अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम पर निबंध-Essay on India’s growing step in space

अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम पर निबंध

अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम पर निबंध-Essay on India’s growing step in space

बीसवीं शताब्दी ने अंतरिक्ष को विज्ञान की परिधि में खड़ा कर दिया है। चंद्रमा पर मनुष्य के कदम पड़ चुके हैं तथा मंगल और शुक्र आदि ग्रहों पर अनुसंधान कार्य जारी है। अंतरिक्ष में न जाने कितने उपग्रह स्थापित हो चुके हैं। ये अंतरिक्ष की जानकारी देने के साथ-साथ धरती के बदलते मिजाज पर भी ध्यान रखते हैं। संचार साधनों में इन्होंने क्रांति ही कर डाली है। जासूसी और सैन्य दृष्टि से इनका महत्व बढ़ता जा रहा है। इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अब पृथ्वी छोड़ अंतरिक्ष युद्ध पर चर्चा हो रही है। ऐसे में भारत ने अपने अंतरिक्ष यात्री भेजकर 14 राष्ट्रों में अपना स्थान बना लिया है। 

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कदम रखने का भारतीय इतिहास बहुत पुराना नहीं है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक एन. विक्रम साराभाई के प्रयत्नों से 1961 में त्रिवेंद्रम में एक अंतरिक्ष केंद्र की स्थापना की गई। फिर 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद का गठन हुआ। 1967 में परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत इस अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद का पुनर्गठन किया गया। 1970 में डॉ. साराभाई के आग्रह पर उपग्रह प्रणाली प्रखंड की स्थापना की गई, जिसका संचालन प्रो. यू.आर. राव को सौंपा गया। 10 मई, 1972 को भारत और रूस के बीच समझौता हुआ। रूस भारत में निर्मित प्रक्षेपण यान को प्रक्षेपित करने हेतु तैयार हो गया। 1972 में ही अंतरिक्ष आयोग तथा अंतरिक्ष विभाग को अलग-अलग कर दिया गया। 1969 में पहला भारतीय रॉकेट अंतरिक्ष में छोड़ा गया। 1974 में श्री हरिकोटा से भारत निर्मित ‘सेंटर’ नामक रॉकेट का प्रक्षेपण किया गया। इस समय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद का कार्य निम्नलिखित स्थानों पर हो रहा है 

  • विक्रम साराभाई केंद्र, वी.एस.एस.सी. धुंबा (केरल) 
  • इंडियन साइंटिफिक सेटेलाइट प्रोजेक्ट, आई.एस.पी. पीनिया, बैंगलौर 
  • फिजिकल रिसर्च लैबोटरी, अहमदाबाद 
  • स्पेशल एप्लीकेशन सेंटर, अहमदाबाद 
  • एक्सपेरिमेंट कंयूनिकेशन अर्थ स्टेशन, आर्वी तथा देहरादून 

इस प्रकार भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है। इसकी प्रमुख उपलब्धियों को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है भारत का प्रथम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ था। इसे 19 अप्रैल, 1975 को भारतीय समय के अनुसार एक बजे अपराह्न सोवियत संघ की राजधानी मास्को से छोड़ा गया। इसके बाद ‘भास्कर-प्रथम’ का प्रक्षेपण जून, 1979 में किया गया। तत्पश्चात 17 जुलाई, 1980 को भारत का भू-उपग्रह ‘रोहिणी’ भारत निर्मित चार स्तरीय रॉकेट एस.एल.वी. द्वारा छोड़ा गया। 

इस प्रकार भारत ने रॉकेट प्रक्षेपण में लगातार प्रगति करते हुए भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण की क्षमता प्राप्त कर ली। भारत ने अंतरिक्ष कार्यक्रम पर ध्यान देते हुए ऐसे रॉकेट की प्रक्षेपण क्षमता प्राप्त की, जिसकी सहायता से एक साथ दस उपग्रहों को छोड़ा जा सकता है। 2008 में भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा का परचम पूरे विश्व में लहराया, जब स्वदेश निर्मित उपग्रह ‘चंद्रयान’ का सफल प्रक्षेपण किया गया। इसी चंद्रयान ने चंद्रमा पर जल और बर्फ की भारी मात्रा का पता लगाया। इसका ज्ञान पहले के किसी अनुसंधान से नहीं हो पाया था। 

अब भारत ‘चंद्रयान-द्वितीय’ की तैयारी कर रहा है, साथ ही साथ अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में मंगल तथा अन्य ग्रहों को भी शामिल करता जा रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत विश्व में एक अंतरिक्ष शक्ति बन चुका है। हम भारतीयों को अपने वैज्ञानिक प्रगति पर गर्व है। भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम की सहायता से ही विश्व का अगुवा बन सकेगा और विश्व का मार्गदर्शन प्राचीन काल की तरह भविष्य में भी करता रहेगा।

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