भारत-पाक सम्बन्ध पर निबंध |भारत पाकिस्तान सम्बन्ध पर निबंध |Essay on India Pakistan Relations

भारत-पाक सम्बन्ध पर निबंध

भारत-पाक सम्बन्ध |भारत पाकिस्तान सम्बन्ध पर निबंध | Bharat Pakistan Sambandh Essay In Hindi

भारत और पाकिस्तान सिर्फ दो पड़ोसी देश ही नही हैं, बल्कि इनकी साझी विरासतें और रवायतें भी हैं। हमें आजादी तो मिली, किन्तु इस आजादी की कीमत हमें देश के बँटवारे के रूप में चुकानी पड़ी। आजादी के साथ एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान का उदय हआ। लोगों ने बँटवारे की त्रासदी को झेला, दर-ब-दर हुए और हिंसा-प्रतिहिंसा का दंश झेलने के बाद अपने-अपने घरों को बसाने में जुट गए, इस सोच के साथ कि अमन का दौर फिर आएगा और दोनों देश हिल-मिल के रहेंगे। अफसोस कि ऐसा हो नहीं पाया और हर गुजरते दिन के साथ दोनों मुल्कों के बीच तनाव बढ़ता गया। हम एक अच्छे पड़ोसी का रिश्ता नहीं निभा पाए, नतीजतन कटुता घटने के बजाय बढ़ती गई और अमन-चैन कायम नहीं हो पाया। हाल ही में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पाकिस्तान द्वारा लगातार गीदड़ भभकी दी जा रही है एवं इसी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार रद्द कर दिया। चीन द्वारा बुलाई गई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत के कदम को उसका आंतरिक मामला बताया गया। 

भारत और पाकिस्तान के मध्य विवाद के कई मुद्दे हैं, जो सम्बन्धों को सामान्य बनाने की राह में अवरोधक की भूमिका निभाते हैं। विषय वस्तु को ध्यान में रखकर संक्षेप में इनके बारे में चर्चा कर लेना उचित रहेगा। विवाद का पहला कारण है कश्मीर, जिस पर पाकिस्तान शुरू से अपना अधिकार जताता रहा और कश्मीर को हथियाने की कोशिशें करता रहा। पहली कोशिश कश्मीर में वर्ष 1947 के अंत में कबाइलियों की घुसपैठ कराकर की गई, जिसके लिए भारतीय सेना को मोर्चा संभालना पड़ा। जनवरी, 1949 को दोनों देशों के मध्य युद्ध विराम तो हो गया, किन्तु तब से लेकर अब तक कश्मीर को लेकर दोनों देशों के मध्य तनाव कायम है। वार्ताएं होती रहती हैं, पर तनाव कम नहीं हो रहा है। 

भारत और पाकिस्तान के मध्य विवाद के कई मुद्दे हैं, जो सम्बन्धों को सामान्य बनाने की राह में अवरोधक की भूमिका निभाते हैं। विषय वस्तु को ध्यान में रखकर संक्षेप में इनके बारे में चर्चा कर लेना उचित रहेगा। विवाद का पहला कारण है कश्मीर, जिस पर पाकिस्तान शुरू से अपना अधिकार जताता रहा और कश्मीर को हथियाने की कोशिशें करता रहा। पहली कोशिश कश्मीर में वर्ष 1947 के अंत में कबाइलियों की घुसपैठ कराकर की गई, जिसके लिए भारतीय सेना को मोर्चा संभालना पड़ा। 

कच्छ के रन को लेकर भी दोनों देशों के मध्य आज तक विवाद कायम है। सीमाई अस्पष्टता के कारण पाकिस्तान ने कच्छ के रन को भी हथियाना चाहा। इसे लेकर वर्ष 1965 में दोनों देशों के बीच जंग हई। 10 जनवरी, 1966 को दोनों देशों ने ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर किए और कच्छ के रन को लेकर दोनों देश 5 अगस्त, 1965 से पूर्व की स्थिति को कायम रखने पर राजी हो गए। पाकिस्तान इस समझौते पर भी कायम नहीं रह सका। विवाद आज भी कायम है। इसके बाद भारत-पाक के मध्य बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष के साये में वर्ष 1971 का युद्ध हुआ, जिसमें पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी। युद्ध विराम के बाद दोनों देशों के बीच 3 जुलाई, 1972 को ‘शिमला समझौता’ सम्पन्न हुआ, जिसमें भारत पाक के मध्य संयुक्त राष्ट्र के चार्टर सिद्धान्तों के अनुरूप परस्पर रिश्ते संचालित करने पर सहमति बनी। इस समझौते में सम्बन्ध बहाली की अनेक सकारात्मक बातें शामिल थीं, किंतु संबंध आज तक बहाल नहीं हुए। बीसवीं सदी के अंत में दोनों देशों के बीच कारगिल का युद्ध हुआ। पाकिस्तान की पराजय हुई, किन्तु वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। सितंबर, 2016 में पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारत को ‘सर्जिकल स्टाइक’ करनी पड़ी, जिसके तहत भारतीय सेना द्वारा एलओसी (नियंत्रण रेखा) के पार पी ओके (पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर) में पाक समर्थित आतंकवादियों के शिविरों पर जबरदस्त हमला किया गया और आतंकियों के अड्डे तबाह कर दिए। इन अड्डों में छिपे आतंकी भारत में घुसपैठ की फिराक में थे। 

2001 में भारतीय संसद पर हुआ हमला, 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए बम विस्फोट और फरवरी, 2019 में हुआ पुलवामा हमला, पाकिस्तान द्वारा दिए ऐसे जख्म हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता है। इनके अलावा सीमा पार से आतंकवाद को हवा देकर पाकिस्तान आए दिन भारत की फिजाओं में जहर घोला करता है। सिंधु नदी के जल को लेकर भी दोनों देशों के मध्य विवाद बना हुआ है। सिंधु नदी बेसिन में भारत द्वारा संचालित की जा रही जल विद्युत परियोजनाओं पर पाकिस्तान को आपत्ति है और वह इसे सिंधु जल समझौते का उल्लंघन बता रहा है। ध्यातव्य है कि यह समझौता वर्ष 1960 में भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरू और पाक राष्ट्रपति अयूब खान के बीच सम्पन्न हुआ था। दोनों देशों के बीच विवाद अनेक हैं। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान इनका शांतिपूर्ण समाधान खोजने के बजाय भारत को तबाह करने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता है। यानी उसकी मंशा साफ नहीं है और वह अमन के बजाय आतंक के रास्ते पर चल रहा है। 

भारत और पाक सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में यह विचारणीय बिन्दु है कि तमाम विवादों के बावजूद सम्बन्ध बहाली की पहले भी होती रहीं, किन्तु विडंबनीय यह रहा कि ये पहले कभी कामयाब नहीं हुईं और गतिरोध कायम रहे। कुछ ऐसी पहले भी गौरतलब हैं। ‘जंग न होने देंगे’ जैसी अमन की पैरोकारी करने वाली कविता के सर्जक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने कार्यकाल के दौरान अमन का संदेश लेकर बस से लाहौर गए। फरवरी, 1999 में दोनों देशों के बीच ‘लौहार घोषणा-पत्र’ हस्ताक्षरित हुआ, जिसमें कश्मीर के साथ अन्य विवादित मुद्दों का समाधान खोजने पर सहमति बनी। शिमला समझौते की तरह पाकिस्तान इस समझौते पर भी कायम नहीं रह पाया। अमन तो कायम नहीं हो पाया, कारगिल की जंग जरूर हो गई। इसी क्रम में जनवरी, 2004 में सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय वार्ता, अप्रैल 2004 एवं सितंबर 2004 में हुई द्विपक्षीय वार्ताओं के जरिए सम्बन्धों में दोस्ती का रंग घोलने की कोशिश की गई, पर नतीजा सिफर रहा। दोनों देशों के विदेश सचिवों के मध्य भी वार्ताओं के कई दौर हुए, पर बेनतीजा रहे। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कई बार वैश्विक मंचों से पाकिस्तानी समकक्ष से वार्ता की, पर गतिरोध दूर नहीं हुए। 

अमन बहाली की ताजा पहल करतारपुर साहिब कॉरीडोर के रूप में सामने आई है। दोनों देशों को जोड़ने वाले लगभग छह किमी. लम्बे इस गलियारे की आधारशिला पहले भारत फिर पाकिस्तान में रखी गई। इस गलियारे का शिलान्यास करते हुए जहाँ भारत के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि यह गलियारा दोनों देशों के बीच प्रेम और शांति का प्रतीक बनेगा, वहीं पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तान में आयोजित आयोजन में कहा कि अतीत में कई युद्ध लड़ चुके फ्रांस और जर्मनी यदि शांति से मिल-जुल कर रह सकते हैं, तो फिर भारत और पाकिस्तान ऐसा क्यों नहीं कर सकते। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसकी तुलना बर्लिन की दीवार गिरने से की। इस धार्मिक कूटनीति के जरिए दोनों देशों ने नजदीकियां बढ़ाने की पहल बेशक की है, किन्तु ‘बर्लिन की दीवार के गिरने’ जैसे हालात बनते नहीं नजर आ रहे हैं। विवादित मुद्दे अभी भी कायम हैं और आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के रवैये में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। 

वस्तुतः भारत और पाकिस्तान के मध्य दोस्ती की बुनियाद बहुत आसानी से नहीं पड़ सकती है। आतंकवाद और विवादित मुद्दे तो बड़े गतिरोध हैं ही, इनके अलावा भी कुछ ऐसी बातें हैं जो बाधक हैं। आजादी के बाद से अब तक भारत ने जिन आदों मल्यों और लक्ष्यों को लेकर राष्ट्र निर्माण किया, वे भारत के लोकतंत्र को ऊँचा बनाते हैं और किसी भी विवाद का हल बातचीत से निकालने में विश्वास रखते हैं। दूसरी तरफ नए राष्ट्र के रूप में उदित होने के बाद से पाकिस्तान में धार्मिक आधार पर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने जल्द ही सैन्य तानाशाही की सूरत अख्तियार कर ली। भारत के आदर्श कुछ और हैं और पाकिस्तान के कुछ और। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व एवं पारदर्शी न्याय व्यवस्था जहाँ भारतीय संविधान के आदर्श हैं, वहीं पाकिस्तान में स्थितियाँ इसके ठीक उलट हैं। ऐसे में दिल्ली और इस्लामाबाद को अमन की रहगुजर कैसे जोड़ पाएगी? 

वस्तुतः भारत और पाकिस्तान के मध्य दोस्ती की बुनियाद बहुत आसानी से नहीं पड़ सकती है। आतंकवाद और विवादित मुददे तो बड़े गतिरोध हैं ही. इनके अलावा भी कछ ऐसी बातें हैं जो बाधक हैं। आजादी के बाद से अब तक भारत ने जिन आदर्शों मल्यों और लक्ष्यों को लेकर राष्ट निर्माण किया. वे भारत के लोकतंत्र को ऊँचा बनाते हैं और किसी भी विवाद का हल बातचीत से निकालने में विश्वास रखते हैं।

यह सच है कि भारत-पाक के मध्य अमन बहाली बहुत आसान नहीं है, किन्तु यदि दोनों देश दोस्ती के रंग में रंग जाएँ तो यह बात दोनों देशों के हित में रहेगी। दोस्त बनकर ही दोनों देश अपनी साझी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत को संजोते हुए दक्षिण एशिया में आर्थिक, तकनीकी और व्यापार-वाणिज्य के क्षेत्र में सहयोग करते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। इसमें एशिया का भी भला है, क्योंकि वैश्विक मंचों पर दोनों देशों की मित्रवत उपस्थिति पूरे दक्षिण एशिया सहित एशिया की प्रशस्ति का मार्ग भी खोल सकती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों देश द्विपक्षीय सम्बन्धों की गतिशीलता को बढ़ा कर इन्हें उच्च आयाम दें। परस्पर अहं के टकराव से बचते हुए मन-से-मन मिलाने की कोशिश करें। पाकिस्तान को अपनी खोखली अवधारणाओं से परहेज रखते हुए भारत को बड़े भाई का सम्मान देना होगा, जिसका वह हकदार भी है। असंभव कुछ भी नहीं है, बस पहले दिल से होनी चाहिए। 

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