अनुशासनहीनता पर निबंध |Essay on Indiscipline in Hindi

अनुशासनहीनता पर निबंध

अनुशासनहीनता पर निबंध |Essay on indiscipline in hindi

अनुशासनहीनता भारत की समस्याओं में महत्त्वपूर्ण है. एक प्रकार से यह एक विश्व व्यापी समस्या है और विश्व के प्रायः समस्त राष्ट्र इसके प्रति चिंतित हैं. अनुशासनहीनता के कारण प्रजातांत्रिक देशों में राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक व्यवस्था की उपेक्षा, सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों का ह्रास आदि समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं. अनुशासन की उपेक्षा ने हमारे जनजीवन को अस्त-व्यस्त एवं संत्रस्त बना दिया है.

अनुशासनहीनता की बीमारी ने एक महामारी की भाँति हमारे जनजीवन को ग्रसित कर लिया है. उच्चतम वर्ग से लेकर निम्नतम वर्ग के व्यक्ति अनुशासन को भंग करते हुए देखे जा सकते हैं. हमारे संसद सदस्य जब अध्यक्ष की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण मार्शल द्वारा धक्का देकर बाहर निकाले जाते हैं, तब हमारा सिर लज्जा से झुकता तो है ही, साथ ही हम यह सोचने को भी विवश हो जाते हैं कि अपनी भावी पीढ़ी के सम्मुख हम क्या आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं. 

अनुशासनहीनता : स्वरूप विश्लेषण 

नीति नियम का निर्वाह अनुशासन है. किसी बात को कहने के पूर्व अथवा किसी काम को करने के पूर्व यह सोचना हमारा यह कार्य किसी की पीड़ा एवं हानि का हेतु तो न बन जाएगा, अनुशासन की नींव जमाता है. इसके विपरीत आचरण करना, समस्त मान्यताओं की उपेक्षा करना, बँधी हुई स्वीकृत व्यवस्था के प्रति विद्रोह तथा निरर्थक प्रश्नों को उभारकर दुराग्रहपूर्ण आचरण वस्तुतः अनुशासनहीनता की परिधि में आते हैं. ऐसा आचरण जो उत्पन्न प्रभाव की उपेक्षा करता है, वस्तुतः अनुशासनहीनता है. अनुशासनहीनता को हम उदंडता, उच्छृखलता, असामाजिक व्यवहार आदि द्वारा भी अभिहित कर सकते हैं. 

भारत के जनजीवन में हर क्षेत्र में हमको अनुशासनहीन व्यवहार देखने को मिलता है. निजी कार्यालय हो, सरकारी दफ्तर हो, शिक्षा संस्था हो, व्यावसायिक संस्थान हो, यहाँ तक पारिवारिक जीवन में भी हमको अनुशासन की अवज्ञा दिखाई देती है. जिस अनुशासन से व्यक्ति अपनी बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है, उसी अनुशासन की उपेक्षा करके वह अपने को कठिनाइयों और समस्याओं के मकड़जाल में फँसाता जा रहा है. 

हमारे कर्णधार जब समस्त मर्यादाओं एवं शालीनता की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए देखे जाते हैं, तब हम प्रजाजन से किस व्यवहार की आशा कर सकते हैं—’यथा राजा तथा प्रजा’ अथवा ‘राजा कालस्य कारणम्.’ 

अनुशासनहीनता ने वस्तुतः अराजकता का वातावरण उत्पन्न कर दिया है. सामान्य सी बात पर उपद्रव, तोड़फोड़, पथराव, मारपीट, आक्रोश के स्वर, पुतले जलाना, पथराव आदि सामान्य घटनाएँ हो गई हैं. चारों ओर अधिकारों की माँग और लड़ाई के दर्शन होते हैं. कर्तव्य बोध का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि कर्त्तव्य पालन नेताओं के भाषणों और मठाधीशों के उपदेशों तक सीमित होकर रह गया है. अपनी मांगों को मनवाने के लिए शांतिमय तरीकों को उठाकर एक ओर रख दिया गया है. हड़ताल, घेराव, भूख हड़ताल आदि का सहारा लिया जाता है. फलस्वरूप राष्ट्रीय सम्पत्ति का क्षय और उत्पादन में गिरावट के कारण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. विद्यालयों की दशा विशेष रूप से शोचनीय हो गई है. छात्रों की स्वयं की समस्याएँ तो कम रहती हैं. राजनीति के खिलाड़ी छात्रों को मोहरा बनाकर अनेकानेक आन्दोलनों में लगा देते हैं. युवा रक्त जोश में होश खो बैठता है. अनुशासन की अवज्ञा के कारण हमारे छात्र-वर्ग में विनय, श्रद्धा, आदरभाव आदि उदात्त गुणों का सर्वथा अभाव हो गया है. राजनीति से प्रेरित हमारा युवा वर्ग आए दिन कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करता रहता है. विध्वंसात्मक कार्यों में संलग्न युवा-वर्ग अपने भविष्य के प्रति प्रश्नचिन्ह लगा देता है. जब इनका जीवन सफल नहीं होता है तो वे आतंकवादी बनकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहते हैं.

अनुशासन : राष्ट्रीय समस्याओं का निदान 

अनुशासनहीनता के मूल में हमारे कर्णधारों की स्वार्थपरता तथा राजनीतिक चालबाजी हैं. हमारे राजनीतिज्ञ धर्म और अल्पसंख्यक के नाम पर विघटन को भारतीय समाज की स्थायी सम्पत्ति बना रहे हैं. वे सही अर्थ में सत्तालोलुप होकर जातिगत भावनाएँ भड़का कर तथा शासन सत्ता के विरुद्ध नारेबाजी करके जनसामान्य को कानून की अवज्ञा करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं. फलतः भारतीय जनता कानून तोड़ने वालों का समुदाय (A Commu nity of Law breakers) बन गई है. 

देश में व्याप्त विभिन्न समस्याओं के निदान के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को एक अनुशासित सैनिक की भाँति व्यवहार करना होगा. इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्व प्रेरणा के आधार पर नियमानुसार कार्य करना होगा. वैलेण्टाइन के अनुसार अनुशासन बालक की चेतना का परिष्करण है, बालक की उत्तम वृत्तियों और इच्छाओं को संस्कृत करके हम अनुशासन के उद्देश्य को पूर्ण कर सकते हैं. हमारे देश ने प्रजातन्त्रात्मक प्रणाली को स्वीकार किया है. हमें समझ लेना चाहिए कि प्रजातन्त्र एक जीवन प्रणाली होता है, अतः प्रजातन्त्र की सफलता के लिए अनुशासित जनजीवन अत्यन्त आवश्यक है. अनुशासन के कड़े निर्वाह द्वारा ही हम अपनी समस्त राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं. 

अनुशासन की दृष्टि से हमारा प्रथम चरण नौनिहालों विद्यार्थियों से आरम्भ होना चाहिए, क्योंकि वे ही राष्ट्र निर्माण की ईंटें हैं यदि युवा वर्ग अनुशासित होगा तो अन्य समस्याएँ अपने आप निर्मूल हो जाएंगी, अन्यथा ये समस्याएँ अनन्त काल तक ज्यों की त्यों बनी रहेंगी. सरकार को चाहिए कि वह संस्कृति एवं परम्पराओं के स्वस्थ निर्वाह के लिए क्षेत्रीय स्तर पर कार्य करने की योजना चलाए, इससे विभिन्न क्षेत्रों के निवासी परस्पर जानकारी प्राप्त करेंगे और आत्मीयता के साथ रहना आरम्भ कर सकते हैं. अनुशासनात्मक व्यवहार द्वारा हम एक स्वच्छ, सुन्दर और स्वस्थ राष्ट्र की कल्पना को साकार कर सकते हैं.

अनुशासन : लोकतंत्र का पर्यायवाची 

लोकतंत्र मानवनिष्ठ समाज की एक प्रक्रिया है. स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व इस जागरूक प्रक्रिया के आदर्श हैं. लोकतंत्र का अर्थ केवल मताधिकार ही नहीं होता है. केवल वोट की प्रक्रिया द्वारा वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना नहीं की जा सकती है. लोकतंत्र की स्थापना के लिए कुछ और भी चाहिए और वह है लोकतंत्र की जीवन दर्शन के रूप में प्रतिष्ठा. ‘लोकतंत्र’ नामक जीवन-दर्शन का सम्बन्ध आपसी समझ, शिक्षा, समझदारी एवं सहनशीलता के साथ है. लोकतंत्र जीवन व आर्थिक ढाँचे को संयोजित करने की एक अनुशासित पद्धति है, परन्तु आज स्थिति सर्वथा भिन्न है. लोकतंत्र के नाम पर हमारे देश में अनुशासनहीनता का बोलबाला हो गया है. लोकतंत्र का अर्थ मनमानी, उच्छृखलता, नीति नियम का उपहास आदि हो गया है. फलतः हमको देश की एकता, अखण्डता तथा लोकतंत्र के सम्मुख प्रश्नचिन्ह पग-पग पर दिखाई देते हैं. अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा यह है कि जो अनुशासन को धता बताते हैं, वे ही “लोकतंत्र खतरे में है” की आवाज उठाते हुए देखे व सुने जाते हैं. 

नियमबद्धता का नाम अनुशासन है. प्रकृति यदि अनुशासन का त्याग कर दे, तो विश्व में प्रलय का दृश्य उपस्थित हो जाए. इसी प्रकार जब मनुष्य अनुशासनहीन हो जाता है, तब समस्त व्यवस्था ही पथभ्रष्ट एवं दिशाहीन हो जाती है, हमारे देश में आज यही स्थिति सर्वत्र व्याप्त हो गई है. 

लोकतंत्र में अनुशासनहीनता लोकतंत्र को समाप्त कर देती है. ऐसी स्थिति में शासन की बागडोर किसी एक व्यक्ति के हाथ में आ जाती है. वह व्यक्ति कोई राजनेता भी हो सकता है या कोई सैनिक जनरल भी हो सकता है, अर्थात् लोकतंत्र की दुर्बलताएँ तानाशाही अथवा सैनिक शासन को जन्म देती हैं और देश कम से कम 50 वर्ष पीछे चला जाता है. इस सम्बन्ध में किसी उदाहरण की भी आवश्यकता नहीं है. 

भारतीय लोकतंत्र में समाविष्ट अनुशासनहीनता ने हमारे राजतंत्र, आर्थिक क्षेत्र आदि को भी पथभ्रष्ट कर ही दिया है, हमारे पारिवारिक जीवन को भी विच्छंखलित कर दिया है. संयुक्त परिवार-प्रणाली का विघटन इसी की देन है, अब परिवार के मुखिया की बात न मानना एक जीवन पद्धति बन गई है और हम छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद उत्पन्न कर देते हैं. हमारी चिन्तन करने की शक्ति वस्तुतः कुंठित हो गई है. हम पशुवत् व्यवहार करने लगे हैं. 

अनुशासन के अभाव में मनुष्य वस्तुतः वन्य पशु के समान हो जाता है. हम तो यहाँ तक कहने को तैयार हैं कि जानवर से भी बदतर हो जाता है. अनुशासन का तात्पर्य है-नीति-नियम का पालन. व्यक्तिगत सुख-सुविधा के समक्ष मर्यादा-निर्वाह को वरीयता प्रदान करना, अनुशासन का आदर्श है, हमारे देश में अनुशासन के अभाव में लोकतंत्र वस्तुतः भीड़तंत्र का पर्यायवाची बन गया है और पूँजीतंत्र अथवा स्वार्थतंत्र में विलीन हो गया है. सन्तुष्टि की राजनीति ने लोकतंत्र में विष घोल दिया है. प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासित रहकर ही प्रगति सम्भव है. देश की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि जनजीवन के प्रत्येक स्तर पर अनुशासन का पालन करने की परम्परा को स्थापित किया जाए.

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