जयप्रकाश नारायण पर निबन्ध | Essay on Jayprakash Narayan in Hindi | लोकनायक जयप्रकाश नारायण 

Essay on Jayprakash Narayan in Hindi

जयप्रकाश नारायण पर निबन्ध | Essay on Jayprakash Narayan in Hindi

समाजवाद के मानवीय एवं लोकतंत्रीय रूप के पैरोकार जयप्रकाश नारायण ने जहां समाजवाद के अग्रणी प्रवक्ता एवं विचारक के रूप में अपनी श्रेष्ठ पहचान बनाई, वहीं एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देश की आजादी में उनका अप्रतिम योगदान रहा। वह लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी भी थे। यही कारण है कि जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की, तो उन्हें लगा कि भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है और इसे रोकने के लिए वह आगे आए तथा अपनी अगुवाई में आपातकाल विरोधी आंदोलन को सफल बनाया। इस तरह उन्होंने देश के लिए दोहरी भूमिका निभाई। पहली भूमिका देश की आजादी के लिए थी और दूसरी भूमिका आजाद भारत में लोकतंत्र की बहाली के लिए थी। उनकी ये दोनों ही भूमिकाएं अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं सराहनीय रहीं। वह सच्चे अर्थों में एक महान देश-भक्त एवं लोकनायक थे। 

भारतीय राजनीति में जेपी और लोकनायक जैसे नामों से चर्चित रहे जयप्रकाश नारायण का जन्म बिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गांव में हुआ था। विद्यार्थी जीवन की शुरुआत पटना से की। वर्ष 1922 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहां कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से उन्होंने एम. ए. की डिग्री हासिल की। वह अपनी पीएचडी वहां से पूरी न कर सके, क्योंकि मां की बीमारी के कारण उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा। विदेश में रह कर महंगी पढ़ाई के खर्च को पूरा करने के लिए उन्होंने रेस्टोरेंटों, कंपनियों एवं खेतों में काम तक किया। बिहार के मशहूर गांधीवादी ब्रजकिशोर प्रसाद की सुपुत्री प्रभावती के साथ उनका विवाह हुआ। 

वर्ष 1929 में जब जयप्रकाश नारायण अमेरिका से भारत लौटे, तो उस समय भारत में स्वाधीनता संग्राम ने गति पकड़ रखी थी। इसी समय उनका सम्पर्क महात्मा गांधी के साथ आजादी की लड़ाई लड़ रहे पं. नेहरू से हुआ। बापू और नेहरू से उन्हें प्रेरणा मिली और युवा जेपी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रियता का पता इसी से चलता है कि वर्ष 1932 में गांधी, नेहरू एवं अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद उन्होंने भारत के अलग-अलग हिस्सों में स्वाधीनता संग्राम को धार देकर अपनी नेतृत्व क्षमता को सिद्ध किया। अंततः जेपी को अंग्रेजों ने मद्रास में गिरफ्तार कर लिया और नासिक जेल भेज दिया। 

वर्ष 1939 में जयप्रकाश नारायण ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध ‘लोक आंदोलन’ का नेतृत्व किया तथा सरकार का किराया एवं राजस्व रोकने के लिए अभियान छेड़ दिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नौ माह कैद की सजा सुनाई गई। जेल जाकर भी जेपी के हौसले पस्त नहीं हुए। वह और सक्रिय हो उठे। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वह मुंबई की आर्थर जेल से फरार हो गए। आजादी के मतवाले जयप्रकाश नारायण ने नेपाल पहुंचकर आजाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षित किया। इसी बीच वर्ष 1943 में उन्हें एक बार फिर पंजाब में चलती ट्रेन से गिरफ्तार कर लिया गया। जेपी की गिरफ्तारी से महात्मा गांधी आहत हुए। लोहिया भी जेल में थे। बापू ने अंग्रेज सरकार को चेतावनी देते हुए साफ कह दिया कि लोहिया और जेपी की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता संभव नहीं है। अंग्रेज सरकार पर दबाव बना और जयप्रकाश नारायण एवं राममनोहर लोहिया को अप्रैल, 1946 में रिहा कर दिया गया। अंततः इस स्वतंत्रता सेनानी ने देश को आजाद करा कर ही दम लिया। 

देश आजाद तो हो गया, किंतु आजादी के सपने पूरे नहीं हुए। इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के कारण लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण का चरण वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा के रूप में सामने आया, तो जेपी फिर जाग उठे। इस लोकनायक के पीछे-पीछे युवकों-छात्रों का हुजूम निकल पड़ा। उन्होंने देश के युवकों को संपूर्ण क्रांति का संदेश कुछ इस प्रकार दिया— “भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना आदि ऐसी चीजें हैं, जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं, जब सम्पूर्ण व्यवस्था ही बदल दी जाए और संपूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए ‘संपूर्ण क्रांति’ आवश्यक है।” इस संपूर्ण क्रांति का आह्वान करने वाले लोकनायक को आपातकाल के दौरान जेल में यातनाएं सहनी पड़ी। किंतु उन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता को अपनी संपूर्ण क्रांति से उखाड़ फेंका।

वर्ष 1954 में जयप्रकाश नारायण संत बिनोवा भावे के सर्वोदय आंदोलन से इतना अधिक प्रभावित हुए कि न सिर्फ उन्होंने इस आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित करने की घोषणा की, बल्कि लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ने का निर्णय तक ले लिया। हालांकि देश के हालात को देखते हुए 1960 के दशक के आखिरी चरण में उन्हें राजनीति में सक्रिय होना पड़ा। उन्होंने सर्वोदय आंदोलन को नई दिशा देते हुए जहां समाज के समस्त वर्गों के समान रूप से कल्याण पर बल दिया, वहीं वर्ग सहयोग पर बल दिया। इसी दृष्टिकोण से उन्होंने भूमि कानूनों को इस तरह बदले जाने पर जोर दिया कि भूमि काश्तकार की अपनी हो जाए और उसका कोई शोषण न कर सके। कृषि व्यवस्था को निहित स्वार्थों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने जहां सहकारी कृषि का समर्थन किया, वहीं कृषि एवं उद्योग में संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से सहकारी गौण उद्योग (Subsid iary Industries) स्थापित किए जाने की बात भी कही। सर्वोदय कार्यक्रम को कार्यान्वित करने के लिए लोकनायक ने ‘दल विहीन लोकतंत्र’ की अवधारणा प्रस्तुत की, ताकि विभिन्न राजनीतिक दल अपने विचारधारात्मक मतभेदों को भुलाकर इस कार्यक्रम में सहयोग दें|

एक समाजवादी चिंतक के रूप में लोकनायक ने राजनीति के आर्थिक आधार पर खास जोर दिया। उनका यह मानना था कि जब तक मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती, उससे सांस्कृतिक सृजनात्मकता की आशा करना व्यर्थ है। यानी यदि जनसाधारण के लिए आवश्यक भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था नहीं की जाती, तो वह कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्रों में मौलिक योगदान की क्षमता कहां से लाएंगे? उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए उस समाजवाद को अपनाए जाने का सुझाव दिया, जो विस्तृत नियोजन (Comprehensive Planning) की मांग करता है। उन्होंने उत्पादन के साधनों के समाजीरण को इसकी पहली शर्त के रूप में निरूपित किया।

भारत के इस स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवी एवं समाजवादी आंदोलन के महत्त्वपूर्ण स्तंभ को वर्ष 1998 में मरणोपरांत देश के शीर्ष नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1979 में इस लोकनायक ने इस लोक को अलविदा कहा। भारतीय राजनीति के इस अमर नायक ने जिस स्वच्छ एवं त्यागमय राजनीति की हमें प्रेरणा दी तथा जिस प्रकार समाजवाद को मानवता के उद्धार से जोड़ा, उससे आज के राजनीतिज्ञों को प्रेरणा लेनी चाहिए। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

3 + fourteen =