कश्मीर की स्वायत्तता – माँग का उद्गम और कारण पर निबंध

कश्मीर समस्या पर निबंध: Essay on Kashmir problem

कश्मीर की स्वायत्तता – माँग का उद्गम और कारण पर निबंध

कश्मीर की स्वायत्तता वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में एक ज्वलन्त प्रश्न है. कश्मीर की स्वायत्तता का अर्थ क्या है? इसे स्पष्ट करने से पूर्व हमें स्वायत्तता शब्द के अर्थ व भारतीय संघ के संविधान से सम्बन्धित कुछ बातों पर ध्यान देना होगा. 

स्वायत्तता शब्द का सीधा-सा अर्थ है– स्वशासन अर्थात् स्वतः संचालित शासन. इसके अनुसार, कश्मीर की स्वायत्तता का अर्थ है, उसे भारतीय संघ के नियमों और निर्देशों से मुक्त करके स्वयं के कानून बनाने की अनुमति देना. दूसरे शब्दों में, कश्मीर को एक स्वतन्त्र राज्य घोषित कर दिया जाए

दूसरी ओर, भारतीय संविधान की प्रस्तावना, (जो संविधान निर्माताओं और भारतीय नागरिकों के विचारों का प्रतिबिम्ब है और भारतीय राष्ट्रीयता का मूल है) में स्पष्ट रूप से घोषित किया गया है कि सभी भारतीय नागरिक, भारतीय संघ की एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता की रक्षा के लिए वचनबद्ध हैं. अतः कश्मीर की स्वायत्तता का प्रश्न भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के विरुद्ध है और देश की सम्प्रभुत्ता के साथ छल है. 

कश्मीर की स्वायत्तता – माँग का उद्गम और कारण 

वास्तव में कश्मीर की स्वायत्तता की माँग के बीज अतीत की भारतीय राजनीति में निहित हैं. 

वास्तव में कश्मीर की स्वायत्तता की माँग का उद्गम कश्मीर समस्या है और इसके लिए निम्नलिखित कारक प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की परिस्थितियाँस्वतंत्रता प्राप्ति की तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार करें तो ज्ञात होगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति के अन्तर्गत कुछ राज्यों यथा-हैदराबाद, कश्मीर आदि को स्वविवेक के आधार पर स्वतंत्र रहने अथवा भारत या पाकिस्तान किसी भी राष्ट्र में सम्मिलित होने की छूट दी थी. उस समय कश्मीर में 90 प्रतिशत जनसंख्या मुस्लिम थी और राजा हिन्दू. चूँकि किसी भी राष्ट्र में सम्मिलित होने का निर्णय लेने का अधिकार तत्कालीन राजा को प्रदान किया गया था अतः तत्कालीन कश्मीर नरेश राजा हरि सिंह ने मुस्लिम बहुल प्रजा का ध्यान रखते हुए कश्मीर को तटस्थ राज्य घोषित किया,

परन्तु कश्मीर की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक सौन्दर्य की वजह से, इसके लिए तटस्थ रहना आसान नहीं था. एक ओर पाकिस्तानी सीमाएँ और दूसरी तरफ भारतीय सीमाएँ, कश्मीर से लगी हुई थीं. अतः सामरिक दृष्टि से कश्मीर महत्वपूर्ण था. साथ ही अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण लोभनीय भी था. अतः पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए कबाइलियों की आड़ लेकर इस पर आक्रमण किया. ऐसे समय में कश्मीर नरेश ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने की स्वीकृति दी. अतः कश्मीर का भारत में विलय स्वैच्छिक है, भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तानी सेनाओं को मुँहतोड़ जवाब दिया. दूसरी ओर विश्व राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए पं. नेहरू ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के सामने रखा, जहाँ तत्काल ही भारत और पाकिस्तान में संधि करवाकर युद्ध समाप्त करा दिया गया. इसके परिणामस्वरूप कश्मीर का कुछ हिस्सा (वर्तमान आजाद कश्मीर) पाकिस्तान के कब्जे में बना रहा.

यह सर्वविदित है कि यदि उस समय भारतीय सेनाओं को कुछ समय मिल जाता तो सम्पूर्ण कश्मीर मुक्त हो जाता और तब शायद वर्तमान कश्मीर समस्या ही नहीं रहती और न ही कश्मीर की स्वायत्तता की मांग उठती. वास्तव में तत्कालीन भारतीय राजनीति की इस छोटी परन्तु महत्वपूर्ण भूल के कारण यह मामला अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर गया और भारत विरोधी अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति के कारण कश्मीर ने ‘एक स्थायी समस्या का रूप धारण कर लिया. जबकि भारत की माँग केवल यह थी कि 

पाकिस्तान को आक्रामक घोषित कर दिया जाए. 

जम्मू-कश्मीर को प्रदत्त संवैधानिक विशेषाधिकार-जहाँ एक ओर 1947 के भारत पाक युद्ध के बाद की युद्ध विराम संधि ने कश्मीर समस्या की नींव रखी, वहीं रही सही कसर संविधान में जम्मू-कश्मीर को प्रदत्त विशेषाधिकारों ने पूरी कर दी. जम्मू-कश्मीर राज्य को प्रदत्त प्रमुख विशेषाधिकार निम्नलिखित हैं 

1.जम्मू-कश्मीर को संविधान में उल्लिखित राज्य की परिभाषा से मुक्त रखा गया है.

2. सम्पूर्ण भारत में कश्मीर ही एक ऐसा राज्य है जिसका अपना स्वयं का संविधान 

3.राज्य का नाम या राज्य क्षेत्र में परिवर्तन आदि कुछ ऐसे विषय हैं जिनकी बाबत जम्मू-कश्मीर की संसद एवं जम्मू-कश्मीर की विधान मण्डल की सम्मति के बिना कार्य नहीं कर सकती. 

4.जम्मू-कश्मीर राज्य की दशा में विधान बनाने की अवशिष्ट शक्ति राज्य के विधान मण्डल को है. केवल विदेशी आक्रमण के समय राज्य सभा में प्रस्ताव पारित करके संसद के अधिकार क्षेत्र का विस्तार इस राज्य पर किया जा सकेगा. 

5.राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित किया गया. 

(i) अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत राष्ट्रपति, आन्तरिक अशान्ति के आधार पर जम्मू कश्मीर राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा, राज्य सरकार की सहमति के बिना नहीं कर सकता, 

(ii) संघ को यह शक्ति प्राप्त नहीं है कि वह अनुच्छेद 356 के अधीन दिए गए निर्देशों का अनुपालन न होने की दशा में राज्य सरकार को निलम्बित कर सके, आदि.. 

उपर्युक्त विशेषाधिकारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान में विशेष दर्जा प्राप्त है. वास्तव में इन्हीं विशेषाधिकारों की वजह से पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद को सहायता देने और भारत की आन्तरिक शान्ति को नष्ट करने के प्रयासों में सफलता मिली है, क्योंकि राज्य पर केन्द्र का नियन्त्रण कम हुआ है और स्थानीय सरकारों की सहायता से अशान्ति फैलाने में पाकिस्तान को मदद मिली है. इसमें एक उल्लेखनीय नाम है, कश्मीर के प्रथम मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला का. 

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर को विशेषाधिकार प्रदान करने का निर्णय माननीय पं. जवाहर लाल नेहरू जी का था जबकि स्वर्गीय सरदार पटेल को इस पर आपत्ति थी और इसके पीछे कारण भी. पंडितजी का स्वयं कश्मीरी होना बताया जाता है. यदि यह सत्य है तो शायद स्वतन्त्र भारत की राजनीति में क्षेत्रवाद की यह पहली घटना थी, जिसका खामियाजा आज सारे देश को भुगतना पड़ रहा है. 

अन्तर्राष्ट्रीय कारण 

कश्मीर मसला प्रारम्भ से ही भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण रहा है. इस मसले को तूल देकर पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान और अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियाँ पचास के दशक से ही भारतीय राजनीति को प्रभावित करती रही हैं. समय-समय पर पाकिस्तान ने इस मसले को अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर रखा, कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दिया, मूल कश्मीरियों, जिनमें कश्मीरी पण्डित प्रमुख हैं और वर्तमान में राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थियों का सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं, को कश्मीर से खदेड़ा और अब कश्मीर में जनमत सर्वेक्षण कराकर उसे स्वायत्त घोषित कराने के षड्यन्त्र में लगा है. इस मुद्दे पर अन्तर्राष्ट्रीय रुख भी सदा ही नकारात्मक रहा है. 

उपर्युक्त कारणों के अध्ययन से स्पष्ट है कि कश्मीर की स्वायत्तता का मसला वास्तव में बनाया गया है, न कि स्वतः उत्पन्न है. वास्तव में यह प्रश्न, जो आज भारतीय राजनीति के सम्मुख है, अन्तर्राष्ट्रीय दबावों, लचर विदेश नीति और सरकार के ढुलमुल रवैये का परिणाम है. वर्तमान दलीय राजनीति भी कम जिम्मेदार नहीं है. मजेदार बात तो यह है कि जिस कश्मीर की स्वायत्तता की माँग को लेकर सारा हंगामा किया गया है, स्वयं उसी जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है. ऐसे में जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता और इसके लिए जनमत सर्वेक्षण की माँग करना ही बेमानी है. 

कश्मीर की स्वायत्तता प्राप्ति के उपरान्त उत्पन्न परिणाम (यदि प्राप्त हो)– यदि हम लाभ-हानि के संदर्भ में देखे तो यह माँग भारत और कश्मीर दोनों के लिए हानिकारक है. सर्वप्रथम कश्मीरियों के संदर्भ में हम पाते हैं कि यदि कश्मीर को स्वायत्तता प्रदान की जाए तो इसकी कोई निश्चितता नहीं कि कश्मीरी अपनी स्वायत्तता बरकरार रख पाएंगे, क्योंकि कश्मीर से सम्बन्धित पाकिस्तानी नीति स्पष्ट है. वह ‘येन केन प्रकारेण’ कश्मीर को अपने कब्जे में लेना चाहता है. ऐसी स्थिति में कश्मीरी जनता को एक बार फिर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा. 

दूसरी ओर भारत के संदर्भ में यह है कि मामला अत्यधिक संकट गर्भित है. यदि कश्मीर को स्वायत्तता मिलती है तो राष्ट्र के सम्मुख निम्नलिखित कठिनाइयाँ आएंगी. 

(1) सर्वप्रथम भारत की एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता को चुनौती मिलेगी. राष्ट्र में अनुचित संदेश जाएगा. जनता का केन्द्र पर से विश्वास उठ जाएगा. चारों तरफ अराजकता फैल जाएगी. वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्र के विभिन्न भागों में क्षेत्रवाद का जहर फैल चुका है यथा बोडोलैण्ड. आन्दोलन, खालिस्तान आन्दोलन आदि. वर्तमान में ये आन्दोलन ठण्डे पड़ चुके हैं पर कश्मीर की स्वायत्तता की आड़ लेकर ये शक्तियाँ भी अपने क्षेत्रों की स्वायत्तता की माँग करेंगी. इससे राष्ट्र के विघटन का खतरा बढ़ जाएगा और गृहयुद्ध की स्थितियाँ उत्पन्न हो जाएंगी. 

(2) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और कूट-नीति के मंच पर यह भारत की एक बड़ी हार होगी. पाकिस्तान जो प्रारम्भ से इस मुद्दे को भड़काता रहा है, उसकी भारत पर यह एक बड़ी कूटनीतिक विजय के रूप में जानी जाएगी. अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में गलत संदेश जाएगा. विभिन्न राष्ट्र तथा चीन आदि, जो भारत की अखण्डता के लिए चुनौती है, इस नीति का अनुसरण करते हुए केन्द्रीय नेतृत्व को चुनौती प्रस्तुत करेंगे. 

(3) विकास के नाम पर कश्मीर पर अब तक व्यय की गई विपुल धनराशि जो अरबों रुपए है-व्यर्थ एवं निष्प्रयोजन बन जाएगी. भारत को आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर हानि होगी, क्योंकि जहाँ वह एक ओर अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए विश्व-विख्यात कश्मीर, विश्वभर के पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र होने के कारण विदेशी आय का प्रमुख स्रोत है, वहीं दूसरी ओर अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.

निष्कर्ष 

स्पष्टतः कश्मीर की स्वायत्तता का मसला सीधे-सीधे भारतीय राष्ट्र की बुनियादों पर चोट करता है. यह एक विडम्बना है कि भारतीय आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर भारत के एक टुकड़े की स्वायत्तता का प्रश्न सुरसा के मुख’ के समान भारतीय राजनीति के सम्मुख है. दरअसल यह मसला असंख्य स्वतंत्रता प्रेमियों और शहीदों की आशाओं, राजनीतिक पुरोधाओं के विचारों और हमारे संविधान का अपमान तथा भारतीय जनता की भावनाओं के साथ छल है. 

अतः राष्ट्र की अखण्डता और सम्प्रभुता की रक्षा के लिए आवश्यक है, इस मसले का हल होना. इसके लिए आवश्यक है सुनियोजित रूप से कश्मीरी जनता को जागरुक बनाना, स्वायत्तता सम्बन्धित नकारात्मक पहलुओं से उन्हें अवगत कराना, उनकी आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक सुरक्षा का प्रबन्ध करना, इस मसले पर अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाना और सर्वोपरि आवश्यक है दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की. 

अतः वर्तमान भारतीय सत्ता को पारस्परिक वैमनस्य और दलगत राजनीति से ऊपर उठाते हुए इस मसले को शान्तिपूर्वक परन्तु राष्ट्रीय गौरव की रक्षा करते हुए हल करने के प्रयास करने होंगे इसी में राष्ट्र का हित है. 

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