भारतीय नारी की वेदना पर निबंध | Essay on Indian women’s pain

भारतीय नारी की वेदना पर निबंध

भारतीय नारी की वेदना पर निबंध |Essay on Indian women’s pain

हमारे धर्मशास्त्रों में ‘अर्द्धनारीश्वर’ का उल्लेख है, जिसका तात्पर्य आधा पुरुष और आधा नारी होने से है. फिर जाने कितने स्याह दौर आए होंगे कि ईश्वर का ही आधा हिस्सा हाकिम बन गया और आधा हिस्सा गुलाम बन गया. फितरी गुलामी की यह दास्तान न जाने कितनी थी कि औरत जब अपनी पहचान अपने में नहीं पा सकी तो मर्द के अहसास में पाने लगी, और वहीं से उसकी शारीरिक एवं मानसिक गुलामी शुरू हुई. 

महाभारत काल में जब पाण्डवों ने जुआ खेला था, तो सब कुछ हार जाने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने खुद को दाँव पर लगा दिया था और जब खुद को भी हार चुके तो द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया. जब द्रौपदी को भी हार गए तो दुर्योधन की सभा में खड़ी हुई द्रौपदी ने यह सवाल पूछा कि जब युधिष्ठिर अपने आपको हार चुके, तो उन्हें क्या हक है मुझे दाँव पर लगाने का……. और द्रौपदी का वह सुलगता सवाल- जिसका उत्तर धर्मराज भी नहीं दे पाए थे-आज तक हवा में खड़ा है. 

आर्थिक पराधीनता वेदना की जड़ है. इसको लक्ष्य करके 400 से अधिक वर्ष पूर्व गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा था 

कत विधि रची नारि जग माहीं। 

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।

जिस देश में नारी के सिर पर दहेज की तलवार हमेशा लटकती रहती है, उस नारी की वेदना का आकलन कौन करेगा? 

नारी के प्रति पूर्वाग्रह का पाया जाना चौंकाता नहीं है. भारतीय नारी की वेदना यह है कि तथाकथित बुद्धिजीवियों और लेखकों की जमात में भी उसे दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है. गिरिजा कुमार माथुर जैसे प्रबुद्ध विचारक भी स्पष्ट कहते हैं कि स्त्री पुरुष समानता की बात पाश्चात्य संस्कृति की बात है. यह संस्कृति नहीं अपसंस्कृति और विशृंखल जीवन का प्रतिमान है. डॉ. धर्मवीर भारती ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी की आत्मा बनाम संस्कृत का खात्मा’ में इस बात का जिक्र किया है कि किस तरह संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वानों ने अपने लेखन द्वारा नारी जाति को अपमान, उपेक्षा व शोषण का शिकार बनाकर शताब्दियों पीछे धकेला. 

हम जाने-अनजाने में भारतीय नारी का चित्रण पूर्वाग्रहग्रस्त होकर करते हैं. पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने अपने व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘सरकार तुम्हारी आँखों में’ ‘राग’ शीर्षकान्तर्गत लिखा है-“जिस तरह महाराज के रंगमहल में हजारों रानियाँ हैं, वैसे ही महाराज के कुत्ता भवन में हजारों कुत्ते भी हैं. रंग-रंग और देश-देश की रानियाँ-रंग-रंग और देश-देश के कुत्ते.” यहाँ रानियों अर्थात् नारियों की तुलना पालतू कुत्तों से की गई है, जो भारतीय नारी की वेदना की अभिव्यक्ति है. भारतीय नारियों की सबसे बड़ी वेदना यही है कि पुरुष वर्ग अभी भी उसे उपेक्षा की निगाहों से देखता है और तो और अपने पिता के घर में भी बेटी कोई खास महत्व प्राप्त नहीं है. अपने पिता के घर में बेटी का क्या सम्मान है, यह इस कहावत से स्पष्ट हो जाएगा-“बाप घर बेटी, गूदड़न लपेटी”। 

सुधार एवं परिवर्तन की इतनी गर्जना होने पर भी पुरुष के अहं का पलड़ा भारी है, वह कुछ भी करे तो स्वाभाविक मान लिया जाता है. स्त्री के पैर जरा भी बाएं-दाएं पड़ें कि वह तुरन्त महापापिनी करार दी जाती है. उसकी पीड़ा कहीं नहीं सुनाई पड़ती-हारकर बेचारी को खामोश हो जाना पड़ता है. चारों तरफ से परास्त, हारी हुई, नितान्त अकेली, समाज से कटी-हुई अलग-थलग होकर अकेलेपन की असहनीय वेदना भोगती है. 

अविवाहित माँ बनने पर उत्पन्न वेदना-डॉ. जयसिंह प्रदीप के अनुसार अविवाहित माताओं के साथ कुछ ऐसी ही ‘ट्रेजेडी’ होती है. नारी सहज भावुकता, वर्जित प्रेम ज्वार, पुनः एक विस्फोट कहीं की नहीं रह जाती है वह सारी तथाकथित आधुनिकताएं ताक पर रखी रह जाती हैं, दकियानूसी हवाएं बवण्डर पैदा कर देती हैं. समाज इतना उदार नहीं कि इसके सत्य को सहन कर सके. हारकर उसे एक झूठ ओढ़ना पड़ता है. मतलब गर्भपात-वैधानिकता का नारा मात्र लगा देने से ही तो काम नहीं चल जाता, सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल जो जुड़ा रहता है. सब कुछ लुके-छिपे ही करना पड़ता है. जिनको यह सुविधा नहीं मिल पाती है, उनके लिए आत्महत्या करना ही एकमात्र रास्ता रह जाता है. 

यातना-विवाह के बाद भी बीते कल का रहस्य खुल जाने के भय से कुछ नारियाँ विवाह नहीं कर पाती हैं. कुछ करके, पता चलने पर तलाक कर दी जाती है. ये हैं अभिशप्त भारतीय नारी की वेदना? कुछ भारतीय नारियाँ परिस्थितियों के थपेड़े खाती हुई मझधार में सदा-सर्वदा के लिए डूब जाती हैं वेश्या बन कर, इतना बड़ा दण्ड देता है समाज इन्हें. मगर गलती? ये सवाल पूछने का साहस भारतीय नारियों को कहाँ? खामोश और सुर्ख चेहरे के अन्दर दर्द का उमड़ता सैलाब छिपाए चलती-फिरती लाश बनी रहती है. जीने के नाम पर पल-पल मरती है, रोती है, मगर सुनता कौन है? कामुक समाज तो कामुकता की आग बुझाने में मशगूल है. इनकी वेदना की परवाह किसी को नहीं है. 

न्यायिक व्यवस्था में नारी के प्रति व्याप्त पूर्वाग्रह-भारतीय कानून पुरुषों के वर्चस्व का शिकार है. इसमें लगभग हर अपराध का फैसला प्रायः स्त्री के खिलाफ, यानी गोलबंद पुरुषों के पक्ष में चला जाता है. संयोगवश जब कभी ऐसा नहीं होता है तो ‘शाहबानो मुकदमे’ की तरह पुरुष वर्ग लामबंद होकर फैसले को अपने पक्ष में करवा लेता है. माननीय उच्चतम न्यायालय ने मना किया तो केन्द्र सरकार ने नारी के हक में किए गए फैसले को पलटने के लिए कानून ही बदल दिया. गिरोहबंदी के इस अंधे दौर में भारतीय नारी की वेदना और भी अधिक पीडादायक बनकर सामने आती है. 

बलात्कार और व्यभिचार की वेदना व कानूनी प्रावधान-व्यभिचार और बलात्कार कानून में इतनी खामियाँ हैं कि अभियुक्त पुरुष वर्ग बेदाग और बाइज्जत रिहा हो जाता है 

और पीड़ित महिला को समाज में बदनामी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता. बलात्कार के मुकदमों में अभियुक्त पुरुष पैसे के बल पर योग्यतम वकील करता है और कानून के तथाकथित लम्बे पंजों से बच निकलता है, क्योंकि न्याय और कानून के तिलस्म और भूलभुलैया में आरोपी के बाइज्जत बच निकलने के तमाम रास्ते मौजूद है. पीड़ित महिला की रजामंदी का बहाना लेकर या उस पर बदचलनी का गलत आरोप चस्पा कर अभियुक्त पुरुष बड़ी आसानी से कानून के कमजोर पंजों से बच निकालता है. पीड़िता नारी के लिए बलात्कार की वेदना तब और भी गहरी हो जाती है जब अदालत में विरोधी पक्ष के वकील के अटपटे और चटपटे व निर्लज्जतापूर्वक किए जा रहे फालतू प्रश्नों का उत्तर उसे देना पड़ता है. 

इन सब बातों का दुष्प्रभाव यह हुआ है कि महिलाएं बलात्कार किए जाने के बावजूद पुलिस और अदालत की शरण में फरियाद लेकर जाना नहीं चाहतीं. कुछेक महिलाएं यदि हिम्मत करके थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने जाती हैं तो पापी पुलिसकर्मी उसे हिकारत की नजर से देखते हैं, बलात्कार की फरियाद लेकर पहुंची पीड़िता को वहाँ भी बलात्कार से मुक्ति नहीं मिलती. जो महिलाएं पुलिसकर्मियों की प्रताड़ना सहकर भी रपट दर्ज कराने में कामयाब हो जाती हैं, उन्हें अदालत में बैठे काले चोंगे के भीतर काला दिल रखने वाले चन्द वकीलों के यातनापूर्ण और कामलोलुप प्रश्नों को सहन करना पड़ता है. महिलाओं के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध निरन्तर बढ़ ही रहे हैं. वर्तमान न्यायिक व्यवस्था अपराधियों को सबक सिखाने लायक कठोर दण्ड देने में असमर्थ है. इस वेदना को नारी कैसे बर्दाश्त करे? 

वेश्या, कॉलगर्ल या चरित्रहीन कही जाने वाली औरतों के साथ बलात्कार करना कानूनन कोई अपराध नहीं है. माननीय न्यायालयों ने भी केवल प्रतिष्ठित महिलाओं से किए गए चन्द बलात्कारों को ही गंभीरता से लिया है. भारतीय नारी के एक बहुत बड़े हिस्से का दुर्भाग्य यह है कि गरीब, हरिजन, आदिवासी आदि श्रेणी की महिलाओं को भी व्यावहारिक धरातल पर वेश्या, कॉलगर्ल व चरित्रहीन कही जाने वाली औरतों के साथ कानून की व्यापक परिधि से बाहर रखा गया है. उदाहणार्थ-बहुचर्चित ‘पड़रिया काण्ड’, ‘मथुरा काण्ड’, ‘सुमन काण्ड’, ‘भोपाल का मिश्रा काण्ड’-इन सभी बलात्कार के मामलों में आरोपी पुलिसकर्मी सिर्फ इस कारण छूट गए या सजा कम हुई, क्योंकि पीड़ित महिलाओं को संदिग्ध चरित्र का माना गया. इसी बिना पर ‘सुमन काण्ड’ में अभियुक्त पुलिसकर्मियों की सजा की अवधि दस वर्ष से घटाकर पाँच वर्ष कर दी गई. भारतीय नारियाँ इन वेदनाओं को सहन करने को बाध्य है. 

दिल्ली की नैना सैहगल हत्याकाण्ड न मालूम कब न्याय पा सकेगा? प्रचलित कानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देता है, परन्तु आतंकित व पीड़ित अधिक करता है. अतः कानून में संशोधन किए जाने के अतिरिक्त यह भी परमावश्यक है कि माननीय न्यायमूर्तियों का दृष्टिकोण भी बदले. नारी के समक्ष उत्पन्न समस्याओं, परेशानियों व चुनौतियों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर अपना निर्णय दें. नारी के प्रति सकारात्मक सोच रखकर ही नारी की वेदनाओं को कम किया जा सकता है. यह हमारा फर्ज भी है और वक्त की माँग भी. 

‘पड़रिया काण्ड’ के बारे में माननीय अदालत के फैसले से ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे न्यायाधीश महोदय की नजर में गरीबी चरित्रहीनता है. क्या इससे सहमत हुआ जा सकता है? वधू-दहन से सम्बन्धित ‘सुधा गोयल हत्याकाण्ड’ के अभियुक्त माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दण्डित किए जाने के निर्णय के बाद भी लगभग 28 महीने तक खुलेआम घूमते रहे थे. पटना की ‘श्वेतनिशा उर्फ बॉबी हत्याकाण्ड’, भागलपुर के ‘पापरी बोस अपहरण काण्ड में अभियुक्तों को कड़ी सजा न मिलना जैसी अनेक घटनाएं हैं, जिससे कानून की कमजोरियों और पुलिस व्यवस्था की अकर्मण्यता व अक्षमता का पता चलता है. इस तरह जाहिर है कि भारतीय नारी की वेदना को सुनने वाला कोई नहीं है. न परिवार, न समाज, न पुलिस और न ही अदालत. 

व्यभिचार सम्बन्धी कानून, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 397 में भी कई खामियाँ हैं. भारतीय नारी की इससे बढ़कर वेदना और क्या हो सकती है कि उपर्युक्त कानून के अनुसार पति की अनुमति या सहमति प्राप्त कर लेने के बाद उसकी पत्नी से व्यभिचार कानूनन अपराध की श्रेणी में नहीं आता. इसमें पत्नी ही अपराधी मानी जाती है, अगर पति की रजामंदी न हो. ऐसा अमानवीय कानून तो कानून के नाम पर कलंक है, परन्तु यदि पति किसी अन्य स्त्री से सहवास करे तो कोई अपराध नहीं. कितना विरोधाभास है कानून में यदि व्यभिचार गलत, अनैतिक और गैरकानूनी है तो क्या पुरुष और क्या स्त्री, सबके लिए निषेध होना चाहिए था. मगर विभेद कायम है, 

इसी प्रकार गुजारे भत्ते से सम्बन्धित कानूनी प्रावधानों में भी कई कमियाँ हैं, जो इसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाली महिलाओं की वेदना को बढ़ाती हैं. अगर पति किसी भी तरीके से यह सिद्ध कर दे कि उसकी पत्नी ने किसी गैर मर्द के साथ सहवास किया है तो उसे गुजारा भत्ता नहीं देना पड़ेगा. विधि आयोग (Law Commission) ने भी इस कानून की विसंगति की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया था, परन्तु उपर्युक्त कानून में अभी तक एतद् विषयक कोई संशोधन नहीं हुआ है. कुल मिलाकर कानूनी स्थिति आज यह है कि पत्नी पति की सम्पत्ति है, वह चाहे तो खुद इस्तेमाल करे और चाहे तो अपने मित्रों, रिश्तेदारों या वरिष्ठ अधिकारियों की खिदमत में उसे परोस दे. ऐसा अमानुषिक आचरण? 

इसी तरह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Indian Evidence Act, 1872) के अनुसार पति की मृत्यु या तलाक के 280 दिनों के भीतर जन्मा शिशु ही वैध होगा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस कानून में व्याप्त कमियों को स्वीकारता है. गर्भाधान की अवधि (Gestation period) 280 दिनों के उपरान्त चन्द हफ्ते बाद भी शिशु का जन्म हो सकता है. 280 दिनों के उपरान्त उत्पन्न शिशु को अवैध करार देना नवीनतम वैज्ञानिक अन्वेषणों के उपयोग को नकारना है. वैसे आदर्श स्थिति तो यही है कि उत्पन्न शिशु सिर्फ नवजात शिशु होता है. न वैध, न अवैध. यह तो समाज और कानून है जो इन्हें वैध और अवैध घोषित कर अपनी सम्प्रभुता को बनाए रखने का प्रयास करता है. जब इन तथाकथित वैध और अवैध शिशु के जन्म की प्रक्रिया एक ही है तो यह विभेद क्यों? 

भारतीय नारियों के शोषण के कई अन्य रूप भी हैं, जो कानून के शिकंजे से बाहर हैं और जिनके लिए विधवा विवाह निषेध, बाल-विवाह, बेमेल विवाह, लड़कियों को बेचना, भ्रूण परीक्षण के उपरान्त लड़की होने पर गर्भपात करा देना, बहुओं को जला देना आदि अनेक अमानवीय कृत्य परम्परानु-मोदित बन चुके हैं. विडम्बना यह है कि नारियों के प्रति पारिवारिक अत्याचारों में सास, नन्द आदि के रूप में नारियाँ प्रमुख भाग लेती हैं. नारी नारी की दुश्मन न हो तो सुधार की सम्भावना अधिक हो सकती है. 

कामकाजी महिलाओं की वेदना-दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं की वेदना तो और भी अधिक है. न चाहते हुए भी माँ को अपने बच्चों को बालानुरक्षण केन्द्र (Crache) में छोड़ना पड़ता है. सारा दिन उन्हें अपने बच्चे की ही चिन्ता लगी रहती है-उसने कुछ खाया-पिया या नहीं? कहीं बीमार न हो जाए? फिर दफ्तर जाने से पहले और आने के बाद घर का सारा काम. कामकाजी महिलाएं एक मूक मशीन के समान सुबह से देर रात तक काम में लगी रहती है और बदले में क्या पाती है? वही तनाव, चिड़चिड़ापन, कमजोरी और थोड़ी सी आर्थिक आजादी. पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से पहले वह घर के अन्दर ही गुलाम थीं, परन्तु नारी की सारी समस्याओं की जड़ अर्थ को मानने की अंध-प्रवृत्ति ने उसे घर के बाहर भी गुलाम बना दिया है. घर के बाहर दफ्तर या काम पर गई हुई स्त्री का चेहरा बाहर वालों की नजर में रोबीला और गर्वीला होता है, किन्तु घर की दहलीज में पाँव रखते ही वही चेहरा पर्स के साथ आलमारी में बंद हो जाता है. घर में वह घिघियाई सी, हाथ पसारे सी, या फिर उसका व्यक्तित्व कुछ और ही होता है. बहुत सारे लोग अपनी पत्नी को नजरंदाज करते रहते हैं. उनके पास इतना भी वक्त नहीं होता कि वे अपनी पत्नी को प्यार के दो मीठे बोल कह सकें. आज के दौर की अधिकतर भारतीय नारियाँ इस तरह की वेदना झेलने को अभिशप्त हैं. इन नारियों का दुर्भाग्य यह रहता है कि इनकी जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है. दफ्तर आदि में काम तो करती ही हैं, घर में काम करने की जिम्मेदारी ज्यों की त्यों बनी रहती है-बच्चों की देखभाल, पति की सेवा, भोजन बनाना आदि. 

बाल्यावस्था में भारतीय बाला पिता के संरक्षण में रहती है. युवती होने पर पति ही उसका स्वामी, मालिक व तारणहार है. वह खुद को पति के चरणों की दासी मानती है. पति की खुशी को ही वह अपनी खुशी समझती है. वृद्धा होने पर वह अपने पुत्र के रहमोकरम पर जीती है. इस कारण, अधिकतर भारतीय नारियों के प्रभावी व्यक्तित्व के विकास का मौका ही नहीं मिलता. यही है नारी की अपार वेदना.

उपसंहार 

भारतीय नारी की व्यथा का वर्णन क्या करें? प्राचीनकाल में सीता और द्रौपदी जैसी साध्वी नारियों को युद्ध का कारण माना गया, पूर्व-मध्यकाल में उपेक्षणीय और त्याग की वस्तु तथा उत्तर-मध्यकाल में विलास और मनोरंजन की सामग्री. समकालीन भारतीय नारी की समस्याओं में काम-कुंठा, संत्रास, अजनबीपन, स्वतंत्र सम्बन्ध की इच्छा-आकांक्षा, पुरुषों से स्वतंत्रता की बलपूर्वक माँग और इसके लिए किए गए विविधरूपी संघर्ष आदि बाते मुख्य है. 

आम भारतीयों के मन में स्त्री का जो आदर्श रूप एक बीज की तरह बोया जाता है, वह जीवन की सहजता को भंग करता है. अस्मिता संकट के नाम पर समकालीन नारी को दबाए जा रहा है और वह नवती-संभलती अपने पाँव जमाने की पुरजोर कोशिश कर रही है. 

भारतवर्ष में नारियों को सम्मान अवश्य मिलता रहा है, लेकिन सब कुछ पुरुषों द्वारा ही नियंत्रित होता रहा है. औरत यहाँ या तो पर्दे की रानी है या फिर एक शीलवती प्रतिमा जो पुरुषों के समक्ष अपना सिर नहीं उठाती. आजादी के बाद जब हमारे देश में नारियों ने पश्चिम से प्रभावित और जाग्रत होकर पुरुषों की समकक्षता पानी चाही है तो उन्हें विद्रोह संघर्ष एवं टूटन-विघटन के दौर से गुजरना पड़ रहा है. 

द्रौपदी की चीख समकालीन नारी की चीख है. समाज के अमानुषी दुःशासनों का अन्त जाने कब होगा? आज की नारियों की नीलामी उनके नशाखोर जुआरी और शराबी पतियों द्वारा की जाती है. यह बन्द होनी चाहिए. इन समस्त वेदनाओं से मुक्त होने के लिए नारी को स्वयं संगठित होकर संघर्ष करना होगा. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

20 − 12 =