भारतीय संस्कृति समस्या पर निबंध |Essay on Indian Cultural Problem

भारतीय संस्कृति समस्या पर निबंध

भारतीय संस्कृति समस्या (Indian Cultural Problem)

संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की अन्तिम परिणति है. संस्कृति उस अवधारणा को कहते हैं, जिसके आधार पर कोई समुदाय जीवन की समस्याओं पर दृष्टि-निक्षेप करता है. यह अवधारणा कई तत्त्वों द्वारा निर्मित होती है. किसी समुदाय की अनुभूतियों के संस्कारों के अनुरूप ही सांस्कृतिक अवधारणा का स्वरूप निर्धारित होता है. संस्कृति किसी समुदाय जाति अथवा देश का प्राण या आत्मा होती है. संस्कृति द्वारा उस जाति, राष्ट्र अथवा समुदाय विशेष के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है जिनके सहारे वह अपने आदर्शों, जीवनमूल्यों आदि का निर्धारण करता है.

संस्कृति : अविरोधी वस्तु 

धर्म के समान संस्कृति भी अविरोधी वस्तु है. वह समस्त दृश्यमान विरोधों के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है. विरोध और विरोधी शब्द उसके लिए अपरिचित होते हैं. वह सत्य की खोज में शील की ध्वजा लेकर चलती है. वह अपनी साधना द्वारा पवित्र और विकसित होती रहती है और अपने संस्पर्श द्वारा आदर्श रूपी क्षितिज के नित्य नये आयाम उद्घाटित करती रहती है. 

हमारे चिन्तन के उदात्तीकरण की प्रेरणा का नाम संस्कृति है, वह हमें दृश्यमान जगत् के समस्त भेदों से परे ले जाने वाली वस्तु है. शील एवं विनय उनके बालक हैं. इस दृष्टि से समस्त संसार के मनुष्यों की एक सामान्य संस्कृति, मानव-संस्कृति हो सकती है, यह दूसरी बात है कि वह व्यापक संस्कृति अब तक सारे संसार में अनुभूत और अंगीकृत नहीं हो सकी है. उसके पहले अमुक देश में भारतीय, पाश्चात्य आदि विशेषणों को जोड़ने का केवल यही अर्थ हो सकता है कि संस्कृति के साधकों ने अभी तक ‘सत्य’ के इतने ही अंश का साक्षात्कार किया है. विशेषण युक्त संस्कृति अवधारक की सीमाओं की बोधक है. वह किसी अन्य संस्कृति के प्रति विरोध की सूचना नहीं देती है.

कतिपय आधुनिक बौद्धिकतावादियों के मतानुसार किसी राष्ट्र के असाधारण बड़प्पन के गर्व को ही ‘संस्कृति’ कहा जाना चाहिए. उदाहरणार्थ इंगलैण्ड की पार्लियामेण्टरी शासन प्रणाली इंगलैण्ड की संस्कृति का आधार है तथा शुद्ध रक्त गर्व को हिटलर ने जर्मनी की की सीमाओं का स्वरूप जानने की प्रेरणा भले ही प्रदान कर सकती हो, परन्तु वह संस्कृति का स्वरूप कदापि नहीं बन सकती है.

संस्कृति : एक व्याख्या 

अनेकानेक एवं विविध ऐतिहासिक परम्पराओं के भीतर से गुजरकर और विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर संसार के भिन्न-भिन्न समुदायों ने उस महान मानवीय संस्कृति के भिन्न-भिन्न पहलुओं का साक्षात्कार किया है. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और भक्ति तथा योगमूलक अनुभूतियों के भीतर मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम ‘संस्कृति’ शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं.” 

यह ‘संस्कृति’ शब्द जितना प्रचलित है, उतना ही इसका अर्थ अस्पष्ट है. प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि एवं अपने संस्कार के अनुसार इसका अर्थ कर लेता है. चूँकि प्रत्येक व्यक्ति इसको समझने का दावा भी करता है, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता है कि यह एक सर्वथा अस्पष्ट वस्तु है. प्रत्येक मनुष्य जानता है कि ‘मनुष्य’ की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं. संस्कृति का स्वरूप-निर्धारण बहुत कुछ नेति नेति कहकर ब्रह्म-निरूपण के सदृश है. संसार के सभी उदात्त तत्व इसी प्रकार मानव चित्त में अस्पष्ट रूप से भासित होते हैं. उनका आभासित होना ही उनकी सत्ता का प्रमाण है, मनुष्य की श्रेष्ठतर मान्यताएँ केवल अनुभूत होकर ही अपनी महिमा सूचित करती हैं. मनुष्य की सामान्य संस्कृति, मानवीय संस्कृति, बहुत कुछ ऐसी ही अनूठी एवं अनिर्वचनीय वस्तु है. 

ऊँच-नीच की भावना-भरित जातिप्रथा हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक समस्या है. इस सम्बन्ध में डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जो चिन्तन प्रस्तुत किया है, उसका सारांश मनन करने योग्य है. यथा—“एक तरफ तो कर्मफल का सिद्धान्त और दूसरी तरफ पेशों के आधार पर स्तर-भेद को सनातन कर देने की व्यवस्था.” इन दोनों ने इस समूचे जनसमूह के आध्यात्मिक विकास में एक अद्भुत जड़ता ला दी है. पेशा-धर्म तभी कहा जा सकता है, जब उसमें व्यक्तिगत लाभ-हानि की अपेक्षा सामाजिक मंगल का भाव अधिक हो. इस दृष्टि से कोई भी पेशा खराब नहीं कहा जा सकता है. धर्म मनुष्य से त्याग की आशा करता है. निस्सन्देह बहुत से पेशे ऐसे हैं, जिनमें व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा सामाजिक मंगल का विधान अधिक है. उदाहरण के लिए, गन्दगी साफ करने का काम अर्थात् मेहतर का पेशा, निस्सन्देह इस पेशे को करने वालों का त्याग प्रशंसनीय है, परन्तु प्रश्न यह है कि क्या वे त्याग के भाव से काम करते हैं अथवा इस त्याग में गौरव की अनुभूति करते हैं ? वस्तु स्थिति यह है कि लाचारी के कारण अथवा जड़तावश अपनी वंश वृत्ति का येन केन प्रकारेण पालन किया जाता है. इसे धर्म नहीं कहा जा सकता है. एक ओर जाति व्यवस्था ने पेशों को धर्म के साथ सम्बद्ध किया है और दूसरी तरफ विभिन्न पेशों के सम्मान में स्तर-भेद स्थापित कर दिया है. इससे समाज में जड़ता और धृष्टता का आ जाना अनिवार्य है. इसी प्रकार की एक अन्य समस्या है हिन्दू-मुस्लिम मिलन की, उनकी एकता की. द्विवेदीजी ने इस दिशा में किये गये तीन स्तरों के प्रयत्नों की चर्चा की है—धर्म के क्षेत्र में, राजनीति के क्षेत्र में तथा विज्ञान के क्षेत्र में. उनका कहना है कि केवल विज्ञान के क्षेत्र में मिलन ही सफल कहा जा सकता है—“वस्तुतः इस क्षेत्र का मिलन जितना ठोस हुआ है, उतना किसी क्षेत्र का नहीं. शायद इतिहास से हमें यह सीखना बाकी है कि साम्प्रदायिक मिलन की भूमि वैज्ञानिक मनोवृत्ति है. इसी को उत्तेजित करना वांछनीय है.” 

आर्य, द्रविड़, शक, नाग, आभीर आदि जातियों के सैकड़ों वर्ष के संघर्ष के बाद समग्र हिन्दू दृष्टिकोण बना है. नये सिरे से भारतीय दृष्टिकोण बनाने के लिए इतने ही लम्बे अरसे की जरूरत नहीं है. आज हम इतिहास को अधिक यथार्थ ढंग से समझ सकते हैं और तदनुकूल अपने विकास की योजना बना सकते हैं. धैर्य और साहस हमें कभी नहीं छोड़ने चाहिए. 

संस्कृति-उत्थान की दिशा में प्रयास 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त भारतीय संस्कृति को विश्व मंच पर स्थापित करने के लिए हमारी राष्ट्रीय सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं, यथा 

(i) जनवरी 1953 में संगीत, नृत्य और नाटक को बढ़ावा देने के लिए संगीत नाटक अकादमी की स्थापना की गई. 

(ii) मार्च 1954 में भारतीय भाषाओं के साहित्य की अभिवृद्धि हेतु साहित्य अकादमी की स्थापना की गई 

(iii) अगस्त 1954 में चित्रकला, पेंटिंग आदि रचनात्मक कलाओं के अध्ययन एवं अनुसंधान को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु ललित कला अकादमी की स्थापना की गई. 

(iv) सन् 1958 में वैज्ञानिक अनुसंधान और सांस्कृतिक सम्बन्ध मंत्रालय (ICCR) नामक एक नवीन मंत्रालय की स्थापना की गई. सन् 1963 में इसको शिक्षा मंत्रालय में मिला दिया गया. 

(v) इन मंत्रालयों की समीक्षा करने के लिए और उन्नति की दृष्टि से आवश्यक सुझाव देने के लिए समय-समय पर समितियाँ नियुक्त की जाती हैं, जो अपनी रिपोर्ट देती रहती हैं और उन पर विचार होता रहता है. नई शिक्षा नीति में भी सांस्कृतिक विकास की सम्भावनाओं के लिए प्रावधानों पर विचार-विमर्श किया जाता रहा है. नई शिक्षा के दस्तावेज में नैतिकता उन्मुख शिक्षा को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया गया है. 

भारतीय संस्कृति की समाहार सामर्थ्य को लक्ष्य करके कवि इकबाल ने ठीक ही लिखा था- 

यूनान, मिन, रोमां, सब मिट गए जहाँ से,

बाकी अभी है लेकिन, नामोनिशां हमारा ।

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी, 

सदियों रहा है दुश्मन, दौरे-जमां हमारा ।

मनुष्य को दासता, जड़ता, मोह, कुसंस्कार एवं परमुखापेक्षिता से बचाना, मनुष्य को क्षुद्र स्वार्थ एवं अहम्मन्यता की दुनिया से ऊपर उठाकर सत्य, त्याग और औदार्य की दुनिया में ले जाना, मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से हटाकर, परस्पर सहयोग के बंधन में बाँधना, संक्षेप में मनुष्य का सामूहिक कल्याण ही संस्कृति का लक्ष्य हो सकता है. यही मानव का प्राप्य है.

भारतीय संस्कृति का हजारों वर्षों से भी पूर्व का क्रमबद्ध विकास का इतिहास उपलब्ध है. वह विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं सम्पन्न संस्कृति है. वह मात्र संस्कृति न होकर विभिन्न संस्कृतियों का गुलदस्ता है. उसमें विभिन्न संस्कृतियों के पोषक तत्त्वों का समाहार है. विज्ञान, दर्शन, धर्म, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र आदि क्षेत्रों में भारतीय मनीषा की सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न परम्परा उपलब्ध होती है. वह वस्तुतः मनुष्य को मानव बनाने की संस्कृति है. भारत में सामान्य मानव संस्कृति को पूर्ण एवं व्यापक बनाने की जो महती साधना है, उसको हृदयंगम करना एवं प्रकाशित करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए. 

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