भारत की विदेश नीति पर निबंध | Essay on India’s Foreign Policy in Hindi | भारत की विदेश नीति : विशेषताएं 

भारत की विदेश नीति पर निबंध

भारत की विदेश नीति पर निबंध | Essay on India’s Foreign Policy in Hindi | भारत की विदेश नीति : विशेषताएं 

प्राचीनकाल से ही भारत के अपने पड़ोसी राज्यों तथा विश्व के अन्य राज्यों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा मानवीय संबंध रहे हैं। भारत विश्व में विस्तृत भू-भाग व विज्ञान जनसंख्या वाला देश होने के कारण उसकी विदेश नीति का विश्व की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि “हम गुटों की खींचातानी में नहीं पड़ेंगे। विश्व के परतंत्र राष्ट्रों के आत्म निर्णय के सिद्धांतों का समर्थन करेंगे तथा जातीय भेदभाव की नीति का पूरी ताकत से विरोध करेंगे। शांति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सभी शांति चाहने वालें राष्ट्रों के साथ सहयोग करके अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा व सद्भावना तथा सहयोग के वातावरण का निर्माण करने में हम सहयोग प्रदान करेंगे।” 

“किसी भी देश की विदेश नीति के मुख्यतः तीन मूलभूत आधार होते हैं-राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय अनिवार्यताएं तथा विश्व की समस्याएं।” 

किसी भी देश की विदेश नीति के मुख्यतः तीन मूलभूत आधार होते हैं—राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय अनिवार्यताएं तथा विश्व की समस्याएं। इन तीनों को ध्यान में रखते हुए भारत की विदेश नीति के आधारभूत उद्देश्य निम्नलिखित हैं 

  •  राष्ट्र का आर्थिक विकास और राजनीतिक स्थिरता जिससे देश की एकता तथा सामाजिक, आर्थिक विकास सुनिश्चित किया जा सके। राष्ट्रीय सुरक्षा, जिससे कि देश की स्वतंत्रता तथा प्रादेशिक अखण्डता पर आक्रमण अथवा आक्रमण के खतरे को रोका जा सके। 
  • आत्मनिर्भरता तथा स्वपोषित औद्योगीकरण जिससे आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा और प्रोत्साहन सुनिश्चित किया जा सके। 
  • राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए मुक्ति आंदोलनों व लोकतांत्रिक संघर्षों तथा आत्मनिर्णय के अधिकारों के लिए संघर्षों का समर्थन करना।
  • साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद, नस्लवाद, जातीय पृथकतावाद, निरंकुशता और सैन्यवाद का विरोध करना।
  • शस्त्रों की होड़, विशेष रूप से नाभिकीय शस्त्रों की होड का विरोध करना और व्यापक एवं पूर्ण निःशस्त्रीकरण की प्रक्रिया का समर्थन करना।
  • विश्व स्तर पर विकास के कार्यों का समर्थन करना और एक ऐसी नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना जिससे न्याय, समानता तथा मानवतावाद पर आधारित ‘विश्व का निर्माण हो सके। 
  • शांतिपूर्ण सहअस्तित्व तथा पंचशील के आदर्शों को बढ़ावा देना। 
  • एक लोकतांत्रिक विश्व हेतु आवश्यक दशा के रूप में मानव अधिकारों के आदर्श एवं उसके क्रियान्वयन का समर्थन करना।
  • विश्व व्यापी तनाव दूर करने, परस्पर सहमति की भावना को बढ़ावा देना, सैन्य गुटबंदी का विरोध करने तथा इन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भय, घृणा, लालच और असमानता से मुक्त विश्व का निर्माण करने के लिए गुट निरपेक्ष आंदोलन को मजबूत बनाना तथा संयुक्त राष्ट्र का समर्थन करना आदि। 

भारत की विदेश नीति के निर्धारण में नेहरू का मुख्य योगदान यह था कि उन्होंने निष्पक्षता अथक सम दूरी की नीति को अपनाया तथा भारत को दोनों गुटों से दूर रखा। निष्पक्षता की नीति का मुख्य तत्व यह था कि प्रत्येक प्रश्न पर स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लिया जाए तथा किसी एक गुट के प्रभाव में आकर निर्णय न लिया जाए। नेहरू तथा भारत की नीति मुख्य रूप से यही रही है कि शांति, निशस्त्रीकरण तथा जातीय समानता का पक्ष लिया जाए तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग दिया जाए ताकि अंतर्राष्ट्रीय झगड़े शांतिपूर्वक सुलझाए जा सकें। 

“भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सभी क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी निभायेगा और यह भागीदारी आपसी बातचीत के माध्यम से तय की जाएगी।” 

जवाहरलाल नेहरू की निष्पक्षता की नीति को सम्मान और समर्थन कोरिया के झगड़े में मिला और उसकी मध्यस्थता से उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच संभावित बड़ा युद्ध टल गया। इसी प्रकार भारत वियतनाम, कंबोडिया और लाओस के देर तक चलते राजनैतिक संघर्ष में भी निष्पक्ष रहा। इसी प्रकार भारत ने साम्राज्यवादी शक्तियों के अत्याचारी रुख का भी विरोध किया। 1956 में जब मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया तो इंग्लैण्ड तथा फ्रांस ने उस पर आक्रमण कर दिया। भारत ने न केवल इन दोनों शक्तियों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया अपितु मिस्र को समर्थन भी दिया, संयुक्त राष्ट्र में भी और बाहर भी। इस समस्त प्रक्रिया का परिणाम यह हुआ कि विदेशी सेनाओं को मिस्र से हटना पड़ा और मिस्र का स्वेज नहर पर नियंत्रण स्वीकार किया गया। 

भारत ने अपने निष्पक्ष रुख को अधिक बल देने के लिए अन्य निष्पक्ष देशों को एकत्रित किया और 1961 में बेलग्रेड में प्रथम निष्पक्ष कांफ्रेंस के रूप में गुट निरपेक्ष आंदोलन (NAM) का आयोजन किया गया। 

इस निर्गुट आंदोलन की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि वर्तमान में 125 देश इसके सदस्य हैं और सक्रिय रूप से इसका समर्थन करते 

इस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत ने जो विदेश नीति अपनाई उसकी प्रमुख विशेषता है 

गुट निरपेक्षता, विश्व शांति, साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध, एशियाई एवं अफ्रीकी एकता की स्थापना, आर्थिक एवं सांस्कृतिक सहयोग, जातीय भेदभाव का विरोध तथा संयुक्त राष्ट्र संघ से सहयोग। 

भारतीय विदेश नीति की इन विशेषताओं के साथ-साथ पंचशील या शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति की आधारशिला है। जिसके अंतर्गत पांच सिद्धांत सम्मिलित हैं, जो हैं –

  1. एक-दूसरे की प्रादेशिक सीमा और प्रभुसत्ता का सम्मान किया जाए।
  2. अनाक्रमण नीति को स्वीकार किया जाए।
  3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न किया जाए। 
  4. एक-दूसरे के सहयोग से लाभ उठाया जाए।
  5. शांति सह-अस्तित्व की नीति पर आचरण किया जाए। 

ये सिद्धांत न केवल भारत वरन विश्व की शांति और सुरक्षा के प्रकाश स्तंभ बन चुके हैं। 

1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय विदेश नीति का एक परिवर्तनकारी बिन्दु था। दूसरे शब्दों में भारत ने 1962 के पश्चात् आदर्शवादी नीति के स्थान पर राष्ट्रीय हितों के अनुरूप यथार्थवादी नीति अपनायी। भारतीय विदेश नीति की यथार्थवादिता का प्रथम प्रमाण था भारत-सोवियत मैत्री संधि जो 9 अगस्त 1971 को नई दिल्ली में संपन्न हुई। पूर्व में भारत ने अमेरिका और सोवियत संघ से समान दूरी बना रखी थी परंतु बांग्लादेश की घटनाओं के संबंध में अमेरिका तथा चीन ने पाकिस्तान का जिस तरह पक्ष लिया उससे भारत की सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया ऐसी स्थिति में भारत ने सोवियत संघ के साथ यह संधि की और दर्ज संधि के फलस्वरूप ही 1971 के भारत-पाक युद्ध में अमेरिका भारत को केवल धमकियां देने तक ही सीमित रहा। भारत ने अपनी यथार्थवादी विदेश नीति का दूसरा परिचय 18 मई 1974 को दिया जब उसने पोखरण में प्रथम सफल भूमिगत परमाणु विस्फोट किया। यद्यपि भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह अणु शक्ति का विकास और उसका प्रयोग शांतिपूर्ण कार्यों के लिए ही करेगा। 

1991 से 1995 के बीच की बदली हुई अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत की विदेश नीति के मुख्य बिन्दु रहे—भारत-सोवियत मैत्री संबंध संधि का नवीनीकरण (8 अगस्त 1991), भारत द्वारा सोवियत राष्ट्रकुल को राजनयिक मान्यता तथा भारत और इजरायल में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होना। इसके साथ ही 1993 में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को राजनयिक मान्यता प्रदान की तथा दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंधों का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। 

1994-95 में भारत का चीन, अमेरिका, ब्रिटेन तथा फ्रांस के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हुआ। वर्ष 1991 में शुरू हुई वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ ही भारत ने अपनी विदेश नीति के तहत पूर्व में बसे प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ संबंध सुधार पर विशेष बल देते हुए व्यापार, निवेश एवं पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में ध्यान दिया। भारत की यह पहल ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ के नाम से जानी गई। इसी क्रम में आंतरिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा एवं खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारत ने वर्ष 2005 में “लक वेस्ट पॉलिसी’ अपनाई। वर्ष 2012 में मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ बनाने के उद्देश्य से भारत द्वारा ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी’ की शुरुआत की गई, जिसके तहत मुख्य रूप से संचार, दूतावास, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया। अप्रवासी भारतीयों के हित संरक्षण तथा उनकी समस्याओं का कूटनीतिक तरीके से हल निकालने के उद्देश्य से वर्ष 2006 में हमने ‘कृष्णा डॉक्ट्रिन’ को अपनाते हुए अप्रवासी भारतीयों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए। 

यदि भारत की वर्तमान विदेश नीति का विश्लेषण किया जाए तो भारत की वर्तमान विदेश नीति निम्नलिखित लक्ष्यों को सामने रखकर चल रही है 

1.भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सभी क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी निभायेगा और यह भागीदारी आपसी बातचीत के माध्यम से तय की जाएगी।

2. पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षी विवादों को सुलझाने के लिए सक्रिय प्रयास किये जाएंगे।

3. पाकिस्तान के साथ जो भी मुद्दे अनसुलझे पड़े हैं, उन्हें दोनों देशों की जनता के पारस्परिक सहयोग में आड़े नहीं आने दिया जाएगा और पाकिस्तान के साथ संबंधों को दीर्घकालीन लक्ष्यों को दृष्टि में रखकर और भी मैत्रीपूर्ण बनाया जाएगा।

4.भारत अपने पड़ोसियों के साथ यथाशक्ति वित्तीय सहयोग करेगा।

5. भारत किसी भी स्थिति में अपनी तरफ से किसी भी देश के विरुद्ध पहले परमाणु शस्त्र का प्रयोग नहीं करेगा।

6. भारत अमेरिका के साथ भी विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग संबंध बनाएगा लेकिन ऐसा करते हुए भी वह अपनी प्रभुसत्ता 

एवं सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं करेगा।

गुजराल सिद्धांत के रूप में भारत की विदेश नीति को और स्पष्ट किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार- 

1.भारत अपने पड़ोसियों के साथ सद्भावना एवं विश्वासपूर्ण सहयोग करते हुए उनमें किसी भी प्रकार के प्रतिदान का आग्रह नहीं करेगा।

2. कोई अन्य देशों के आंतरिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा।

3. दक्षिण एशिया का कोई भी देश अन्य देश के विरुद्ध कार्यवाही के लिए अपनी भूमि का दुरुपयोग नहीं होने देगा।

4. इस क्षेत्र के सभी देश अपने द्विपक्षीय मामले शांतिपूर्वक तथा परस्पर बातचीत के माध्यम से ही सुलझाएंगे।

5. दक्षिण एशिया का प्रत्येक देश अन्य देश की क्षेत्रीय अखण्डता को पूरा-पूरा सम्मान देगा।

इस नीति के परिणामस्वरूप नेपाल, बांग्लादेश तथा श्रीलंका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हुआ। 

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