भारत और बांग्लादेश संबंध पर निबंध | Essay on India and Bangladesh Relations

भारत और बांग्लादेश संबंध पर निबंध

भारत और बांग्लादेश संबंध पर निबंध | Essay on India and Bangladesh Relations

“मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य में भारत और बांग्लादेश की सरकारें तथा जनता, जिनके आदर्श और त्याग समान हैं, एक-दूसरे की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने, समानता और आपसी हितों के प्रति सम्मान पर आधारित संबंधों का निर्माण करेंगे।” 

वर्ष 1971 के छह दिसंबर को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने लोकसभा में उक्त उदगार तब व्यक्त किया था, जब वह नवसृजित राष्ट्र बांग्लादेश को स्वतंत्र गणराज्य के रूप में मान्यता दे रही थीं। भारत और बांग्लादेश के पुख्ता संबंधों की अहमियत को हम इसी बात से समझ सकते हैं कि बांग्लादेश को एक स्वतंत्र गणतंत्र के रूप में भारत ने ही सबसे पहले मान्यता दी थी। 

वर्ष 1971 में बांग्लादेश का उदय एक प्रभुसत्ता संपन्न स्वतंत्र राष्ट के रूप में हुआ था और उसकी मुक्ति में भारत ने महत्त्वपूर्ण भमिका निभाई थी। ऐसा करते हुए भारत ने अमेरिका और चीन जैसे देशों की भी परवाह नहीं की, जिन्होंने उस समय बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ दिया था। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने से पूर्व बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के रूप में पाकिस्तान का एक अंग था। मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के अग्रणी और सम्मानित नेता थे और वह स्वतंत्र बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति नियुक्त हुए। 

हर नवसृजित राष्ट्र के सामने कुछ व्यावहारिक दिक्कतें होती हैं। ये दिक्कते तब और बढ़ जाती है, जब उसका ही कोई पड़ोसी उसे तबाह करने पर आमादा हो। उस समय इस भूमिका में पाकिस्तान था और उसका मकसद बांग्लादेश को आर्थिक स्तर पर छिन्न-भिन्न कर देने का था। 

हर नवसृजित राष्ट्र के सामने कुछ व्यावहारिक दिक्कतें होती हैं। ये दिक्कते तब और बढ़ जाती है, जब उसका ही कोई पड़ोसी उसे तबाह करने पर आमादा हो। उस समय इस भूमिका में पाकिस्तान था 

और उसका मकसद बांग्लादेश को आर्थिक स्तर पर छिन्न-भिन्न कर देने का था। इसके अलावा बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग होने के बाद जहां जर्जर प्रौद्योगिक व्यवस्था सौगात में मिली थी, वहीं कृषि कार्य भी पिछड़े हुए थे। इस नवोदित राष्ट्र के समक्ष देश के पुनर्निर्माण एवं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती थी। स्वाभाविक है कि इसके लिए पड़ोसी राष्ट्रों से मदद और संबल की उसे जरूरत थी। भारत ने इस काम में एक सच्चे हितैषी की भूमिका निभाई और सहयोग का विशेष प्रस्ताव बांग्लादेश के समक्ष रखा। इस प्रकार दोनों देशों के मध्य जहां सहयोग बढ़ा, वहीं बांग्लादेश की निर्भरता भारत पर बढ़ती गई। सच तो यह है कि बांग्लादेश के नवनिर्माण में भारत ने अप्रतिम योगदान दिया। उसने न सिर्फ बहुत ही आसान शर्तों पर उदारतापूर्वक अपने इस पड़ोसी देश को ऋण उपलब्ध करवाया, बल्कि अपने विशेषज्ञों को बांग्लादेश भेजकर उसे सहयोग दिया। इस तरह भारत की भूमिका बांग्लादेश के प्रति एक शुभेच्छु और निकटतम सहयोगी की रही। यह सिलसिला अनवरत जारी है। हालांकि इसमें एक बार विघ्न तब पड़ा था, जब वर्ष 1975 में मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद वहां की राजनीति में बदलाव आया। उस समय दूरियां बढ़ीं, जिनका नुकसान भी बांग्लादेश को हुआ। 

भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध शुरू से ही अच्छे रहे हैं। दोनों देशों के मध्य अनेक ऐसे समझौते समय-समय पर होते रहे, जिनसे संबंधों की डोर और मजबूत हुई। इस संबंध में भारत बांग्लादेश शांति, मैत्री एवं सहयोग संधि (Indo-Bangladesh Treaty of Peace, Friendship and Co-operation) को विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है। यह संधि 19 मार्च, 1972 को 25 वर्षों के लिए हुई थी। इस संधि का मकसद यह था कि दोनों देश परस्पर शांति एवं मैत्री बनाए रखेंगे, साथ ही एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और अखंडता का सम्मान रखेंगे और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यह भी निश्चय किया गया कि न तो दोनों देश एक-दूसरे के विरुद्ध किसी सैनिक संधि में शामिल होंगे और न ही अपने देश की भूमि पर ऐसी गतिविधियों के संचालन की अनुमति देंगे, जो दूसरे देश के खिलाफ जाती हो। शिक्षा, विज्ञान, व्यापार, संस्कृति तथा खेलों को प्रोत्साहन देने तथा इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से जहां दोनों देशों के मध्य महत्त्वपूर्ण समझौता हुआ, वहीं 19 मई, 1974 को हुआ ‘सीमा समझौता’ भी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते में भी बांग्लादेश की भूमिका एक समझदार पड़ोसी की रही, जिससे दक्षिण एशिया में शांति बहाली का रास्ता साफ हुआ। भारत का रुख बांग्लादेश के प्रति कितना आत्मीय रहा इसका अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बांग्लादेश को अन्य देशों द्वारा मान्यता दिलवाने तथा उसको संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनवाने के लिए भारत ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 

भारत-बांग्लादेश के बीच संबंधों में अवरोध तब पैदा हुआ, जब वहां मुजीबर्रहमान के शासन के अंतिम वर्षों में भारत विरोधी शक्तियों ने अपनी गतिविधियां बढ़ानी शुरू की। 15 अगस्त 1975 को उनकी तथा उनके परिवार के सभी सदस्यों की हत्या के बाद बांग्लादेश में सैन्य शासन शुरू हुआ। इस समय वहां का संविधान परी तरह से बदल दिया गया। भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ने तथा इस्लामिक पार्टियों के प्रभाव के कारण यह देश पाकिस्तान की ओर उन्मुख हो गया। इसका परिणाम यह सामने आया कि सीमावर्ती भारतीय राज्यों में विघटनकारी तत्व सिर उठाने लगे, नतीजतन इन राज्यों में अस्थिरता बढ़ी। यह बांग्लादेश के लिए भी अस्थिरता का काल था और वहां के आंतरिक हालात बहुत खराब हो गये थे। यह अस्थिरता एक लंबे समय तक कायम रही और वर्ष 1976 से वर्ष 1991 तक का समय इस अस्थिरता का साक्षी बना, जोकि दोनों देशों के संबंधों की दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील रहा। अस्थिरता के  इस दौर में जहां भारत में बांग्लादेशी शरणार्थियों की समस्या बढ़ी, वहीं बांग्लादेश सरकार द्वारा सीमा विवाद खड़ा करने से स्थिति तनावपूर्ण हुई। दोनों देशों के बीच मतभेद भी बढ़े। इस उतार-चढ़ाव वाले दौर के बाद फरवरी, 2001 में बांग्लादेश में आम चुनाव हुए और नेशनल पार्टी की नेता खालिदा जिया के हाथ में वहां की सत्ता आई। इस तरह बांग्लादेश में दोबारा लोकतंत्र बहाल हुआ, जो दोनों देशों के संबंधों की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। बांग्लादेश की नई लोकतांत्रिक सरकार ने भारत के प्रति लचीला रुख अपनाया और भारत सरकार ने भी अपने इस पड़ोसी देश के साथ मधुर संबंध बनाने की दिशा में पहल की। इस दौरान जहां गंगा पानी के बंटवारे की दिशा में सकारात्मक पहल हुई, वहीं चकमा शरणार्थियों की समस्या समाधान में प्रगति हुई। बांग्लादेश की तरफ से चकमा शरणार्थियों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया और उनकी वापसी के लिए संयुक्त कार्यदल का गठन किया गया। फरवरी 2013 में नई दिल्ली में भारत और बांग्लादेश के मध्य हुए स्वास्थ्य समझौते को जहां महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, वहीं जनवरी, 2013 में दोनों देशों के मध्य ‘प्रत्यर्पण संधि’ पर भी हस्ताक्षर किये गये। दोनों देशों के मध्य ‘संशोधित वीजा प्रणाली’ पर भी सहमति बनने से रिश्तों में निकटता बढ़ी है। मई, 2019 में भारत के प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में बांग्लादेश के राष्ट्रपति अब्दुल हामिद शामिल हुए। इन सब पहलों का ही नतीजा है कि भारत एवं बांग्लादेश का द्विपक्षीय व्यापार जहां 2013 में 6.6 बिलियन डॉलर था वहीं 2018 में यह बढ़कर 10 बिलियन डॉलर हो गया। 

भारत के प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में बांग्लादेश के राष्ट्रपति अब्दुल हामिद शामिल हुए। इन सब पहलों का ही नतीजा है कि भारत एवं बांग्लादेश का द्विपक्षीय व्यापार जहां 2013 में 6.6 बिलियन डॉलर था वहीं 2018 में यह बढ़कर 10 बिलियन डॉलर हो गया। 

वर्ष 2008 में लोकतंत्र की हिमायती नेता शेख हसीना द्वारा बांग्लादेश की सत्ता सम्हालने के बाद भारत और बांग्लादेश के मध्य संबंधों के एक नये अध्याय की शुरुआत हुई है। फरवरी, 2011 में शेख हसीना भारत आईं। संबंध सुधार की दृष्टि से यह यात्रा न सिर्फ महत्त्वपूर्ण रही, बल्कि उपलब्धिपूर्ण भी रही। दोनों देशों के बीच एक सहमति पत्र और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के समझौतों पर हस्ताक्षर हए, जिनमें परस्पर विधिक सहायता, सजायाफ्ता कैदियों के हस्तांतरण व अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, संगठित अपराध एवं अवैध दवाओं की तस्करी रोकने जैसे महत्त्वपूर्ण अनुबंध सम्मिलित हैं। चटगांव और मंगला समुद्री बंदरगाहों का भारत द्वारा उपयोग किए जाने पर भी सहमति बनी, जिसके लिए भारत काफी समय से प्रयास कर रहा था। रेल व सड़क परिवहन से जुड़े तथा माल ढुलाई से संबंधित महत्त्वपूर्ण अनुबंध भी हुए। नये अनुबंधों के तहत दोनों देशों के बीच त्रिपुरा के अगरतला और बांग्लादेश के अखौरा को रेलमार्ग से जोड़ने पर भी सहमति बनी। इसी क्रम में जून, 2015 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए, जिनमें ऐतिहासिक भू-सीमा समझौता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहा। इसके तहत दोनों देशों द्वारा 1974 के भारत-बांग्लादेश भू-सीमा समझौता तथा भू-सीमा समझौते पर 2011 के प्रोटोकाल के संदर्भ में अनुसमर्थन पत्रों के आदान-प्रदान हेतु प्रोटोकाल हस्ताक्षरित हुआ तथा 1974 के भू-सीमा समझौते और 2011 के प्रोटोकाल की क्रियान्वयन व्यवस्था हेतु दस्तावेजों का आदान-प्रदान हुआ। इस बहुप्रतीक्षित भू सीमा समझौते के तहत दोनों देशों के एक-दूसरे के भू-क्षेत्र में स्थित एनक्लेवों का आदान-प्रदान होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तथा इस हेतु भारत की संसद द्वारा संविधान में 100वां संशोधन भी किया जा चुका है। एनक्लेवों में रहने वालों को अपनी राष्ट्रीयता का चुनाव करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इस तरह संबंधों को नये आयाम मिले। 

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि भारत और बांग्लादेश के संबंधों में उतार-चढ़ाव बेशक आते रहे, किन्तु उनमें एक अनिवार्य घनिष्ठता और निर्भरता बनी रही। हालांकि अभी दोनों देशों के बीच जल विवाद कायम है, जिसका समाधान निकाला जाना अत्यंत आवश्यक है। इससे संबंधों की गरिमा भी बढ़ेगी। हालांकि इस दिशा में द्विपक्षीय प्रयास जारी हैं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इस समस्या का कोई सम्मानजनक समाधान निकल आएगा। 

भारत और बांग्लादेश दोनों देशों की जनता चाहती है कि संबंधों की गर्माहट बनी रहे। शेख हसीना का रुख भी एक अच्छे सहयोगी का है। भारत विरोधी एवं विघटनकारी तत्वों को शेख हसीना ने प्रश्रय न देकर यह संदेश दिया है कि भारत के प्रति उनके इरादे नेक हैं। यही वह समय है कि दोनों देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की पैरोकारी करें तथा परस्पर सहयोग को बढ़ाकर दोस्ती की मिसाल कायम करें। 

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