कश्मीर समस्या पर निबंध-Essay on Kashmir problem

कश्मीर समस्या पर निबंध

कश्मीर समस्या पर निबंध-Essay on Kashmir problem

कश्मीर का मुद्दा भारत की एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्या है। वर्तमान स्थिति से बाह्य रूप में यही लगता है कि यह समस्या कभी समाप्त होने वाली नहीं है। दूसरे शब्दों में यह एक ऐसी समस्या है, जिसे राजनीतिक लाभ के लिए हमेशा समस्या बनाए रहना लाजिम है। कश्मीर की समस्या हिंदू-मुसलमान के मानसिक अंतर्द्वद्व की प्रतीक है। भारत की जितनी भी राष्ट्रीय समस्याएं हैं, उनमें से कश्मीर सकल समस्या है, जिसे पैदा किया गया है और आज तक समस्या बनाए रखा गया है। क्या कारण है कि अब तक इस समस्या का निदान नहीं हो सका? अगर भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की समस्या सुलझा सकता है, तो आखिर कश्मीर समस्या का निदान क्यों नहीं हो सकता? 

बहरहाल, यह तय है कि कश्मीर समस्या बनी रहेगी। ऐसे में नेताओं द्वारा कभी भी पाकिस्तान की ज्यादती और भारत पर आक्रमण की तैयारी का भय दिखाकर पूरे देश को दिग्भ्रमित किया जा सकता है। राष्ट्रीय संकट की घोषणा करके जनता की सहानुभूति बटोरी जा सकती है। अगर कश्मीर समस्या का कोई मुद्दा ही नहीं रह जाएगा, तो इतना संवेदनशील राष्ट्रीय मामला कहां से आएगा और जनता में देशानुराग कैसे पैदा किया जाएगा? 

अब प्रश्न यह है कि कश्मीर के मामले ने ‘समस्या’ का रूप कैसे धारण किया? आज कश्मीर का कुछ भाग ‘पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर’ कहलाता है, तो शेष भाग भारत का अंग माना जाता है। इसकी क्या वजह है ? हमें इन सारी बातों पर विचार करना चाहिए। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। देश दो भागों में विभक्त हुआ। भारत के मानचित्र पर उत्तर-पश्चिम का एक हिस्सा स्वतंत्र राष्ट्र पाकिस्तान बन गया, जबकि मानचित्र का शेष भाग भारत है। 

उस समय देश में छह सौ से अधिक देशी रियासतें थीं। उन्हें इस बात की छूट दी गई कि वे अपनी इच्छानुसार चाहे भारत में मिल जाएं अथवा पाकिस्तान में। अन्य सभी रियासतें या तो भारत में मिल गईं अथवा पाकिस्तान में। किंतु सीमावर्ती रियासत होने के कारण कश्मीर की समस्या जटिल थी। भारतीय स्वाधीनता अधिनियम के अनुसार रियासत के राजा को यह अधिकार था कि वह अपनी इच्छानुसार जिसके साथ चाहे, मिल सकता है। 

कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया। वे न तो पाकिस्तान से मिलना चाहते थे और न ही भारत से। पाकिस्तान कश्मीर को अपने अधिकार में रखना चाहता था। अतएव उसने कश्मीर पर अधिकार करने की एक योजना बनाई। पाकिस्तान ने सीमावर्ती कबायलियों को उकसाया। तब कबायलियों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, जिसका नेतृत्व पाकिस्तानी सैनिक कर रहे थे। वे कश्मीर के अनेक स्थानों पर कब्जा जमाते हुए आगे बढ़ने लगे। महाराजा हरि सिंह की थोड़ी सी सेना उनका मुकाबला नहीं कर सकी। राजा और शेख अब्दुल्ला ने मिलकर भारत से मदद की मांग की। 

ऐसी विकट स्थिति में भारत ने यह शर्त रखी कि पहले कश्मीर का भारत में विलय हो, तब भारत कश्मीर की मदद करेगा। अंत में ऐसा ही हुआ। तब भारतीय सेना ने कश्मीर की ओर प्रस्थान किया। कश्मीर पहुंचकर भारतीय सेना ने आक्रमणकारियों को पीछे ढकेलना प्रारंभ किया और छीने गए कुछ क्षेत्रों को भी वापस ले लिया। यदि भारतीय सेना को छूट दी गई होती, तो आज पूरा कश्मीर भारत का अंग होता और बार-बार यह समस्या नहीं उठती। 

भारत ने कश्मीर का मामला निबटाने के बजाय उसे फुसी से नासूर बनाने की चेष्टा की। भारत ने कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के सामने प्रस्तुत कर दिया। सुरक्षा परिषद ने भारत और पाकिस्तान के बीच संधि कराकर युद्ध समाप्त करवा दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर समस्या आज तक बनी हुई है। 

सन 1950 में कश्मीर विधानसभा का चुनाव हुआ। वहां का संविधान बना और कश्मीर में संविधान लागू कर दिया गया। इस संविधान के अनुसार कश्मीर का भारत में विलय हो गया। शेख अब्दुल्ला ने कुछ विदेशी शक्तियों के दबाव में आकर कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का षड्यंत्र रचा, लेकिन वह असफल हो गया। सच तो यह है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। कश्मीर की विधान सभा कश्मीर की जनता के अच्छे प्रतिनिधियों की सभा है और उसका निर्णय जनमत संग्रह के समान प्रामाणिक है। 

पाकिस्तान ने अनेक बार कश्मीर मुद्दे का बहाना बनाकर भारत पर आक्रमण करने की कोशिश की। सन 1965 का भारत-पाक युद्ध उसकी एक कड़ी है। पाकिस्तान ने यह युद्ध इसलिए किया था कि कश्मीर उसे मिल जाए, लेकिन हो गया-उल्टा। भारतीय सेनाएं लाहौर तक जा पहुंची थीं और पाक अधिकृत कश्मीर के कई भागों को मुक्त कराकर भारत को देना पड़ा। 

यद्यपि सन 1965 के युद्ध समाप्ति के बाद कश्मीर के सवाल पर व्यापक कार्यवाही नहीं हुई, फिर भी पाकिस्तान बार-बार यह प्रश्न उठाता रहा है कि जनमत संग्रह करके कश्मीर समस्या को सुलझाया जाए। इससे कश्मीर में सांप्रदायिक ताकतें सक्रिय होती रहीं और उसके प्रभाव से देश की सांप्रदायिक ताकतों को बल प्राप्त होता था। 1977 के बाद शेख अब्दुल्ला अपना पुराना राग अलापने लगे। फलस्वरूप कश्मीर समस्या सुलझने के बजाय उलझती रही।

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