भारतीय ग्रामीण जीवन पर निबंध | Essay on Indian Rural Life in Hindi

भारतीय ग्रामीण जीवन पर निबंध

भारतीय ग्रामीण जीवन पर निबंध | Essay on Indian Rural Life in Hindi

जगमग नगरों से दूर-दूर, है जहाँ न ऊँचे खड़े महल,

टूटे-फूटे कुक कच्चे घर, दिखते खेतों में चलते हल ।

पुरई पालों, खपरैलों में, रहिमा रमुआ की नावों में,

है अपना हिंदुस्तान कहाँ? वह बसा हमारे गाँवों में। 

सोहनलाल द्विवेदी

किसी महानगर में चले जाएँ, तो आकाश को चूमनेवाली अट्टालिकाएँ शैतान की आँत की तरह डरावनी-भयावनी मालूम पड़ती हैं। शेषनाग ने करवट बदली, भूकंप का हलका झटका लगा और हजारों की जान पर आफत आई। किंतु, गाँवों में आकर देखें, छोटे-छोटे फूस और मिट्टी के घर कितने निरापद हैं। लगता है, बालक विधाता ने अपनी क्रीड़ा के लिए मनपसंद घरौंदे बनाए हैं।

मानव के पृथ्वीपुत्र कहलाने की सार्थकता कहाँ, यदि वह पृथ्वी की गोद में चिपका न रहे? आज का मानव भले ही गगनचारी हो जाए, वह गगननिवासी भले ही हो जाए, किंतु मूल से संबंध-विच्छेद कर उसकी दशा अमरलती की तरह हो जाएगी, अपनी गंगोत्री से विच्युत होकर उसकी जीवनधारा ही सूख जाएगी, इसमें संदेह नहीं। 

गाँवों में किसी ओर निकल जाएँ, लगेगा प्रकृति-रानी सोलहों श्रृंगार कर निकल पड़ी है। खेतों में दूर-दूर तक उसका रेशमी दुपट्टा बिखरा हुआ है, जिसमें सूर्य की सुनहरी किरणें गोटे-सी जड़ दी गई हैं। सरसों के सुहावने पीले फूल उसमें तारे-से जड़े हैं, जौ-गेहूँ की बालियाँ तथा मटर की फलियाँ किसी कशीदागर की कशीदाकारी-सी मालूम पड़ती है। हरसिंगार और रजनीगंधा के फूल उसकी मुस्कराहटों-से झर रहे हैं, केवड़े की सुगंध उसके केशपाश से उड़नेवाली भीनी-भीनी गंध है, झलकते ओसकण उसके नाजुक बदन पर पसीने की नन्हीं बूंदों की तरह उभर आए हैं। सुमित्रानंदन पंत ने अपनी ‘ग्रामश्री’ कविता में ग्रामजीवन की इस नैसर्गिक सुंदरता का बड़ा सटीक वर्णन किया है 

फैली खेतों में दूर तलक

मखमल की कोमल हरियाली

लिपटी जिससे रवि की किरणें

चाँदी की-सी ऊजली जाली।

तिनकों के हरे-हरे तन पर

हिल हरित रुधिर है रहा झलक,

श्याम भूतल पर झुका हुआ। 

नभ का चिर निर्मल नील फलक।

हमारे ये ग्राम क्या हैं? ये और कुछ नहीं हैं, मानव-जीवन के वृहत् ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों के पृष्ठ हमारे अन्नदाता किसान हैं, जो अपने खेतों की यज्ञशाला में अपने स्वेद की समिधा चढ़ाते रहते हैं। यदि आप चाहें, तो इन्हीं एडी-चोटी का पसीना एक नेवाले कृषकों में भगवान के दर्शन कर सकते हैं-जैसा महाकवि रवींद्रनाथ ने कहा है। ये ग्राम प्रकृति की पुष्पवाटिका के पवित्र मंडप हैं।

इन्हीं में हमारी सभ्यता का इतिहास सुरक्षित है, संस्कृति की गाथा आलेखित है, यहाँ की मिट्टी पता के तपश्चरण से दीप्त है; यह कामधेनु-सी फलप्रदा है, पारिजात से भी अधिक सुरभिवाली है, कुंकुम से भी अधिक अरुणवर्ण तथा मणिमुक्ता से भी अधिक मूल्यवती है। 

किंत, प्रकृति के इस चंदन-पालने में आज बहार कहाँ है? बादल की बिजली-सी मस्कराहटों के साथ इनकी मुस्कराहट क्या कहीं दिखाई पड़ती है? चाँदनी की लहर पर इनके जीवन में रोमांस कहाँ झरता है? लहराती आती मधुबयार के झोंके पर इनमें जीवन की मधुवेला कहाँ उतरती है? आल्हा और कजली की धुनों पर जीवन का संगीत कहाँ लहराता है? ढोल-झाँझ-मृदंग और खजरी के ताल पर जीवन का बोल कहाँ थिरकता है? रामायण की चौपाइयों पर जीवन में पवित्रता कहाँ टपकती है? ये सारे प्रश्न आज ग्रामजीवन के संदर्भ में बड़ी ही सहजता से उठते हैं। 

यह बात ठीक है कि स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में ग्रामसुधार के लिए बहुत-कुछ किया गया है। प्रखंडों के द्वारा ग्रामविकास की योजनाएँ बनाई गई हैं। दुष्प्रवेश्य ग्रामों तक सड़क पहुँचाने का प्रयत्न किया गया है। उन्हें पास के नगर से जोड़ने का प्रयास किया गया है। गाँवों में आज बिजली के फूल खिलते दीखते हैं, सिनेमाई गीत गली-गली में सुनने को मिलते हैं, किसान भी रेडियो और ट्रांजिस्टर का आनंद लेते हैं। बहुत सारे गाँवों में टेलीविजन भी पहुँच गया है।

अब गाँवों में अखबार भी आने लगे हैं, दूर देश का संदेश लाने के लिए अब कागा की चोंच को सोने से मढ़ाने का प्रलोभन देना बंद हुआ है, मनुष्य और पशु की चिकित्सा के लिए डॉक्टरों का प्रबंध किया गया है; बैलों की रुनझुन के साथ खेतों में पंपों और ट्रैक्टरों का कोलाहल भी सुनाई पड़ने लगा है; किंतु फिर भी गाँवों में आशानुकूल सुधार नहीं आ पाया है। ग्रामीण आज भी अंधविश्वास के ब्यूह में फँसे हैं, रूढ़ियों के पाशों को आज भी छिन्न नहीं कर सके हैं; आपसी वैमनस्य इन्हें दिन-ब-दिन तोड़ता जा रहा है, फूट और कलह, द्वेष और ईर्ष्या के कारण मारपीट मामूली बात है। इनका समय अब निंदा या कचहरियों में अधिक बीतने लगा है, अशिक्षा की राक्षसी से इन्हें मुक्ति नहीं मिल पाई है। गरीबी की तो बात ही मत पूछिए। 

किंतु, ग्रामों की दुर्दशा से बहुत निराश होना भी उचित नहीं है। हम यदि अपने गाँवों को सचमुच यूरोप और अमेरिका के गाँवों की तरह पूर्ण विकसित एवं सुविधा-संपन्न बनाना चाहते हैं, तो इसका दायित्व सरकार पर छोड़कर ही हमें निश्चित नहीं हो जाना चाहिए। आज ग्रामीण कृषकपुत्र ऊँची शिक्षा प्राप्त करके भी छोटी-छोटी नौकरियों के लिए शहरों में कार्यालयों की खाक छानते हैं। उन्हें स्नातक होकर खेतों में काम करना, गाँवों में रहना प्रतिष्ठा के प्रतिकूल मालूम पड़ता है।

धूलि में पले जीवन को अब खेतों की धूलि से नफरत होने लगी है। अब उन्हें मिट्टी की सोंधी गंध न भाकर डीजल-इंजन का धुआँ ही अधिक भाने लगा है-घर के धारोष्ण दूध की अपेक्षा उन्हें होटल की सड़ी चाय अच्छी लगने लगी है। गाँव की खुली हवा के बदले उन्हें शहरों की असूर्यंपश्या गलियाँ अधिक भाने लगी हैं। किंतु, उनकी यह मनोवृत्ति कतई ठीक नहीं। बच्चनजी ने ठीक ही कहा है 

जिसे माटी की महक न भाए

उसे नहीं जीने का हक है।

अतः, जब तक हमारे शिक्षित नवयुवक ग्रामों में नहीं रहते, वे रूढ़िमुक्त उन्मुक्त हृदय से जब तक ग्रामों में नया वातावरण निर्मित नहीं करते, तब तक ग्रामजीवन आकर्षक और अभिनव नहीं हो सकता। 


Essay on Indian rural life 

The bristles are far from the cities, where the palaces, not standing tall,

Broken cook raw house, plow walking through visible fields.

Puri sails, rags, rahima ramua boats,

Where is your India? He settled in our villages.

Sohan Lal Dwivedi

When you go to a metropolis, the skulls kissing the sky look like horrors-like devil’s bowels. Sheshnag changed sides, the earthquake struck lightly and caused thousands of casualties. But, come to the villages and see how safe the small pallet and mud houses are. The boy Vidhata seems to have made favorite gharaundas for his play.

Where is the significance of a human being called Prithviputra, if he does not stick in the lap of the earth? Even though today’s human may become sky-high, he may become a resident of the sky, but after breaking away from the original, his condition will be like that of Amarlati, his life stream will be withered by his Gangotri, no doubt.

Get out somewhere else in the villages, the nature-queen will leave after making up sixteen. His silk scarf is spread far and wide in the fields, in which the golden rays of the sun have been rooted. The beautiful yellow flowers of mustard are star-studded in it, barley-wheat earrings and pea beans seem to be embroidered by any embroidery. The flowers of Harsingar and Rajnigandha are bursting with her smiles, the fragrance of the kevda is a bittersweet odor flying through her hair, the shining Osakan has emerged like tiny drops of sweat on her delicate body. Sumitranandan Pant has described this natural beauty of village life very accurately in his ‘Gram Shree’ poem.

Spread far in the fields

Soft green velvet

Wrapped around

Like silver silver

On the greenish specks of spears

Hill green blood is glimpse,

Shyam leaned on the ground floor.

Nirmal Nil Plaque of the sky.

What are our villages? These are nothing else, are the great texts of human life. The pages of these texts are our Annadata peasants, who keep offering their sweat in the yagyasala of their fields. If you wish, you can see the sweat of these eddy-peaks in one of the peasants, as stated by Mahakavi Rabindranath. These villages are the sacred pavilions of nature’s Pushpavatika.

It is in these that the history of our civilization is safe, the saga of culture is written, the soil here is enlightened by the passion of the address; It is Kamadhenu-si fruitful, more fragrant than Parijat, more Arunavarna than Kunkum and more valuable than Manimukta.

Kint, where is today outside in this sandalwood cradle of nature? Does their smile appear with the lightning of the clouds? Where is the romance in their life on the moonlight? Where does the Madhubela of life descend on the wad of Madhubayar waving? Where does the music of life sway to the tunes of Alha and Kajali? Where does the words of life dance on the beat of drum-jingle-mridang and khajri? Where does the sanctity of life drip on the four-footed Ramayana? All these questions arise very easily in the context of village life today.

It is true that after independence, a lot has been done for village improvement in India. Village development plans are planned by the blocks. Efforts have been made to take the road to vicious villages. An attempt has been made to connect them with the nearby city. Today, electric blossoms are seen in villages, cinematic songs are heard in street, farmers also enjoy radio and transistors. Television has also reached many villages.

Now newspapers have also started coming to the villages, now the temptation to put Kaga’s beak with gold to bring the message of the distant country has stopped, doctors have been arranged for the treatment of man and animal; Along with the repercussions of bulls, the noise of pumps and tractors in the fields is also heard; But still there is no hope of improvement in the villages. The villagers are still trapped in superstition, they have not been able to break the stereotypes even today; Mutual rivalry is breaking them day by day, fighting due to divisions and discord, envy and jealousy is a minor matter. Their time is now passing more in condemnation or in courts, they have not been able to get rid of the demons of illiteracy. Do not ask about poverty.

But it is also not appropriate to be very disappointed with the plight of the villages. If we really want to make our villages fully developed and convenient like the villages of Europe and America, then we should not be sure of leaving the responsibility to the government. Today, even after getting higher education, the rural agricultural farmers search the offices in cities for small jobs. After graduating, working in the fields, living in villages seems to be contrary to reputation.

Life in dust has now started to hate the dust of fields. Now they have not smelled the smell of soil, but the smoke of diesel-engine has started getting more fine – they have liked the rotten tea of ​​the hotel more than the milk of the house. In lieu of the open air of the village, they have started to get more insecure streets of the cities. But his attitude is not good at all. Bachchanji has rightly said

Who does not like the smell of soil

He has the right not to live.

Therefore, unless our educated young men live in villages, they cannot be attractive and innovative until they create a new environment in the villages with a conservative free heart.

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