भारतीय समाज और बुद्धिजीवी पर निबंध |Essay on Indian Society and Intellectuals

भारतीय समाज और बुद्धिजीवी पर निबंध

भारतीय समाज और बुद्धिजीवी (Indian Society and Intellectuals

दिमागी काम करने वाले व्यक्ति बुद्धिजीवी कहे जाते हैं अर्थात् जो लोग पुरुषार्थ करने के लिए अपने शारीरिक श्रम की अपेक्षा अपने बुद्धि बल को अधिक काम में लाएँ वे साधारणतः बुद्धिजीवी कहे जाते हैं. यह ध्यान रखना चाहिए कि श्रमिक और बुद्धिजीवी सापेक्षिकता सूचक शब्द हैं. वकील, डॉक्टर, अध्यापक, क्लर्क, मुनीम, सरकारी अफसर, पत्रकार, नेता आदि सब बुद्धिजीवी हैं. 

सामाजिक दायित्व के प्रति बुद्धिजीवियों की भूमिका की सुनिश्चित परम्परा वस्तुतः भारत में पुनर्जागरण काल से उपलब्ध होती है. इस काल में स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, आदि विभूतियों ने अपने सामाजिक दायित्व के प्रति महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, छुआछूत- जाति प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों के प्रति विरोध में इन्होंने अपनी आवाज़ ही बुलन्द नहीं की, बल्कि आन्दोलन भी किए. पूर्ण स्वराज की माँग को लेकर क्रान्ति का बिगुल बजाने वाले बुद्धिजीवी देशभक्तों की पंक्ति बहुत लम्बी है. राष्ट्रीय गौरव को लेकर भारत में नवचेतना उत्पन्न करने वाले हैं-अरविन्द, रवीन्द्र, श्रीमती एनी बेसेंट, आदि अनेक मनीषी हमारे सामने आते हैं. देश और समाज के नाम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में भारत के बुद्धिजीवी कभी पीछे नहीं रहे.

बुद्धिजीवियों की वर्तमान दुर्दशा 

यह तथ्य अपनी जगह सही है कि आज बुद्धिजीवी अपनी भूमिका के प्रति न्याय नहीं कर रहा है. समाज बुद्धिजीवी से जिस नेतृत्व की आशा करता है, वह उभर कर नहीं आ रहा है. बुद्धिजीवियों की भूमिका को लक्ष्य करके विगत वर्षों में काफी विवाद रहा है और विचार विनिमय भी हुआ है. 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्त क्षेत्रों में परिवर्तन की हवा आई और अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति बुद्धिजीवियों को अधिक गहन-गम्भीर बोध हो गया और वे देश के लोगों के प्रति देश के ही लोगों द्वारा किए जाने वाले अन्याय, भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध आवाज उठाने लगे थे, परन्तु वोट की राजनीति ने धीरे धीरे समस्त वातावरण को दूषित कर दिया. फलतः आज का बौद्धिक वर्ग सर्वथा उपेक्षित होकर अनेक सीमाओं में सिमटता जा रहा है. राजनीति के सर्वव्यापी प्रभाव एवं राजनीतिक सत्ता के केन्द्रीकरण ने बुद्धिजीवी को प्रायः बौना बनाकर रख दिया है. पूँजीवादी शक्ति ने उसे नौकर जैसी स्थिति में पहुँचा कर उनकी पहचान को प्रायः समाप्त कर दिया है, बुद्धिजीवी की सामाजिक चेतना उपेक्षित हो गई है. 

सत्ता, शक्ति, मान-सम्मान, पुरस्कार, अलंकार आदि के प्रलोभनों एवं प्रभावों ने बुद्धिजीवी को सरकार का मुखापेक्षी बना दिया है. देश में बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ उभरती रहती हैं, परन्तु बुद्धिजीवी अपने दायित्व बोध के प्रति उदासीन दिखाई देता है. स्वार्थवश अथवा विवशता के कारण वह सत्ता, सम्मान, आर्थिक लाभ के मकड़ जाल में फँसकर निर्जीव-सा हो गया है, वह अपने उत्तरदायित्व के प्रति न्याय करने में असमर्थ हो गया है. 

हमारी राष्ट्रीय सरकार के कार्यक्रम के अन्तर्गत बुद्धिजीवियों के हितार्थ वस्तुतः कोई स्थान नहीं है. जितनी भी कल्याणकारी योजनाएँ हैं, वे सबकी सब ग्रामोत्थान अछूतोद्धार, हरिजन-कल्याण, अल्पसंख्यक रक्षण जैसे कार्यक्रमों को लेकर चलने वाली हैं. इसके मूल में मुख्यतः दो कारण हैं—पहला कारण तो है वोट की राजनीति. बुद्धिजीवियों की संख्या इतनी कम है कि उनकी उपेक्षा आसानी से की जा सकती है. यह वर्ग यदि सरकार से असन्तुष्ट भी हो तो क्या कर लेगा ? इस वर्ग के पास न तो धन बल है और न ही भुज बल. धन बल के वह तथाकथित पिछड़े हुए एवं अल्पसंख्यक लोगों का ध्यान रखती है. राजनीति प्रधान सामाजिक व्यवस्था में बुद्धिजीवियों की आवाज नक्कारखाने में तूती से अधिक नहीं हो सकती है. दूसरा कारण है—व्यवहार कुशलता सम्बन्धी दूरदर्शिता. बुद्धिजीवी वर्ग को किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन देना हमारी सरकार साँप को दूध पिलाना समझती है. वह जानती है कि बुद्धिजीवी एक जागरूक और विवेकशील व्यक्ति होता है. इसी वर्ग ने स्वतन्त्रता आन्दोलन का संचालन करके ब्रिटिश सत्ता को भारत छोड़ने के लिए विवश किया था. यह वर्ग यदि सक्रिय हो गया तो हमारी भी मुसीबत कर देगा. इस वर्ग को औचित्यानौचित्य का भी ज्ञान है. इस वर्ग के वोटों को भी आसानी से नहीं खरीदा जा सकेगा. जो भी बुद्धिजीवी सरकारी नौकरियों में चले गये हैं, वे अनेक कारणोंवश वैसे ही सरकार के विरुद्ध न बोलते हैं और न बोल सकते हैं. विभिन्न समितियों के सदस्य, अध्यक्ष आदि बनाकर, नए-नए खोले जाने वाले विभागों के अध्यक्ष या निदेशक बनाकर, विभिन्न योजनाओं की परामर्शदात्री समितियों के परामर्शदाता बनाकर, विश्वविद्यालयों के कुलपति बनाकर सरकार ने अनेक प्रभावशाली बुद्धिजीवियों को सहज ही अपना पक्षधर और हिमायती बना लिया है. 

यदि बुद्धिजीवी अपने कर्तव्यों को पूरा करना भी चाहे तो उसके पास इसके लिए कोई समुचित मार्ग भी नहीं है. प्रचार के समस्त माध्यमों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में सरकार का नियन्त्रण बना रहता है. बुद्धिजीवी के स्वतन्त्र अथवा राजनीति निरपेक्ष विचारों को प्रकाशित कोई क्यों करने लगा? हमारे समाचार पत्र उन लोगों के विचारों को स्थान देते हैं जो उन्हें विज्ञापन और कागज का कोटा प्राप्त कराते हैं अथवा प्राप्त कराने में सहायक होते हैं अथवा निकट भविष्य में सहायक हो सकते हैं. सर्वाधिक विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि चुनाव प्रक्रिया इतनी अधिक व्ययसाध्य एवं समूह सापेक्ष हो गयी है कि बुद्धिजीवी चुनाव के मैदान में उतरने की बात सोच भी नहीं सकता है. हमारे देश में तो वोट और नोट की भाषा को ही समझा जाता है तथा भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का दर्जा प्राप्त है. जिन प्रजातान्त्रिक आदर्शों की दुहाई हमारे नेतागण देते रहते हैं, वे केवल नारे मात्र हैं, दिखावा मात्र हैं, अबोध जनता को बहकाने की भूल-भूलैया मात्र हैं. वस्तुस्थिति यह है कि वर्तमान भ्रष्ट राजनीति के वातावरण में जीवन मूल्यों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में बुद्धिजीवी बहुत ही सीमित योगदान कर सकता है. स्थिति परिस्थिति प्रतिकूल एवं विषम होने पर भी यह तो मान्य नहीं हो सकता है कि बुद्धिजीवी अपने कर्तव्य की उपेक्षा करें तथा समाज के प्रति उदासीन हो जाएँ. वे वस्तुतः हैं भी नहीं. कतिपय विवशताओं ने वस्तुतः उनकी जबान पर ताला लगा दिया है. अन्यथा वे यदि यह न सोचें कि उन्हें क्या मिलेगा, क्या लाभ होगा और केवल कर्तव्य-भावना से ही कार्य करें तो हम समझते हैं कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं.

अवसरवाद का परित्याग 

ऐसे भी अनेक बुद्धिजीवी देखे जा सकते हैं जो अपने आपको अप्रतिबद्ध एवं तटस्थ कहते हैं, परन्तु अपनी सुविधाओं एवं अपने स्वार्थों के लिए सत्ताधारी दल की विचारधारा और नीतियों के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए तनिक भी नहीं झिझकते हैं. सही बात तो यह है कि प्रतिबद्धता व्यक्ति को चारित्रिक दृढ़ता प्रदान करती है और हाँ में हाँ मिलाने के प्रति निषेध करती है. आपातस्थिति की अवधि में तो बौद्धिक तटस्थता के अनेक दावेदारों की कलई खुल गई थी. सरकारी नीतियों के एक बहुत ही प्रबल कम्युनिस्ट आलोचक ने आपातस्थिति के दौरान अपनी जान बचाने के लिए सरकार की खुशामद में अखबार में इस प्रकार से अपने विचार प्रकट किए थे कि “आपातकालीन स्थिति के दौरान कुछ ज्यादतियों का होना अनिवार्य था और देश की विशालता और जनसंख्या को देखते हुए उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं कही जा सकती.” आपातकालीन स्थिति में अधिकांश बुद्धिजीवियों का व्यवहार इसी प्रकार का रहा था. बुद्धिजीवी स्वयं विचार करें कि बौद्धिक तटस्थता के प्रति वह ईमानदार हैं या नहीं. बुद्धिजीवी की रीढ़ की हड्डी में दम होगा, तभी उसकी वाणी में बल आएगा और तभी लोग उसकी बात सुनना पसन्द करेंगे. अवसरवादिता ने बुद्धिजीवियों के जीवन को सुविधापूर्ण अवश्य बनाया है, परन्तु सामाजिक दृष्टि से उनका अवमूल्यन भी कर दिया है. प्रसिद्ध विधिवेत्ता श्री पालकीवाला ने कोयले की खानों के राष्ट्रीयकरण के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में अपनी श्रेष्ठ बौद्धिकता का उपयोग करते हुए कहा था कि 

“यदि देश में निजी सम्पत्ति का अधिकार सुरक्षित नहीं रहेगा तो विचार प्रकाशन और नैतिक चेतना के अधिकार भी अक्षुण्ण नहीं रह सकेंगे. यह वक्तव्य एक बुद्धिजीवी की बौद्धिक ईमानदारी का द्योतक है.

सत्य निष्ठापूर्वक कर्त्तव्यपालन 

अधिकांश बुद्धिजीवी दो मुखौटे रखते हैं—एक अपने ड्राइंग रूम तथा होटल-मोटल की मेज के लिए और दूसरा सार्वजनिक स्थानों के लिए, यह प्रयोग अनुचित है. वे कम-से-कम इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने विचारों की अभिव्यक्ति करते समय एकरूपता और ईमानदारी बरतने के अभ्यस्त हों. बुद्धिजीवी अत्यधिक सुविधावादी होने के मोह को त्यागकर अभिव्यक्ति की ईमानदारी के महत्त्व को समझ सकें तो हमारे देश का भविष्य बहुत कुछ निरापद बन जाये और समाज के अर्द्ध सभ्य वर्ग को सही दिशा-निर्देश सम्भव हो जाए. सच्चा बुद्धिजीवी वही हो सकता है, जो बुद्धि विवेकसम्मत बात कहे और काम करे तथा सत्य का उद्घाटन एवं उद्घोष पूरी निर्भीकता के साथ करें तथा सत्यान्वेषण के नाम पर पद को महत्त्वहीन समझे. कथनी और करनी के मध्य सामंजस्य बुद्धिजीवी का आवश्यक लक्षण है. गांधी, श्री विवेकानंद आदि के नाम लेने वाले तथा उन्हें उद्धृत करने वाले बहुत व्यक्ति मिल जाते हैं, परन्तु उनके अनुसार आचरण करने वाले कितने लोग सामने आते हैं ? दूसरी ओर हमारे साहित्यकार अखाड़े और कैम्पों की राजनीति में उलझ गए हैं. वे वादों के चरागाह में मग्न होकर जुगाली कर रहे हैं. 

इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि आज बुद्धिजीवी वर्ग की स्थिति विवशतापूर्ण, संघर्षपूर्ण और कहीं कहीं निन्दनीय मोड़ों से गुजरने वाली बन गई है. उसके चारों ओर एक कुहासा सा छा गया है. अब तो सवर्ण को मनुवादी कहकर उस पर कहर बरपाया जाता है, वह कुहासा शीघ्र ही हट जाएगा ऐसा, विश्वास हमें रखना चाहिए. 

इतिहास इस तथ्य को कभी अनदेखा नहीं कर पायेगा कि “सामाजिक संक्रान्ति के इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी, बुरे लोगों का चीत्कार नहीं, अपितु भले लोगों की चुप्पी रही है.” स्वनाम धन्य स्व. डॉ. एस. राधाकृष्णन का यह कथन हमारे बुद्धिजीवियों को प्रेरणा प्रदान करने वाला होना चाहिए—“यह संसार वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा नहीं, बल्कि मूल्यवान विचारों द्वारा चलता है.” 

बुद्धिजीवी वर्ग समाज की रीढ़ होता है. समस्त कलाकृतियों की रचना तथा वैज्ञानिक अनुसन्धान उसी के हाथों सम्भव हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे. बुद्धिजीवी वर्ग सदैव से विभिन्न क्षेत्रों में देश और समाज का नेतृत्व करते आये हैं, यहाँ तक कि क्रान्तियों के बिगूल भी उन्होंने ही बजाये हैं. हम स्वयं देख सकते हैं कि फ्रांस की क्रान्ति, रूस की क्रान्ति, इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति से लेकर चीन की हरित क्रान्ति, और भारत को स्वतन्त्रता प्राप्ति तक के संग्राम, सबका नेतृत्व बुद्धिजीवियों ने ही किया है. बुद्धिजीवी वस्तुतः समाज शरीर के मस्तिष्क तथा विश्व विकास योजना के हृदय हैं. बुद्धिजीवी वर्ग का महत्व निर्विवाद है. उन्हें अपने महत्वपूर्ण स्थान एवं दायित्व के प्रति जागरूक एवं सावधान होना चाहिए. उनके द्वारा अपने दायित्वपूर्ण कर्तव्य-पालन पर ही हमारे प्रजातन्त्र का भविष्य अवलम्बित है. बुद्धिजीवी यदि अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीनता दिखायेंगे तो हमारे राष्ट्र का अस्तित्व संकटग्रस्त हो जायेगा जिसके लिए भावी सन्तान उन्हें कभी क्षमा नहीं कर सकेगी. हमें पूर्ण विश्वास है कि वे अपनी दायित्वपूर्ण भूमिका के प्रति सजग हो गये हैं.

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