भारत और ब्रिक्स पर निबंध | Essay on India and BRICS

भारत और ब्रिक्स पर निबंध | Essay on India and BRICS

भारत और ब्रिक्स पर निबंध | Essay on India and BRICS

इसमें कोई दो राय नहीं है कि विगत कुछ वर्षों में भारत ने न सिर्फ विश्व मंच पर अपनी मजबूत स्थिति दर्ज करवाई है, वहीं अश्विक स्तर के संगठनों में भी उसकी भूमिका और दबदबा भी बढ़ा और यह बात बिक्स के परिप्रेक्ष्य में भी लागू होती है। भारत की गणना बिक्स के संस्थापक और मजबूत सदस्यों के रूप में होती है। 

ब्रिक्स दुनिया की पांच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है और भारत इस समूह का सबसे सक्रिय सदस्य है। एक संगठन के रूप में इसकी स्थापना वर्ष 2009 में हुई थी। तब इसमें चार ही देश-ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन शामिल थे और इसे ‘ब्रिक’ नाम दिया गया था। यह वह समय था, जब पूरा विश्व आर्थिक मंदी से जूझ रहा था। इस काल में जहां विश्व के सभी बड़े देश वित्तीय संकट से ग्रस्त थे, वहीं ब्राजील, रूस, भारत व चीन जैसे देश न सिर्फ इस वैश्विक समस्या से अछूते रहे, बल्कि एक नये आर्थिक संगठन की स्थापना भी कर दी। अप्रैल 2011 में चीन में इस संगठन का तीसरा सम्मेलन हुआ, जिसमें दक्षिण अफ्रीका को औपचारिक रूप से इस संगठन का सदस्य बनाया गया और यह ‘ब्रिक’ से ‘ब्रिक्स’ हो गया। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2050 तक ब्रिक्स के सदस्य देश विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में जाने जाएंगे। आज विश्व की 43 प्रतिशत जनसंख्या व कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 18 प्रतिशत हिस्सेदारी वाला यह समूह तेजी से उभर रही अर्थव्यवस्थाओं वाला समूह है। 

“बिवस दुनिया की पांच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है और भारत इस समूह का सबसे सक्रिय सदस्य है।” 

भारत इस समूह का एक बड़ा देश है और इसकी सक्रियता भी काफी है। ब्रिक्स के लिए भारत का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इक्कीसवी सदी में भारत की उपलब्धियां महत्त्वपूर्ण रहीं। सूचना तकनीक, अंतरिक्ष, सामरिक तथा परमाणु क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां हासिल कर भारत ने अपनी महत्त्वपूर्ण स्थिति बनाई है। वैश्विक मंदी में जब अमेरिका जैसे देशों की आर्थिक संस्थाएं दिवालिया हो रही थीं, तब भी भारत के वाणिज्यिक संस्थान पूरी गति से काम कर रहे थे। इस अवधि में देश के विकास दर की गति थोड़ी धीमी जरूर पड़ी, किन्तु आज हम पुनः 9 से 10 प्रतिशत की विकास दर प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं। वर्तमान में विश्व के 30 तेजी से विकसित शहरों में से 10 शहर भारत में हैं। भारत से जुड़ी ये स्थितियां ब्रिक्स के लिए लाभप्रद हैं। 

ब्रिक्स के संदर्भ में भारत के अन्य सदस्य देशों से द्विपक्षीय संबंध को देखें, तो भारत और ब्राजील के मध्य 8 मिलियन डॉलर का वार्षिक व्यापार होता है। कुछ समय पहले भारत तथा ब्राजील के मध्य सूचना प्रौद्योगिकी, नैनो प्रौद्योगिकी, शिक्षा तथा द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्र में समझौते हुए हैं, जिससे दोनों देश लाभान्वित हुए हैं। इसी प्रकार ब्रिक्स का नया सदस्य राष्ट्र दक्षिण अफ्रीका भी भारत का प्रमुख वाणिज्यिक सहयोगी देश है। जहां तक चीन का प्रश्न है, भारत तथा चीन के मध्य लगभग 300 वस्तुओं का व्यापार होता है। दक्षिण एशिया में दोनों देशों की स्थिति बराबर मजबूत हो रही है और इसी कारण दोनों कई मायनों में प्रतिस्पर्धी भी हैं। सीमा संबंधी विवाद, पाकिस्तान से चीन की मित्रता तथा रूस और अमेरिका से भारत की मित्रता आदि कुछ ऐसी स्थितियां हैं, जिनके कारण भारत और चीन के मध्य विश्वास का रिश्ता कायम नहीं हो पा रहा है, तथापि दोनों देश व्यापारिक हितों को लेकर सजग हैं और इस पर किसी भी प्रकार की आंच नहीं आने दे रहे हैं। रूस के साथ तो हमारे संबंध जग जाहिर हैं। इससे दोनों देशों के बीच लाभकारी स्थितियां निर्मित हो रही 

सकल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से भारत का स्थान ब्रिक्स सदस्यों में दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन प्रथम स्थान पर है। ब्रिक्स का सदस्य राष्ट्र रूस जहां क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान पर है, वहीं जनसंख्या की दृष्टि से चीन और भारत क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं। ब्रिक्स देशों की सामूहिक शक्ति उनकी व्यक्तिगत क्षमता का परिणाम है। सदस्य देशों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनकी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। जहां भारत और चीन ऊर्जा के सबसे बड़े उपभोक्ता देश हैं, वहीं रूस व ब्राजील ऊर्जा के सबसे बड़े उत्पादक राष्ट्र हैं। ब्राजील एवं रूस जहां खनिज और कच्चे माल के संदर्भ में समृद्ध देश हैं, वहीं चीन एवं भारत सेवा, विनिर्माण तकनीक के क्षेत्र में आगे हैं। भारत और ब्राजील जहां कृषि उत्पादन में अग्रणी राष्ट्र हैं, वहीं रूस तेल एवं प्राकृतिक गैस उत्पादन में अग्रणी है। ये सारी बातें ब्रिक्स के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत कर रही हैं। यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि वर्ष 2016 की स्थिति के अनुसार ब्रिक्स देशों की सम्मिलित जनसंख्या लगभग तीन बिलियन है, जो विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 44 प्रतिशत है। ब्रिक्स देशों का भौगोलिक क्षेत्रफल विश्व का 26 प्रतिशत है। विश्व के कुल जीडीपी में लगभग 20 प्रतिशत (क्रयशक्ति समता-पीपीपी आधार पर लगभग 40 प्रतिशत) भागीदारी ब्रिक्स देशों की है तथा वर्ष 2020 तक इनका कुल जीडीपी 50 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंचने का आकलन है। यह आर्थिक संगठन वैश्विक स्तर पर अपनी आर्थिक पकड़ मजबूत बनाने को उद्यत है। इस संगठन के सभी पांच देशों के बीच यह सहमति बन चुकी है कि वे मिलकर आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देंगे। ऐसा करने के लिए ही ब्रिक्स ने अपने दो नए वित्तीय संस्थानों ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) एवं ‘आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था’ (Contingency Reserve Arrange ment-CRA) को आकार देना शुरू कर दिया है। इस बैंक का मुख्यालय शंघाई में स्थापित किया जा चुका है, जिसका प्रथम अध्यक्ष बनने का गौरव प्रख्यात भारतीय बैंकर के.वी. कामथ को प्राप्त हुआ है |

“वैश्विक मंदी को निष्प्रभावी बनाते हुए ब्रिक्स के सदस्य राष्ट्रों ने जहां अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा और गति प्रदान की है, वहीं उन्होंने अपनी-अपनी अंदरूनी अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ और विकासोन्मुख बनाया है।” 

ब्रिक्स देशों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की प्रतियोगी न होकर पूरक हैं। इतना ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सभी देशों की सोच भी एक जैसी है और सभी मिलकर अमेरिकी और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देना चाहते हैं। यह एकरूपता, एकता, सामंजस्य और समन्वय ब्रिक्स के स्वर्णिम भविष्य और प्रगतिशील वर्तमान की ओर संकेत करता है। ब्रिक्स को हम एक लोकतांत्रिक शुरुआत के रूप में देख सकते हैं, क्योंकि इसके सदस्य देश मिलकर अमेरिकी वर्चस्व वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था को बहुपक्षीय, बहुध्रुवीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होते हुए देखना चाहते हैं। यह भी संयोग है कि सभी पांचों देश जी-20 जैसे संगठन के सदस्य हैं और वैश्विक आर्थिक मंदी के प्रभावों को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसी संदर्भ में इन सदस्यों का सम्मिलित प्रयास आईएमएफ तथा विश्व बैंक में सुधार की नीतियां लागू करने पर है। यह कहना असंगत न होगा कि ब्रिक्स का उदय पश्चिमी देशों के खिलाफ एक नई शक्ति के रूप में हुआ है। भले ही यह संगठन अभी अपने शैशवकाल में है, किन्तु इसके सदस्य देशों की एकजुटता और संकल्प यह बयां कर रहा है कि यह संगठन पश्चिमी देशों को चुनौती देते हुए जहां अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की बेहतरी के नये मानक स्थापित करेगा, वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र की बहाली का काम करेगा, जहां छोटे-बड़े, सशक्त-निशक्त सभी राष्ट्रों का समान महत्त्व होगा और चंद ताकतवर राष्ट्र मनमानी नहीं कर सकेंगे। वैश्विक फलक पर जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार होगा और उसकी स्थिति मजबूत होगी, वैसे-वैसे पश्चिमी दबाव और वर्चस्व के दिन भी पूरे होंगे। 

किसी भी संगठन के विकास के लिए उसकी अर्थव्यवस्था का मजबूत होना महत्त्वपूर्ण होता है। ये अच्छे संकेत हैं कि इस दिशा में ब्रिक्स के सदस्य राष्ट्रों ने कमर कस रखी है। वैश्विक मंदी को निष्प्रभावी बनाते हुए ब्रिक्स के सदस्य राष्ट्रों ने जहां अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा और गति प्रदान की है, वहीं उन्होंने अपनी-अपनी अंदरूनी अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ और विकासोन्मुख बनाया है। ब्रिक्स के सदस्य राष्ट्रों के उद्यमी भी परस्पर तालमेल बढ़ा रहे हैं, क्योंकि पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास पूंजी, तकनीक और प्रबंधन की बेजोड़ क्षमता उपलब्ध है, जिनके सामने विकासशील देशों की कंपनियों को टिकने में कठिनाई होती है। यही कारण है कि अब ब्रिक्स राष्ट्रों के उद्यमी मिलकर पश्चिमी देशों का मुकाबला करने को उद्यत हैं। अब वह समय आ चुका है, जब भारत की प्रबंधन क्षमता, ब्राजील की तकनीक और चीन की पूंजी के सामने पश्चिमी देश टिक नहीं सकेंगे और आने वाले समय में ब्रिक्स समूचे विश्व को चमत्कृत करेगा। 

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