जयशंकर प्रसाद पर निबंध | Essay on Jay Sankar Prasad in Hindi

जयशंकर प्रसाद पर निबंध

जयशंकर प्रसाद पर निबन्ध | Essay on Jay Sankar Prasad in Hindi

जयशंकर प्रसाद ने हिंदी के नाट्य साहित्य में नये युग का सूत्रपात किया। प्रसाद जी युगांतकारी नाटककार थे। उनके आगमन के साथ हिंदी नाट्य साहित्य में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। उन्होंने अपने भावपूर्ण ऐतिहासिक नाटकों में राष्ट्रीय जागृति, नवीन आदर्श एवं भारतीय इतिहास के प्रति अगाध श्रद्धा प्रस्तुत की। प्रसाद जी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। उन्होंने कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी एवं निबंध आदि विधाओं में रचना करके हिंदी साहित्य को संपन्नता प्रदान की है। वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ नाटककार थे। 

महाकवि एवं ऐतिहासिक नाटककार जयशंकर प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल पंचमी, संवत् 1889 को काशी के सुप्रतिष्ठित धनी एवं महादानी सेठ सुंघनी साहू के परिवार में हुआ था। इन्होंने घर पर ही हिंदी, संस्कृत, फारसी, बंगला, अंग्रेजी तथा उर्दू भाषा का अध्ययन किया। साथ ही वेद, पुराण, इतिहास, साहित्य और दर्शन शास्त्र का अपने स्वाध्याय से ही सम्यक ज्ञान प्राप्त किया। प्रसाद जी में काव्य सृजन के संस्कार बचपन से ही थे। उनकी पहली कविता नौ वर्ष की अल्पायु में ही प्रकाश में आ गई। विषम परिस्थितियों के कारण उनका संपन्न परिवार ऋण के बोझ से दब गया। अत: उन्हें कष्टमय जीवन व्यतीत करना पड़ा, परंतु उन्होंने हार नहीं मानी। उनका शरीर चिंताओं के कारण जर्जर हो गया। अंतत: 15 नवंबर, 1837 को काशी में जीवन लीला समाप्त हो गई। 

प्रसाद जी के समान सर्वतोन्मुखी प्रतिभा वाला साहित्यकार हिंदी में कोई दूसरा नहीं हुआ। उन्होंने काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध, संपादन आदि सभी विधाओं में कुछ न कुछ लिखा, परंतु वे मूलतः कवि और नाटककार थे। ‘प्रेम पथिका’, ‘आंसू’, ‘झरना’, ‘लहर’, ‘चित्राधार’, ‘कानन कुसुम’, ‘करुणालय’, ‘महाराणा का महत्व’ एवं ‘कामायनी’ उनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएं हैं। ‘कंकाल’ एवं ‘तितली’ प्रसाद जी के उपन्यास हैं। ‘छाया’, ‘आंधी’, ‘आकाश दीप’, ‘इंद्रजाल’ एवं ‘प्रतिध्वनि’ में उनकी कहानियां संकलित हैं। प्रसाद जी के प्रसिद्ध नाटक हैं-‘राज्यश्री’, ‘अजात शत्रु’, ‘कामना’, ‘चंद्रगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘विशाख’, ‘एक चूंट’, ‘कामायनी’, ‘जनमेजय का नागयज्ञ’, ‘स्कंदगुप्त’ आदि। उन्होंने ‘इंद्र’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया था। 

प्रसाद जी के ऐतिहासिक नाटकों में सबसे पहली रचना ‘राज्यश्री’ है। इस नाटक में हर्षकालीन भारत का चित्रण है, लेकिन ‘अजात शत्रु’ से प्रसाद जी नाटककार के रूप में प्रसिद्ध हुए। ‘स्कंदगुप्त’ और ‘चंद्रगुप्त’ प्रसाद जी के सर्वोत्कृष्ट नाटक हैं। उनके नाटकों में राष्ट्रप्रेम की भावना परिलक्षित होती है। ‘चंद्रगुप्त’ नाटक के एक गीत की निम्नवत पंक्तियां उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं –

अरुण यह मधुमय देश हमारा, 

जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में प्रसाद जी ने प्राचीन काल में विधवा विवाह का प्रमाण देकर नारी उत्थान का समर्थन किया। इनके नाटकों में नारी पात्रों की गरिमा का अंकन हुआ है। मालविका, देवसेना, अलका, मल्लिका, ध्रुवस्वामिनी आदि ऐसे ही नारी पात्र हैं। इसके अतिरिक्त इनके नाटकों में भारतीय और पाश्चात्य चिंतन का समन्वय भी दिखता है। प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य में नवीन युग की चेतना का प्रादुर्भाव किया। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर काव्य के विषय और क्षेत्र में भी मौलिक परिवर्तन किए। प्रसाद जी ने नारी के कोमल अवयवों का उत्तेजक वर्णन नहीं किया, वरन उसके आंतरिक गुणों पर अधिक बल दिया। उन्होंने अपने काव्य द्वारा नारी में श्रद्धा भाव उत्पन्न किया। इनकी प्रसिद्ध काव्य कृति ‘कामायनी’ की निम्नलिखित पंक्तियां देखिए 

नारी तुम केवल श्रद्धा हो,

विश्वास रजत नग पद तल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो, 

जीवन के सुंदर समतल में।

जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में दार्शनिकता, रहस्यवाद, प्राकृतिक सौंदर्य एवं भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई देती है। उन्होंने गद्य एवं पद्य–दोनों भावनात्मक शैली में लिखे हैं। सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, राष्ट्रीय एवं साहित्यिक सभी दृष्टि से इनके नाटक हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। 

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