भारतीय संस्कृति पर निबंध |Essay on India Culture in Hindi

भारतीय संस्कृति पर निबंध

भारतीय संस्कृति पर निबंध | Essay on India Culture in Hindi

हमारे देश में ‘संस्कृति’ शब्द बहुत अधिक प्रयुक्त होता है, लेकिन अब तक इसकी कोई सर्व सम्मत परिभाषा नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि और संस्कारों के अनुसार इसका अर्थ लगाता है। लेकिन संस्कृति का मूल स्रोत वे सूक्ष्म संस्कार हैं, जो किसी जाति की रीढ़ हुआ करते हैं, जिनकी वजह से उसका अस्तित्व होता है। इस प्रकार संस्कृति विकास की एक धारा है। 

संस्कृति और सभ्यता में घनिष्ट संबंध है। जिस जाति की संस्कृति उच्च स्तर की होती है, वही जाति ‘सभ्य’ कहलाती है और उसके मनुष्य सुसंस्कृत माने जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जो सुसंस्कृत है, वही सभ्य है और जो सभ्य है, वही सुसंस्कृत है। इन दोनों में सूक्ष्म भेद है। प्रत्येक जाति की अपनी-अपनी संस्कृति होती है। यह बात भी ज्ञातव्य है कि संस्कृति अच्छी या बुरी हो सकती है, लेकिन सभ्यता हमेशा अच्छी होती है। अतः सभ्यता के भीतर बहने वाली धारा को ही हम ‘संस्कृति’ कहते हैं। 

 संस्कृति का विकास देश की प्राकृतिक दशा, उपज और जलवायु पर निर्भर करता है। हमारे रहन-सहन और आचार-विचार सब पर प्रकृति का प्रभाव पड़ता है। उच्च स्तर की संस्कृति निम्न स्तर की संस्कृति को प्रभावित करती है, लेकिन आत्मसात नहीं कर पाती। उदाहरण के लिए, आर्य जाति की संस्कृति से हूण, कुषाण, शक आदि अन्य जातियां बहुत प्रभावित हुईं। भारतीय संस्कृति अत्यंत उत्तम है। यह समाज से संबंधित होने के कारण आपसी व्यवहार की वस्तु है। संस्कृति धर्म से प्रेरणा लेती है और उसे प्रभावित करती है। यदि धर्म एक सरोवर है, तो संस्कृति उसमें उत्पन्न कमल है। 

यद्यपि आत्मा और शरीर का पारस्परिक संबंध है, तथापि भारतीय संस्कृति आत्मा को मुख्य तथा शरीर को गौण मानती है। शरीर और मन की शुद्धि भी आवश्यक है। जब तक मनुष्य का शरीर एवं अंतर शुद्ध नहीं होता, तब तक वह गलत वस्तु को भी सही मानता रहता है। भारतीय संस्कृति का विकास धर्म का आधार लेकर हुआ है, तभी उसमें दृढ़ता है। भारतीय मनीषियों ने मानव चेतना को पंच कोषों के रूप में विभाजित किया है। ये पंच कोष इस प्रकार हैं-अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंदमय कोष। 

इन कोषों में प्रथम शरीर, द्वितीय प्राण तथा तृतीय मन को स्थूल माना जाता है। प्राण को संयत करने के लिए श्रम अर्थात कर्मयोग और मन को नियंत्रित करने के लिए राजयोग की विधि बताई गई है, जो अभ्यास पर निर्भर करती है। मनीषियों ने अभ्यास को ही एकमात्र साधन नहीं माना है। अभ्यास के साथ ही वैराग्य भी आवश्यक है। चित्त की स्थिरता अभ्यास और वैराग्य पर आश्रित है, तभी बुद्धि निर्मल होती है। उसी समय परम सत्य का साक्षात्कार होता है। 

परंपरागत भारतीय विश्वासों के अनुसार मनुष्य देव तथा पितृ ऋण लेकर संसार में आता है। अधिकांश लोगों की धारणा है कि इन ऋणों को चुकाए बिना मनुष्य साधना का अधिकारी नहीं हो सकता। भारतीय मनीषियों ने इन ऋणों को चुकाने का भी उपाय बताया है। उपाय यह है कि मनुष्य इन ऋणों को ऋणों के रूप में ही ग्रहण करे और अपने पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ाए। जल बरसाने वाला मेघ, अन्न उपजाने वाली पृथ्वी और प्रकाश देने वाला सूर्य हमें अनायास प्राप्त हो गए हैं। इन्हें देवता माना गया है। इनके ऋण से मुक्त होने के लिए हमारे पास जो कुछ है, उसे लोगों में बांटकर ही ग्रहण करना चाहिए। 

ऋषियों के ऋण से उऋण होने के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञान की धारा की रक्षा करें और उसे आगे बढ़ाएं। भारतीय संस्कृति में कर्तव्य, संयम, वैराग्य आदि पर विशेष बल दिया गया है। हमारे पतन का केवल एक ही कारण दृष्टिगोचर होता है-अपने उच्च आदर्शों की विस्मृति। भारतीय संस्कृति व्यक्ति को व्यक्तित्व देकर उसे महान कार्यों की प्रेरणा देती है और इन्हीं कार्यों के द्वारा हम अपनी संस्कृति की धारा को अक्षुण्ण बनाए रख सकते हैं।

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