भारत में न्यायिक सुधार | भारत में न्यायिक सुधार पर निबंध |Essay on Judicial Reform in India

भारत में न्यायिक सुधार

भारत में न्यायिक सुधार (Judicial Reforms in India) अथवा भारत में त्वरित न्याय की आवश्यकता अथवा न्याय में विलंब न्याय से इंकार (Justice Delayed is Justice Denied) 

यह कैसी अन्याय व्यवस्था छलती है

रेंग-रेंग कर यहां अदालत चलती है।

बेकसूर भी उसी तराजू तुलता है

मरने के भी बाद मुकदमा चलता है।

यहां गरीब तारीखों में मर जाता है

कुछ के लिए रात अदालत खुलती है। 

आज न्यायपालिका में अथाह विश्वास रखने वाला भारत का जनमानस आहत है। जिन न्यायाधीशों को लोग भगवान का प्रतिरूप समझते थे, वे कदाचार के दोषी पाए जा रहे हैं। अदालतें, जिन्हें हम न्याय का मंदिर कहते हए नहीं थकते थे, तबाही के अड्डे बन चुके हैं। न्याय की आस में पीढ़ियां गुजर जाती हैं, पर न्याय नहीं मिलता। दीवानी के मामलों में तो स्थिति कुछ ज्यादा ही विकराल है। बाप के मरने के बाद बेटा मुकदमा लड़ता है, फिर भी न्याय मिल जाए तो गनीमत समझिए। तारीखों-ही-तारीखों में उम्र गुजर जाती है। यह स्थिति ‘न्याय में विलंब न्याय से इंकार’ (Justice Delaved in Justice Denied) की पुरानी कहावत को चरितार्थ कर रही है. जिसका अभिप्राय यह है कि समय से न्याय न मिलना, व्यवहारतः न्याय से वंचित करने जैसा है। दूसरे शब्दों में, विलंबित न्याय, उपचार विहीनता (Remedilesness) के समान है, जबकि त्वरित न्याय (Speedy Justice) न सिर्फ नैसर्गिक न्याय का मूलभूत तत्व है बल्कि समय की मांग भी है। जनसंख्या वृद्धि, अधिकारों के प्रति बढती हई जागरूकता, तीव्र आर्थिक विकास, नगरीकरण तथा सामाजिक एवं पारिवारिक विघटन के कारण संघर्ष एवं विवाद तेजी से बढ़े हैं। नतीजतन अदालतों में मुकदमों की संख्या भी बढ़ी है, क्योंकि तमाम विरोधाभासों के बावजूद देश की जनता का न्यायपालिका में अट्ट विश्वास कायम है। जनता के इस भरोसे को मजबूत बनाने के लिए न्यायपालिका को जिस गतिशीलता का परिचय देना चाहिए था, वह नहीं दे पाई। मुकदमों का अंबार बढ़ता गया और जनता न्याय के लिए बिलबिलाती रही। न्याय के मूलभूत अवयव त्वरित न्याय ने दम तोड़ दिया। इन्हीं सब विसंगतियों के कारण भारत में व्यापक पेमाने पर न्यायिक सुधारों की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है, ताकि सस्ते सुलभ एवं त्वरित न्याय की लोकतांत्रिक कसौटी पर हम खरे उतर सकें। 

वर्तमान समय में भारत में न्यायिक सुधारों की जबरदस्त दरकार है। आज स्थिति यह है कि शिथिलता, भ्रष्टाचार और सुस्ती न्यायपालिका की पहचान बनती जा रही है। मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा है और परिणामस्वरूप न्याय मिलने में अनावश्यक रूप से विलंब की समस्या विकराल होती जा रही है। न्याय में विलंब से धन और समय की बर्बादी तो बढ़ती ही है, वादकारी के हित भी प्रभावित होते हैं। न्यायिक प्रणाली में बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण भी न्यायपालिका की विश्वसनीयता घटी है। भ्रष्टाचार के आरोप सिर्फ न्यायाधीशों पर ही नहीं हैं, बल्कि न्यायालय के अधिकारियों एवं अधिवक्ताओं पर भी रिश्वतखोरी के आरोप हैं। न्यायपालिका में बिचौलियों का वर्चस्व भी बढ़ा है। 

इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह जान लेना आवश्यक होगा कि भारत में न्यायपालिका की स्थिति क्या है। भारतीय संविधान में न्यायपालिका के स्वतंत्र स्वरूप को न सिर्फ वरीयता दी गई है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के पर्याप्त उपाय भी संविधान में किए गए हैं। चंकि भारतीय संविधान में विधि के शासन (Rule of Law) की अवधारणा निहित है, अतएव इसके लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी आवश्यक है। न्यायपालिका का यह कर्तव्य है कि वह विधि के शासन की रक्षा और कानून की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करे। 

“वर्तमान समय में भारत में न्यायिक सुधारों की जबरदस्त दरकार है। आज स्थिति यह है कि शिथिलता, भ्रष्टाचार और सुस्ती न्यायपालिका की पहचान बनती जा रही हा 

वस्तुतः एक स्वतंत्र न्यायपालिका आम आदमी के अधिकारों की रक्षा करती है, विवादों का निपटारा कानून के अनुसार करती है। तथा यह सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र को किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही द्वारा प्रतिस्थापित न किया जाए। इस प्रकार, न्यायपालिका संविधान के संरक्षक की भूमिका निभाती है। न्यायपालिका को प्राप्त स्वतंत्रता के कारण ही जहां न्यायाधीश बिना भय या भेदभाव के अपना कार्य कर पाते हैं, वहीं सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। विधायिका और कार्यपालिका. न्यायपालिका के कार्यों को बाधित नहीं कर सकते। 

यह सच है कि पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा विधि के शासन के लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता आवश्यक है तथा इसको सुनिश्चित करने के पर्याप्त उपाय भी हमारे संविधान में किए गए हैं, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायपालिका को निरंकुश बनाया गया है और उसमें उत्तरदायित्व का अभाव है। न्यायपालिका, देश के संविधान, लोकतांत्रिक परंपरा और जनता के प्रति जवाबदेह है। इस जवाबदेही को और बढ़ाने तथा न्याय प्रणाली में अधिक पारदर्शिता व त्वरितता लाने के लिए ही न्यायिक सुधारों की आवश्यकता हमारे देश में महसूस की जा रही है। यह आवश्यकता इसलिए और महसूस की जा रही है, क्योंकि पिछले कुछ समय से जहां न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हुई हैं, वहीं न्यायालयों में लंबित प्रकरणों की संख्या भी बढ़ी है। 

न्याय में देरी, न्याय से इन्कार’ कहावत विलंब से मिलने वाले न्याय पर लागू होती है। इन परिस्थितियों में न्याय प्रणाली में ढांचागत सुधार एवं पारदर्शिता के लिए न्यायिक सुधार आवश्यक हो गये हैं।” 

हमारे देश में न्यायिक सुधार एवं त्वरित न्याय के लिए पहले शुरू हो चुकी हैं। इनमें से एक है न्याय प्रदान एवं कानूनी सुधार हेतु राष्ट्रीय मिशन। इस राष्ट्रीय मिशन का उद्देश्य निचली अदालतों में लंबित प्रकरणों को निपटाना है, ताकि वादकारियों को त्वरित न्याय मिल सके। यह मिशन मकदमों के लंबित रहने की अवधि को भी कम करने की दिशा में तत्पर है। इस मिशन के तहत जहां जरूरी कानूनी बदलाव किए गये, वहीं कानूनी प्रक्रिया को सहज और सरल बनाने पर ध्यान दिया गया है। आधारभत सविधाएं विकसित एवं विस्तृत की जा रही हैं तथा अधीनस्थ न्यायालयों की अवसंरचना में सुधार भी किया जा रहा है। 

देश की न्यायिक प्रणाली को और अधिक बेहतर व युक्ति संगत बनाने तथा मुकदमों की संख्या घटाने के उद्देश्य से जहां राष्ट्रीय वाद नीति की शुरुआत की जा चुकी है, वहीं न्याय प्रणाली के आधुनिकीकरण की भी शुरुआत हो चुकी है। न्यायालयों को कंप्यूटरीकृत कर काम की गति एवं पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। वादों के जल्द निस्तारण हेतु जहां फास्ट ट्रैक न्यायालयों की व्यवस्था की गई है, वहीं देश के पिछड़े एवं दूर-दराज के क्षेत्रों में न्यायिक व्यवस्था की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ लंबित वादों की संख्या में कमी लाने के उद्देश्य से सचल न्यायालयों (Mobile Courts) की भी शुरुआत की जा चुकी है। इसी क्रम में हमारे देश में न्यायिक अवसंरचना का पूरा-पूरा उपयोग करने तथा मुकदमों के बोझ में कमी लाने के उद्देश्य से सांध्यकालीन अदालतों (Evening Courts) के रूप में अनूठी पहल की जा चुकी है। उठाए जा रहे इन कदमों के अच्छे परिणाम मिलने चाहिए। ऐसा नहीं है कि सरकार न्यायिक सुधारों के लिए प्रयासरत नहीं है। सरकारी प्रयास जारी हैं, किन्तु ये उतने प्रभावी साबित नहीं हो रहे, जितने होने चाहिए। न्यायिक सुधारों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ सुझाव यहां बिन्दुवार दिए जा रहे हैं-

 न्यायालयों में अवकाश कम किए जाएं तथा आए दिन होने वाली वकीलों की हड़ताल को रोकने के उपाय सुनिश्चित किए जाएं। अदालतों में कामकाजी घंटों में इजाफा किया जाए। उन न्यायाधीशों को पुरस्कृत एवं प्रोत्साहित किया जाए, जो अधिक से अधिक मुकदमों का निपटारा कम से कम समय में करते हों। देश की अदालतों में न्यायाधीशों के खाली पदों को तो तत्काल भरा ही जाए, आबादी के अनुपात में नए पदों का सृजन भी किया जाए। विधि आयोग के अनुसार न्यायाधीशों का अनुपात 10 लाख की आबादी पर 50 का होना चाहिए, जो कि अभी 10 लाख की आबादी पर मात्र 10 जजों का है।

न्यायाधीशों की निगरानी के लिए एक तंत्र विकसित किया जाए।

लोकपाल के दायरे में न्यायपालिका को भी लाया जाए। 

अदालती प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाया जाए तथा न्याय सस्ता और सुलभ हो, इस दिशा में विशेष ध्यान दिया जाए। फर्जी मामलों को प्रथम चरण में ही रोका जाए तथा फर्जी मामले दाखिल करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए, ताकि अदालतों में फर्जी मामलों की बाढ़ को रोका जा सके।

मध्यस्थता के जरिये न्याय किया जाए। इसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम रहती है, क्योंकि दोनों पक्ष आमने-सामने होते हैं। साथ ही लंबित मुकदमों को निपटाने के लिए मध्यस्थता. लोक अदालत. समझौता, बातचीत. रेंट ए जज एवं सुलह जैसे वैकल्पिक निपटारा उपायों को वरीयता दी जाए।

कार्यवाहियों के स्थगन (Stay of Proceeding) को रोका जाए तथा अदालतों में बार-बार तारीखें देने का चलन बंद किया जाए। वादों की प्रकृति के अनुरूप इनको निपटाए जाने की एक निश्चित समयावधि तय की जाए। साथ ही वकीलों की मौखिक दलीलों का समय इस तरह से निश्चित किया जाए कि वे एक से डेढ घंटे की ही हों। अधिक समय की जिरह की अनुमति तभी दी जाए, जब मामले में विधि का कोई पेचीदा प्रश्न अंतर्विष्ट हो। समय की बचत को ध्यान में रखकर वकीलों की लिखित दलीलों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति सिर्फ वकालत के अनुभव के आधार पर न की जाए, इसके लिए परीक्षा की अनिवार्यता होनी चाहिए तथा नियुक्ति के समय पृष्ठभूमि पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जज बनाए जाने के बाद उसी उच्च न्यायालय में नियक्ति न दी जाए, जहां वह वकालत कर चुका हो। 

कानूनी पेचीदगियों को कम कर न्याय प्रक्रिया को आसान बनाया जाए। यह भी आवश्यक है कि देश में कोर्ट मैनेजमेंट प्रणाली’ अपनाते हुए लंबित मामलों की कार्यसूची के प्रबंधन में प्रबंधन पेशेवरों की सहायता ली जाए। कोर्ट प्रबंधकों की नियुक्ति कर हम गुणवत्तापूर्ण त्वरित न्याय की तरफ बढ़ सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट से मुकदमों का बोझ कम करने के लिए ‘नेशनल कोर्ट ऑफ अपील के गठन का मार्ग प्रशस्त किया जाए। इन्हें उन स्थानों पर स्थापित किया जाए, जो दिल्ली से दूर हैं।

विशेष न्यायालयों एवं न्यायाधिकरणों की संख्या बढ़ाई जाए तथा निचली अदालतों में ढांचागत सुधार किया जाए।

पुलिस तथा अन्वेषण अभिकरण (Police and Investigat ing Agency) कार्य-बोझ से दबे हुए हैं। हमारी पुलिस, अपराधों के अन्वेषण के साथ-साथ कानून व्यवस्था के दोहरे दायित्व को उठा पाने में असमर्थ है। लचर अन्वेषण तथा बिगड़ती कानून व्यवस्था न्याय-तंत्र पर दबाव बढ़ाती है। इसे देखते हुए इस व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। बेहतर होगा कि स्वतंत्र अन्वेषण अभिकरण (Independent Investingation Agency) की स्थापना की जाए।

मुकदमों की बाढ़ को रोकने का एक बेहतर प्रावधान सशर्त शुल्क (No win. No Fee) भी हो सकता है। इसके तहत मुवक्किल उन्हीं वकीलों को फीस देते हैं, जो मामले में फैसला उनके हक में कराते हैं। ऐसे में वकील वही केस हाथ में लेते हैं, 

जिनमें दम होता है तथा जीतने की गंजाइश रहती है। अमेरिका. इंग्लैंड एवं वेल्स में ऐसा प्रावधान है। अब तक यह भी देखने को मिला है कि सबसे बड़ी मुकदमेबाज सरकार है, जो कि अनावश्यक रूप से मकदमों का बोझ बढान म आगे रहती हैं। ऐसे में सरकारों का यह दायित्व बनता है कि वे अपनी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में त्वरित न्याय (Speedy Justice) समय की मांग के साथ न्यायिक सुधार का सर्वोच्च घटक बन चुका है तथा इस दिशा में विशेष प्रयासों की जरूरत है। सिर्फ न्यायपालिका को ही नहीं, अपित लोकतंत्र के सभी अंगों-उपांगों को इस दिशा में समग्र प्रयास करने होंगे। हालांकि इन प्रयासों को करते हए हमें अनावश्यक शीघ्रता से बचना भी होगा और इस बात को ध्यान में रखना होगा कि जल्दबाजी में किया गया न्याय, न्याय की हानि करता है (Justice Hurried is Burried) यानी न्याय की आत्मा को हमें हर हाल में सुरक्षित रखना होगा। यह एहतियात बड़ी शिद्दत से बरतना होगा कि शीघ्र न्याय के चक्कर में न्याय की अन्यायिक प्रणाली पैर न पसार पावे। 

न्यायिक व्यवस्था के प्रति जनास्था का घटना शुभ संकेत नहीं है। हमारे देश में पंच को परमेश्वर मानने की परंपरा रही है। ऐसे में न्यायिक सुधारों के जरिये न्याय व्यवस्था की खोई हुई गरिमा को वापस लाना ही होगा और इससे जुड़ी आदर्श स्थितियां निर्मित करती होगी। हमें यह याद रखना होगा ‘न्याय’ मात्र एक शब्द नहीं है, बल्कि यह समाज दर्शन की बुनियादी धारणा है। 

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