भारत के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध पर निबंध |Essay on International Relations of India

Essay on International Relations of India

भारत के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध पर निबंध-Essay on International Relations of India

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की दृष्टि से वर्तमान सदी परिवर्तन की सदी कही जा सकती है. इस सन्दर्भ में विगत सदी जहाँ विचारधारा, शक्ति सन्तुलन, सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था, उपनिवेशवाद आदि सिद्धान्तों की सदी थी वहीं वर्तमान सदी में वैश्वीकरण, मुक्त पूँजी, मुक्त अर्थव्यवस्था, आर्थिक विकास आदि सिद्धान्तों का बोलबाला है, आज सभी राष्ट्र न सिर्फ इन सिद्धान्तों के आधार पर अपनी नीतियों को निर्धारित करते हैं वरन् आज नित नए आर्थिक सहकारों द्वारा “वसुधैव कुटुम्बकम” की धारणा भी चरितार्थ होती दिखती है. 

किसी भी देश की विदेश नीति उसकी ऐतिहासिक परम्पराओं, दार्शनिक विरासतों, सांस्कृतिक विशिष्टताओं एवं भौगोलिक स्थिति से निर्धारित होती है. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त भारत ने जो नीति अपनाई, वह उसके अतीत के आदर्शों से निर्धारित हुई. शान्ति, सहयोग और मैत्री के लक्ष्यों को समर्पित यह नीति गुटनिरपेक्षता, पंचशील और शान्तिपूर्ण-सहअस्तित्व आदि सिद्धान्तों पर आधृत थी. यद्यपि समय-समय पर भारतीय नीति के इन सिद्धान्तों पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता रहा तथापि इन सिद्धान्तों की सफलता अब तक निर्विवाद रूप से सिद्ध हुई है. 

अपनी स्वतन्त्रता के पश्चात् से ही भारत ने उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद का विरोध तथा अपने पड़ोसियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध निर्माण की घोषणा की परन्तु शीतयुद्ध के प्रारम्भ, द्विध्रुवीय व्यवस्था के उद्भव व भारत से टूटकर अलग हुए पाकिस्तान द्वारा पूँजीवादी गुट के समर्थन ने भारत के समक्ष नवीन चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी. तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने इन परिस्थितियों में अभूतपूर्व सूझबूझ प्रदर्शित करते हुए ‘गुटनिरपेक्षता’ की नवीन नीति प्रतिपादित की. आज यद्यपि शीतयुद्ध का अवसान हो चुका है, जर्मनी के एकीकरण, सोवियत संघ के विघटन तथा विचारधाराओं के संघर्ष के अन्त की घोषणा के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का एक अध्याय समाप्त हो चुका है तथापि गुटनिरपेक्षता, पंचशील, शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व एवं मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध की नीति अब भी भारतीय नीति का मूलाधार बनी हुई है और इसने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में भारतीय स्थिति को सुदृढ़ किया है. संक्षेप में, द्वितीय विश्वयुद्धोत्तरकालीन विश्व व्यवस्था में भारत के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को निम्न प्रकार से विश्लेषित किया जा सकता है 

भारत-अमरीका सम्बन्ध 

1947 में अपनी स्वतन्त्रता के बाद से ही भारत अमरीकी मैत्री का आकांक्षी रहा है. यद्यपि दोनों देशों की आन्तरिक राजनीतिक संरचना में अत्यधिक समानता है, दोनों देशों की उदारवादी लोकतान्त्रिक मूल्यों में गहरी आस्था है, तो भी दोनों देशों की शीतयुद्धकालीन मैत्री का इतिहास ‘मित्रता की अभूतपूर्व इच्छा’ और फिर ‘तनावों से ग्रस्त मित्रता का इतिहास’ है. भारत-अमरीका के वास्तविक सम्बन्धों में द्विपक्षीय सहकार का युग शीत-युद्ध की समाप्ति व सोवियत संघ के विघटन के उपरान्त प्रारम्भ हुआ जब भारत के बदले बदलते विश्व की आवश्यकता के अनुरूप अपनी नीतियों में तेजी से परिवर्तन किया. इसी प्रकार नई विश्व व्यवस्था के आविर्भाव के उपरान्त संयुक्त राज्य प्रशासन ने पाक व चीन की तुलना में भारत के महत्व को पहचाना व उसे बराबर महत्व देना शुरू किया. खाड़ी संकट (1990) व प्रथम खाड़ी युद्ध (1991) के बाद भारत ने अमरीकी पक्ष लेते हुए इराक को आक्रमणकारी माना और उससे कुवैत छोड़ने का आह्वान किया जिससे अमरीकी प्रशासन अत्यधिक प्रभावित हुआ. इस सन्दर्भ में भारत की समाजवादी अर्थव्यवस्था को बाजार अर्थव्यवस्था में बदलने के प्रयत्न, भारत द्वारा इजराइल को मान्यता, भारत-अमरीका नौसैनिक साझे अभ्यास आदि सकारात्मक तथ्य रहे. यद्यपि 1998 में भारत द्वारा पोखरन में किए गए परमाणु विस्फोटों ने दोनों देशों में थोड़ा मनोमालिन्य उत्पन्न किया तथापि 9/11 की घटना के बाद सम्बन्धों में पुनः सुधार हुआ. 18 जुलाई, 2005 को सम्पन्न परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते ने दोनों राष्ट्रों के सम्बन्धों को एक नया आयाम प्रदान किया. इस समझौते ने भारतीय परमाणु नीति को एक वैधता भी प्रदान की. 

आज संयुक्त राज्य भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है. पिछले काफी समय से भारत-अमरीकी व्यापार का सन्तुलन भारत के पक्ष में होने, भारत के प्रशिक्षित सॉफ्टवेयर उद्यमी व सेवाप्रदाताओं की अमरीकी बाजार में जबरदस्त माँग तथा अमरीकी कम्पनियों के लिए 60 करोड़ आबादी वाले मध्यमवर्ग के विशाल भारतीय बाजार की उपस्थिति आदि कारणों ने भारत अमरीका सहयोग के नए द्वारों को खोला है. संक्षेप में, यद्यपि भारत-अमरीका सम्बन्ध आज अपनी चरम सीमा पर है तथापि इन्हें और विस्तृत किए जाने की आवश्यकता 

भारत-यूरोप सम्बन्ध 

भारत और यूरोपीय संघ जिसकी स्थापना यूरोपीय समुदाय के रूप में 5 मई, 1952 को हुई, के सम्बन्धों की शुरूआत 1960 के दशक के पूर्वार्द्ध में हुई. दोनों समूहों को पास लाने में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के उदार लोकतान्त्रिक चरित्र, स्वतन्त्र-निष्पक्ष न्यायालय और प्रेस, कश्मीर समस्या पर यूरोपीय दृष्टिकोण, आंग्ल भाषा विशेषज्ञों की भारत में बढ़ती जनसंख्या, विकसित होती भारतीय अर्थव्यवस्था, उच्च शिक्षित तकनीकी पेशेवरों की उपस्थिति आदि कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आज भारत में वास्तविक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का सबसे बड़ा स्रोत यूरोपीय संघ है. एक इकाई के रूप में यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भी है. 

वर्ष 2004 में भारत के निर्यात में ई. यू. का हिस्सा 21-20% तथा आयात में 15.9% का योगदान रहा. वर्ष 2004-05 में भारत-ई.यू.का द्विपक्षीय व्यापार 30-35 बिलियन था जबकि 2005-06 की प्रारम्भिक छमाही में दोनों के आपसी व्यापार में 28% वृद्धि हुई. आज ई.यू. भारत के गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जनसंचार आदि क्षेत्रों में 65 मिलियन डॉलर की लागत वाली लगभग 118 परियोजनाओं में काम कर रहा है. 

आज दोनों समूह मुक्त व्यापार समझौते की ओर अग्रसर हैं. आतंकवाद, गरीबी, नशीली दवाओं का व्यापार, परमाणु ऊर्जा, आन्तरिक सुरक्षा आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर दोनों समूह और पास आ सकते हैं. वस्तुतः आपसी सहयोग व सामन्जस्य से ही दोनों अपने भविष्य को सुखी व निरापद बना सकेंगे.

भारत और अफ्रीका सम्बन्ध 

एक गरीब और अल्पविकसित क्षेत्र होते हुए भी अफ्रीका महाद्वीप भारत के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है. भारत ने उपनिवेशवाद व रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष में सदैव अफ्रीका को पूरा सहयोग दिया. ध्यातव्य है कि भारत द. अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध आवाज उठाने वाला पहला देश था. आज दोनों समूह गुटनिरपेक्षता, गैर-रंगभेद और गैर-उपनिवेशवाद में विश्वास रखते हैं जिससे दोनों को करीब आने में मदद मिली है. 

अपनी स्वतन्त्रता से ही भारत ने अफ्रीकी क्षेत्र में गहरी दिलचस्पी लेना प्रारम्भ कर दिया. 1960 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में उपनिवेशों का अन्त करने सम्बन्धी एक प्रस्ताव रखा जिसे ध्वनिमत से स्वीकारा गया. भारत वस्तुतः इस बात को स्वीकारता है कि एक मजबूत, विकसित और स्थिर अफ्रीकी समुदाय भारतीय हितों के अनुकूल है. इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर भारत ने कोलम्बो प्लान, विशेष अफ्रीकी राष्ट्रकुल सहायता योजना, भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम के अन्तर्गत अनेक अफ्रीकी राष्ट्रों को सहायता दी. भारत ने विदेशी निवेश, संयुक्त उद्यमों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण के द्वारा तकनीकी के स्थानान्तरण के साथ ही मॉरिशस, मोजाम्बिक, जाम्बिया, युगांडा, सूडान, तंजानिया, नाइजीरिया, लीबिया, अल्जीरिया आदि देशों को अनेक आर्थिक सहायता भी दी. हाल ही में भारत व दक्षिण अफ्रीकी कस्टम यूनियन (SAKU) ने वरीयता व्यापार समझौता हेतु एक फ्रेमवर्क एग्रीमेन्ट पर हस्ताक्षर भी किए. यद्यपि बीच-बीच में केन्या, युगाण्डा और तंजानिया आदि देशों की कुछ नीतियों से दोनों के सम्बन्धों में कुछ गत्यावरोध खड़े हुए पर कुल मिलाकर दोनों समूह आज नित नए सहकारों द्वारा अपने सम्बन्धों को नई ऊँचाइयों पर ले जाने में सफल रहे हैं. 

भारत-पश्चिम एशिया सम्बन्ध 

एशिया महाद्वीप का वह भाग जिसमें मिम्न से लेकर अरब राज्य, ईरान, इराक तक का भू-भाग फैला है, पश्चिम एशिया या मध्यपूर्व क्षेत्र कहलाता है. अपने पेट्रोलियम आदि संसाधनों के कारण यह क्षेत्र विश्व राजनीति में प्रमुख स्थान रखता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही यह भू-भाग विभिन्न संघर्षों, युद्धों का स्थल बन गया. शीतयुद्ध के प्रभाव, महाशक्तियों की प्रतिद्वन्द्विता, अरब राष्ट्रवाद का उद्भव आदि इस क्षेत्र को अशान्त बनाने के उत्तरदायी कारक बने. इन विषम परिस्थितियों में भी भारत ने सदैव अपने राष्ट्रहितों के अनुकूल कदम उठाए. भारत ने जहाँ एक ओर अरब-इजराइल युद्धों में सदैव अरब राज्यों का समर्थन किया वहीं शीत युद्ध के अवसानोपरान्त उसने इजराइल से भी कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किए. भारत ने इराक ईरान युद्ध तथा खाड़ी युद्ध-I एवं II को भी समाप्त करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई. हाल ही में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भारत द्वारा यूरोपीय देशों के प्रस्ताव के समर्थन ने इस क्षेत्र में भारत की नई भूमिका को रेखांकित किया है. 

भारत और उसके पड़ोसी 

भारत जो स्वयं दक्षिण एशियाई क्षेत्र का एक भाग है, अपनी स्वतन्त्रता के उपरान्त से ही इस क्षेत्र के देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध निर्माण का समर्थक है, परन्तु इस या उस कारण से उसे अभी अपने पड़ोसियों के साथ (विशेषतः पाकिस्तान) अपेक्षित सफलता नहीं मिली है. अपनी स्वतन्त्रता के उपरान्त ही भारत अपने पड़ोसियों से विभिन्न प्रकार के सीमा विवादों में उलझ गया जिसकी चरम परिणति 1947-48, 1965, 1971 के भारत-पाक ‘युद्धों, 1962 के भारत-चीन ‘युद्ध’ और 1999 के भारत-पाक कारगिल संघर्ष में हुई. इन अनापेक्षित परिणामों के बावजूद भी भारत अपने पड़ोसियों से शान्तिपूर्ण सम्बन्धों का समर्थक है, 

अप्रैल 2005 में चीनी प्रधानमंत्री वान जियावो की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अतीत के पूर्वाग्रहों से बचते हुए आगामी भविष्य की नवकल्पनाएँ प्रस्तुत की. चीनी प्रधानमंत्री ने न सिर्फ सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग स्वीकारा वरन् सीमा विवाद के शान्तिपूर्ण समाधान के प्रति अपनी वचनबद्धता भी दोहराई. चीन ने यू. एन. सुरक्षा परिषद् में भारतीय सदस्यता के दावे का समर्थन भी किया. दोनों देशों ने अपनी मित्रता को नया आयाम देते हुए 6 जुलाई, 2006 को सीमा व्यापार हेतु नाथूला दर्रे को खोल दिया. संक्षेप में, दोनों देश अतीत के पूर्वाग्रहों से बचते हुए अपने सम्बन्धों को नए ढंग से रेखांकित करने में प्रयासरत हैं. इसी क्रम में, भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों में, कश्मीर का मुद्दा हावी होने के बावजूद, सुधार के पर्याप्त लक्षण प्रदर्शित हुए हैं. हाल ही में, पाकिस्तान विदेश मंत्री शौकत अजीज की ‘सकारात्मक’ भारत यात्रा के एक दिन पूर्व समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोटों से स्पष्ट हुआ कि अब ‘आतंकवाद’ अकेले भारत की समस्या नहीं है वरन् भारत व पाकिस्तान दोनों को मिलकर इससे लड़ने की आवश्यकता है. अफगानिस्तान में अभी नवजात प्रजातन्त्र है. वस्तुतः एक मजबूत, आधुनिक, सशक्त, लोकतान्त्रिक अफगानिस्तान ही भारत के हित में है, इसी विश्वास के आधार पर भारत ने करजई सरकार के प्रति अपने समर्थन का विस्तार किया व अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण व आधुनिकीकरण में मदद कर रहा है. बांग्लादेश से भारत के सम्बन्ध काफी जटिल हैं. चाहे मुम्बई लोकल ट्रेन बम धमाकों का षड्यंत्र हो या असम में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों का मसला, बांग्लादेश की भूमिका अब तक सन्देहास्पद ही रही है. यद्यपि हाल की वार्ताओं में बेहतर सुरक्षा, सीमा प्रबन्धन, सीमा पार आवाजाही पर बल दिया गया है. तथापि इन सम्बन्धों की दशा-दिशा क्या होगी यह समय के गर्भ में है. उपर्युक्त देशों के अतिरिक्त श्रीलंका, नेपाल (जो अपनी आन्तरिक अशान्तियों से पीड़ित है) तथा भूटान से भारत के सम्बन्ध सकारात्मक ही हैं. आशा की जानी चाहिए कि जैसे-जैसे इन देशों में आन्तरिक शान्ति सुदृढ़ होती जाएगी, भारत के सम्बन्ध और मजबूत होते जाएंगे.

भारत व शेष विश्व 

विश्व के उपर्युक्त भू-भागों के अतिरिक्त भारत ने शेष विश्व से भी मजबूत सम्बन्ध स्थापित किए हैं. इसे भारतीय कूटनीति की सफलता ही कहा जाएगा कि तमाम अमरीकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए रूस ने तारापुर नाभिकीय संयन्त्र हेतु यूरेनियम उपलब्ध कराने की घोषणा की. भारत ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई क्षेत्रों से ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ के तहत् अनेक समझौते किए जिसमें भारत व आसियान देशों के बीच 2007 तक मुक्त व्यापार समझौता लागू करना भी शामिल है. इसी प्रकार बदलती अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में जापान ने भी भारत से अपने सम्बन्धों को मजबूत किया है. दोनों देश हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं जिससे दोनों को ऊर्जा संरक्षण व ऊर्जा दक्षता को बढ़ाने में सहायता मिलेगी. भारत ने इब्सा (IBSA) फोरम जैसी संस्थाओं के माध्यम से तृतीय विश्व के देशों से अपने मजबूत सम्बन्ध कायम किए हैं इससे न सिर्फ एकध्रुवीय व्यवस्था बहुध्रुवीय बनाने में मदद मिलेगी. वरन भारत भविष्य की समस्त आवश्यकताओं को पूर्ण करने में भी सक्षम होगा. 

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि समकालीन समय में भारत ने बदलते समय और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अन्य देशों से सम्बन्ध स्थापित किए हैं. वस्तुतः एक मजबूत, स्थिर, विकसित भारत की उपस्थिति न सिर्फ उपमहाद्वीप वरन् दक्षिण एशिया तदन्तर सम्पूर्ण विश्व के भविष्य के लिए लाभप्रद सिद्ध होगी. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

4 × five =