भारतीय लोकतंत्र पर निबंध | Essay on Indian Democracy

भारतीय लोकतंत्र पर निबंध

भारतीय लोकतंत्र पर निबंध: सबल और दुर्बल पक्ष (Indian Democracy : The Strong And The Weak Points) 

भारतीय लोकतंत्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। वर्ष 1952 में वयस्क मताधिकार के आधार पर देश में सम्पन्न हुए पहले आम चुनाव के साथ हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत हुई और नित नई सफलताओं के साथ भारतीय लोकतंत्र अब तक छह दशक से भी ज्यादा का सफर तय कर चुका है। यदि लोकतंत्र के शाब्दिक अर्थ पर गौर करें तो इससे ध्वनित होता है कि यह एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें जनता की सत्ता होती है। यह शासन की एक ऐसी पद्धति है, जिसमें सत्ता सामूहिक रूप से लोगों में निहित रहती है। यह समाज का ऐसा शासन है, जिसमें लोगों को राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी अधिकारों की समानता दी जाती है। लोकतंत्रीय नीतियां भारतीय लोकतंत्र के प्राणतत्व हैं। यानी हमारे यहां जनता के अनुमोदन को कर्म के औचित्य का आधार बनाकर प्रजा के हितों को सर्वोपरि रखा जाता है। जनमत निर्माण में समाज के कमजोर-से कमजोर व्यक्ति को आम चुनाव में स्वतंत्र रूप से भाग लेने का अधिकार है। भारतीय जनता के प्रति विश्वास एवं सम्मान का भाव रखते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत में लोकतंत्र की स्थापना का दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय लिया और हमने लोकतंत्र की कसौटी पर भरसक खरा उतरने की कोशिश की। इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र को एक सम्पूर्ण एवं मजबूत लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। यह सच है कि भारतीय लोकतंत्र के अनेक सबल पक्ष हैं, किन्तु इन सबल पक्षों के बरक्स दुर्बल पक्षों की भी कमी नहीं है। भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप को भली-भांति समझने के लिए इसके सबल एवं दुर्बल पक्षों की समीक्षा जरूरी है। पहले हम इसके सबल पक्षों पर दृष्टि डालते हैं। 

“भारतीय मतदाता किसी भी दल को सत्ता से वंचित कर सकता है और अपने देश की राजनीतिक संरचना तथा इतिहास के प्रवाह को बदल सकता है। यही तथ्य लोकतंत्र का सार और आधार है।” 

भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार यहां की जनता है और जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधानसभाओं में जनाकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र की बनियाद सुदृढ़ है, जो कि स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व जैसे आदर्शों पर टिकी है। भारतीय लोकतंत्र ने सदैव जनता की प्रतिष्ठा को बढ़ाने का काम किया है तथा लोकमानस में कर्मशक्ति, विकास, आत्मनिर्भरता, दृढ़ता, ईमानदारी एवं नैतिकता की पूर्ति की है। भारतीय लोकतंत्र के सर्वाधिक सबल पक्ष का पता डॉ. सुभाष कश्यप के इस कथन से चलता है- “भारतीय मतदाता किसी भी दल को सत्ता से वंचित कर सकता है और अपने देश की राजनीतिक संरचना तथा इतिहास के प्रवाह को बदल सकता है। यही तथ्य लोकतंत्र का सार और आधार है।” भारतीय लोकतंत्र न सिर्फ अत्यंत परिपक्व है, बल्कि भारतवासियों को इस पर पूर्ण विश्वास भी है। हमारा लोकतंत्र जनास्था का केन्द्र बिन्दु है। यकीनन भारतीय लोकतंत्र जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में सक्षम एवं समर्थ है। 

संसद को हम भारतीय लोकतंत्र का मन्दिर कह सकते हैं, जहां जनाकांक्षाओं के अनुरूप नीतियों का निर्माण होता है, तो राष्ट्रीय महत्व के विषयों का निष्पादन होता है। जनसमस्याओं पर हमारी संसद मौन नहीं रहती है और इनके निवारण में वह महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। संसद ही वह स्थान है, जहां हमारे प्रतिनिधियों एवं मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा होती है तथा जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा न उतरने वालों को संसदीय दबाव के चलते पद छोड़ने को भी बाध्य होना पड़ा है। वर्ष 1956 में विपक्ष के आक्रामक रुख के चलते टी.टी. कृष्णमाचारी को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। हमारे देश की संसद ने न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व बखूबी निभाया है, अपितु इन मूल्यों को ऊंचाई भी प्रदान की है। संसद में जहां देश के विभिन्न वर्गों, जातियों को मिलने वाले प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रीकरण हुआ, वहीं इसके दोनों सदनों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें देश के विभिन्न वर्गों, समुदायों, जातियों, पेशों एवं पंथों आदि के प्रतिनिधित्व में निरंतर इजाफा हुआ। वंचित समूहों के राजनीतिक सशक्तिकरण के कारण लोकसभा का संयोजन धीरे-धीरे अधिक संतुलित होता गया। जब-जब सत्ता दिशाहीन या दिग्भ्रमित हुई अथवा उसके आचरण से लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर आंच आई, तब-तब संसद में बैठे विपक्ष ने सत्ता को आईना दिखाने का काम किया और लोकतांत्रिक मान्यताओं पर आंच नहीं आने दी। 

भारतीय लोकतंत्र की पंथनिरपेक्षता को भी हम इसके एक सबल पक्ष के रूप में रेखांकित कर सकते हैं। यहां जाति, धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है। भारतीय लोकतंत्र सभी को साथ लेकर चलता है। इसमें सभी के लिए समान अवसर हैं, फिर चाहे वह किसी भी जाति या सम्प्रदाय का क्यों न हो। पंथनिरपेक्षता हमारे संविधान की बुनियादी विशेषता है। भारत सरकार धर्म के मामले में तटस्थ है। उसका अपना कोई धार्मिक पंथ नहीं है तथा देश के सभी नागरिकों को अपनी इच्छा के अनुसार धार्मिक उपासना का अधिकार है। भारत सरकार न तो किसी धार्मिक पंथ का पक्ष लेती है और न ही किसी धार्मिक पंथ का विरोध करती है। ‘सर्व धर्म समभाव’ भारतीय लोकतंत्र की एक प्रेरक विशेषता है। 

राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता के लिए आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना को आवश्यक माना गया है। भारतीय लोकतंत्र की सफलता का दारोमदार भी आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना पर है, इस बात को ध्यान में रखकर हमारे यहां आर्थिक नियोजन पर विशेष बल दिया गया है। नियोजित आर्थिक विकास ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की है। हमने आर्थिक विकास की एक मजबूत जमीन तैयार की है। हमने विकास को वंचितों तक पहुंचाने पर ध्यान दिया है। भारतीय लोकतंत्र में जहां आर्थिक विषमता को दूर करने के प्रयास किए गए हैं, वहीं गरीबी एवं भुखमरी की समस्याओं के निवारण के भी यथेष्ट प्रयास किए गए हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक लोकतंत्र के मार्ग पर भी सधे कदमों से आगे बढ़ रहे हैं। आर्थिक लोकतंत्र की अवधारणा को ध्यान में रखकर ही हमारे यहां आर्थिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण किया गया है। इसके अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं का दर्जा प्राप्त पंचायतों के माध्यम से आर्थिक विकास गांव-गांव तक पहुंचा है, साथ ही स्थानीय समस्याओं का निराकरण भी हो रहा है। इस प्रकार हम एक सच्चे गणतंत्र की अवधारणा को साकार कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उपर्युक्त सबल पक्षों ने भारतीय लोकतंत्र को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति व सम्मान दिलवाया है। 

“स्वतंत्र भारत का स्वाधीन नागरिक, सामान्य जन आज कठिनाई के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें उसका मानस ‘चिर मुक्ति’ की ही कामना कर सकता है।” 

जहां भारतीय लोकतंत्र के अनेक सबल पक्ष हैं, वहीं इसके दुर्बल पक्ष भी कम नहीं हैं। दुर्बल पक्षों की ध्वनि समग्रता के साथ डॉ. योगेश अटल के इस कथन में सुनी जा सकती है-“स्वतंत्र भारत का स्वाधीन नागरिक, सामान्य जन आज कठिनाई के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें उसका मानस ‘चिर मुक्ति’ की ही कामना कर सकता है।” भूख, गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी की समस्याएं, किसानों की आत्महत्या की घटनाएं, बिगड़ती कानून-व्यवस्था, महिलाओं के विरुद्ध बढ़ रहे अपराध और यौन हिंसा, महंगाई एवं भ्रष्टाचार वे घटक हैं, जिन्हें हम भारतीय लोकतंत्र के दुर्बल पक्ष या असफलताओं के रूप में रेखांकित कर सकते हैं। एक उत्तरदायी विपक्ष के अभाव में भारतीय लोकतंत्र से जुड़ी समस्याएं और परवान चढ़ी हैं। चूंकि भारत में प्रतिपक्ष अनेक दलों में विभक्त है, अतएव न तो वह सरकार की सशक्त आलोचना ही कर पाता है और न ही सत्ता की निरंकुशता से जनता को राहत ही दिलवा पाता है। देश की राजनीति में बहुदलीय प्रथा की जड़ें गहरी हैं। अनेक दल हैं, जिनमें अनेकता है। अपने स्वार्थों को साधने वाले, इन दलों से लोकतंत्र को मजबूत बनाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। 

भारतीय लोकतंत्र को क्षति पहुंचाने में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद (प्रादेशिकता) एवं भाषावाद जैसी समस्याओं ने बड़ा योगदान दिया है। इन समस्याओं ने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर ठेस पहुंचाई है और विघटन व अलगाव को प्रोत्साहित कर लोकतंत्र की चूलें हिलाने का काम किया है। इन समस्याओं की दृष्टि से भारत की भूमि अत्यंत उर्वरा रही है और इन्हें लेकर आए दिन विवाद पैदा होते रहे हैं। ये समस्याएं भारतीय लोकतंत्र की दुर्बलताएं बनकर उसके प्रभाव को घटाती रहीं एवं सफलता के मार्ग में अवरोधक बनती रहीं।

महंगाई, भ्रष्टाचार एवं आर्थिक शोषण जैसी समस्याओं ने भी भारतीय लोकतंत्र की धार को कुंद बनाने का काम किया है। महंगाई से त्रस्त आम जनता पर जहां रोटी, कपड़ा और मकान के मसले 1 भारी पड़ रहे हैं, वहीं भ्रष्टाचार भारतवासियों के स्वभाव में कुछ इस तरह से रच-बस गया है कि इसके दर्शन सड़क से संसद तक होते हैं। आए दिन हो रहे बड़े-बड़े घोटालों से जहां विकास का प्रवाह थमा है, वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था से आम जनता का विश्वास डिगने लगा। आर्थिक शोषण ने आर्थिक विषमता को बढ़ाकर उग्र पूंजीवाद को जन्म दिया है।

आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याओं ने भारतीय लोकतंत्र | को क्षति पहुंचाई है। हम इनसे उबर नहीं पा रहे हैं। हिंसा और आन्दोलन की राजनीति ने अशांति और अराजकता को जन्म दिया है, जिससे लोकतंत्र में जनता की आस्था घटी है। राजनीतिक अस्थिरता | एवं गुटबाजी के कारण भी भारतीय लोकतंत्र का क्षरण हुआ है। 

राजनीतिक संघर्ष की उभरती प्रवृत्तियों ने रचनात्मक लोकतंत्र की अवधारणा पर कुठाराघात किया है। दल-बदल की दूषित प्रवृत्तियों ने भारतीय लोकतंत्र एवं राजनीति को संक्रमित करने का काम किया है। अस्थिर सरकारों के कारण पैदा होने वाले राजनीतिक अस्थायित्व को देश की जनता ने कई बार भोगा और असमय होने वाले चुनाव का बोझ जनता को ढोना पड़ा। 

संसद की गरिमा का विगत कुछ वर्षों में जिस तरह से ह्रास हुआ, वह भी भारतीय लोकतंत्र के लिए सुखद स्थिति नहीं है। सिर्फ गरिमा का ही नहीं, संसदीय सत्ता का भी ह्रास हुआ है। संसद में होने वाले हंगामों से संसदीय मंच का अवमूल्यन हुआ है तथा गतिरोध की स्थिति पैदा हुई है। स्पष्ट है कि जब लोकतंत्र का सर्वोच्च निकाय संसद, जो जनता के प्रतिनिधित्व के लिए जानी जाती है, ही ठप रहेगी, तो न तो सार्थक लोकतंत्र की अवधारणा ही साकार होगी और न ही जनता का ही भला होगा। 

हमारे देश में नौकरशाही का प्रभुत्व कायम है। कभी-कभी तो यह इतना अधिक बढ़ जाता है कि पराधीनता के दिनों की याद ताजा करवा जाता है। नौकरशाह आज भी खुद को जनता का स्वामी समझते हैं, न कि सेवक। उनमें जनसेवा के भाव का नितांत अभाव है। नौकरशाहों, नेताओं एवं पूंजीपतियों और ठेकेदारों के गठजोड़ से देश की जनता त्रस्त है। स्वाधीन भारत में जिस तरह से नौकरशाही का वर्चस्व बढ़ा है, उससे पैदा हुई त्रासद स्थितियों ने भारतीय लोकतंत्र की चमक को फीका किया है। नौकरशाही से त्रस्त जनता लोकतंत्र को जिस तरह से कोसती है, उसे एक सफल लोकतंत्र का द्योतक नहीं माना जा सकता। 

चुनाव किसी भी लोकतांत्रिक देश में महापर्व जैसा माहात्म्य रखते हैं। यह बात भारत पर भी लागू होती है। यदि चुनाव निष्पक्षता से होते हैं, इनके प्रति जनता का उत्साह होता है तथा मतदान शत प्रतिशत होता है, तो एक स्वस्थ जनमत का निर्माण होता है, जिससे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती है। दुख का विषय है कि चुनाव सुधार की अनेक पहलों के बावजूद हम अभी तक एक निर्दोष चुनाव प्रणाली विकसित नहीं कर पाए हैं। 

भारतीय लोकतंत्र को प्रभावी एवं गरिमामय बनाने के लिए इसके दुर्बल पक्षों को दूर किया जाना आवश्यक है। इन्हें दूर करने के लिए समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। पहली जरूरत तो यह है कि हम एक सशक्त विपक्ष को विकसित करें। लोकतंत्र की सार्थकता के लिए भारत में नौकरशाही पर नकेल कसी जानी भी आवश्यक है। नौकरशाह स्वयं को जनता का सेवक समझें, न कि स्वामी, इस भावना का विकास किया जाना जरूरी है। 

भारतीय लोकतंत्र को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए हमें चुनाव प्रणाली को और बेहतर बनाते हुए ऐसे उपाय सुनिश्चित करने होंगे कि चुनावों में धनबल एवं बाहुबल का प्रयोग प्रत्याशी न कर सकें। मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए जनता में भी जागृति लानी होगी। 

भारतीय लोकतंत्र को और अधिक सबल एवं गरिमामय बनाने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम यथाशीघ्र देश से जातिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता, भाषावाद, महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कुपोषण, गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याओं का निवारण करें, जो कि भारतीय लोकतंत्र पर स्याह धब्बों की तरह हैं। इसके साथ ही हमें आर्थिक लोकतंत्र एवं सामाजिक न्याय की स्थापना पर अधिकाधिक बल देते हुए विकास और आर्थिक उन्नति की ओर सधे कदमों से बढ़ना होगा। भारतीय लोकतंत्र के दुर्बल पक्षों को दूर कर हम इसके भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं।

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