यदि मैं शिक्षक होता हिंदी निबंध |Essay on If I were a Teacher in Hindi

यदि मैं शिक्षक होता हिंदी निबंध

यदि मैं शिक्षक होता हिंदी निबंध -Essay on If I were a Teacher in Hindi

जीवन के प्रारंभ से ही मैं शिक्षक बनने का इच्छुक रहा हूं। इसका कारण है-अपने राष्ट्र के भावी कर्णधारों तथा मनु की संतानों को शिक्षा के माध्यम से मानवता का पाठ पढ़ाना और अपने विद्यार्थियों को वास्तविक मनुष्य बनाना। 

गुरु-शिष्य के संबंधों का निर्वाह भी मैं अध्यापक बनने पर भली-भांति करूंगा। अगर मैं अध्यापक होता, तो महात्मा बुद्ध की ये बातें अवश्य ही याद रखता, “गुरु को आकाशधर्मी होना चाहिए, शिलाधर्मी नहीं। जिस प्रकार लता, विरुद, वनस्पति एवं शास्त्र संपदा को सहज स्वाभाविक रूप से विकास प्राप्त करने में सहयोग देने के लिए सुदूर प्रसारी और मुक्त आकाश उन्हें अहर्निश आवश्यक ऊर्जा, ताप, वायु तथा जल प्रदान करता रहता है, उसी प्रकार शिष्य के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षक को उचित परिस्थितियों का सृजन करना चाहिए। 

मेरा दृढ़ निश्चय है कि आदर्श शिक्षक बनने के लिए मैं उपयुक्त गुणों, स्वभाव, संस्कार और आचरण को अवश्य आत्मसात् कर लूंगा। आज भौतिकता की अंधी दौड़, भ्रष्ट प्रशासन तंत्र, गंदी राजनीति, आर्थिक वैषम्यता तथा संकीर्ण सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता में फंसे समाज की व्यवस्था के चलते शिक्षक का कार्य बहुत अधिक जटिल हो गया है। 

इस दयनीय परिस्थिति ने शिक्षण संस्थानों को अध्ययन एवं चरित्र निर्माण की पावन पीठस्थली के स्थान पर अराजकता और अनुशासनहीनता का खुला अखाड़ा बना दिया है। परिणाम स्वरूप आज का औसत छात्र शिक्षक वर्ग को अपना मार्गदर्शक न मानकर उसे अत्याचारी शासक मानता है और परीक्षाओं में नकल करने की सुविधा न मिलने पर अपने को सताया हुआ महसूस करता है। अतः शिक्षकों के प्रति आक्रोश प्रकट करने के लिए वह उनकी कक्षाओं में कुत्ते और सियार की बोलियां बोलता है। वह उनके विरुद्ध संगठित होकर जुलूस निकालता है तथा पोस्टरबाजी के माध्यम से जनसाधारण को बताता है कि छात्र समुदाय पर शिक्षकों द्वारा जुल्म ढाया जा रहा है। 

मैं अच्छी तरह अनुभव कर रहा हूं कि ऐसे बिगड़े माहौल में मुझ जैसे आदर्शवादी शिक्षक के लिए अपना मिशन पूरा करना अत्यंत कष्टसाध्य कार्य होगा, फिर भी मैं हताश नहीं होऊंगा। यदि मैं अपने कार्यकाल में भगवान वेदव्यास और स्वामी विवेकानंद के आदर्शों की कसौटी पर खरा उतरने वाले एक भी मनुष्य का निर्माण कर सका, तो मान लूंगा कि मैं सफल हूं। कहने का तात्पर्य यह है कि मैं एक आदर्श शिक्षक के रूप में अपने छात्रों को अध्यापन के साथ-साथ उनका समुचित मार्गदर्शन करूंगा। विषय से संबंधित भरसक ज्ञान देने के अतिरिक्त उन्हें समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने तथा देश में खुशहाली लाने के प्रति प्रेरित करूंगा। इस प्रकार वे देश के एक अच्छे नागरिक एवं भावी कर्णधार सिद्ध होंगे।

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