भारत की परमाणु नीति पर निबंध | Essay on India’s Nuclear Policy

भारत की परमाणु नीति पर निबंध

भारत की परमाणु नीति पर निबंध | Essay on India’s Nuclear Policy

शीत युद्ध के दौर में जब दो प्रमुख परमाणु शक्ति संपन्न गुटों के मध्य प्रतिस्पर्धा व शस्त्रों की होड़ की राजनीति चल रही थी, उसी समय भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में, एक संप्रभु राष्ट्र की पहचान के साथ तत्कालीन गुटीय राजनीति से अपने को अलग करते हुए ‘गुटनिरपेक्ष’ आंदोलन की अगुवाई कर रहा है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अनेक लक्ष्यों में से एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य ‘निःशस्त्रीकरण’ भी रहा है। भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषता भी पूर्ण निःशस्त्रीकरण है। जिसमें परमाणु निःशस्त्रीकरण को भारत ने सबसे अधिक प्राथमिकता दी है। भारत सार्वभौमिक सुरक्षा एवं स्वयं अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों को पूर्ण रूप से समाप्त करना चाहता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र के भीतर और बाहर कई कदम उठाये हैं। वर्ष 1988 में निःशस्त्रीकरण के संबंध में संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष अधिवेशन में भारत ने चरणबद्ध रूप से ‘जन विनाश के हथियारों की पूर्ण समाप्ति की व्यापक योजना’ (Compre hensive Plan for Total Elimination of Weapons of Mass Destruction) प्रस्तुत की। इसके अतिरिक्त अभूतपूर्व परमाणु शस्त्रों की होड़ के प्रति अंतर्राष्ट्रीय चिंता प्रकट करने के लिए भारत ने अस्सी के दशक में छः राष्ट्रों के पांच महाद्वीपीय संयुक्त अभिक्रम (Six Nation Five Continent Joint Initiative) की सदस्यता ग्रहण की। 

“भारत सार्वभौमिक सुरक्षा एवं स्वयं अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों को पूर्ण रूप से समाप्त करना चाहता है।” 

लेकिन भारत की परमाणु नीति को समझने से परमाणु निःशस्त्रीकरण की उसकी धारणा से संबंधित भ्रांतियां स्पष्ट हो सकती हैं। क्योंकि मई 1998 के पोखरण में किए गए परमाणु परीक्षण के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भारत की परमाणु नीति एवं निःशस्त्रीकरण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर संशय प्रकट किया था। इन संशयों को दूर करने के लिए भारत ने ये स्पष्ट किया कि ये परीक्षण राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में और मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए किए गए हैं। भारत ने इन परमाणु हथियारों के पहले प्रयोग न करने (No First Use) की घोषणा की। जहां एक ओर भारत परमाणु प्रसार को लेकर नियंत्रण कायम किए हुए है, वहीं पाकिस्तान के ए. क्यू. खान ने उत्तरी कोरिया, लीबिया और ईरान को इसकी जानकारी विक्रय की। ईरान और अन्य गोपनीय सदस्यों ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के प्रति अपने स्वीकृत दायित्व की वचनबद्धता का स्वयं उल्लंघन किया है परंतु इन सभी उदाहरणों ने अमेरिका और अन्य परमाण शक्तियों के दोहरे मानदंड को प्रकट कर दिया। लेकिन भारत की स्थिति भिन्न है, पूर्व भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन का कहना है- “स्वतंत्रता के समय से भारत की विदेश नीति का सिद्धांत वैश्विक परमाणु निःशस्त्रीकरण रहा है। भारत के परमाणु संपन्न होने का यह अर्थ नहीं कि उसकी परमाण मक्त विश्व का उद्देश्य खत्म हो गया है। एक सार्वभौमिक, प्रमाणिक और गैर भेदभाव के परमाणु निःशस्त्रीकरण द्वारा एक अहिंसक विश्व व्यवस्था की खोज भारत की परमाणु नीति का महत्त्वपूर्ण तत्व रहेगा जो नियंत्रण, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, दृढ़ कथन और सुरक्षा के लिए स्थिति निर्धारण से अभिलक्षित होता है।” 

वर्ष 2008 में भारत एवं अमेरिका के मध्य हुए असैन्य परमाणु करार के बाद भारत की परमाणु नीति की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। इसलिए आजादी के बाद से अब तक की भारतीय परमाणु नीति (INP) को जानना जरूरी है। भारत की आजादी के समय हिरोशिमा व नागासाकी की घटनाएं हो चकीं थी तथा परमाण तकनीक के विकास ने वैश्विक सुरक्षा के स्वरूप में बदलाव ला दिया था। उस समय भारतीय नेताओं ने तर्क दिया कि परमाणु अस्त्र युद्ध के अस्त्र नहीं बल्कि जन विनाश के अस्त्र हैं और एक परमाणु अस्त्र विहीन विश्व न केवल भारत की सुरक्षा बल्कि सभी राष्ट्रों की सुरक्षा को बढ़ावा देगा। उसी समय से भारत ने परमाणु शस्त्रों की होड़ एवं परमाणु परीक्षणों को समाप्त करने की मांग का बीड़ा उठाया। लेकिन सार्वभौमिक और गैरपक्षपाती निःशस्त्रीकरण के अभाव में भारत ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सकता जो विश्व का परमाणु संपन्न और परमाणु विहीनों के बीच स्वेच्छाचारी विभाजन कर दे। भारतीय नेताओं ने यह भी माना कि परमाणु तकनीक आर्थिक विकास के लिए व्यापक संभावनाएं प्रदान करती है, खासकर उन विकासशील देशों के लिए जो लम्बे समय तक औपनिवेशिक शोषण के कारण पिछड़े रह गये हैं। वर्ष 1948 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम से यही विचार प्रतिबिंबित होता है। 

परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अस्तित्व में आने से पहले ही भारत ने वर्ष 1965 में गुट निरपेक्ष देशों के एक छोटे से समूह के साथ एक अंतर्राष्टीय परमाणु अप्रसार संधि के विचार को आगे बढ़ाया जिसके अंतर्गत यह कहा गया कि परमाणु संपन्न राज्य किसी अन्य देश को ऐसे शस्त्रों के विकास अथवा प्राप्ति के लिए अपने शस्त्रागार प्रदान नहीं करने पर सहमति व्यक्त करेंगे। लेकिन जब वर्ष 1968 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का उदय हुआ तो भारत ने इसे भेदभावपूर्ण व असुरक्षित बताते हुए इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। भारत ने विस्तार से NPT की त्रुटियों पर प्रकाश डाला व बताया कि कैसे यह केवल कुछ (पांच) देशों के प्रभुत्व व एकाधिकार पर आधारित है तथा अन्य देशों को ऐसे ही अस्त्र व तकनीक से दूर रखना चाहती है। NPT पर हस्ताक्षर न करने का निर्णय भारत की संप्रभुता व विचार एवं कार्यों की स्वतंत्रता से भी जुड़ा है इसके साथ ही गुट निरपेक्ष के एक नेता के रूप में बराबरी पर आधारित विश्व व्यवस्था की मांग के साथ भी संबंधित है। 

“भारत ने अब तक अपनी परमाणु अस्त्र संपन्न क्षमता का इस्तेमाल किसी देश व मानव समुदाय के प्रति नहीं किया है।” 

वर्ष 1974 में किए गए भारत के परमाणु परीक्षण के बाद से भारत की सभी क्रमिक सरकारों ने भारत के परमाणु विकल्प के सुरक्षित बनाये रखने के आवश्यक कदम उठाये। इसलिए भारत ने वर्ष 1996 के व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि’ (CTBT) पर हस्ताक्षर नहीं किया। इस निर्णय को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से पारित किया। CTBT पर हस्ताक्षर करने का निहितार्थ यह था कि भारत की परमाणु क्षमता अत्यंत सीमित हो जाती। वर्ष 1998 में पोखरण-II के बाद से भारत को विश्व में एक परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता प्राप्त है फिर भी भारत अपनी विदेश नीति के मूल सिद्धांत के प्रति वचनबद्ध है। भारत के लिए वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की समाप्ति न केवल भारत की सुरक्षा बल्कि समस्त विश्व की सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करेगी। भारत निरंतर सभी देशों से खासकर परमाणु शक्ति संपन्न देशों से ऐसे उपाय अपनाने का आग्रह करता रहेगा जो परमाणु अस्त्र मुक्त विश्व का सपना साकार करें। 

भारत ने अपनी परमाणु नीति में एक महत्त्वपूर्ण बिंदु यह भी रखा है कि भारत परमाणु सामग्री व संबंधित तकनीकों के निर्यात पर पूर्ण एवं प्रभावी रूप से नियंत्रण स्थापित रखेगा। भारत ने अब तक अपनी परमाणु अस्त्र संपन्न क्षमता का इस्तेमाल किसी देश व | मानव समुदाय के प्रति नहीं किया है, यह भारत की वैश्विक शांति व सुरक्षा के प्रति व्यापक धारणा का सूचक है। भारत ने अपनी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल केवल अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में किया है। पुलवामा हमले, 2019 के बाद भी भारत अपनी इसी नीति पर कायम रहा। तारापुर परमाणु संयंत्र से लेकर कुडनकुलम परमाणु संयंत्र तक के इसके उदाहरण हैं। भविष्य में भी भारत ने अपनी परमाणु क्षमता का उपयोग विकास व आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में ही करने के लिए प्रतिबद्धता जाहिर की है। असैन्य परमाणु समझौते इसकी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। लेकिन भारत की राष्ट्रीय व सीमा सुरक्षा को | मद्देनजर रखते हुए भारत की परमाणु शक्ति संपन्नता अपरिहार्य है, 

क्योंकि भारत के पड़ोसी देशों, पाकिस्तान, चीन, म्यांमार में जिस | तरह से परमाण अस्त्रों के प्रति जोर है उसके प्रत्युत्तर में भारत के लिए अपने परमाणु अस्त्रों को दूरदर्शी होते हुए बनाए रखने की आवश्यकता है। 

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