भारतीय किसान पर निबंध । Essay on Indian Farmer in Hindi

भारतीय किसान पर निबंध

भारतीय किसान पर निबंध । Essay on Indian Farmer in Hindi

जिस देश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ किसान हों, जिसकी जनसंख्या की चादर का प्रायः आठ-बटा दस भाग किसानों के द्वारा बुना जाता हो, जो किसान ब्रह्मा की तरह उत्पादन करते हों और विष्णु की भाँति परिपालन, उन्हीं का जीवन रुदन का आख्यान हो, आँसुओं का आप्लावन हो-यह बड़ा आश्चर्यकर प्रतीत होता है। 

जोड़ों को जड़ बना देनेवाली जाड़े की सुबह हो, लू की लपटों से दिग्दिगंत को झुलसा देनेवाली ग्रीष्म की उदास दोपहरी हो अथवा बिजली की नागिनें गिराती बरसात की भयानक रात हो, हमारे किसान महान साधक की भाँति अपनी साधना में संलीन रहते हैं। सरदार पूर्णसिंह ने कहा है कि उनका खेत ही उनकी हवनशाला है, जिसमें वे अपने शरीर का ही हवन किया करते हैं। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस अग्नि की चिनगारियों की उपज हैं।

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कर्मयोगी किसान को न तो वनिता की ममता है, न सुत का स्नेह ही खींचता है। उषा की पहली किरणों का अभिनंदन वह अपनी मेड़ पर करता है। अस्ताचलगामी किरणों का पूजन वह चरागाह से लौटकर आती हुई गायों की ग्रीवाओं में बजनेवाली घंटियों से करता है। उसके लिए उसका खेत ही मंदिर है, मस्जिद है, गुरुद्वारा है। उसके जीवन में मनोरंजन का स्थान नहीं, विश्राम का कोई प्रोग्राम नहीं। ऋतुओं के बरछे-पर-बरछे खाकर भी उसका वज्रशरीर अपनी एकलव्य साधना में लीन रहता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही कहा है 

बरसा रहा है रवि अनल भूतल तवा-सा जल रहा,

है चल रहा सन-सन पवन तन से पसीना ढल रहा।

तब भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं, 

किस स्वार्थ के हित वे अहो लेते नहीं विश्राम हैं?

भारतीय कषकों की दीनावस्था के एक नहीं, अनेक कारण हैं। पहला कारण है उनकी बेहद गरीबी। इस गरीबी के कारण ही वे खेती के आधुनिक और विकसित उपकरण खरीद नहीं पाते, वे न सिंचन का प्रबंध कर पाते हैं, न खेतों में उर्वरक डाल पाते हैं, न उत्तम बीज खरीद पाते हैं। दूसरा कारण है उनकी घोर अशिक्षा। अशिक्षा के कारण ही वे रूढ़ियों के दास बने हुए हैं। उनकी धारणा है कि उर्वरक डालने से कुछ दिनों के बाद भूमि बंध्या हो जाएगी;

अतः अच्छा है कि खेत को सर्वदा प्रसूता बनाने के लिए उसमें खाद न डाली जाए। चूँकि उनमें शिक्षा नहीं है, इसलिए वे गोबर के महत्त्व को भी नहीं जानते। वे वैसे उत्तम पदार्थ के गोइठे बना डालते हैं। मवेशी के द्वारा छोड़ी गई घास से वे कंपोस्ट बनाना नहीं जानते। वे कृषि-संबंधी पत्रिकाएँ नहीं पढ़ते, इसलिए उत्तम कृषि की पद्धतियों से परिचित नहीं हैं। वे उत्तम प्रकार के बीजों की जानकारी भी नहीं रखते। 

तीसरा कारण है-हमारे कृषक भी खेती को उत्तम नहीं मानते। वे अब निषिद्ध चाकरी को उत्तम मानने लगे हैं। कोई किसान नहीं चाहता कि उसका बेटा कृषि की शिक्षा प्राप्त कर विकसित पद्धति से खेती करे। डॉक्टर अपने बेटे को वाणिज्य की शिक्षा देकर, व्यापारिक प्रशिक्षण प्रदान कर कुशल व्यापारी बनाना चाहता है, किंतु कृषक नहीं चाहते कि उनका बेटा कृषि की शिक्षा प्राप्त कर समुन्नत कृषि करे। वे अपने बेटों को मामूली किरानी बनाना चाहते हैं, कृषक नहीं। जब तक कषकों की यह मनोवृत्ति नहीं बदलेगा, तब तक न तो उनकी स्थिति में सुधार आएगा, न देश की स्थिति में। 

चौथा कारण है-प्रकृति के प्रति निर्भरता। हमारे देश की खेती बहुत-कुछ मानसून की कपा पर निर्भर है। कुटज-कुसूमों से लाख पूजा करने के बाद भी जब बादल महाराज नहीं पिघलते, तब फिर किसानों की स्थिति बड़ी दयनीय हो जाती है। खेत में फसल उगाई नहीं जा सकती। सारी धरती मरुभूमि जैसी मालूम पड़ती है। कभी-कभी जब बीच में इंद्र भगवान दगा दे जाते हैं, मरझाती कोंपलों के साथ किसानों के कपोल भी मुरझा जाते हैं। कभी-कभी अतिवष्टि या बाढ जब अपनी सर्वग्रासिनी लपलपाती जिह्वाएँ खोलती हैं, तब फिर लहलहाते खेतों का वैभव क्षणभर में विवर्ण हो जाता है। 

इधर भारत-सरकार तथा प्रांतीय सरकारों ने भारतीय कृषि की इस विवशता की ओर काफी ध्यान दिया है। अतिवृष्टि एवं बाढ़ के प्रकोप को रोकने के लिए तटबंध बनाए जा रहे हैं। सिंचाई के लिए कूपों, नलों, नहरों और सरकारी ट्यूब-वेलों से पानी का प्रबंध किया जा रहा है। आधुनिकतम कृषि-ज्ञान देने के लिए हर राज्य में कृषि-पदाधिकारी भेजे जा रहे हैं। गाँव-गाँव में कृषि की जानकारी के लिए कृषि-पदाधिकारी भेजे जा रहे हैं। कृषि के लिए उत्तम बीज तथा खाद की व्यवस्था की जा रही है।

गेहूँ की अधिक उपज देनेवाली किस्म सोना, कल्याण आदि का प्रचार किया जा रहा है। साल में तीन-तीन फसल देनेवाले धान रोपे जा रहे हैं। गहन कृषियोजना चालू की जा रही है तथा किसानों को ट्रैक्टर-प्रशिक्षित करने की व्यवस्था की जा रही है। सिंचन-यंत्र किश्तों पर दिए जा रहे हैं। आर्थिक अभाव को दूर करने के लिए बैंकों से भी ऋण की व्यवस्था की जा रही है। हरित क्रांति से भारतीय किसानों के मध्य नई उषा आनेवाली है। किंतु, यह उषा तभी चिरस्थायिनी हो सकती है, जब कृषकों का देशव्यापी संघ हो, उनकी उपज का मूल्य निश्चित (assured price) हो, उनकी फसल का बीमा (insurance of harvest) हो, उनकी उपज पूँजीपति मनचाहे मूल्यों पर न खरीदें।

क्रेता और कृषक के बीच जो मुनाफा मारनेवाले सेठ-साहूकार हैं, उन्हें समाप्त कर देना भी बड़ा आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, कृषकों को हम हेय दृष्टि से देखना छोड़ें तथा उन्हें राज्य-सरकार और भारत-सरकार द्वारा भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। यदि कोई नर्तक या वादक राष्टपति के द्वारा पद्मश्री, पद्मविभूषण आदि से सम्मानित किया जाता है, तो जिनके अन्न से उनके मन के तार बजते हैं, उन्हीं कृषकों को सम्मानित न किया जाए, यह अनुचित है। इस प्रकार, हमें अनेक प्रकार से कृषिकर्म को सुरक्षित एवं सम्मानित बनाने की आवश्यकता है। प्रसन्नता की बात है कि अब भारत-सरकार उन्नत कृषि करनेवाले कृषकों को ‘कृषिपण्डित’, ‘कृषिश्री’ आदि की उपाधि से विभूषित करने लगी है। 

किंतु, छोटे किसानों की कम तथा टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त भूमि, बड़े किसानों की अशिक्षा और नई पद्धतियों के प्रति उदासीनता तथा सरकारी कर्मचारियों की पूर्ण तत्परता के अभाव के कारण किसानों का जैसा भाग्योदय अभीप्सित है, वैसा नहीं हो पा रहा है। सरकारी योजनाओं की गंगोत्तरी अब भी उनके जीवन में पूर्ण रूप से नहीं उतर रही है। 

अब वह समय शीघ्र आनेवाला है, जब भारतीय किसान कापालिक की भाँति नहीं रहेंगे, भिखमंगों की दलित जिंदगी नहीं व्यतीत करेंगे, वरन् वे अमेरिका, रूस, जापान तथा हालैंड के किसानों की भाँति बिलकुल संपन्न-समद्ध एवं जीवनस्तर के आधुनिक साधनों से युक्त रहेंगे। खेतों में काम करने के समय भले ही वे स्वेदकणों की माला पहनें, किंतु वहाँ से निकलने पर वैसे ही वातानुकूलित कक्षों में रहेंगे, जैसे संपन्न नागरिक रहा करते हैं। पंजाब-हरियाणा के अनेक किसानों ने अपने अध्यवसाय से साबित कर दिया है कि ऐसा संभव भी है। 

कृषक भारतीय जीवन के मेरुदंड हैं। वे भारतीय समाज की केंद्रस्थ धुरी हैं। अतः, उनके विकास, उद्धार एवं उन्नयन से ही भारत का विकास, उद्धार एवं उन्नयन संभव है। भारत का भविष्य भारतीय किसानों का भविष्य है। अब हमें गाँवों में स्वर्ग उतारना है, नंदनकानन बसाना है, युगों से कृषकों की म्लान मुखाकृति पर मुसकराहटों के फूल खिलाने हैं। कृषक मानवजाति की विभूति हैं। जिसने अनाज के दाने उपजाए, पौधों के पत्ते लहराए, वह मानवता का महान सेवक है और उसका महत्त्व किसी भी राजनीतिज्ञ से कम नहीं।