कुंभ मेला पर निबंध |Essay on Kumbh Mela

कुंभ मेला पर निबंध

कुंभ : एक सांस्कृतिक संगम 

“दिव्य कुम्भः भव्य कुंभ” 

“सर्व सिद्धि प्रदः कुंभ” आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं मिलन सारिता का महापर्व कुंभ जिसका आयोजन प्रयागराज में हुआ, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता की पल्लवित एवं पोषित करने वाला रहा। यह सामाजिक समरसता, बंधुत्व एवं भाई-चारे को बढ़ाने के साथ आस्था, आध्यात्म, कला, चिंतन एवं परम्परा का एक साथ, एक स्थान पर प्रदर्शित करने वाला अनोखा पर्व रहा। 

प्रयागराज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जो आध्यात्म, चिंतन, एवं शिक्षण का विशेष केन्द्र रहा है, संगम की महत्ता को बतलाते हुए यह महापर्व कर्मकाण्ड, ज्योतिष, खगोलविज्ञान, कल्पवास, जैसी संस्कृतियों एवं मान्यताओं को प्रदर्शित करता महसूस हुआ। शाही स्नान, नागा साधु एवं महंत तथा उनकी कला को देखते ही बन रहा था। ऊपर से हैलिकाप्टर से पुष्प वर्षा चारो तरफ आस्था के उद्घोष के नारे, अथाह भीड़ वृद्ध, बच्चे, महिलाओं एवं प्रशासन का इस तरह विहंगमय दृश्य मानों स्वर्ग को पृथ्वी पर उतार दिया हो। तटों पर स्नान, दान, नौका विहारण द्वीप प्रज्जवलन के साथ शाम की गंगा आरती ने मन को आनन्द एवं शान्ति से उद्वेलित कर दिया। 

चारो तरफ लाइट की चकाचौंध, चौड़ी सड़कें घोड़ों, हाथियों पर सवार नागा, चारों तरफ लाउडस्पीकर की ध्वनि से वहाँ का दृश्य मनोरथ हो उठा था। लाउडस्पीकर पर कैलाश सत्यार्थी की कविता 

‘अमौसा का मेला, अमौसा का मेला, 

संगम नहाये चलल गांव देखा, 

एहू हाथे झोरा, ऊहूहाथे झोरा 

कांधे पर बोरी और कवारे पर झोरा …..”

का श्रवण मानों जीवन की सत्यता से परिचय करा दिया हो। भौतिकता को भुलाकर आध्यात्म में खो जाने का एक अवसर हमने पहली बार देखा।

सड़क के किनारे चाट, पकौड़ी, चाय की दुकानें उस पर तरह, तरह के रंग-विरंगे, कपड़ों में अलग-टलग रंग-रूप स्वरूप के लोगों का एक साथ बैठकर आत्मीयता से खाना मानों भारत की उस समृद्ध परम्परा परस्पर सौहार्द, विश्वास एवं बसुधैव कुटुंबकम को चरितार्थ कर दिया हो। अलग-अलग पहनावे के साथ भाषा एवं बोली भी अलग-अलग फिर राह भटकने पर इशारों से समझा देना ऐसा सौहार्द और कहीं नहीं देखने को मिलेगा। 

“जिन लोगों को भारत दर्शन करना हो उनके लिए इससे अच्छा अवसर तथा स्थान कही नहीं मिलेगा, तथा इसी तरह जिन्हें आध्यात्मक जानना हो तो कुंभ जैसी महापर्व में अवश्य जाना चाहिए।” 

3200, वर्ग किलोमीटर में फैला कुम्भ जिसके हर एक गतिविधियों को देख रहे हों, बच्चों, वृद्ध महिलाओं के खो जाने पर 1500 से अधिक खोयापाया कैम्प से कानों में पड़ती आवाज पुनः कैलाश सत्यार्थी जी की कविता याद दिला देती थी 

कलौता के माई क झोरा हेराईल,

अ बुद्ध का तड़का कटोरा हेराईल, 

टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहैं 

विधुलिया के भाई बिजुलिया के जौहें

मचल हउव मेला में सगरों ढुंढाई

चमेला के बापू धमेला क माई” 

गुलबिया समद्दर बिहारत चलेली 

मुरहुवा-मुरहुवा पकारत चलेली

अ छोटकी बिटियवा के मारत चलेली

अ बिटियवा पर गुस्सा उतारत चलेली।। 

शहर में घुसते ही बड़े-बड़े पोस्टर पे लिखा था: यूनिस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोधर: कुंभ। इस लिखवट ने मन में सांस्कृतिक धरोहर एवं उसके संरक्षण की बात का ख्याल आया। अतः हम मित्रों ने कुंभ को स्वच्छ रखने का संकल्प लेते हुए शहर में प्रवेश किया। स्वच्छता को लेकर हमने देखा तो अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा इतनी भीड़-भाड़ और इतनी अच्छी सफाई व्यवस्था। हमले देखा सैकड़ों के तादात में सड़क के किनारे कूड़ादान, मठो एवं मन्दिरों के बाहर कूड़ादान तथा चप्पे-चप्पे पर हमारे सफाईकर्मी बंधु अपना कर्त्तव्य पूरी निष्ठा व ईमानदारी से निभा रहे थे तभी तो भारत के प्रधानमंत्री द्वारा इनका पाँव धुला गया तथा स्वच्छकुम्भः दिव्य कुंभ का नारा दिया। कुंभ में स्वच्छता हेतु लगभग 15 हजार अस्थाई इकोफ्रेंडली शौचालयों को बनवाया गया था, जिससे मलमूत्र नदी में प्रवाहित होने से रोका जा सके। 

हमारी यात्रा चल रही थी कि अचानक हमारी नजर अक्षयवट वृक्ष की तरफ खड़े हुए लोगों पर पड़ी हमने भी अक्षयवट के दर्शन किए तो पता चला कि कुंभ में पहली बार अक्षयवट के दर्शन लोगों को हो रहे हैं। सरकार ने इसे आम जनता के दर्शन हेतु इसी कुंभ में खोला था। इसके दर्शन से हमें वह पंक्ति याद आ गई जिसमें अक्षयवट की महत्ता के बारे में बताया गया है 

” त्रिवेणी माधवं सोमं भारद्वाज चवासुखीम,

वंदे अक्षयवट शेष प्रयागतीर्थ नायकम्॥” 

शहर की दिवारों पर पेन्ट माया सिटी के तहत चित्रित कलाकृतियों ने मानों हमारी स्थानीय कला को जीवंत कर दिया हो। स्थानीय कला का एक ऐसा प्रदर्शन जो दिवारों, पुलों, रेलवेस्टेशन, अस्पताल, विद्यालय की दिवारों पर प्रदर्शित हो रहा था जैसे भारत की संस्कृति का मूर्तरूप दृश्यमय हो गया हो। इसी तरह टेन्ट मैप सिटी के तहत पूरे शहर को टेंट से मानों ढक दिया गया हो। हमने देखा इस टेंट में फाइवस्टार जैसी सुख सुविधा का पूरा इंतजाम था, जो यात्रियों को विश्राम हेतु एक सुविधाजनक अच्छी सुविधा प्रदान कर रहा था।

कुल 22 करोड़ ऋद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। इतनी बड़ी भीड़ को नियंत्रित करना एक चुनौती होता है, पर हमने देखा हमारी सरकार ने इस हेतु 122 पुलिस चौकी, 52 महिला पुलिस चौकी, 20 पुलिस थानों की व्यवस्था कर रखी थी। जो प्रत्येक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थी। सभी केन्द्रों को आपस में जोडा गया था जिस हेत 25 मॉनिटरिंग केन्द्र बनाये गए हो। अतः पूरे मेले क्षेत्र में शान्ति व्यवस्था कायम थी। 

हमन दखा ऋद्धालुओं के आन जान हतु सरकार न विशेष बसों, ट्रेनों का इंतजाम भी किए हुए थे। भारत के कोने-कोने से आने हेतु विशेष ट्रेनों की व्यवस्था थी तो अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों हेतु भी विशेष प्रावधान किए गए थे। कुंभ में कुल 6 लाख विदेशी ऋद्धालुओं ने स्नान किया। हम सभी के स्वास्थ्य की देखभाल हेतु लगभग 25 अस्पतालों की भी व्यवस्था की गई थी। 

अंत में जब हम स्टेशन पहुंचे तो देखा स्टेशन आदमियों से खचा-खच भरा हुआ था, बच्चों के द्वारा सीटियों की आवाज, पों-पॉ, कूदने वाले, प्लास्टिक के बन्दर तो कहीं महिलाओं की हाथ में पूड़ी छानने का पौंना, चौका, बेलन, कड़ाही इत्यादि थे तो वहीं पुरूष अपने हिसाब-किताब में व्यस्त था वह बार-बार जेब में हाथ डालता, पैसा निकालता, गिनता व जाने की तैयारी करता। इसको देखकर कैलाश सत्यार्थी जी की पुन: उसी कविता की कुछ पक्तियाँ याद आ जाती है-100 

“भइया बेचारू जोड़त हाउवै खरचा,

भुलइले न भूलै पकौड़ी क मरचा, 

सिहाने कचहरी कचहरी की चिंता 

बहिनिया क गौना मसहरी क चिन्ता

फटल हउवै कुरता फटल हउवै जूता

खलीसा है खाली कराया क बूता 

तबौ पीछे-पीछे चलत जात हउवन, 

गवेरी में सरती मलट घाट हउवन,

अमौसा क मेला, अमवसा क मेला

रहइ हउवै भइया अमवसा क मेला।।”

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