पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निबंध | Essay on Jawahar Lal Nehru in Hindi

Essay on Jawahar Lal Nehru in Hindi

पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निबंध | Essay on Jawahar Lal Nehru in Hindi

पं. जवाहरलाल नेहरू न सिर्फ स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, बल्कि एक महान विद्वान, चिंतक व दार्शनिक भी थे। उनकी दृष्टि आधुनिक व वैज्ञानिक थी। इसीलिए उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता भी कहा जाता है। वह तकनीक और विज्ञान को देश की प्रगति के लिए आवश्यक मानते थे। उन्होंने गरीबी दूर करने के लिए हमें औद्योगीकरण का रास्ता दिखाया। पं. नेहरू राष्ट्रवाद के सच्चे हिमायती थे। उनमें राष्ट्रवाद कूट-कूट कर भरा था। वह रचनात्मक राष्ट्रवाद के पक्षधर थे, न कि ध्वंसात्मक अथवा अंधराष्ट्रवाद के। राष्ट्रवाद को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा था- “राष्ट्रवाद वस्तुतः अतीत की उपलब्धियां, परंपराओं और अनुभवों की सामूहिक स्मृति है। आज के युग में राष्ट्रवाद की भावना इतनी सुदृढ़ हो गई है, जितनी पहले कभी नहीं थी। जब कभी कोई संकट पैदा हुआ है, हमारा राष्ट्रवाद फिर से उभर कर सामने आया है और लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं में आनंद और शक्ति की तलाश की है। वर्तमान युग की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है—अपने खोए हुए अतीत की फिर से खोज।” पं. नेहरू राष्ट्रवाद को एक बड़ी ताकत व मजबूत आधार मानते थे। तभी तो वह कहा करते थे— “राष्ट्रवाद एक महान और जीवंत शक्ति है। अतः यदि हम अपने देश के लोगों की सहज प्रतिभा और बुनियादी परंपराओं के किसी अंश को छोड़ दें, तो हम बहुत कुछ गंवा देंगे। हम निराधार हो जाएंगे। संभवतः जब राष्ट्रवाद से जुड़े इनके इन रचनात्मक विचारों को महात्मा गांधी का संस्पर्श मिला, तो वह बापू से प्रभावित होकर देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और राष्ट्र की आजादी के लिए संघर्ष शुरू कर दिया।” 

वर्ष 1889 के 14 नवंबर को इलाहाबाद के एक पुराने मुहल्ले में पं. जवाहर लाल नेहरू का जन्म हुआ था। पिता मोतीलाल नेहरू व माता स्वरूपरानी की वह इकलौती संतान थे। उनका लालन-पालन बहुत ही संपन्नता में हुआ तथा उन्होंने विदेश में शिक्षा प्राप्त की। भारत लौटने पर गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत की स्थितियां देख वे उद्वेलित हो उठे। उनका रुझान इस कारण से राजनीति की तरफ बढ़ा। इसी बीच वर्ष 1912 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसमें उन्होंने एक प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया। वह देश को आजाद कराने को बेताब हो उठे। कांग्रेस के वर्ष 1916 में लखनऊ में संपन्न हुए अधिवेशन में वह महात्मा गांधी के संपर्क में आए और उनके अनुयायी बन गये। 

गांधीजी का सान्निध्य उन्हें विशेष रूप से प्राप्त था और बापू उन पर बहुत भरोसा करते थे। इसी बीच वह कमलाजी के साथ परिणय सूत्र में बंधे और इंदिरा गांधी के रूप में कन्या रूपी रत्न को जन्म दिया। पिता से इंदिरा गांधी को भी देशप्रेम के संस्कार मिले और उन्होंने बाल्यावस्था में ही ‘वानर सेना’ का गठन कर आजादी की लड़ाई में अपने योगदान को सुनिश्चित किया।

देश की आजादी की लड़ाई में पंडित नेहरू को न सिर्फ काफी कष्ट उठाने पड़े, बल्कि कई बार जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 1921 – 22 के असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने पहली बार जेल यात्रा की। यही वह समय था जब महात्मा गांधी से उनकी निकटता काफी बढ़ी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में उनकी पैठ बढ़नी भी शुरू हुई। वर्ष 1928 में जहां वे कांग्रेस के महामंत्री बने, वहीं वर्ष 1929 में लाहौर अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने इसके बाद कांग्रेस के अध्यक्ष पद को कई बार सुशोभित किया। 

पंडित नेहरू समाजवाद और लोकतंत्र के प्रबल पक्षधर थे और भारत में लोकतंत्र की स्थापना के लिए उन्होंने जहां 9 वर्ष जेल में बिताए, वहीं कुल नौ बार जेल यात्राएं भी की।लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रबल आस्था थी। लोकतांत्रिक अवधारणा से ही प्रेरित होकर उन्होंने भारत के लिए संविधान सभा के विचार को प्रोत्साहित किया और इस परिप्रेक्ष्य में यह कहा भी, “हमारी राजनीतिक और साम्प्रदायिक समस्याओं का एक मात्र समाधान यही संविधान सभा होगी। शर्त यह है कि वह वयस्क मताधिकार के द्वारा और जनवादी आधार पर निर्वाचित हो।” नेहरू जी शांति, अमन, सौहार्द और सहिष्णुता के अग्रदूत थे। वह जातिवाद व सम्प्रदायवाद के विरोधी थे। तभी तो उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि हम इस देश में किसी तरह की साम्प्रदायिकता को नहीं सहन करेंगे, क्योंकि हम एक स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राज्य का निर्माण कर रहे हैं, जहां प्रत्येक धर्म और विश्वास को पूरी स्वतंत्रता और बराबर सम्मान मिलेगा, जहां प्रत्येक नागरिक को समान स्वतंत्रता और समान अवसर प्राप्त होंगे। 

पंडित नेहरू छद्म लोकतंत्र के नहीं, बल्कि ऐसे वास्तविक व सच्चे लोकतंत्र के हिमायती थे, जिसमें सभी प्रकार की नागरिक स्वतंत्रताएं लोगों को मिली हुई हों। खासतौर पर वे हिंसा मुक्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तो परम आवश्यक मानते थे। पं. नेहरू कहा करते थे—“सच्चा लोकतंत्र व्यक्ति के विवेक को पूरी मान्यता देता है। यदि कोई व्यवस्था व्यक्ति को अपना निर्णय भीड के हाथों मैंप देने को विवश करती है, तो उसे ‘लोकतंत्र’ कहना, लोकतंत्र का मजाक होगा।” पं. नेहरू ने जो कहा, वह आज भारत में दिख भी रहा है। जितना स्वस्थ्य और उदार लोकतंत्र हमारे देश में है, उतना अन्यत्र कहीं नहीं। हम विश्व के सबसे बड़े सम्मानित लोकतंत्र हैं। 

भारत के स्वाधीनता आंदोलन को मंजिल-ए-मकसूद तक पहुंचाने में पंडित नेहरू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और 2 सितंबर, 1946 को अर्ल वावेल के आमंत्रण पर जिस ‘अंतरिम सरकार’ का गठन हआ, नेहरू जी को उसके प्रधानमंत्री का दायित्व सौंपा गया। इसी बीच देश आजाद तो हुआ, किंतु भारत-पाक बंटवारे के साथ। 15 अगस्त, 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और लगातार 17 वर्षों तक इस पद पर काबिज रहे। 

देश के लिए पं. नेहरू ने जो योगदान दिया, वह अविस्मरणीय है। उन्होंने देश के लिए दोहरी भूमिका निभाई। जहां स्वाधीनता संग्राम में कूदकर देश को आजाद कराने में अग्रणी भूमिका निभाई, वहीं प्रधानमंत्री के रूप में आधुनिक भारत के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। जिस समय देश आजाद हुआ, उस समय हमारे समक्ष अनेक समस्याएं थीं, जिनका समाधान पं. नेहरू ने बहुत धीरज और तन्मयता के साथ किया। उन्होंने भारत को स्वावलंबी बनाने की दिशा में भरपूर प्रयास किया और वैज्ञानिक सोच का परिचय देते हुए देशवासियों को यह पैगाम दिया कि विज्ञान ही प्रगति का रास्ता है। वह कहा करते थे— “मैंने विज्ञान के मंदिर में पूजा की है और अपने आप को विज्ञान का एक पुजारी मानता आया हूं। मौजूदा वक्त में कौन है, जो साइंस को दरगुजर कर सकता है। कदम-कदम पर हमें इसकी जरूरत पड़ती है। आज की दुनिया तो पूरी तरह से साइंस की दी बनाई हई है।” पंडित जी विज्ञान को एक अनिवार्य और निश्चित तौर पर बुनियादी अंश मानते थे और यह कहा करते थे कि अब निशित है कि विज्ञान और टेक्नालॉजी के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। आज भारत में जो वैज्ञानिक प्रगति व संचेतना देखने को मिल रही है, इसमें पंडित नेहरू के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। 

प्रधानमंत्री के रूप में पं. नेहरू ने जिस समझ और सूझ-बूझ का परिचय दिया, उसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। पंडित नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘पंचशील’ का सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीयतावाद के क्षेत्र उनकी न सिर्फ भारतीय राजनीति में, बल्कि विश्व की राजनीति में सबसे मौलिक व महत्त्वपूर्ण देन है। उनका पंचशील का सिद्धांत आदर्शात्मक न होकर व्यावहारिक था। वे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नैतिक मार्ग के अनुसरण में विश्वास रखते थे। उन्होंने शांतिपूर्ण तरीकों तथा बातचीत व सहयोग द्वारा मेल-जोल की नीति पर बल दिया। जिस समय विश्व के राष्ट्र भयंकर मनोविक्षिप्तता और व्याकुलता से पीड़ित थे, इस व्यापक कटुता के वातावरण में उन्होंने पंचशील के जिन पांच सिद्धांतों का प्रतिपादन किया वे आज भी प्रासंगिक हैं। ये पांच सिद्धांत हैं—(1) एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता तथा सर्वोच्च सत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान की भावना (2) अनाक्रमण (3) एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना (4) समानता एवं पारस्परिक लाभ तथा (5) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। पं. नेहरू के इन सिद्धांतों के प्रति विश्व के अधिकांश राष्ट्रों आस्था व्यक्त की व इन्हें सराहा। 

नेहरू जी एक समझदार राजनेता थे और महान शांतिवादी थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत में जिस विदेश नीति की नींव डाली, उसे गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) की नीति अथवा तटस्थता की नीति कहते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का विश्व खेमों में बंट गया था। यह एक तरह से शीतयुद्ध (Cold War) का समय था। नेहरू जी ऐसी खेमेबाजी के खिलाफ थे और इसके जवाब में उन्होंने जो रास्ता चुना, वह था-दोनों खेमों से अपने को अलग रखना। यानी विदेश संबंधी मामलों में भी अपनी स्वतंत्रता को बरकरार रहना। इसी को गुट निरपेक्षता (Non Alignment) के नाम से जाना गया, जो पंचशील की दार्शनिक अवधारणा का एक व्यावहारिक पहलू भी है। 

प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू जी ने भारत की अर्थव्यवस्था को उन्नत बनाने के भरपूर प्रयास किए। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की संतुलित अभिवृद्धि तथा दिनों-दिन विकसित होते उसके प्रभाव क्षेत्र को नजरंदाज कर मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीतियों का परिपालन किया, जहां निजी उद्यमों के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण क्षेत्र खाली था। उनका लक्ष्य कुशल उत्पादन तकनीक को विकसित कर अधिकतम उत्पादन स्तर प्राप्त करने का था, जिससे न्याय एवं अवसर की समानता प्राप्त होती।

पंडित नेहरू एक उच्चकोटि के राजनेता ही नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील रचनाकार भी थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा (Au tobiography) तो लिखी ही, विश्व इतिहास की झलक (Glimpses of World History) तथा भारत की खोज (Discovery of India) जैसी महत्त्वपूर्ण कृतियों की भी रचना की। उनके पत्र और भाषणों से भी उनके उच्चकोटि के राजनीतिक दर्शन का पता चलता है। आधुनिक भारत के इस निर्माता का देहावसान 27 मई, 1964 को दिल्ली में हुआ। पंडित नेहरू जैसे राजमर्मज्ञ ने राष्ट्र को आजाद कराने तथा राष्ट्र के निर्माण में जो अग्रणी योगदान दिया उसके प्रति हम हमेशा कृतज्ञ रहेंगे। 

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