भारतीय शिक्षा प्रणाली पर निबंध |Essay on Indian education system

भारतीय शिक्षा प्रणाली पर निबंध

भारतीय शिक्षा प्रणाली पर निबंध |Essay on Indian education system

 शिक्षा एक ऐसा सशक्त एवं प्रभावी माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति का विकास होता है, उसका उद्धार होता है, उसका सांस्कृतिक नवीनीकरण होता है, उसकी आर्थिक प्रगति होती है तथा स्त्री-पुरुषों को समाज की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रशिक्षण मिलता है, शिक्षा प्राप्त व्यक्ति आधुनिककालीन वैज्ञानिक, तकनीकी एवं परमाणविक समाज के उपयुक्त धर्मनिरपेक्ष एवं जनतांत्रिक दृष्टि का विकास करता है. दुर्भाग्य की बात है कि जीवन की इस परम आवश्यकता से हमारे अनेक नौनिहाल वंचित रह जाते हैं और हमारा समाज इन विकासमान बालकों की प्रतिभा का लाभ नहीं उठा पाता है. विडम्बना यह है कि ये कलियाँ मुस्कराने का भी अवसर प्राप्त नहीं कर पाती है. 

एक शिक्षाविद का यह कथन मनन करने योग्य है कि “किसी देश का निर्माण उसकी कक्षाओं में होता है.” यह सही है कि किसी भी देश की प्रगति एवं उसके चारित्रिक विकास का स्तर उसके नागरिकों के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है और नागरिकों के निर्माण का स्वरूप सीधे उसके शैक्षिक पर्यावरण एवं उसकी शिक्षा नीति के साथ जुड़ा रहता है. 

सन् 1984 में होने वाले लोकसभा चुनावों के मध्य किये गये वायदे के अनुसार युवा प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी ने नई शिक्षानीति की रूपरेखा बनाने का दायित्व शिक्षा मंत्रालय (वर्तमान में मानव संसाधन विकास मंत्रालय) को सौंप दिया था. 

20 अगस्त, 1985 को शिक्षामंत्री ने नई शिक्षा नीति के नाम पर शिक्षा की चुनौती, नीति सम्बन्धी परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया और कहा कि यह दस्तावेज शिक्षा का एक प्रारूप मात्र है. हमारी मान्यता है कि इस आधार प्रपत्र पर राष्ट्रव्यापी विचार-विनिमय हो जिससे नई शिक्षा नीति तैयार करने में सहायता प्राप्त हो. शिक्षा की नीति को तीन प्रमुख अध्यायों में बाँटा गया है 

(1) शिक्षा, समाज और विकास

(2) शैक्षिक विकास पर विहंगम दृष्टि

(3) समीक्षात्मक मूल्यांकन

इस शिक्षा नीति के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं –

(1) वह भारतीय चिन्तन की इस विचारधारा को स्वीकार करती है कि मानव-समाज की महत्वपूर्ण सम्पत्ति है और इसी दृष्टि से पूरी सावधानी एवं सहानुभूति के साथ उसके विकास की व्यवस्था की जानी चाहिए. 

(2) बालक के संश्लिष्ट व्यक्तित्व का विकास किया जाए. इस सन्दर्भ में लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का समावेश किया गया. 

(3) देश के विभिन्न भागों में नवोदय विद्यालय स्थापित किये जाएँगे. इनमें विशेष प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थियों को शिक्षित किया जाएगा. कमजोर वर्ग के बालकों के लिए इसमें आरक्षण की व्यवस्था होगी. 

(4) इसमें रोजगारपरक शिक्षा की महत्वपूर्ण धारा है. कम्प्यूटर के उपयोग का प्रशिक्षण रोजगारपरक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग होगा. 

(5) उच्च शिक्षा के सन्दर्भ में यह प्रस्ताव है कि वर्तमान संस्थाओं में अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएंगी, शिक्षा के गिरते हुए स्तर को रोका जाएगा और शोध कार्यों को विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा. 

(6) ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाएगी. महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित बुनियादी शिक्षा के क्रांतिकारी आदर्शों पर उनको विकसित किया जाएगा. 

(7) खुले विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाएगी, जिससे दूर-दराज के छात्र-छात्रा उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें. नई शिक्षा नीति के नाम पर सन् 1985 में दिल्ली में इन्दिरा गांधी खुला विश्वविद्यालय स्थापित किया गया. 

(8) परीक्षा पद्धति एवं मूल्यांकन में प्रभावकारी सुधारों की योजना है. 

(9) शिक्षा जगत् के सम्यक् प्रबन्ध के लिए आगे चलकर अखिल भारतीय शिक्षा सेवा Indian education service or All India Education service की स्थापना का प्रस्ताव है. 

(10) शिक्षा में गैर सरकारी सेवा भावी सहयोग का स्वागत किया जाएगा, किन्तु शिक्षा को व्यवसाय बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाएगी. 

(11) शिक्षा को सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा का सबल साधन बनाया जाएगा. 

(12) यह शिक्षा नीति के अन्तर्गत पाठ्यक्रम का निर्माण एक राष्ट्रीय स्तर पर होगा. इसमें भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास, सांस्कृतिक परम्पराओं, सांस्कृतिक विरासत आदि पर विशेष बल दिया जाएगा.

उच्च शिक्षा-नीति 

इस सन्दर्भ में यह बता देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) के निर्माण एवं उसके क्रियान्वयन के अन्तर्गत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं मानवीय संसाधन विकास मंत्रालय का जोर स्नातक स्तर की शिक्षा में रोजगार परक (Job Oriented) पाठ्यक्रमों को विषय के रूप में समावेश करने पर हुआ और स्तर-स्तर की शिक्षा के ढाँचे में परिवर्तन कर विभिन्न विश्वविद्यालयों से इस प्रकार के विषयों के पाठ्यक्रम विकसित करना या कहीं से उधार लेकर चालू करना प्रारम्भ किया जाए, जो विद्यार्थी को समाजोपयोगी क्षेत्रों में दक्षता प्रदान कर सकें. इस सन्दर्भ में नवीनतम स्थिति यह है कि चुने हुए लगभग 30 विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक महाविद्यालय खोलकर शिक्षा के ढाँचे में एक नया आयाम जोड़ा जा रहा है. 

आशा है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission) की यह महत्त्वाकांक्षी योजना सफल होगी, जिसके अन्तर्गत व्यावसायिक कॉलेजों का जाल बिछाया जा रहा है और इसमें ऐसे नवयुवक/नवयुवतियाँ तैयार होंगे, जो शिक्षा के उपरान्त नौकरी के भरोसे न रहकर स्वतन्त्र व्यवसाय कर सकेंगे. इस प्रकार यह स्वप्न साकार होगा कि उच्च शिक्षा केवल बेरोजगारों की फौज बढ़ाने का उपकरण मात्र न होकर राष्ट्रीय विकास व सामाजिक परिवर्तन का एक सबल हथियार साबित होगा. 

इसी प्रकार एक अन्य मुद्दा विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के शिक्षकों के पुनर्बोधन या प्रशिक्षण का है. स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल में प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में एक क्रांतिकारी पहल की गई है कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षकों के लिए समय समय पर शिक्षण प्रशिक्षण के कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ. इस हेतु देश के कोने कोने में एकेडेमिक स्टाफ कॉलेजों की स्थापना की गई. ये कॉलेज वर्ष भर का कैलेण्डर बनाकर प्रतिवर्ष उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षकों के लिए लगभग छ:-छ: सप्ताह के पुनर्बोधन कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिसके अन्तर्गत उन्हें शिक्षा के उद्देश्य, शिक्षा की दार्शनिक व सामाजिक पृष्ठभूमि एवं विषय की यथासम्भव नवीनतम जानकारी दी जाती है. साथ ही शिक्षण कार्य को अधिक प्रभावी बनाने की तकनीकों पर भी विचार-विमर्श किया जाता है. इस सन्दर्भ में यह ज्ञातव्य है कि श्री रामचरन सिंह ने मेरठ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति के रूप में इस प्रकार की योजनाएँ लागू की थीं. उनका उद्देश्य था कि मेरठ विश्वविद्यालय को विकसित करने के साथ शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में गुणात्मक परिवर्तन के प्रयास भी किए जाएँ. उन्होंने शिक्षा एवं मूल्यांकन में सुधार के लिए कई योजनाएँ लागू की थीं.

नई शिक्षा नीति के सम्बन्ध में कतिपय सुझाव 

राष्ट्रीय नई शिक्षा नीति के सम्बन्ध में पर्याप्त विचार-विमर्श हो चका है, परन्तु फिर भी उसमें सुधार एवं परिवर्तन के लिए पर्याप्त स्थान है. छात्रों को अपने देश की मिट्टी के साथ जोड़ने की आवश्यकता है. इसके लिए उन्हें देश की कृषि संस्कृति से परिचित कराना होगा जिसकी प्रेरणा में श्रमशील कृषक अपने श्रम सीकर द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए अन्न उत्पन्न करता है. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए दो कार्य अनिवार्य हैं : (1) गाँवों में अधिकतम संख्या में विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित किए जाएँ—विश्वविद्यालयों को स्थापित करने पर विचार अगले चरण में किया जा सकता है, तथा (II) ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों की, विशेषकर कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना की जाए. इससे गाँवों का विकास भी होगा तथा नगरीय क्षेत्र में आबादी का दबाव भी कम होगा. महत्वपूर्ण यह है कि पाठ्यक्रम में ग्रामीण जीवन से सम्बन्धित प्रसंगों का समावेश किया जाए. 

शिक्षा की योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे अधिकतम बालक-बालिकाएँ प्रत्येक स्तर पर शिक्षा प्राप्त कर सकें. विद्यालयों में नवोदित विद्यालय भी शामिल हैं. उनकी संख्या इतनी हो जिससे एक भी प्रतिभाशाली बालक अन्तर्निहित शक्तियाँ उपेक्षित न रह जाएँ. 

आपरेशन ब्लैक बोर्ड का उत्तरदायित्व बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्राथमिक शिक्षा की नींव पर ही माध्यमिक और उच्च शिक्षा का भवन खड़ा किया जाता है. अतएव इस पद्धति को लागू करते समय धनाभाव की समस्या आड़े नहीं आनी चाहिए. इस शिक्षा नीति की 

विशेषता यह है कि इसमें शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का पूर्ण विधान है, इसकी कमी यह है कि इसको जीविकार्जन के साथ नहीं जोड़ा गया है, इसको Job-oriented नहीं बनाया गया है. नई शिक्षा नीति की एक अन्य विशेषता भी स्वागत योग्य है. कार्य की श्रेष्ठता/सक्षमता (Efficiency) को पुरस्कृत करने का प्रावधान किया गया है. 

नई शिक्षा नीति के प्रारूप में शिक्षा के माध्यम को जानबूझ कर अनछुआ छोड़ दिया गया है. हमें समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रीयता की भावना तथा अपने देश की मिट्टी के साथ लगाव के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि बालक/बालिकाओं को राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाए. नई शिक्षा नीति की भाषा सम्बन्धी चुनौती को हमारे उदीयमान नागरिक जिस रूप में ग्रहण करेंगे, उसी पर नई शिक्षा नीति की सफलता निर्भर करेगी. 

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