है, जिसे बड़ी-से-बड़ी तपस्या भी नहीं धो सकती। ज्ञान के प्रदीप को नष्ट कर औरों को अंधकार में रखना जघन्य अपराध है। 

पुस्तकालय विश्व के चिंतन का स्थायी केंद्र है। यह एक ऐसा विद्यामंदिर है, जहाँ बैठकर कोई मनोविनोद, आत्मिक तृप्ति, मानसिक तुष्टि, ज्ञान-विस्तार एवं प्रगति के स्वर्णिम शिखर का सहज ही स्पर्श कर सकता है।