न्यायिक सक्रियता पर निबंध | Essay on Judicial Activism

न्यायिक सक्रियता पर निबंध

न्यायिक सक्रियता पर निबंध अथवा भारत में न्यायिक सक्रियता : अर्थ, औचित्य तथा सीमाएं अथवा न्यायिक सक्रियता और भारत का लोकतंत्र (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2004 एवं यूपी पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2016) अथवा न्यायिक सक्रियतावाद (Judicial Activism) (आईएएस मुख्य परीक्षा, 1997)

भारतीय न्याय व्यवस्था में इधर कुछ बदलाव देखने में आया है, वह निषेधात्मक के स्थान पर रचनात्मक बन गई है। न्यायिक सक्रियता अथवा न्यायिक सक्रियतावाद इसके इसी रचनात्मक पक्ष से जड़ा एक घटक है। न्यायिक व्यवस्था की इस रचनात्मकता से अभिप्राय यह है कि अब कानून की भूमिका मात्र अतीत से जुड़ी हुई रूढ़िवादी न्याय व्यवस्था नहीं है और न ही निहित स्वार्थों की रक्षा करना इसका कर्तव्य है। उसे तो गरीबों तथा असहायों को न्याय व्यवस्था में सम्मानजन नागरिक बनने में सहायता देनी चाहिए। सारतः यह कह सकते हैं कि जब आम और असहाय नागरिकों की गरिमा के संरक्षण के लिए न्यायालयों द्वारा सक्रिय भूमिका निभाई जाती है. तो यह प्रक्रिया न्यायिक सक्रियता कहलाती है। पारिभाषिक स्तर पर न्यायिक सक्रियतावाद से अभिप्राय उस प्रवृत्ति से है, जिसमें देश की न्यायपालिका (Judiciary) सामाजिक और प्रशासनिक गतिविधियों को नियमित करने में शासन के अन्य अंगों-विधानमण्डल (Leg islature) और कार्यपालिका (Executive) से बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने लगती है। 

“न्यायिक सक्रियता के संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कल तक जिस न्यायालय की भूमिका सिर्फ संविधान की पदावलियों की व्याख्या करने तथा नागरिकों के विवादों के निपटारों तक सीमित थी, उसे न्यायिक सक्रियता की ओर कदम क्यों बढ़ाना पड़ा?” 

न्यायिक सक्रियता के संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कल तक जिस न्यायालय की भूमिका सिर्फ संविधान की पदावलियों की व्याख्या करने तथा नागरिकों के विवादों के निपटारों तक सीमित थी, उसे न्यायिक सक्रियता की ओर कदम क्यों बढ़ाना पड़ा? इस प्रश्न का सीधा सा जवाब यह है कि न्यायपालिका का सक्रिय होना यह प्रदर्शित करता है कि कार्यपालिका अपने प्रशासनिक कार्यों के निर्वहन में असफल हुई है। यह कहना असंगत न होगा कि जब भारतीय शासन की प्रक्रिया में शिथिलता परिलक्षित होती है, तब जन हित में न्यायपालिका को उसे अभिप्रेरित करना पड़ता है। 

भारत में न्यायिक सक्रियता की शुरुआत आपातकाल के बाद के वर्षों से देखने को मिलती है और तब से अब तक न्यायपालिका की सक्रियता ने लोकतंत्र की नींव को मजबूती प्रदान करते हुए कार्यपालिका को कर्त्तव्यपरायण बनाने में महती भूमिका निभाई है। वस्तुतः न्यायिक सक्रियता के रूप में जनहित को संरक्षण प्रदान कर न्यायपालिका ने न्याय व्यवस्था को एक नया मोड़ दिया है। 

न्यायिक सक्रियता की कुछ महत्त्वपूर्ण विशिष्टताएं होती हैं। पहली महत्त्वपूर्ण विशिष्टता यह है कि भारतीय नागरिकों की अस्तित्वात्मक (Existential) स्थिति को ध्यान में रखते हुए जन सरोकारों के प्रति एक प्रखर न्यायिक दृष्टिकोण का परिचय दिया गया है। यह अकारण नहीं है कि आज अपंग, असहाय, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर एवं शोषित वर्ग की ओर से कोई भी व्यक्ति न्यायालय में फरियाद कर न्याय की आस कर सकता है। यह कहना असंगत न होगा कि इस रूप में विधि के शासन’ तथा ‘संविधानवाद’ (Consti tutionalism) को बल मिला है। 

न्यायिक सक्रियता की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशिष्टता यह है कि इसके जरिए संविधान के अनुच्छेद 21 को एक नई व्याख्या प्रदान की गई है। ध्यातव्य है कि संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है। इस अनुच्छेद के तहत यह प्रावधान है कि कार्यपालिका या सरकार व्यक्ति को उसके जीवन और स्वतंत्रता से वंचित कर सकती है। इसमें मनमानी की पूरी गुंजाइश को देखते हुए इस पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंकुश लगाया गया। ‘मेनका गांधी बनाम भारत संघ’ के वाद में अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और स्वतंत्रता से वंचित करने की प्रक्रिया को विवेक-सम्मत, उत्तम तथा न्यायपूर्ण होना चाहिए। न्यायिक सक्रियता की तीसरी महत्त्वपूर्ण विशिष्टता यह है कि इसने सामाजिक न्याय को पुनर्परिभाषित करते हुए भारतीय लोकतंत्र को न्याय-सम्मत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

न्यायिक सक्रियता के रूप में भारतीय लोकतंत्र में नवचेतना का प्रादुर्भाव हुआ है। इसने साधनहीन, भाग्यवादी तथा आम नागरिक की लोकतंत्र में आस्था एवं विश्वास जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कार्यपालिका की अकर्मण्यता, संवेदनहीनता तथा निरंकुशता को नियंत्रित करने एवं भारत जैसे विशाल देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को सृदृढ़ करने में न्यायिक सक्रियता ने प्रभावी योगदान दिया है। इसने भारतीय न्याय प्रणाली को जटिल तथा तकनीकी विधिक प्रक्रिया एवं पुरातन विधिक नियमों से मुक्त कराने का भी प्रयास किया है तथा लोक जीवन में पारदर्शिता एवं दायित्व बोध पर बल दिया है। जहां न्यायिक सक्रियता का बाह्य प्रकटीकरण लोकहितवाद, प्रतिनिधिक वाद तथा वर्ग कार्यवाहियों के रूप में हुआ है, वहीं इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य ‘मानवाधिकार विधिशास्त्र’ (Human Right Juris prudence) को भारतीय लोकतंत्र का एक आवश्यक अंग बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

न्यायिक सक्रियता की चर्चा करते हुए यदि जन-हित संरक्षण संबंधी कुछ एक महत्त्वपूर्ण मामलों का उल्लेख न किया जाए, तो यह चर्चा अधूरी रह जाएगी। न्यायिक सक्रियता के पहले-पहल मामलों में से एक था ‘हुसैन आरा खातून बनाम बिहार सरकार का मामला। यह मामला बिहार के जेलों में विचाराधीन कैदियों की दयनीय दशा से संबंधित था, जिस पर छपी एक खबर को आधार बनाकर एक अधिवक्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उल्लेखनीय है यह याचिका कैदियों की तरफ से नहीं थी, तथापि इस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हजारों कैदियों को मुक्त करवाया। अपने निर्णय में यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई का अधिकार जीवन तथा स्वतंत्रता के अधिकार का अनिवार्य एवं अभिन्न हिस्सा है। 

न्यायिक सक्रियता को लेकर अस्सी के दशक में ‘बंधुआ मक्ति मोर्चा बनाम भारतीय संघ’ का मामला काफी चर्चा में रहा था। इस प्रकरण में एक संस्था द्वारा पत्र के जरिए सवोच्च न्यायालय को यह सूचित किया गया था कि फरीदकोट जिले की पत्थर की खदानों में बड़ी संख्या में श्रमिक अमानवीय दशाओं में मजदूरी कर रहे हैं, जिनमें से अधिकांश बंधुआ हैं। उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने इस पत्र को रिट मानकर एक आयोग की नियुक्ति की। आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को रिपोर्ट दी कि संस्था का आरोप सत्य है। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जनहित के ऐसे मामलों का सरकार को स्वागत करना चाहिए और समुचित कदम उठाकर बंधुआ मजदूरों की स्थिति को सुधारना चाहिए। पर्यावरण संरक्षरण के क्षेत्र में भी न्यायालय कई कारगर कदम उठा चुका है। फिर चाहे वह गंगा प्रदूषण का मामला हो अथवा दिल्ली में डीजल का इस्तेमाल करने वाले वाणिज्यिक वाहनों द्वारा फैलाए जाने वाले व्यापक वायु प्रदूषण का। यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि विगत कुछ वर्षों में शीर्ष न्यायालय के समक्ष ऐसे कई मामले आए, जिनमें अदालती निर्णयों का दबाव इस सीमा तक पड़ा कि संसद को कानून बनाना पड़ा। स्मरण रहे कि शिक्षा को मूल अधिकार का दर्जा दिए जाने, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करके प्रत्याशियों के बारे में जानकारी दिए जाने को अनिवार्य बनाने तथा सूचना अधिकार कानून के निर्माण में सार्थक पहले न्यायपालिका की ओर से ही हुई थीं। 

“न्यायिक सक्रियता के रूप में न्यायपालिका की श्लाघनीय पहलों के बावजूद न्याय व्यवस्था से जुड़ा यह रचनात्मक घटक आलोचनाओं का शिकार होने से बच नहीं पाया है। न्यायिक सक्रियता के विरुद्ध सर्वाधिक कठोर प्रतिक्रिया राजनीतिक क्षेत्र से आ रही है।” 

देश के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए बेहिचक यह कहा जा सकता है कि विधायिका की अक्षमता एवं कार्यपालिका की भ्रष्टता के कारण लोकतंत्र के दो स्तंभ जर्जर अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं। इस अवस्था में यदि तीसरा स्तंभ यानी न्यायपालिका अपने बलबूते पर लोकतंत्र को खड़ा करने का सद्कार्य कर रही है, तो यह निश्चय ही प्रशंसनीय है। 

न्यायिक सक्रियता के रूप में न्यायपालिका की श्लाघनीय पहलों के बावजूद न्याय व्यवस्था से जुड़ा यह रचनात्मक घटक आलोचनाओं का शिकार होने से बच नहीं पाया है। न्यायिक सक्रियता के विरुद्ध सर्वाधिक कठोर प्रतिक्रिया राजनीतिक क्षेत्र से आ रही है। राजनीतिज्ञों के एक बड़े वर्ग का यह मानना है कि न्यायालय न्यायिक सक्रियता की वैध सीमाओं को पार करते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप न्यायिक सक्रियता, ‘न्यायिक निरंकुशता’ में परिवर्तित होती जा रही है। राजनीतिज्ञों के अनुसार बढ़ती हुई न्यायिक सक्रियता के कारण शासन के विभिन्न अंगों के मध्य शक्तियों के विभाजन का कोमल संतुलन गंभीरता से प्रभावित हो रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि न्यायिक सक्रियता ने विधायिका, कार्यपालिका के अंतर को धुंधला कर दिया है, जिससे इन तीन अंगों के बीच पारस्परिक संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो गया है। यह भी एक तर्क है कि लोकतांत्रिक शासन का आधार है कि सरकार का हर अंग एक-दूसरे की शक्तियों और क्षेत्राधिकारों का सम्मान करे। न्यायिक सक्रियता से इस लोकतांत्रिक सिद्धांत को आघात पहुंचा है। कुछ आलोचक सीधे-सीधे तो न्यायिक सक्रियता की आलोचना नहीं करते, बल्कि इसे केवल असाधारण एवं सीमित संदर्भो में ही स्वीकार्य मानते हैं। 

यहां ध्यान देने योग्य बिन्द यह है कि आलोचना न्यायिक सक्रियता की वैध सीमा को लेकर हो रही है। यह मांग नहीं की जा रही है कि न्यायिक सक्रियता को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाए। इससे यही ध्वनित होता है कि न्यायिक सक्रियता औचित्यपूर्ण तो है, किंतु इसकी एक सीमा होनी चाहिए। प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि क्या न्यायिक सक्रियता अपनी युक्ति संगत सीमा को पार | कर अतिवाद की ओर अग्रसर है? इसी से जुड़ा एक दूसरा पक्ष यह भी है कि अतिवादी न्यायिक सक्रियता न केवल संवैधानिक संकट पैदा कर सकती है, बल्कि कार्यपालिका के मनोबल को भी गिरा सकती है। ऐसे सवालों और तर्कों को उठाने वालों को यह समझना चाहिए कि जिन व्यवस्थाओं में न्यायालय को पुनर्विलोकन (Judical Review) का अधिकार है, वहां न्यायिक सक्रियता स्वतः उपस्थित रहती है। अंतर मात्र इतना है कि कहीं न्यायिक सक्रियता तकनीकी स्तर की होती है, तो कहीं यह सामाजिक सक्रियता के रूप में परिलक्षित होती है। परिवर्तन के इस दौर में न्यायिक सक्रियता का सामाजिक सक्रियता में रूपान्तरण होना स्वाभाविक है। रही बात कार्यपालिका के मनोबल के गिरने की. तो इसके लिए कार्यपालिका को अपने गिरेबान में मुंह डाल कर खुद से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह अपने प्रशासनिक कार्यों के निर्वहन में कितनी सफल रही है? यदि सफल रहती, तो संभवतः न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता ही न पड़ती। आलोचनाओं के परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता न्यायिक सक्रियता को समझने की है। न्यायिक सक्रियता, ‘न्यायिक तानाशाही’ नहीं है, यह तो वह प्रक्रिया है, जो कार्यपालिका को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाती है। 

न्यायिक सक्रियता वह प्रखर दृष्टिकोण है, जिसका आधार न्यायिक संवेदनशीलता है, जो कि एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जहां न्याय नहीं, वहां लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता। न्यायिक सक्रियता ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को सींचा है तथा सामाजिक न्याय, विधि के शासन, संविधानवाद तथा व्यापक लोकहित को सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह सक्रिय न्यायिक हस्तक्षेप स्वस्थ लोकतंत्र के लिए नितांत आवश्यक है। 

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