राष्ट्रीयता की भावना के अभाव पर निबंध|Essay on lack of sense of nationality

राष्ट्रीयता की भावना के अभाव पर निबंध|Essay on lack of sense of nationality

राष्ट्रीयता की भावना के अभाव में राष्ट्र विकास नहीं हो सकता 

“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। 

वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।” हे विधाते ! 

तुम भी कितने बेमिसाल रहमान हो, कि समझ में नहीं आता कि इंसान जननी की कोख से अवतरित होकर देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत होकर न केवल राष्ट्र के स्वर्णिम विकास के लिए आमादा हो जाता है, बल्कि अपने वतन की आबरू को ताजिन्दगी महफूज रखने के लिए हँसते-हँसते अपनी सुकोमल गर्दन में भौतिकता की माला के बजाए ले लेता है–फाँसी का फंदा ! और कुर्बान हो जाता है, वतन के लिए. जिस मुल्क में जीवन बसर करने वाले नागरिक के जिस्म के जर्रे-जर्रे से राष्ट्रीयता की फौलादी भावनाओं के फुब्बारे फूटते हों, भला ! उस राष्ट्र के विकास का क्या कहना ! राष्ट्र के प्रति समर्पित हो जाना ही तो राष्ट्रीयता है न? 

जापान का उदाहरण सामने है. मंचूरिया के युद्ध में रूस सदश विशाल एवं शक्तिशाली देश को पराजित कर उसने अपनी अस्मिता स्थापित की, द्वितीय विश्वयुद्ध के मध्य मानव बम द्वारा रिपल्स एवं प्रिंस ऑफ वेल्स नामक जंगी जहाजों को मिटाकर इंगलैण्ड की नौसेना की अपराजेयता की बखिया उधेड़ दी तथा एटम बम द्वारा विनष्ट होने के उपरान्त अपने श्रम सीकर द्वारा जापान को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करके अपने अदम्य राष्ट्रीयता की भावना का परचम फहराया. कौन रोक सकता है ऐसे देश को विकास के पथ पर अग्रसर होने से? जिस तरह गुलशन फूल के बिना, पिता-पुत्र के बिना, प्रेमिका-प्रेमी के बिना, पत्नी-पति के बिना, नारी शृंगार के बिना, छात्र-विद्या के बिना सूना तथा फीका लगता है, ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीयता की भावना के अभाव में राष्ट्र का विकास न केवल जटिल, बल्कि सर्वथा नामुमकिन सा प्रतीत होता है. राष्ट्रीयता की भावना के अभाव में राष्ट्र के विकास की चर्चा के लिए वक्त ही किसके पास होगा? 

यदि ऐसा कहा जाए कि किसी भी राष्ट्र के विकास की बुलन्द इमारत को राष्ट्रीयता की भावना की बिसात पर खड़ी की जा सकती है, तो बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी. 

एकता, अखण्डता, भाई-चारे, प्रेम तथा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में ही किसी राष्ट्र के विकास की परिकल्पना की जा सकती है. राष्ट्र के प्रति समर्पित भावना ही तो राष्ट्रीयता की धोतिका है न? राष्ट्रीयता एक ऐसा उर्वरक है जो राष्ट्र के विकासशील पौधे को हरा भरा रखकर सम्पूर्ण बगिया के अस्तित्व को कायम रखता है. यदि सर्वाधिक लोगों में राष्ट्रीयता की भावना की कमी हो जाए तो फिर उस राष्ट्र का विकास कैसे सम्भव हो सकता है? राष्ट्रीयता की भावना और राष्ट्र के विकास में चोली-दामन का सम्बन्ध है. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. जिस प्रकार मछलियाँ जल के अभाव में तड़प-तड़प कर मर जाती हैं, ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीयता की भावना के अभाव में राष्ट्र का विकास भी दम तोड़ देता है.

किसी भी विकासशील राष्ट्र का महत्वपूर्ण सम्बल राष्ट्रीयता की भावना ही होती है, इसे नजरन्दाज कर राष्ट्र को विकास के मुकाम तक पहुँचाना न केवल पापड़ बेलना है, अपितु टेड़ी खीर भी है. सम्प्रति नियति के क्रूर-काल के चक्र ने तथा फिरकापरस्तियों के कुचक्र ने हमारे राष्ट्र में राष्ट्रीयता की भावना को मसलकर राष्ट्र के विकास को कहर और कयामत के दल-दल में धकेलकर पतनरूपी हादसा का हुजूम लगा दिया है, जो निर्विवादरूप से वतन की बदनसीबी को मुकम्मल करती है. तभी तो किसी शायर ने अपनी फफकती आवाज में कहा है- 

“न आँसू अलग हैं, न आहे अलग हैं, न मंजिल अलग है, न राहें अलग हैं। मगर सोचता हूँ, कुछ सिरफिरों की, वतन के लिए क्यूँ, निगाहें अलग हैं।।” 

भारतवर्ष की परम्पराएं और अजीबोगरीब हैं, महापुरुषों के लम्बे फेहरिस्त और दर्दनाक है. यहाँ की दास्तां-कि जब-जब हमारे राष्ट्र के पाक-साफ दामन पर लुटेरों द्वारा बदनुमा-धब्बा लगाने की जुर्रत की गई है, तब-तब हिन्द की सौंधी मिट्टी ने तपः-तपाये कालजयी सपूतों को पैदा कर अपनी अस्मत को अक्षुण्ण रखने का सफल प्रयत्न किया है, तभी तो रणचण्डी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, वीर कुंवर सिंह, सरदार भगत सिंह, चन्द्रेशखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाषचन्द्र बोस, पंडित नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर सरीखे देश-भक्ति के दीवानों ने आजादी की जंग में कूदकर अपनी जान की बाजी लगाकर अपने हैरत-अंगेज कारनामों द्वारा अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर उन्हें भारत छोड़ने के लिए विवश किया और आजादी रूपी महान् तोहफा हासिल कर एक अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित कर राष्ट्रीयता की भावना को उजागर किया, जो सचमुच अविस्मरणीय है. 

कितना बड़ा विरोधाभास है यह कि हालात भी कभी-कभी कैसी करवटें बदल देती हैं और अप्रत्याशित त्रासदी से संघर्ष करने के लिए राष्ट्र को मजबूर कर देती हैं, तभी तो फिलवक्त हमारे राष्ट्र की प्रगति रूपी दुल्हन गद्दीनसीन स्वार्थी तत्वों तथा उसके गलियारे में जीने वाले उनके मोहरों, ठेकेदारों तथा कुत्सित सौदागरों के सींखचों में नजरबन्द होकर चीख और चीत्कार रही है, परन्तु क्या किया जाए ! मानो ऐसा लगता है कि इसके करुण-क्रंदन को सुनने वाला कोई नहीं है, आखिर इसका सबब क्या है? विकास के दिए गए धन में से प्रत्येक रुपए में 85 पैसे सफेदपोश राहजनों एवं चोरों की जेबों में चले जाते हैं. तहकीकात करने पर ऐसा महसूस होता है कि राष्ट्रीयता की भावना का नितान्त अभाव-जिसके बगैर उन्नति की मंजिल तक पहुँचना तो दूर, उस ओर एक कदम चलना भी मुश्किल है, फिर क्यों नहीं अपने हृदयांगन में राष्ट्रीयता की भावना को बसाया जाए, जिसकी बदौलत राष्ट्र की ‘विकास रूपी दुल्हन’ को उन दरिन्दों की सलाखों से निजात दिला सकें, हकीकत है कि राष्ट्र का विकास एक ऐसा दर्पण है, जो जन-मानस के स्वच्छ चितेरे को प्रतिबिम्बित करता है. 

यह कटु सत्य है कि किसी भी राष्ट्र का समुचित उत्थान उस राष्ट्र के शैक्षिक स्तर पर निर्भर करता है, अतएव शिक्षा का स्तर स्वच्छ, अनुशासनबद्ध तथा सदाचारता से लबालब होना अपरिहार्य है, क्योंकि शिक्षालय ही एक ऐसी मशीन है, जो एक-से-एक शिक्षाविदों को तैयार करती है और उसे हर क्षेत्रों का तर्जुबा देती है, तभी तो व्यक्ति शिक्षित होकर वह राष्ट्र के सम्बन्ध में कुछ सोच-समझ सकता है और राष्ट्र के मर्म को समझते हुए उसके विकास के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक कर सकता है. फलस्वरूप राष्ट्र के विकास में शिक्षा की भूमिका अपने आप में एक मायने रखती है, परन्तु यहाँ तो समस्त कर्णधार राष्ट्रभाषा का भी ज्ञान नहीं रखते हैं. 

सच पूछा जाए तो राष्ट्रीयता की भावना एक ऐसा सोपान है, जिसके जरिए राष्ट्र विकास के अन्तिम पडाव तक पहुँचने में सक्षम बनता है, लेकिन किया क्या जाए ! फिलहाल तो हमारे राष्ट्र के विकास के सब द्वार बन्द दिखाई दे रहे हैं. 

क्या हो गया हमारे हिन्दुस्तान को? जहाँ गुजरे हुए वक्त में हम अपने राष्ट्र की अकूत सम्पन्नता, क्षमता, विकसित मान्यता से अघाते न थे, परन्तु बहरहाल विपुल विपन्नता एवं अक्षमता की वजह से सकुचाते हैं, शर्माते हैं. 

आज जब हम अपनी निगाहें घुमाते हैं, तो नजारा मिलता है कि भारतीय लोकतंत्र में सर्वत्र झूठ का बोलबाला है, सच का मुँह काला है, हवाला तथा पशुचारा घोटाला है, खुदगों का साम्राज्य है, लुटेरों का राज्य है, जहाँ दया रोती है हया सिसकती है, हैवानियत पनपती है, इन्सानियत तड़पती है, प्रेम कराहता है, विद्वेष विहँसता है, धन के धमार में जहाँ कर्त्तव्य को शर्म आती है, अन्याय की अदालत में जहाँ न्याय को लाज आती है वहाँ भला राष्ट्र का विकास कैसे मुमकिन हो सकता है? जरूरत है-इस खौफनाक मंजर के खात्मे की तथा राष्ट्रीय भावना के खुशनुमा परवाने की, जब तक हमारा राष्ट्र, यहाँ का जन-गण स्वार्थ, साम्प्रदायिकता, जुल्म के बज-बजाते दल-दल से निजात नहीं पा लेगा, राष्ट्रीयता के पौधे का पल्लवन, पुरूपन तथा सुरमन सम्भव नहीं हो सकता, और राष्ट्रीयता के समन्दर में जब तक हम गोता नहीं मारेंगे राष्ट्र का विकास रूपी मोती हमें नहीं प्राप्त हो पाएगा. अतः यह कथन शत-प्रतिशत यथार्थ है कि राष्ट्रीयता की भावना के अभाव में राष्ट्र का विकास नहीं हो सकता. 

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