इंटरनेट पर निबंध | इंटरनेट : खूबियां और खामियां अथवा वर्तमान परिवेश में इंटरनेट का महत्त्व

इंटरनेट : खूबियां और खामियां अथवा वर्तमान परिवेश में इंटरनेट का महत्त्व (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2004) अथवा इंटरनेट और वर्तमान समाज 

इसमें कोई दो राय नहीं कि इंटरनेट विज्ञान की वह अद्भुत देन है, जिसने दुनिया को बदल कर रख दिया है। जहां इसके सामने सीमाएं सिकुड़ी हैं, वहीं इसके माध्यम से ज्ञान और अभिव्यक्ति का फलक विस्तृत हुआ है। सूचनाओं के आदान-प्रदान में त्वरितता भी आई है, तो जीवन के विविध क्षेत्रों में सुविधाओं और सहूलियतों में भी इजाफा हुआ है। इतना ही नहीं, अब यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने का एक सशक्त माध्यम भी बन चुका है। – वर्तमान परिवेश में इंटरनेट का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया है कि यह वर्तमान समाज का अभिन्न हिस्सा बन गया है तथा इसके अभाव में आधुनिक जीवन अपूर्ण है। 

प्रो. जे. सी. लिक्लाइडर को इंटरनेट का जनक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही कंप्यूटर की एक विश्वव्यापी अंतर्संबंधी श्रृंखला की कल्पना की थी, जिसके जरिए आंकड़ों और कार्यक्रमों को तत्काल प्राप्त किया जा सके। इंटरनेट का प्रारंभ 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा ‘एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी नेट’ के विकास के लिए किया गया। 

वस्तुतः इंटरनेट (Internet), इंटरनेशनल नेटवर्किंग (Inter national Networking) का संक्षिप्ताक्षर है। यह दुनियाभर में फैले हुए छोटे-बड़े कंप्यूटरों का विशाल और विश्वव्यापी जाल (Global Network) है, जो विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा समान नियमों का अनुपालन कर एक-दूसरे से सम्पर्क स्थापित करते हैं तथा सूचनाओं का आदान-प्रदान संभव बनाते हैं। यह नेटवर्कों का नेटवर्क है। यह संसार का सबसे बड़ा नेटवर्क है, जो दुनियाभर में फैले व्यक्तिगत, सार्वजनिक, शैक्षिक, व्यापारिक तथा सरकारी नेटवर्कों के आपस में जुड़े होने से बनता है। कि प्रो. जे. सी. लिक्लाइडर को इंटरनेट का जनक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही कंप्यूटर की एक विश्वव्यापी अंतर्संबंधी श्रृंखला की कल्पना की थी, जिसके जरिए आंकड़ों और कार्यक्रमों को तत्काल प्राप्त किया जा सके। इंटरनेट का प्रारंभ 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा ‘एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी नेट’ के विकास के लिए किया गया। अगले 20 वर्षों तक इंटरनेट का प्रयोग रक्षा और अनुसंधान तथा शिक्षा संस्थाओं में ही होता रहा। वर्ष 1989 में इंटरनेट को आम जनता के लिए खोल दिए जाने से इसका उपयोग अन्य प्रयोजनों के लिए किया जाने लगा तथा इसके क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई। वर्ष 1990 में टिम बर्नर ली द्वारा “वर्ल्ड वाइड वेब’ के आविष्कार ने इंटरनेट को नये आयाम प्रदान किए। वर्तमान में इंटरनेट पर जो प्रमुख सुविधाएं उपलब्ध हैं, वे हैं-वर्ल्ड वाइड वेब, इलेक्ट्रानिक मेल, सोशल नेटवर्किंग साइट, वायस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल, इंटरनेट प्रोटोकॉल टीवी, ई-कामर्स, चैटिंग, वीडियो कान्फ्रेंसिंग तथा आनलाइन शॉपिंग आदि। 

यकीनन तमाम सुविधाओं से युक्त इंटरनेट को हम खूबियों का खजाना कह सकते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने इसकी उपादेयता को और बढ़ाया है। इन्होंने दुनिया को दीवाना बनाया है। चूंकि सोशल नेटवर्किंग ‘रियल टाइम एलोकेशन बेस्ड’ तथा ‘लाइव फीड’ पर आधारित है, अतः इसमें सजीवता भी है। पूरी जीवन्तता के साथ सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अभिव्यक्ति एवं विचारों का आदान प्रदान अनूठा आनंद प्रदान करता है। 

इंटरनेट की जो सबसे बड़ी खूबी है, वह यह है कि यह आम और खास दोनों की पहुंच में है। जहां आम इंसान इंटरनेट का भरपूर इस्तेमाल कर लाभान्वित हो रहा है, वहीं खास लोग और मशहर हस्तियां इसके माध्यम से कभी अपनी खुशियां, तो कभी अपने दर्दोगम बयां करते हैं। जीवन से जुड़े लगभग हर क्षेत्र में इंटरनेट हमारे साथ कदमताल करता नजर आ रहा है।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने सोशल मीडिया को नये आयाम दिए हैं। यही कारण है कि इंटरनेट की इस महत्त्वपूर्ण सौगात सोशल मीडिया के प्रति आकर्षण बढ़ा है। व्यापार की दुनिया ने भी बाहे फैलाकर इसका स्वागत किया है, क्योंकि विज्ञापन के परंपरागत माध्यमों के मुकाबले सोशल मीडिया कहीं अधिक प्रभावी साबित हो रहा है। एक शोध के दौरान यह बात सामने आई कि सोशल मीडिया के तमाम तरह के कारोबारी फायदे हैं। एक तरफ जहां इससे बिक्री में बढ़ोत्तरी होती है, तो दूसरी तरफ इसके माध्यम से प्रतिस्पर्धी कंपनियों की खूबियों-खामियों का भी पता लगाया जाता है। अपने प्रोडक्ट्स के बारे में जहां लोगों का रुझान पता चलता है, वहीं बाजार की मानसिकता का भी पता चलता है। 

बड़ी कंपनियों के लिए ही नहीं, सोशल मीडिया लघु और | मध्यम श्रेणी के उद्योगों के लिए भी अत्यंत लाभप्रद साबित हो रहा है। यह प्रचार के साथ मुनाफे का भी बेहतर माध्यम साबित हो रहा है। कंपनी की हर गतिविधि को आनलाइन करने से उस पर फौरन प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, जो कि नीति निर्धारण में सहायक बनती हैं। प्रोडक्ट की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए क्या करना है या इसकी कितनी जरूरत है, यह सब भी नेट से मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से निर्धारित करने में आसानी रहती है। सिर्फ कारोबार, शिक्षा, चिकित्सा, अभिव्यक्ति या जनजीवन से जुड़े काम-काज को निपटाने में ही इंटरनेट की खूबियां कारगर नहीं साबित हो रही हैं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील मुद्दों पर भी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। यानी इंटरनेट आम आदमी के लिए एक कारगर एवं मददगार उपकरण का काम कर रहा है। 

‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत सरकार ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ (Internet of Things : 10T) के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रही है, जो इंटरनेट से जुड़े रहकर एक-दूसरे से संवाद (Communication) स्थापित करते हैं। तथा डाटा भेजते (send) हैं। यह एक ऐसी नेटवर्किंग है, जिसमें उपयोग की सभी चीजें ( माइक्रोवेव से लेकर घड़ी तक) इंटरनेट से जुड़ी रहती हैं। 

भारत में न सिर्फ इंटरनेट ने क्रांति ला दी है, बल्कि इसके प्रोत्साहन की पहले भी बढ़-चढ़ कर हो रही हैं। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत सरकार ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ (Internet of Things : _IOT) के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रही है, जो इंटरनेट से जुड़े रहकर एक-दूसरे से संवाद (Communication) स्थापित करते हैं। तथा डाटा भेजते (send) हैं। यह एक ऐसी नेटवर्किंग है, जिसमें उपयोग की सभी चीजें (माइक्रोवेव से लेकर घड़ी तक) इंटरनेट से जुड़ी रहती हैं। यदि आप ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ के दायरे में हैं, तो आपका डिवाइस आपके घर और किचेन में रखे अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को कामंड देता है। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 तक 15 अरब डॉलर का ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ (IOT) उद्योग खड़ा करने का लक्ष्य रखा गया है। भारत सरकार ने ‘डिजिटल इंडिया’ पहल के रूप में ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ तकनीक से जुड़े स्टॉर्टअप और खोजों को बढ़ावा देने के लिए देश में कई ‘उत्कृष्टता के केंद्र’ (Centres of Excellence) स्थापित किए हैं। एक आंकड़ा यह भी है कि वर्ष 2022 तक देश में 25 से 30 अरब आईओटी उपकरण उपलब्ध होंगे, जिनका अनुमानित बाजार 3.7 अरब डॉलर होगा। 

भारत में इंटरनेट आधारित तकनीकें विविध क्षेत्रों में मददगार सिद्ध हो रही हैं। ऐसी ही एक अभिनव तकनीक है ‘जियो-फ्रेंसिंग’ (Geo-Fencing), जिसकी मदद से दूरी आधारित टोल प्रणाली विकसित की जा रही है। इसका लाभ इस रूप में सामने आएगा कि राजमार्गों पर जो जितनी दूरी तय करेगा, उससे उतना ही टोल टैक्स वसूला जाएगा। ‘जियो फेंसिंग’ वह तकनीक है, जिसमें वर्चुअल भौगोलिक सीमा की निगरानी के लिए जीपीएस (Global Positiioning System : GPS) या आरएफआईडी (Radio Frequency Identification : RFID) प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक की मदद से सॉफ्टवेयर यह बताने में सक्षम होता है कि वाहन ने कब संबंधित क्षेत्र में प्रवेश किया और कब उस क्षेत्र से बाहर निकला। ‘जियो फेंसिंग तकनीक राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा सुगम बनाने के सरकार के फास्ट टैग (FAST Tag) कदम के अनुरूप है। इन अभिनव तकनीकों ने इंटरनेट की खूबियों को बढ़ाया है। 

एक तरफ जहां इंटरनेट की खूबियों ने आम आदमी को इसका दीवाना बनाया है, वहीं इसकी खामियों ने नई-नई चुनौतियां भी पेश की हैं। इसका ईजाद तो मानव जीवन को सजाने-संवारने के उद्देश्य से किया गया था, मगर इसके नकारात्मक परिणामों ने हमें चिन्ता में डाल दिया है। अब इंटरनेट पर अपराध का भी एक समृद्ध संसार फल-फूल रहा है, जिस पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। इंटरनेट की इस आपराधिक दुनिया के मुख्य अवयव हैं-सूचना की चोरी, यौन अपराध, अश्लीलता, हैकिंग, वायरस भेजना, धमकाना, पहचान चुराना, ब्लैक मेलिंग, धोखाधड़ी एवं ट्रोलिंग (जज्बाती बनाना और प्रताड़ना) आदि। 

आजकल आनलाइन अपराधों की बाढ़ सी आ गई है। जुए से लेकर जिस्मफरोशी तक के धंधे नेट के जरिये संचालित किए जा रहे हैं। अपराधियों का एक नया वर्ग सामने आया है, जो पढ़ा-लिखा है और नेट के माध्यम से आपराधिक गतिविधियों में लिप्त है। इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के साथ इससे जुड़े खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। जहां इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील साइटें सांस्कृतिक, वैचारिक एवं मानसिक प्रदूषण को हद दर्जे तक बढ़ा रही हैं, वहीं इसके जरिये आतंकी हरकतों को भी बढ़-चढ़कर अंजाम दिया जा रहा है। गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान के लिए आतंकवादी संगठन इसका बढ़ चढ़कर इस्तेमाल कर रहे हैं। 

चूंकि इंटरनेट पर पहचान छिपाने की सुविधा है, अतः यह बात अपराधियों के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हो रही है। साइबर अपराधों के शिकार लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। कभी ‘वर्ल्डवाइड’ के सह आविष्कारक रॉबर्ट कैलिनाड ने कहा था कि एक समय था जब इंटरनेट का उपयोग करने वाले व्यक्ति सभ्य और सुसंस्कृत होते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह एक दुर्भाग्य ही होगा यदि ये विपरीत शक्तियां इंटरनेट को निष्क्रिय बनाने में सफल हो जाती हैं। इसलिए सबसे जरूरी है कि वेब को सुरक्षा प्रदान की जाए।

यकीनन इंटरनेट की उपयोगिता को बढ़ाने तथा इसे खामियों से मुक्त करने के लिए अब यह जरूरी हो चला है कि हम इंटरनेट को अपराधियों का अड्डा बनने से रोकें। इसके लिए जहां कुछ एहतियातों की जरूरत है, वहीं सख्त कानूनों की भी दरकार है। चूंकि इंटरनेट का विस्तार विश्व व्यापक है, अतः सुरक्षा की दृष्टि से विश्व व्यापक पहल की भी जरूरत है। 

नेट के प्रयोग में हमें अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए तथा पूरी जांच-परख के बाद ही किसी को सोशल नेटवर्क में शामिल करना चाहिए। हमें वह जागृति भी लानी होगी, जिससे इसके आपराधिक इस्तेमाल न करने की सीख लोगों को मिले। इंटरनेट के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए जहां हमें सुरक्षा की आधुनिक तकनीकें विकसित करनी होंगी, वहीं कानूनी जकड़बंदी को भी बढ़ाना होगा। 

बढ़ते साइबर अपराध सूचना क्रांति पर बदनुमा धब्बे बनकर उभरे हैं। इस तरफ सर्वप्रथम अमेरिका ने ध्यान दिया था। साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए अमेरिका में वर्ष 1986 में कानून बनाया गया था। इस कानून के तहत दो प्रकार के अपराधों की रोकथाम के लिए अधिनियम बनाए गए थे। पहला अधिनियम था कंप्यूटर फ्रॉड और एब्यूज ऐक्ट तथा दूसरा था- इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन प्राइवेसी ऐक्ट। कंप्यूटर फ्रॉड और एब्यूज ऐक्ट के तहत किसी को आर्थिक क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से नेट के इस्तेमाल को गैरकानूनी माना गया। साथ ही सूचनाओं की चोरी, कंप्यूटर तंत्र को क्षतिग्रस्त करना तथा पासवर्ड की चोरी आदि को अपराध माना गया। इलेक्ट्रानिक कम्युनिकेशन प्राइवेसी ऐक्ट किसी भी प्रकार के अनचाहे इलेक्ट्रानिक संचार, चाहे वह टेलीफोन या मोबाइल फोन. वायस मेल हो या ईमेल के जरिये हो, से सुरक्षा प्रदान करता है। 

भारत भी साइबर अपराधों की रोकथाम को लेकर सजग है। वर्ष 2003 में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए नौ एशियाई देशों से समझौता किया था। वर्ष 2000 में हमारे यहां साइबर अपराधों की रोकथाम तथा आईटी सेक्टर के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने के उद्देश्य से ‘आई-टी रेगुलेशन ऐक्ट 2000’ नामक विशेष कानून अस्तित्व में आया। यह कानून न तो बहुत प्रभावी ही है और न ही सख्त। अपराध सिद्ध करना मुश्किल हो जाता है। साइबर अपराधों पर कारगर अंकुश लगाने के लिए हमें कानून का लचीलापन दूर करना होगा। आवश्यकता एक सख्त, व्यावहारिक एवं प्रभावी कानून की है, ताकि दोषी बच न पाएं। हमारे देश में साइबर थानों की पर्याप्त संख्या नहीं है। दक्ष लोगों की भी कमी है। इसके अलावा जनता में भी जागरूकता और जानकारी का अभाव है। तमाम लोग तो यह तक नहीं जानते कि ऐसे अपराधों के विरुद्ध शिकायत कहां और कैसे दर्ज कराई जाए। 

इंटरनेट को विज्ञान की एक सुंदर और बहुउपयोगी सौगात के रूप में स्थापित करने के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि हम इसकी खूबियों को तो विस्तार दें तथा खामियों को मिटाकर इस निरापद बनाएं, ताकि यह निरापद स्वरूप में सिर्फ और सिर्फ हम लाभान्वित करे। सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा अत्यंत गंभीर है तथा इससे उबरने के लिए वैश्विक पहल नितांत आवश्यक है। 

इंटरनेट की खामियों को मिटाने अथवा उन्हें नियंत्रित रखने के लिए विश्व मंच से पहल जरूरी है। आवश्यकता एक ऐसे सख्त एवं सर्वमान्य अंतर्राष्ट्रीय कानून की है, जो नेट की खामियों को दूर करने में कारगर साबित हो। जल्द से जल्द हमें एक ऐसा सुरक्षा कवच तो विकसित ही करना होगा, जिसके भीतर से इंटरनेट अपनी खूबियों से विश्व को सजाता-संवारता रहे और लोगों को नजदीक लाता रहे। 

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