भारत-चीन संबंध पर निबंध |Essay on India-China relationship in hindi

भारत-चीन संबंध पर निबंध

भारत-चीन संबंध पर निबंध (भारत और चीन के बीच बढ़ते मैत्री सम्बन्ध) |Essay on India-China relationship in hindi

चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ की नवम्बर 2006 में चार दिवसीय भारत यात्रा से निःसन्देह भारत-चीन सम्बन्धों को एक नई गति मिलने की सम्भावना है. इस अवसर पर चीन के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच समग्र सहयोग के लिए एक साझा घोषणा-पत्र भी जारी किया गया. यद्यपि घोषणा-पत्र में सर्वाधिक नाजुक तीन मुद्दों-सीमा विवाद (जिसे चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के ठीक पहले चीनी राजदूत ने गरमा दिया था), भारत का परमाणु कार्यक्रम और मुक्त व्यापार पर आम सहमति नहीं बनी, लेकिन दोनों देशों के लोगों का आपसी सम्पर्क, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, विद्यार्थियों की आपसी आवाजाही जैसे क्षेत्रों में किए गए सहयोग के कोई आधा दर्जन समझौते से यह स्पष्ट है कि देर-सबेर इन विवादास्पद मुद्दों का भी समाधान हो जाएगा. 10 सूत्रीय इस घोषणा-पत्र में दोनों देशों ने शांति और मदद का पुरजोर समर्थन करते हुए राजनीतिक तथा आर्थिक सम्बन्धों में और मजबूती लाने के लिए और उसकी नियमित समीक्षा हेतु शिखर सम्मेलन आयोजित करने की बात भी की. चीन द्वारा सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता हेतु कोई बाधा नहीं बनने का आश्वासन देना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों में चीन भी शामिल है और इन देशों को वीटो शक्ति प्राप्त है. इसके अलावा, भारत-चीन और रूस के बीच बातचीत में तेजी लाने पर जोर देते हुए चीन के राष्ट्रपति ने अपनी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था स्थापित करने की मंशा जाहिर की है, क्योंकि चीन यह भली-भांति जानता है कि वह अमरीका के वर्चस्व को अपने दम पर चुनौती नहीं दे सकता. दोनों देशों ने अपने 2010 तक के मिशन में आपसी व्यापार को मौजूदा 20 अरब डॉलर से बढ़ाकर दोगुना यानी 40 अरब डॉलर तक ले जाने, क्षेत्रीय व्यापार समझौते पर बने टास्क फोर्स द्वारा अक्टूबर 2007 तक रिपोर्ट देने और अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तेल और प्राकृतिक गैस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तथा सहयोग बढ़ाने की रणनीति का भी खुलासा किया. चीन के राष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि वह एशिया क्षेत्र में शांति और विकास हेतु निःस्वार्थ भाव से हर भूमिका निभाने को तैयार है. संयक्त वक्तव्य में आगामी दुसरे पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन में दोनों देशों द्वारा एशिया में निकटतर क्षेत्रीय सहयोग की सम्भावनाएं तलाशने पर भी जोर दिया गया है, जबकि दिसम्बर 2005 में कुआलालम्पुर में सम्पन्न पहले पूर्व एशियाई शिखर सम्मेलन में भारत की जोरदार पहल के बावजूद चीन तथा कुछेक अन्य राष्ट्रों ने उदासीनता दिखाई थी. यह चीन का भारत के प्रति बदलते दृष्टिकोण का परिचायक है, 

स्मरणीय है कि पिछले 25 वर्षों में भारत और चीन की अर्थव्यवस्था विश्व में सर्वाधिक गतिशील रही है और विश्व जीडीपी में दोनों ने नई ऊँचाइयों को छुआ है. यद्यपि इस मामले में अभी जापान शीर्ष पर है. इस अवधि में इन दोनों देशों ने यूरोपीय संघ के देशों एवं अमरीकी राष्ट्रीय आय में हुई वृद्धि को भी पीछे छोड़ दिया जो क्रमशः 1.5 प्रतिशत तथा 3 से 4 प्रतिशत के बीच थी, जबकि भारत और चीन की क्रमशः 6 तथा 10 प्रतिशत थी. दुनिया के जीडीपी में चीन की हिस्सेदारी तीन गुना है, जबकि भारत की दोगुनी है. वर्ष 2005 में भारत-चीन व्यापार में 38 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है. इसलिए प्रधानमंत्री ने पश्चिमी देशों से आग्रह किया है कि वे इस घटनाक्रम से परेशान न हों, क्योंकि गतिशील एशिया ही भविष्य में विश्व को विकास और शक्ति प्रदान करेगा तथा इससे यूरोप एवं अमरीका के लिए विकास के नए अवसर उपलब्ध होंगे. इसके बावजूद भारत के साथ चीन का व्यापार संतुलन घाटे में है. चीन मुख्य तौर पर भारत को मशीनरी, खनिज, प्लास्टिक और रबर तथा चीनी मिट्टी और शीशे से बने सामानों का निर्यात करता है, जबकि भारत से चीन को लौह अयस्क, खनिज पदार्थों, रसायन, प्लास्टिक, रबर, सूती कपड़ा, जेवरात, मशीनरी, समुद्री उत्पादों, कार्बनिक तथा अकार्बनिक रसायन, दवाओं, इलेक्ट्रिक उपकरण, चमड़ा, सब्जी और जूते का निर्यात किया जाता है. इसमें और विस्तार की जरूरत है. टेलीकॉम के क्षेत्र में भी चीन की उपलब्धि शानदार है. उसने बिना निजीकरण तथा विदेशी कम्पनियों के सहयोग के अपनी छह सरकारी कम्पनियों के मार्फत यह उपलब्धि हासिल की है. उसके टेलीफोन कनेक्शन भारत की अपेक्षा कई गुना ज्यादा हैं. भारत और चीन के बीच व्यापार पिछले 10 वर्षों में 15 गुना बढ़ा है, जबकि 1962 के युद्ध के बाद सामान्य स्थिति बहाल होने पर 1984 में यह लक्ष्य 9 अरब अमरीकी डॉलर रखा गया था. चीन के साथ व्यापार में तेजी लाने हेतु हमें व्यापारिक ढाँचे में सुधार और प्रौद्योगिकी सहयोग में बढ़ोतरी, सीमा पार व्यापार में वृद्धि, व्यापार तथा निवेश सम्बन्धी बाधाओं को दूर करने की जरूरत है. यह भी तथ्य है कि भारत-चीन के बीच पूँजी निवेश आशानुरूप नहीं है, लेकिन दोनों देशों की बाजार सम्भावनाएं यदि टटोली जाएं, तो 5 अरब डॉलर तक पारस्परिक निवेश सम्भव है. स्मरणीय है कि भारत और चीन के बीच 2003 में बैंकॉक समझौते के तहत् द्विपक्षीय व्यापार में तेजी लाने की वचनबद्धता व्यक्त की गई थी और चीन ने औसतन 13-5 प्रतिशत तक भारत के 217 वस्तुओं पर आयात शुल्क में कटौती करने का वादा किया था.

भारत-चीन के मध्य अधिक व्यापार हेतु सम्भावित क्षेत्र 

आईटी और कृषि जैसे क्षेत्रों के अलावा ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत और चीन के बीच सहयोग की काफी गुंजाइश है. भारत की तरह चीन को एक नई ऊर्जा रणनीति की जरूरत है. औद्योगिक राष्ट्रों ने नाभिकीय, सौर पवन तथा बायोगैस और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर बहुत काम किया है, परन्तु चीन की प्रौद्योगिकी क्षमता इस क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों से भी पीछे है. ऊर्जा के लिए केवल कोयले पर चीन की निर्भरता आने वाले समय में न केवल उसके लिए, बल्कि विश्व के पर्यावरण के लिए गम्भीर खतरा सिद्ध होगा, इसे चीन ने समझ लिया है और इसलिए वह क्लीन एनर्जी को सर्वोच्च प्राथमिकता देने लगा है. यहाँ तक कि उसने ‘ग्रीन जीडीपी’ की अवधारणा को ही विकास का आधार बनाने का निश्चय किया है. चीन में दूषित पेयजल और वायु प्रदूषण समस्या विकट है, इसलिए इस क्षेत्र में भी वह भारत के अनुभवों का लाभ उठा सकता है. अभी हाल ही में बीजिंग में सम्पन्न 5 प्रमुख तेल आयातक देशों के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में भारत के पेट्रोलियम मंत्री का यह सुझाव महत्वपूर्ण है कि एशियाई देशों को तेल का रणनीतिक भण्डार रखना चाहिए. इस बैठक में भारत और चीन के अलावा अमरीका, जापान और दक्षिण कोरिया ने भी भाग लिया. बैठक के बाद ऊर्जा मंत्रियों के साझा बयान में ऊर्जा के ग्लोबल मार्केट को खुला रखने और पारदर्शी, पर्याप्त तथा प्रतिस्पर्धी बनाने का आह्वान किया गया. उल्लेखनीय है कि यह बैठक मुख्यतः तेल की कीमतों को स्थिर रखने, अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को बरकरार रखने (जिसका पुरजोर समर्थन चीन के प्रधानमंत्री ने भी किया) तथा विकास की रफ्तार को कायम रखने पर केन्द्रित रही. यह भी उल्लेखनीय है कि विश्व के कुल तेल उत्पादन के करीब आधे हिस्से यानी 45.5 प्रतिशत का उपयोग ये पाँच देश ही करते हैं. भारत और चीन अपनी बढ़ती ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने हेतु दुनिया भर से तेल एवं प्राकृतिक गैस हासिल करने के लिए मिलकर काम करने पर भी सहमत हुए हैं. इसके लिए दोनों देशों द्वारा संयुक्त उपक्रम स्थापित करने की योजना है जिसमें खास जोर लातीन अमरीका तथा अफ्रीका के देशों पर होगा. 

जहाँ तक चीन के साथ विवादास्पद मुद्दों का सम्बन्ध है, न्यूक्लियर्स सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) के सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि यह परमाणु अप्रसार से सम्बन्धित 45 देशों का एक ग्रुप है जिसमें चीन भी एक सदस्य है. यह ग्रुप परमाणु तकनीक और उपकरणों का निर्यात करता है. नॉर्वे, स्वीडन, चीन तथा आस्ट्रेलिया जैसे देश भारत अमरीका परमाणु सहयोग पर शंका व्यक्त करते रहे हैं. अब इस मुद्दे पर चीन द्वारा समर्थन देना स्वागत योग्य कदम है. स्मरणीय है कि एनएसजी के समर्थन के बिना भारत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु तकनीक और उपकरणों का आयात नहीं कर सकता. सीमा विवाद पर पहले ही संयुक्त कार्यदल का गठन किया जा चुका है जिसमें सीमा विवाद को तर्कसंगत और शांतिपूर्ण तरीके से निपटाने की बात की गई है, परन्तु यहाँ हमें चीन की विस्तारवादी नीति को ध्यान में रखते हुए उस पर बराबर नजर रखना भी जरूरी है. चीन तिब्बत से लेकर पूर्वोत्तर के रास्ते कोलकाता तक एक व्यापारिक मार्ग तैयार करने की इच्छा रखता है जिसके पीछे उसकी मंशा यही है कि उसका माल कोलकाता में आसानी से उतर सके. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि चीन ने 1962 के युद्ध में भारत की 40 हजार वर्ग किमी जमीन पर कब्जा जमाया है और कश्मीर का 5180 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान को तोहफे के रूप में देकर चीन से इस्लामाबाद तक सड़क बन चुकी है. पाक अधिकृत कश्मीर का यह क्षेत्र उसके लिए वरदान साबित हुआ 

भारत-चीन मुक्त व्यापार

चीन के साथ मुक्त व्यापार के मुद्दे पर यह उल्लेखनीय है कि पहले ही चीनी माल विशेषकर खिलौना बाजार, बल्ब की लड़ी, बैटरी जैसे छोटे उत्पादों ने भारतीय बाजार की कमर तोड़ रखी है और एफटीए लागू होने पर भारतीय बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ना अवश्यम्भावी है. भारतीय उद्योगपतियों को चीनी कम्पनियों का माल भारत में डम्प करने के प्रति भी चिन्ता है. चीनी कम्पनियों की डम्पिंग नीति का सर्वाधिक दुष्प्रभाव भारत की केमिकल और पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री पर पड़ा है. भारत ने पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री में एंटी डम्पिंग से सम्बन्धित करीब 82 मामले दर्ज किए हैं इनमें से आधे से अधिक मामले चीन से सम्बन्धित हैं. अर्थशास्त्रियों की भी यह मान्यता है कि चीन भारत में निवेश की अपनी वचनबद्धता के प्रति गम्भीर नहीं रहा. 1992 के बाद भारतीय उद्योगपतियों ने चीन में 5 करोड़ डॉलर निवेश किया, जबकि चीन द्वारा 26 करोड़ डॉलर का निवेश करने का वादा करने के बावजूद अभी तक 30 लाख डालर का ही निवेश किया है. एफटीए यानी दो देशों के बीच ऐसा समझौता जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के उत्पादों की प्रविष्टि पर सीमा शुल्क पूरी तरह हटाने का नाममात्र करने पर सहमत होते हैं. एफटीए का एक दोष यह भी है कि चीन के मार्फत किसी भी दूसरे देश का जैसे ताइवान या मलेशिया का सस्ता माल भारत में आ सकता है, क्योंकि चीन के टैक्स कानून और सरकारी नियम भारत की तरह पारदर्शी नहीं हैं. इसलिए इस पर हमें कड़ी नजर रखनी होगी. पूर्वोत्तर में चीनी निवेश और चीनी कारोबार भी सुरक्षा के नजरिए से एक संवेदनशील मसला है. चीन की मुक्त व्यापार नीति भारत से सर्वथा उलट है. चीन ने मुक्त व्यापार को सशर्त स्वीकार किया है यानी विदेशी कम्पनियों के लिए चीन का हर क्षेत्र खुला नहीं है वह योजनाबद्ध तरीके से बारी-बारी व्यापार क्षेत्रों को मुक्त व्यापार के दायरे में लाने का पक्षधर है, जबकि भारत ने पश्चिम की तर्ज पर पूरे देश को दुनिया के लिए खोल दिया है. साथ ही चीन अपने सख्त प्रबन्धन तथा श्रम कानूनों के कारण अनेक प्रकार के उपभोक्ता माल का उत्पादन हमारी तुलना में बहुत कम मूल्य पर करने में सक्षम है. भारत और चीन ने नाथुला दर्रा से होकर 6 जुलाई, 2006 से सीमावर्ती व्यापार बहाल कर ऐतिहासिक समझौता किया और 44 साल बाद यह मार्ग खोला गया है, लेकिन इससे आशानुरूप परिणाम सामने नहीं आए. इसके तहत् भारत के सिर्फ 25 और चीन के 19 सामानों का व्यापार करने की अनुमति है. अभी हमारे पास चीन के बाजर के लिए पर्याप्त माल भी नहीं है. इसलिए एफटीए से पहले चीन की बराबरी करना जरूरी है. यह तभी सम्भव है, जबकि उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाई जाए, कर ढाँचे के साथ ही बुनियादी सुविधाओं में सुधार हो. 

अन्त में भारत-चीन के बीच प्रगाढ़ होते सम्बन्धों के बारे में विश्व बैंक के पूर्व प्रमुख जेम्स वोल्फ गैंग के कथन का उल्लेख करना यहाँ समीचीन होगा जिसमें उन्होंने भारत और चीन को आने वाले समय में दुनिया के आर्थिक विकास का इंजन बनने की सम्भावना व्यक्त की है. सम्भवतः उनकी टिप्पणी का आशय इन दोनों देशों द्वारा अखिल एशियाई आर्थिक समुदाय के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने से है. आखिर हो भी क्यों नहीं? दोनों राष्ट्र विश्व की कुल आबादी का एक-तिहाई भाग अपने में समेटे हैं. उम्मीद करें कि दोनों देशों के बीच की मैत्री समय की कसौटी में खरी उतरे और आने वाले समय में दुनिया का नियंत्रण ऐसे इन दो देशों के हाथों में हो जिन्हें आज विकासशील देश कहा जाता है. इससे जहाँ विश्व में आर्थिक शक्ति के एक नए समीकरण और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के एक नए भूगोल का सपना भी साकार होगा, वहीं दूसरी ओर संयुक्त दस्तावेज में उल्लिखित ‘Fair, just, equitable world order’ की भावना भी मूर्त रूप ग्रहण करेगी.

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